कबीर दास जी | जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएँ एवं भाषा

कबीर दास जी भारत के एक महान संत तथा हिंदी साहित्य की मध्यकालीन भक्ति-साहित्य की निर्गुण धारा (ज्ञानाश्रयी शाखा) के अत्यंत महत्त्वपूर्ण और विद्रोही संत-कवि के रूप में जाने जाते हैं, जो जीवन पर्यन्त समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। कबीर दास जी हिंदी साहित्य की निर्गुण भक्ति शाखा के प्रमुख कवि थे। कबीर दास जी लोगों के बीच व्याप्त अन्धविश्वास को दूर करने का प्रयास करते रहे। वह कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे, जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकती है। उनका सम्पूर्ण जीवन लोक कल्याण हेतु समर्पित था।

कबीर दास जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनकी प्रतिभा में अबाध गति और अदम्य प्रखरता थी। समाज में कबीर दास जी को जागरण युग का अग्रदूत कहा जाता है। कबीर दास जी के कुछ महान लेखन बीजक, कबीर ग्रंथावली, अनुराग सागर, साखी ग्रंथ हैं। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने बचपन में ही अपने गुरु रामानंद से अपना सारा आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्राप्त कर लिया था। वे बहुत आध्यात्मिक व्यक्ति तथा एक महान साधु थे। अपनी प्रभावशाली परंपराओं और संस्कृति के कारण उन्हें दुनिया भर में प्रसिद्धि मिली।

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कबीरदास जी का परिचय | Kabirdas Biography

नामसंत कबीर दास
अन्य नामकबीरदास, कबीर परमेश्वर, कबीर साहब, कबीरा
जन्मसन् 1398 (विक्रम संवत 1455) लहरतारा, काशी, उत्तर प्रदेश
मृत्युसन् 1518 (विक्रम संवत 1575) मगहर, उत्तर प्रदेश (120 वर्ष)
नागरिकताभारतीय
शिक्षानिरक्षर (पढ़े-लिखे नहीं)
पेशासंत (ज्ञानाश्रयी निर्गुण), कवि, समाज सुधारक, जुलाहा
पिता-मातानीरू, नीमा
गुरुरामानंद
मुख्य रचनाएंसबद, रमैनी, बीजक, कबीर दोहावली, कबीर शब्दावली, अनुराग सागर, अमर मूल
भाषाअवधी, साधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी

कबीर दास जी का जन्म एवं जन्म-सम्बन्धी मत

भारत के महान संत, समाज सुधारक और निर्गुण भक्ति परम्परा के प्रमुख कवि संत कबीर दास जी के जन्म के संबंध में विद्वानों और कबीरपंथियों में मतभेद पाए जाते हैं। सामान्यतः यह माना जाता है कि उनका जन्म सन 1398 ई. के आसपास हुआ था। किंतु उनके जन्म, जन्मस्थान और माता-पिता के विषय में कोई सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

कबीर दास जी का जन्म : जुलाहा परिवार की मान्यता

लोकप्रिय और प्रचलित मत के अनुसार, कबीर दास जी का जन्म काशी (वर्तमान वाराणसी) में एक जुलाहा परिवार में हुआ था। उनके पालक पिता का नाम नीरू तथा माता का नाम नीमा बताया जाता है। कहा जाता है कि नीरू और नीमा गंगा तट की सीढ़ियों से गुजर रहे थे, तभी उन्होंने एक नवजात शिशु को वहाँ पड़ा देखा। वे उस बालक को अपने घर ले आए और उसका पालन-पोषण किया। यही बालक आगे चलकर कबीर दास के नाम से विख्यात हुए।

स्वयं कबीर ने भी कई स्थानों पर अपने को जुलाहा कहा है—

“जाति जुलाहा नाम कबीरा,
बनि बनि फिरो उदासी।”

जाति जुलाहा मति कौ धीर। हरषि गुन रमै कबीर।

और—

“तू ब्राह्मन मैं काशी का जुलाहा।”

