डिजिटल सर्विस टैक्स (Digital Services Tax – DST): वैश्विक विवाद और भारत सहित दुनिया पर प्रभाव

डिजिटल युग में वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। इंटरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल सेवाओं के प्रसार ने न केवल जीवन शैली को प्रभावित किया है, बल्कि कर प्रणाली (Taxation System) को भी नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर दिया है। पारंपरिक कर व्यवस्था मुख्यतः भौतिक उपस्थिति (Physical Presence) और मुनाफे (Profits) पर आधारित होती है। लेकिन डिजिटल कंपनियाँ—विशेषकर बड़ी अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जैसे Google (Alphabet), Meta (Facebook), Amazon और Apple—कई देशों से भारी राजस्व (Revenue) अर्जित करती हैं, जबकि वहाँ उनकी कोई ठोस भौतिक उपस्थिति नहीं होती।

इसी असमानता को दूर करने और डिजिटल सेवाओं से होने वाले राजस्व को कराधान (Taxation) के दायरे में लाने के लिए कई देशों ने डिजिटल सर्विस टैक्स (DST) लागू किया। हालांकि, यह कदम अमेरिका के लिए विवाद का कारण बना, क्योंकि DST का सबसे अधिक असर उसकी टेक दिग्गज कंपनियों पर पड़ा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यहाँ तक चेतावनी दी थी कि यदि यूरोप, भारत या अन्य देश DST पर जोर देंगे, तो अमेरिका उनके उत्पादों पर भारी टैरिफ (Tariffs) लगाएगा।

इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि DST क्या है, इसकी विशेषताएँ, अमेरिका और अन्य देशों की चिंताएँ, अंतर्राष्ट्रीय बहस, भारत की स्थिति और इस पूरे मुद्दे का वैश्विक व्यापार पर क्या असर पड़ सकता है।

डिजिटल सर्विस टैक्स (DST) क्या है?

डिजिटल सर्विस टैक्स (Digital Services Tax – DST) एक ऐसा राजस्व–आधारित कर (Revenue-based Tax) है, जो बड़ी डिजिटल कंपनियों पर तब लगाया जाता है जब वे किसी देश के उपयोगकर्ताओं (Users) को डिजिटल सेवाएँ प्रदान करती हैं।

पारंपरिक कर और DST में अंतर

  • कॉर्पोरेट टैक्स: मुनाफे (Profits) पर लगाया जाता है।
  • ऑनलाइन सेल्स टैक्स या VAT: उत्पाद या सेवा की बिक्री कीमत पर लगाया जाता है।
  • DST: कंपनी की डिजिटल गतिविधियों से उत्पन्न कुल राजस्व (Gross Revenue) पर लगाया जाता है—चाहे कंपनी को मुनाफा हो या न हो।

DST किन पर लागू होता है?

  • ऑनलाइन विज्ञापन (Online Advertising)
  • डिजिटल मार्केटप्लेस (Digital Marketplaces)
  • स्ट्रीमिंग सेवाएँ (Streaming Services)
  • उपभोक्ता डेटा की बिक्री (Sale of User Data)
  • मोबाइल ऐप स्टोर कमीशन (App Store Commissions)

डिजिटल सर्विस टैक्स की विशेषताएँ

  1. Revenue-Based Tax (राजस्व आधारित कर)
    DST सीधे कंपनी के राजस्व पर आधारित होता है। मुनाफा या घाटा इससे अप्रासंगिक है।
  2. बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर फोकस
    यह टैक्स मुख्य रूप से बड़ी कंपनियों (Big Tech) को लक्ष्य करता है, जिनके पास वैश्विक स्तर पर अरबों डॉलर का कारोबार होता है।
  3. Jurisdiction-Specific (देश–विशिष्ट)
    DST कंपनी की भौतिक उपस्थिति पर नहीं, बल्कि उपयोगकर्ताओं के स्थान (User Location) पर आधारित होता है। उदाहरण के लिए, यदि भारत में उपयोगकर्ता YouTube या Facebook का इस्तेमाल करते हैं, तो उससे Google या Meta को मिलने वाले राजस्व पर भारत DST लगा सकता है।
  4. डिजिटल अर्थव्यवस्था से मूल्य (Value) प्राप्त करना
    DST का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी देश के उपयोगकर्ता डिजिटल सेवाओं से मूल्य उत्पन्न कर रहे हैं तो उस देश को उसका कर हिस्सा मिल सके।

