चिली गणराज्य और भारत | 76 वर्षों की मैत्री पर एक दृष्टि

भारत और चिली के बीच द्विपक्षीय संबंधों का एक गौरवशाली इतिहास है, जो 76 वर्षों से अधिक पुराने हैं। इसी संबंध को और प्रगाढ़ करने के उद्देश्य से चिली गणराज्य के राष्ट्रपति श्री गेब्रियल बोरिक फोंट की 1 से 5 अप्रैल, 2025 तक भारत की राजकीय यात्रा विशेष महत्व रखती है। यह यात्रा न केवल राजनीतिक दृष्टि से अहम है, बल्कि आर्थिक, सांस्कृतिक, और रणनीतिक दृष्टिकोण से भी दोनों देशों के लिए नए द्वार खोल सकती है।

इस लेख ले माध्यम से चिली गणराज्य की भौगोलिक, प्राकृतिक और भूगर्भीय विशेषताओं पर विस्तृत रूप से चर्चा की गयी है, साथ ही भारत–चिली संबंधों के ऐतिहासिक और समकालीन पहलुओं पर भी प्रकाश डाला गया है।

चिली गणराज्य का परिचय

चिली गणराज्य दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के पश्चिमी तट पर स्थित एक अनूठा देश है। इसकी भौगोलिक बनावट और प्राकृतिक संसाधनों ने इसे वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण राष्ट्र बना दिया है। अपने भूगोल, खनिज संसाधनों और भूगर्भीय विशेषताओं के कारण चिली को विश्व अर्थव्यवस्था में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है।

चिली गणराज्य | भौगोलिक विशेषताएँ

चिली गणराज्य की भौगोलिक स्थिति

स्थान और स्वरूप

चिली दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी किनारे पर स्थित एक लम्बा, संकीर्ण और तटवर्ती देश है। इसकी कुल लंबाई लगभग 4,300 किलोमीटर है, लेकिन चौड़ाई औसतन केवल 91 किलोमीटर के आस-पास है। इस असामान्य आकार ने चिली को भिन्न-भिन्न जलवायु और पारिस्थितिक क्षेत्रों का अद्भुत मिश्रण बना दिया है।

उत्तर में अटाकामा रेगिस्तान की अत्यधिक शुष्क भूमि से लेकर दक्षिण में बर्फ से ढकी पर्वतमालाओं और आइसबर्गों तक, चिली की जलवायु विविधता उल्लेखनीय है। देश का दक्षिणी भाग उप-अंटार्कटिक क्षेत्र में आता है, जहां तापमान अत्यंत निम्न रहता है और सर्दियों में बर्फबारी आम है।

तटरेखा और समुद्री क्षेत्र

चिली की तटरेखा लगभग 6,437 किलोमीटर लंबी है, जो प्रशांत महासागर के किनारे फैली हुई है। इतनी विस्तृत तटरेखा देश को समुद्री संसाधनों की दृष्टि से समृद्ध बनाती है। मत्स्य उद्योग, समुद्री परिवहन, और जैविक विविधता के क्षेत्र में चिली की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

विशेष रूप से दक्षिणी छोर पर स्थित केप हॉर्न एक रणनीतिक और ऐतिहासिक रूप से प्रसिद्ध स्थल है। यह बिंदु समुद्री यात्रा के लिए चुनौतीपूर्ण माना जाता है, जहाँ तेज़ हवाएँ, भारी लहरें और धुंधली जलवायु स्थितियाँ नाविकों के लिए खतरनाक साबित होती हैं।

चिली गणराज्य | प्राकृतिक संसाधनों की संपन्नता

चिली विश्व में खनिज संसाधनों के मामले में अग्रणी देशों में से एक है। इसका भूगर्भीय ढांचा और जलवायु इसे खनिज उत्पादन के लिए उपयुक्त बनाते हैं।

अटाकामा रेगिस्तान

उत्तरी चिली में स्थित अटाकामा रेगिस्तान को विश्व का सबसे शुष्क स्थान माना जाता है। यहाँ वर्ष भर में औसतन केवल 15 मिलीमीटर वर्षा होती है। इस क्षेत्र की भौगोलिक बनावट अत्यंत कठोर और शुष्क है, किंतु इसके भीतर अपार खनिज संपदा छिपी हुई है।

यह रेगिस्तान विशेष रूप से खगोलविदों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है, क्योंकि यहाँ की सूखी और निर्मल वायुमंडलीय परिस्थितियाँ टेलीस्कोप और अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए अत्यंत उपयुक्त मानी जाती हैं। चिली के अटाकामा डेज़र्ट में विश्व के सबसे बड़े खगोल वैधशालाओं में से एक ALMA (Atacama Large Millimeter/submillimeter Array) स्थित है।

लिथियम और तांबा

चिली लिथियम और तांबे के भंडार के लिए विश्व प्रसिद्ध है। वैश्विक स्तर पर तांबे की आपूर्ति में चिली की हिस्सेदारी लगभग एक तिहाई है, जिससे यह दुनिया का सबसे बड़ा तांबा उत्पादक देश बन गया है।