इन पंक्तियों से यह संकेत मिलता है कि वे अपने सामाजिक वर्ग को लेकर पूर्णतः सजग और गर्वशील थे।

विधवा ब्राह्मणी से जन्म की मान्यता

कुछ विद्वानों का मत है कि कबीर दास जी जन्म से मुसलमान नहीं थे, बल्कि वे किसी विधवा ब्राह्मणी के पुत्र थे। लोककथाओं के अनुसार, लोक-लाज के भय से उस ब्राह्मणी ने जन्म के तुरंत बाद शिशु को काशी में गंगा तट की सीढ़ियों पर छोड़ दिया था।

एक किंवदंती के अनुसार, उस ब्राह्मणी को स्वामी रामानंद जी ने भूलवश पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था। इसी कारण यह बालक जन्मा, किंतु सामाजिक भय के कारण उसे त्याग दिया गया। बाद में नीरू-नीमा ने उसका पालन-पोषण किया। हालांकि, यह मत भी ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में विवादित है।

कबीरपंथियों की मान्यता : लहरतारा तालाब से प्राकट्य

कबीरपंथियों के अनुसार, कबीर दास जी का जन्म साधारण रूप से न होकर दैवी प्राकट्य के रूप में हुआ था। उनकी मान्यता है कि कबीर काशी के लहरतारा तालाब में कमल पुष्प पर प्रकट हुए।

इस विश्वास को व्यक्त करने वाला एक प्रसिद्ध पद्य कबीरपंथ में प्रचलित है—

चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ ठए।
जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी तिथि प्रगट भए॥
घन गरजें दामिनि दमके, बूँदे बरषें झर लाग गए।
लहर तलाब में कमल खिले, तहँ कबीर भानु प्रगट भए॥

यह पद्य कबीर को एक दिव्य अवतार के रूप में प्रस्तुत करता है।

कबीर दास जी और स्वामी रामानंद : गुरु-शिष्य संबंध

कबीर दास जी ने स्वामी रामानंद जी को अपना गुरु माना। लोककथा के अनुसार, एक दिन कबीर तड़के सुबह पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर लेट गए, जहाँ से रामानंद जी गंगा स्नान के लिए जाते थे। अंधेरे में रामानंद जी का पैर कबीर पर पड़ गया और उनके मुख से सहज रूप से “राम-राम” शब्द निकल पड़ा।

कबीर ने उसी शब्द को दीक्षा-मंत्र मान लिया और रामानंद जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। स्वयं कबीर कहते हैं—

“हम कासी में प्रकट भये हैं,
रामानन्द चेताये।”

कबीर दास जी का जन्मस्थान : विभिन्न मत

कबीर दास जी के जन्मस्थान के संबंध में मुख्यतः तीन मत प्रचलित हैं— मगहर, काशी और आजमगढ़ में बेलहरा गाँव।

1. काशी (वाराणसी)

अधिकांश विद्वान और कबीरपंथी मानते हैं कि कबीर दास जी का जन्म काशी में हुआ था। उनका अधिकांश जीवन वहीं व्यतीत हुआ और वे “काशी के जुलाहा संत” के रूप में प्रसिद्ध हुए। किंतु ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में यह मत पूर्णतः प्रमाणित नहीं है।

2. मगहर

कुछ विद्वान मगहर को कबीर का जन्मस्थान मानते हैं। इसके समर्थन में कबीर की यह पंक्ति दी जाती है—

“पहिले दरसन मगहर पायो, पुनि कासी बसे आई।”

मगहर में कबीर दास जी का मक़बरा भी स्थित है। हालांकि, यह अधिकतर उनके निर्वाण स्थल के रूप में स्वीकार किया जाता है, न कि जन्मस्थान के रूप में।

3. बेलहरा (आजमगढ़)