अमेरिका और DST विवाद

ट्रंप की चिंता और तर्क

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने DST के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया दी। उनके तर्क निम्नलिखित थे:

  1. अमेरिकी टेक कंपनियों पर सीधा असर
    DST सीधे तौर पर Google, Facebook, Amazon और Apple जैसी अमेरिकी कंपनियों को नुकसान पहुँचाता है। ट्रंप प्रशासन ने इसे “अमेरिका विरोधी कदम” (Anti-American Step) करार दिया।
  2. दोहरा टैक्सेशन (Double Taxation) का खतरा
    अमेरिकी कंपनियाँ पहले ही अमेरिका में टैक्स देती हैं। यदि हर देश अलग-अलग DST लगाएगा तो इन कंपनियों पर अतिरिक्त कर बोझ बढ़ जाएगा।
  3. वैश्विक व्यापार नियमों का उल्लंघन
    ट्रम्प प्रशासन ने तर्क दिया कि DST WTO के निष्पक्ष व्यापार सिद्धांतों के खिलाफ है और इसे भेदभावपूर्ण (Discriminatory Tax) माना।
  4. अमेरिकी निर्यात और निवेश पर असर
    DST से अमेरिकी कंपनियों की लागत बढ़ेगी, जिससे उनके मुनाफे में गिरावट और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता पर असर पड़ेगा।
  5. प्रतिशोधी टैरिफ की धमकी
    ट्रम्प ने चेतावनी दी कि DST लगाने वाले देशों के उत्पादों पर अमेरिका भारी टैरिफ लगाएगा, ताकि उन्हें अमेरिकी कंपनियों के खिलाफ कर नीति से रोका जा सके।

DST पर वैश्विक बहस

यूरोप और DST

फ्रांस, इटली, स्पेन और ऑस्ट्रिया जैसे यूरोपीय देशों ने पहले DST लागू किया। फ्रांस का DST अमेरिकी कंपनियों पर सबसे अधिक प्रभावी साबित हुआ।

अमेरिका ने फ्रांस पर 25% टैरिफ लगाने की धमकी दी थी, विशेषकर वाइन और लग्ज़री उत्पादों पर। बाद में इस विवाद को अस्थायी रूप से टाला गया, लेकिन तनाव बरकरार रहा।

OECD की पहल

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) ने “BEPS – Base Erosion and Profit Shifting” परियोजना के तहत एक वैश्विक कर समझौते (Global Tax Agreement) की दिशा में काम शुरू किया।

  • उद्देश्य: हर देश को न्यायसंगत कर हिस्सा दिलाना और DST जैसे एकतरफा कदमों से बचना।
  • लेकिन अभी तक सभी देश किसी एक फार्मूले पर सहमत नहीं हो पाए हैं।

भारत का डिजिटल टैक्स मॉडल

भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था में दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक है। Google, Amazon, Meta जैसी कंपनियाँ यहाँ से अरबों डॉलर कमाती हैं। लाखों लोग प्रतिदिन Google, Facebook, Amazon, Flipkart, Netflix जैसी सेवाओं का उपयोग करते हैं। इन सेवाओं से भारी राजस्व तो उत्पन्न होता है, लेकिन इन कंपनियों का भारत में सीमित कर भुगतान होता है। इस असंतुलन को दूर करने के लिए भारत ने अपना विशेष टैक्स ढाँचा तैयार किया।

2016: Equalisation Levy की शुरुआत

  • भारत ने 2016 में Equalisation Levy लागू की, जिसे “Google Tax” भी कहा गया।
  • यह शुरुआती रूप से ऑनलाइन विज्ञापन सेवाओं पर 6% था।
  • इसका उद्देश्य विदेशी डिजिटल कंपनियों को कर दायरे में लाना था।

2020: Equalisation Levy 2.0

  • 2020 में भारत ने इसे और विस्तारित किया।
  • अब विदेशी ई-कॉमर्स ऑपरेटरों (जैसे Amazon, Flipkart Singapore, Alibaba आदि) की ऑनलाइन बिक्री पर 2% टैक्स लगाया गया।
  • इसके बाद Netflix जैसी स्ट्रीमिंग सेवाओं, Apple App Store और Google Play Store से होने वाली आय भी इसके दायरे में आ गई।