एसकोंडिडा खदान

चिली की एसकोंडिडा खदान दुनिया की सबसे बड़ी तांबे की खदान है, जो वैश्विक तांबे की आपूर्ति का लगभग 5% उत्पादन करती है। यह खदान न केवल चिली की अर्थव्यवस्था का प्रमुख स्तंभ है, बल्कि वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक उद्योग, निर्माण, और ऊर्जा क्षेत्रों में भी इसकी अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

लिथियम त्रिकोण

चिली, अर्जेंटीना और बोलीविया का सीमावर्ती क्षेत्र लिथियम त्रिकोण के रूप में जाना जाता है। यहाँ स्थित नमक के मैदानों (salt flats) में लिथियम की विशाल भंडारण क्षमता है, जो भविष्य की इलेक्ट्रिक बैटरियों और ग्रीन एनर्जी टेक्नोलॉजी के लिए आवश्यक है। चिली की लिथियम आपूर्ति वैश्विक बाजार में इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

चिली गणराज्य | भूगर्भीय स्थिति और भूकंपीय गतिविधियाँ

चिली की भूगर्भीय स्थिति उसे एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र बनाती है। यह देश प्रशांत रिंग ऑफ फायर (Pacific Ring of Fire) का हिस्सा है, जो एक सक्रिय ज्वालामुखीय और भूकंपीय क्षेत्र है।

टेक्टोनिक प्लेटों का संघात

चिली के नीचे नाज़्का प्लेट और अंटार्कटिक प्लेट दक्षिण अमेरिकी प्लेट के नीचे धंस रही हैं। यह प्रक्रिया सबडक्शन (subduction) कहलाती है, जिससे ज़मीन में अत्यधिक दाब उत्पन्न होता है और समय-समय पर तीव्र भूकंप तथा ज्वालामुखीय विस्फोट होते हैं।

भूकंप और ज्वालामुखी

इतिहास में चिली कई विनाशकारी भूकंपों का साक्षी रहा है। वर्ष 1960 में आए वल्दिविया भूकंप (9.5 तीव्रता) को अब तक का सबसे शक्तिशाली भूकंप माना जाता है। इसके अलावा देश में कई सक्रिय ज्वालामुखी हैं, जिनमें लास्कर, विलारिका और ल्लैमा प्रमुख हैं।

चिली की सरकार और जनता ने भूकंपीय खतरे को ध्यान में रखते हुए अत्याधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, इमरजेंसी रेस्पॉन्स सिस्टम, और जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से अपनी तैयारियों को सुदृढ़ किया है।

भारत–चिली संबंध | ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और समकालीन परिदृश्य

भारत और चिली के बीच राजनयिक संबंधों की शुरुआत वर्ष 1948 में हुई थी। इसके बाद से दोनों देशों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग और व्यापारिक आदान-प्रदान में निरंतर वृद्धि हुई है।

राजनीतिक संबंध

भारत और चिली के बीच उच्च स्तरीय यात्राओं का आदान-प्रदान होता रहा है। 2025 में चिली के राष्ट्रपति श्री गेब्रियल बोरिक फोंट की भारत यात्रा इन संबंधों को नई ऊँचाइयों पर ले जाने की एक महत्वपूर्ण पहल है।

व्यापारिक और आर्थिक सहयोग

भारत और चिली के बीच व्यापक व्यापार समझौता (Preferential Trade Agreement – PTA) लागू है, जिससे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि हो रही है। चिली भारत को तांबा, लिथियम और समुद्री उत्पाद निर्यात करता है, जबकि भारत चिली को दवाइयाँ, कपड़े, ऑटो पार्ट्स और आईटी सेवाएँ निर्यात करता है।

विज्ञान, तकनीक और शिक्षा में सहयोग

दोनों देशों के विश्वविद्यालय और अनुसंधान संस्थान आपस में शैक्षणिक आदान-प्रदान और शोध कार्यों में सहयोग कर रहे हैं। साथ ही, अंतरिक्ष विज्ञान, खगोल विज्ञान और भूगर्भीय अध्ययन जैसे क्षेत्रों में भी साझा प्रयास हो रहे हैं।

चिली गणराज्य प्राकृतिक संसाधनों, भूगोल, और खनिज समृद्धि के साथ-साथ अपने भूगर्भीय स्वरूप के कारण एक अद्वितीय राष्ट्र है। भारत और चिली के बीच बढ़ते संबंध इस बात का संकेत हैं कि भविष्य में दोनों देश न केवल आर्थिक रूप से बल्कि रणनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी एक-दूसरे के महत्त्वपूर्ण साझेदार बन सकते हैं।

भारत और चिली के बीच 76 वर्षों की यह राजनयिक यात्रा एक नई शुरुआत का संकेत है, जिसमें परस्पर सम्मान, सहयोग और साझेदारी की भावना अंतर्निहित है। राष्ट्रपति बोरिक की यात्रा इन संबंधों को और सुदृढ़ करेगी और दोनों देशों के भविष्य को नई दिशा देगी।

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