कुछ लोग आजमगढ़ ज़िले के बेलहरा गाँव को कबीर का जन्मस्थान मानते हैं और यह तर्क देते हैं कि ‘बेलहरा’ ही कालांतर में ‘लहरतारा’ बन गया। किंतु इस मत के पक्ष में कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है। आजमगढ़ ज़िले में कबीर या उनके पंथ से संबंधित कोई प्रामाणिक स्मारक भी नहीं मिलता।

कबीर दास जी के माता-पिता : अनिश्चितता का प्रश्न

कबीर दास जी के माता-पिता के विषय में भी कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकलता। यह स्पष्ट नहीं है कि वे नीरू-नीमा की संतान थे या केवल उनके द्वारा पाले गए थे। स्वयं कबीर ने अपनी रचनाओं में जाति-पांति और जन्म-आधारित श्रेष्ठता का विरोध किया, जिससे यह प्रश्न और भी गौण हो जाता है।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि कबीर दास जी के जन्म, जन्मस्थान और माता-पिता के विषय में अनेक मत प्रचलित हैं, किंतु कोई भी मत पूर्णतः ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है। स्वयं कबीर ने भी जन्म और जाति से अधिक मानवता, सत्य, प्रेम और समाज-सुधार को महत्व दिया। इसलिए उनका महत्त्व उनके जन्म से नहीं, बल्कि उनके विचारों और काव्य से निर्धारित होता है।

कबीर दास जी की शिक्षा

कबीर दास जी पढ़े लिखे नहीं थे। उन्होंने कभी भी कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली। यहाँ तक कि उन्होंने कभी कागज़ कलम को छुआ भी नहीं।

`मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।’

कबीरदास की खेल में कोई रुचि नहीं थी। मदरसे भेजने लायक़ साधन पिता-माता के पास नहीं थे। जिसे हर दिन भोजन के लिए ही चिंता रहती हो, उस पिता के मन में कबीर दास जी को पढ़ाने का विचार आया ही न होगा। यही कारण है कि वे किताबी विद्या प्राप्त न कर सके। उन्होंने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, बल्कि उनकी कही हुई बातों और उपदेशों को उनके शिष्यों ने लिख लिया।

वे अपनी आजीविका के लिए जुलाहे का काम करते थे। कबीर दास जी अपनी आध्यात्मिक खोज को पूर्ण करने के लिए वाराणसी के प्रसिद्ध संत रामानंद के शिष्य बनना चाहते थे। स्वामी रामानन्द जी अपने समय के सुप्रसिद्ध ज्ञानी कहे जाते थे पर रामानंद उन्हें शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहते थे। किन्तु कबीर ने उन्हें मन ही मन अपना गुरु मान लिया था। वे अपने गुरु से गुरु मंत्र लेना चाहते थे पर कबीर दास को कोई उपाय नहीं सूझ रहा था।

कबीर दास जब संत रामानंद रात्रि चार बजे स्नान के लिए काशी घाट पर जाते थे तो उनके मार्ग में लेट जाते थे ताकि उनके गुरु मुख से जो भी पहला शब्द निकले उसे ही गुरु मंत्र मान लेंगे। तब एक दिन मार्ग में उनके गुरु के पैर कबीर पर पड़े तो संत रामानंद ने अपने मुंह से “राम” नाम लिया। बस कबीर ने उसे ही गुरु मंत्र मान लिया।

कुछ लोग मानते हैं कि कबीर दास जी के कोई गुरु नहीं थे। उन्हें जो ज्ञान प्राप्त हुआ वह अपनी ही बदौलत प्राप्त किया। वे पढ़े-लिखे नहीं थे यह बात उनके इस दोहा से मिलता है – `मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।’

कबीर दास जी ने स्वयं कोई ग्रंथ नहीं लिखा, उन्होंने सिर्फ उसे बोले थे। उनके शिष्यों ने उनके द्वारा कही गई बातों और उपदेशों को कलमबद्ध किया था। कबीर दास के बारे में जानकर ही आश्चर्य होता है कि उन्होंने कभी कागज कलम को हाथ तक नहीं लगाया, ना ही कोई पढ़ाई की और न ही उनके कोई औपचारिक गुरु थे।