Equalisation Levy और DST का फर्क

हालाँकि Equalisation Levy और DST दोनों का मकसद समान है—डिजिटल कंपनियों से राजस्व अर्जित करना—लेकिन दोनों में कुछ अंतर हैं:

  1. Equalisation Levy भारत का एक विशेष घरेलू प्रावधान है, जबकि DST शब्द का प्रयोग वैश्विक बहस के संदर्भ में होता है।
  2. Equalisation Levy को Income Tax Act से अलग रखा गया है, जबकि DST कई देशों में कॉर्पोरेट टैक्स का ही हिस्सा है।
  3. Equalisation Levy अपेक्षाकृत कम दर (2% या 6%) पर लगाई जाती है, जबकि कुछ देशों में DST की दर 3–7% तक हो सकती है।
  4. Equalisation Levy का फोकस विशिष्ट सेवाओं और ई-कॉमर्स लेनदेन पर है, जबकि DST का दायरा अपेक्षाकृत व्यापक होता है।

भारतीय स्टार्टअप्स और डिजिटल कंपनियों पर असर

भारत में DST और Equalisation Levy का दोहरा प्रभाव देखा गया है।

  1. सकारात्मक असर
    • इससे विदेशी कंपनियों पर कर बोझ बढ़ता है, जिससे स्थानीय स्टार्टअप्स और डिजिटल कंपनियों को प्रतिस्पर्धा में कुछ राहत मिलती है।
    • भारतीय सरकार को अतिरिक्त राजस्व मिलता है, जिससे डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा दिया जा सकता है।
  2. नकारात्मक असर
    • विदेशी कंपनियाँ अक्सर टैक्स का बोझ भारतीय उपभोक्ताओं और व्यवसायों पर डाल देती हैं। उदाहरण के लिए, Google ने अपने विज्ञापन दरों में वृद्धि की।
    • छोटे भारतीय स्टार्टअप्स, जो विदेशी प्लेटफॉर्म पर निर्भर हैं, उनकी लागत बढ़ जाती है।
    • निवेशकों को आशंका रहती है कि बार-बार टैक्स बदलाव से व्यवसायिक माहौल अस्थिर हो सकता है।

अमेरिका की प्रतिक्रिया

अमेरिका ने भारत के DST को लेकर चिंता जताई और इसे भेदभावपूर्ण कहा। USTR (United States Trade Representative) ने इसकी जाँच की और पाया कि यह मुख्यतः अमेरिकी कंपनियों को प्रभावित करता है। हालांकि, भारत ने अपने निर्णय को सही ठहराया और कहा कि यह केवल डिजिटल कारोबार में न्याय सुनिश्चित करने का तरीका है।

भारत-अमेरिका संबंधों पर प्रभाव

भारत और अमेरिका दोनों ही बड़े व्यापारिक साझेदार हैं। लेकिन DST और Equalisation Levy को लेकर दोनों के बीच कई बार मतभेद हुए हैं।

  • अमेरिका का तर्क है कि Equalisation Levy केवल अमेरिकी कंपनियों को लक्ष्य करती है, इसलिए यह “भेदभावपूर्ण” है।
  • भारत का कहना है कि यह टैक्स किसी विशेष देश को लक्ष्य नहीं करता, बल्कि डिजिटल सेवाओं से उत्पन्न मूल्य को कर प्रणाली में शामिल करता है।
  • USTR (United States Trade Representative) ने 2021 में भारत के DST की जाँच की और इसे अनुचित पाया। हालांकि अमेरिका ने टैरिफ लगाने का निर्णय स्थगित कर दिया।

DST के पक्ष और विपक्ष

DST के पक्ष में तर्क

  1. कर न्याय (Tax Justice) – उपयोगकर्ता जहाँ हैं, उस देश को कर मिलना चाहिए।
  2. स्थानीय कंपनियों को सुरक्षा – स्थानीय डिजिटल स्टार्टअप्स और MSMEs के लिए समान अवसर।
  3. राजस्व वृद्धि – विकासशील देशों को अतिरिक्त टैक्स राजस्व मिलता है।
  4. डिजिटल अर्थव्यवस्था का नियमन – बड़ी कंपनियों की एकाधिकार प्रवृत्ति पर अंकुश।