पर कैसे उन्हें इतना आत्मज्ञान प्राप्त हुआ? यह अपने आप में हैरान करने वाला है।

कबीर दास जी का वैवाहिक जीवन : परंपरागत मान्यता

लोककथाओं, जनश्रुतियों और कुछ ग्रंथीय संकेतों के आधार पर यह माना जाता है कि संत कबीर दास जी विवाहित थे। उनकी पत्नी का नाम लोई बताया जाता है। परंपरागत मत के अनुसार, कबीर और लोई की दो संतानें थीं—

  • पुत्र : कमाल
  • पुत्री : कमाली

यह मान्यता कबीर के पारिवारिक जीवन की ओर संकेत करती है, यद्यपि इस विषय में विद्वानों के बीच सर्वसम्मति नहीं है।

लोई के विषय में मान्यता एवं विवाह-संबंधी विवरण

कुछ विद्वानों के अनुसार, कबीर का विवाह वनखेड़ी बैरागी की पालिता कन्या ‘लोई’ से हुआ था। यह मत कबीर के गृहस्थ जीवन की पुष्टि करता है। कबीर की वाणियों में लोई का नाम कई स्थानों पर संबोधन के रूप में आता है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि लोई केवल एक काल्पनिक या प्रतीकात्मक पात्र नहीं थीं।

एक स्थान पर कबीर लोई को संबोधित करते हुए कहते हैं—

“कहत कबीर सुनहु रे लोई।
हरि बिन राखन हार न कोई॥”

यह पंक्ति लोई के वास्तविक अस्तित्व की ओर संकेत करती है।

कबीर दास जी की संतानें : कमाल और कमाली

कबीर दास जी के पुत्र कमाल का उल्लेख कई ग्रंथों में मिलता है। गुरु ग्रंथ साहिब के एक श्लोक से यह संकेत मिलता है कि कमाल कबीर के मत से सहमत नहीं था—

बूड़ा बंस कबीर का, उपजा पूत कमाल।
हरि का सिमरन छोड़ि के, घर ले आया माल॥

इस श्लोक से यह धारणा बनती है कि कमाल सांसारिक जीवन की ओर प्रवृत्त था, जबकि कबीर निर्गुण भक्ति और वैराग्य के पक्षधर थे।

वहीं पुत्री कमाली का उल्लेख कबीर की वाणियों में प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलता। इसलिए कुछ विद्वान उसके ऐतिहासिक अस्तित्व पर प्रश्न उठाते हैं।

गृहस्थ जीवन की कठिनाइयाँ और लोई का असंतोष

लोककथाओं के अनुसार, कबीर के घर में साधु-संतों और फकीरों (मुड़ियों) का निरंतर आगमन रहता था। इससे घर की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती थी और कई बार बच्चों को भोजन तक उपलब्ध नहीं हो पाता था। इस स्थिति से कबीर की पत्नी लोई झुंझला उठती थीं।

एक स्थान पर कबीर लोई को समझाते हुए कहते हैं—

सुनि अंघली लोई बंपीर।
इन मुड़ियन भजि सरन कबीर॥

यह प्रसंग कबीर के पारिवारिक संघर्ष और उनकी आध्यात्मिक प्राथमिकताओं को उजागर करता है।

कबीरपंथ की मान्यता : ब्रह्मचर्य और शिष्य-परंपरा

कबीरपंथ में कबीर दास जी को प्रायः बाल-ब्रह्मचारी और विरक्त संत माना जाता है। इस मत के अनुसार—

  • कमाल को कबीर का पुत्र नहीं, बल्कि शिष्य माना जाता है
  • लोई और कमाली को भी उनकी शिष्याएँ माना गया है

कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि ‘लोई’ शब्द का प्रयोग कबीर ने एक स्थान पर कंबल के अर्थ में भी किया है, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई।