DST के खिलाफ तर्क

  1. दोहरा टैक्सेशन – कंपनियाँ कई देशों में एक ही राजस्व पर बार-बार टैक्स देंगी।
  2. वैश्विक व्यापार तनाव – अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में टैरिफ युद्ध छिड़ सकता है।
  3. उपभोक्ता पर बोझ – अंततः DST की लागत उपभोक्ताओं पर डाली जा सकती है।
  4. निवेश में कमी – विदेशी कंपनियाँ DST वाले देशों में निवेश करने से बच सकती हैं।

DST के पक्ष और विपक्ष (भारत के संदर्भ में)

भारत के लिए फायदे

  1. अतिरिक्त कर राजस्व (2021-22 में Equalisation Levy से लगभग 4,000 करोड़ रुपये मिले)।
  2. भारतीय स्टार्टअप्स को आंशिक प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त।
  3. कर न्याय (Tax Fairness) – जहाँ उपयोगकर्ता हैं, वहीं टैक्स मिलना चाहिए।

भारत के लिए चुनौतियाँ

  1. अमेरिकी दबाव और टैरिफ की धमकी।
  2. विदेशी निवेश पर नकारात्मक असर।
  3. उपभोक्ताओं और छोटे व्यवसायों पर अतिरिक्त लागत।
  4. वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ने का खतरा, यदि OECD का साझा समाधान लागू हो गया।

भारत का दृष्टिकोण

DST विवाद अभी भी सुलझा नहीं है। OECD एक वैश्विक न्यूनतम कॉर्पोरेट टैक्स (Global Minimum Corporate Tax – 15%) पर सहमति बनाने की कोशिश कर रहा है, ताकि सभी देशों को राजस्व का उचित हिस्सा मिल सके। भारत लगातार OECD की बहुपक्षीय चर्चाओं में भाग ले रहा है। यदि वैश्विक न्यूनतम कॉर्पोरेट टैक्स (15%) और “Pillar One” (डिजिटल कंपनियों का लाभ उपयोगकर्ता-आधारित देशों में बाँटना) लागू हो जाता है, तो भारत को Equalisation Levy जैसे प्रावधान हटाने पड़ सकते हैं।

हालांकि, जब तक वैश्विक सहमति नहीं बनती, भारत के लिए Equalisation Levy और DST जैसे उपाय राजस्व जुटाने और कर न्याय सुनिश्चित करने का एक व्यावहारिक साधन बने रहेंगे।

भविष्य की राह

यदि सभी देश सहमत हो जाते हैं, तो DST जैसे एकतरफा कर धीरे-धीरे हटाए जा सकते हैं। लेकिन यदि सहमति नहीं बनती, तो अमेरिका और DST लगाने वाले देशों के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ सकता है।

भारत जैसे देशों के लिए यह चुनौती है कि वे डिजिटल सेवाओं से राजस्व सुनिश्चित करें, लेकिन साथ ही अमेरिका जैसे बड़े व्यापारिक साझेदार से संबंध भी खराब न हों।

निष्कर्ष

भारत ने डिजिटल कराधान में अग्रणी भूमिका निभाई है। Equalisation Levy और DST जैसे प्रावधानों से उसने यह संदेश दिया है कि वैश्विक डिजिटल कंपनियाँ भारतीय बाजार से अरबों डॉलर कमाकर कर से बच नहीं सकतीं।

फिर भी, भारत को यह संतुलन साधना होगा कि वह राजस्व संग्रह करे लेकिन साथ ही विदेशी निवेश और व्यापारिक संबंध भी न बिगाड़े। आने वाले वर्षों में भारत की कर नीति इस बात पर निर्भर करेगी कि OECD और G20 के तहत वैश्विक कर सुधार किस गति से लागू होते हैं।

डिजिटल सर्विस टैक्स (DST) आधुनिक कर नीति का एक जटिल और विवादास्पद विषय है। यह उस वास्तविकता को दर्शाता है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था ने पारंपरिक कर ढाँचे को चुनौती दी है।

जहाँ एक ओर DST विकासशील और उपभोक्ता-प्रधान देशों के लिए राजस्व संग्रह का एक न्यायसंगत साधन है, वहीं अमेरिका और उसकी टेक कंपनियाँ इसे भेदभावपूर्ण और व्यापार विरोधी कदम मानती हैं।

भविष्य में समाधान केवल वैश्विक सहमति से ही संभव है। यदि OECD का बहुपक्षीय कर समझौता लागू होता है तो DST की प्रासंगिकता कम हो सकती है। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक DST अमेरिका और अन्य देशों के बीच नए आर्थिक तनाव का केंद्र बना रहेगा।


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