पत्नी से शिष्या बनने की संभावना

यह भी संभव माना जाता है कि लोई प्रारंभ में कबीर की पत्नी रही हों, किंतु बाद में कबीर ने उन्हें शिष्या के रूप में स्वीकार कर लिया हो। कबीर स्वयं नारी-विषयक मोह से विरक्ति की बात करते हैं—

नारी तो हम भी करी, पाया नहीं विचार।
जब जानी तब परिहरि, नारी महा विकार॥

इस पद से यह संकेत मिलता है कि कबीर ने गृहस्थ जीवन के अनुभव के बाद वैराग्य को अपनाया।

कबीर दास जी के वैवाहिक जीवन के विषय में विरोधाभासी मत मिलते हैं। एक ओर लोककथाएँ और वाणियाँ उनके विवाह, पत्नी और संतान की ओर संकेत करती हैं, तो दूसरी ओर कबीरपंथ उन्हें पूर्णतः विरक्त और ब्रह्मचारी संत के रूप में प्रस्तुत करता है। वस्तुतः कबीर के जीवन में गृहस्थ और वैराग्य दोनों के अनुभव रहे होंगे। किंतु कबीर की दृष्टि में ये सभी प्रश्न गौण हैं—उनका मूल उद्देश्य था आत्मज्ञान, भक्ति और समाज-सुधार

कबीर दास जी की मृत्यु

15वीं शताब्दी के सूफी कवि कबीर दास के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि उन्होंने अपनी मृत्यु का स्थान मगहर चुना था, जो लखनऊ से लगभग 240 किमी दूर स्थित है। उन्होंने लोगों के मन में भरे हुए एक अन्धविश्वास को दूर करने के लिए इस जगह को अपनी मृत्यु के लिए चुना। 

उन दिनों यह माना जाता था कि जो व्यक्ति मगहर क्षेत्र में अपनी अंतिम सांस लेते है और मृत्यु हो जाती है, उन्हें स्वर्ग में जगह नहीं मिलेगी। उनको नरक में भेज दिया जाता है। यह भी माना जाता है कि जो काशी में मर जाता है, वह सीधे स्वर्ग जाता है इसलिए हिंदू लोग अपने अंतिम समय में काशी जाते हैं और मोक्ष प्राप्त करने के लिए मृत्यु की प्रतीक्षा करते हैं। 

लोगों के मिथकों और अंधविश्वासों को तोड़ने के लिए कबीर दास जी जीवन भर काशी में रहने के बावजूद अपने आखिरी समय में मगहर चले आये। और उनकी मृत्यु काशी के बजाय मगहर में हुई। विक्रम संवत 1575 में हिंदू कैलेंडर के अनुसार, उन्होंने माघ शुक्ल एकादशी पर वर्ष 1518 में जनवरी के महीने में मगहर में दुनिया को छोड़ दिया। 

मिथक को ध्वस्त करने के लिए कबीर दास जी ने मगहर में अपने प्राण त्यागे थे। इससे जुड़ी एक प्रसिद्ध कहावत है –

“जो कबीरा काशी मुए तो रमे कौन निहोरा”

यानी काशी में मरने से ही स्वर्ग जाने का आसान रास्ता है तो भगवान की पूजा करने की क्या जरूरत है।

ऐसा कहा जाता ही कि जब कबीर दास जी ने जब मगहर में अपना देह त्याग दिया, उस समय उनकी मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से। इसी विवाद के साथ जब उनके शव पर से चादर हटाई गई, तब लोगों ने वहाँ फूलों का ढेर पड़ा देखा। जिसके बाद में वहाँ से आधे फूल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने।

मुसलमानों ने मुस्लिम रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीति से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया। मगहर में कबीर दास जी की समाधि है। जन्म की भाँति इनकी मृत्यु तिथि एवं घटना को लेकर भी मतभेद हैं किन्तु अधिकतर विद्वान् उनकी मृत्यु संवत 1575 विक्रमी (सन 1518 ई.) मानते हैं, लेकिन बाद के कुछ इतिहासकार उनकी मृत्यु 1448 को मानते हैं।

समाधि से कुछ मीटर की दूरी पर एक गुफा है जो मृत्यु से पहले उनके ध्यान स्थान का संकेत देती है। कबीर शोध संस्थान नाम का एक ट्रस्ट चल रहा है जो कबीर दास के कार्यों पर शोध को बढ़ावा देने के लिए एक शोध फाउंडेशन के रूप में काम करता है। यहां शैक्षणिक संस्थान भी चल रहे हैं जिनमें कबीर दास की शिक्षाएं शामिल हैं।

कबीर दास जी का ईश्वर के प्रति विचार

संत कबीर दास जी के अनुसार ईश्वर एक है। जिस प्रकार विश्व में एक ही वायु और जल है, उसी प्रकार संपूर्ण संसार में एक ही परम ज्योति व्याप्त है। सभी मानव एक ही मिट्टी से अर्थात् ब्रम्ह द्वारा निर्मित हुए हैं। कबीर दास ने ईश्वर प्राप्ति के प्रचलित विश्वासों का खंडन किया है।

कबीर के अनुसार ईश्वर न मंदिर में है, न मस्जिद में है। न काबा में हैं, न कैलाश आदि तीर्थ स्थानों में है। वह न योग साधना से मिलता है, और न वैरागी बनने से। ये सब उपरी दिखावे हैं, ढोंग हैं। इनसे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती।

कबीर दास जी का साहित्यिक परिचय

कबीर दास जी एक महान संत होने के साथ-साथ सांसारिक व्यक्ति भी थे। तथा वह समाज सुधारक और एक सजग कवि भी थे। वह अनाथ थे, लेकिन सारा समाज उनकी छत्रछाया की अपेक्षा करता था। कबीर के महान व्यक्तित्व एवं उनके काव्य के संबंध में हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ प्रभाकर माचवे ने लिखा है – “कबीर में सत्य कहने का अपार धैर्य था और उसके परिणाम सहन करने की हिम्मत भी। कबीर की कविता इन्हीं कारणों से एक अन्य प्रकार की कविता है। वह कई रूढ़ियों के बंधन तोड़ता है वह मुक्त आत्मा की कविता है।”

कबीर दास जी की रचनाएं एवं भाषा

संत कबीर दास जी पढ़े-लिखे नहीं थे उन्होंने स्वयं ही कहा है –

   मसि कागद छुयो नहीं, कलम गह्यो नहीं हाथ।

उनकी कही गयी वाणियों को, उनके उपदेशों को उनके शिष्यों ने लिखा।

कबीर दास जी की भाषा सधुक्कड़ी एवं अवधी थी। कबीरदास जी ने अपनी रचनाओं को बेहद सरल और आसान भाषा में है, अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने बड़ी बेबाकी से धर्म, संस्कृति, समाज एवं जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी राय रखी है। उनके काव्य में आत्मा और परमात्मा के संबंधों की भी स्पष्ट व्याख्या मिलती है। उनकी प्रमुख रचनाएं हैं –

  • साखी
  • सबद
  • रमैनी
  • कबीर बीजक
  • सुखनिधन
  • रक्त
  • वसंत
  • होली अगम

इन रचनाओं में कबीर का बीजक ग्रंथ प्रमुख है। उनकी रचनाओं में वो जादू है जो किसी और संत में नहीं है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को “वाणी का डिक्टेटर” कहा है। और आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने कबीर की भाषा को ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा है।

यह सत्य है कि उन्होंने स्वयं अपनी रचनाओं को नहीं लिखा है। इसके बाद भी उनकी वाणीयों के संग्रह के रूप में कई ग्रंथों का उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथों में- ‘अगाध-मंगल’, ‘अनुराग सागर’, ‘अमर मूल ‘, ‘अक्षर खंड रमैनी’, ‘अक्षर भेद की रमैनी’, ‘उग्र गीता’, ‘कबीर की वाणी’, ‘कबीर ‘, ‘कबीर गोरख की गोष्ठी’, ‘कबीर की साखी’, ‘बीजक’, ‘ब्रह्म निरूपण’, ‘मुहम्मद बोध’, ‘रेख़्ता विचार माला’, ‘विवेकसागर’, ‘शब्दावली ‘, ‘हंस मुक्तावली’, ‘ज्ञान सागर’ आदि प्रमुख ग्रंथ हैं इन ग्रंथों को पढ़ने से हमें कबीर की विलक्षण प्रतिभा का परिचय मिलता है।  

कबीर की वाणियों का संग्रह ‘बीजक’ के नाम से प्रचलित है इसके तीन भाग हैं –

  1. साखी 
  2. सबद 
  3. रमैनी

कबीर दास जी के प्रमुख दोहे

  1. यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ।
  2. लाडू लावन लापसी ,पूजा चढ़े अपार पूजी पुजारी ले गया,मूरत के मुह छार !!
  3. पाथर पूजे हरी मिले, तो मै पूजू पहाड़ ! घर की चक्की कोई न पूजे, जाको पीस खाए संसार !!
  4. जो तूं ब्राह्मण , ब्राह्मणी का जाया ! आन बाट काहे नहीं आया !!
  5. माटी का एक नाग बनाके, पुजे लोग लुगाया ! जिंदा नाग जब घर मे निकले, ले लाठी धमकाया !!
  6. माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे ।
  7. काल करे सो आज कर, आज करे सो अब । पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब ।
  8. ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग । तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग ।
  9. जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होए । यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोए ।
  10. गुरु गोविंद दोऊ खड़े ,काके लागू पाय । बलिहारी गुरु आपने , गोविंद दियो मिलाय ।।
  11. सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज । सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए ।
  12. ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये । औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ।
  13. ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये । औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ।
  14. बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर । पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ।
  15. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय । जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय ।
  16. दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय । जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय ।
  17. चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये । दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए ।
  18. मलिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार । फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार ।
  19. जाती न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान । मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान ।
  20.  तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार । सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार ।
  21. नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए । मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए ।
  22. कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी । एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ।
  23. जिनके नौबति बाजती, मैंगल बंधते बारि । एकै हरि के नाव बिन, गए जनम सब हारि ॥
  24. मैं-मैं बड़ी बलाइ है, सकै तो निकसो भाजि । कब लग राखौ हे सखी, रूई लपेटी आगि ॥
  25. उजला कपड़ा पहरि करि, पान सुपारी खाहिं । एकै हरि के नाव बिन, बाँधे जमपुरि जाहिं ॥
  26. कहा कियौ हम आइ करि, कहा कहैंगे जाइ । इत के भये न उत के, चाले मूल गंवाइ ॥
  27. `कबीर’ नौबत आपणी, दिन दस लेहु बजाइ । ए पुर पाटन, ए गली, बहुरि न देखै आइ ॥
  28. पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजौं पहार। याते ये चक्की भली, पीस खाय संसार।।
  29. गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय । बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय॥
  30. निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें । बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए ।
  31. पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात । देखत ही छुप जाएगा है, ज्यों सारा परभात ।
  32. जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप । जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप ।
  33. जो घट प्रेम न संचारे, जो घट जान सामान । जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्राण ।
  34. ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई न संग । प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत ।
  35. तन को जोगी सब करे, मन को विरला कोय । सहजे सब विधि पाइए, जो मन जोगी होए ।
  36. प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए । राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए ।
  37. जिन घर साधू न पुजिये, घर की सेवा नाही । ते घर मरघट जानिए, भुत बसे तिन माही ।
  38. साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय।
  39. जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश । जो है जा को भावना सो ताहि के पास ।
  40. राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय । जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय ।

इन्हें भी देखें –

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