राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली

हिंदी साहित्य के आधुनिक युग में मैथिलीशरण गुप्त का नाम एक ऐसे कवि के रूप में स्थापित है, जिन्होंने कविता को केवल भावात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित न रखकर उसे राष्ट्र, संस्कृति और मानव-मूल्यों की सशक्त वाणी बनाया। उनका संपूर्ण साहित्य भारतीय सभ्यता की आत्मा, नैतिक आदर्शों और राष्ट्रीय चेतना का संवाहक है। इसलिए उनके जीवन और कृतित्व का मूल्यांकन करते समय सर्वप्रथम उनका राष्ट्रकवि के रूप में स्थान और उनकी सांस्कृतिक दृष्टि समझना आवश्यक हो जाता है।

Table of Contents

राष्ट्रकवि के रूप में प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक चेतना

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त भारतीय संस्कृति के अमर गायक और राष्ट्रीय जागरण के प्रखर स्वर थे। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में भारतीय जीवन-मूल्यों, नैतिक आदर्शों तथा सांस्कृतिक गौरव का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उनकी काव्य-धारा में एक ओर देशभक्ति की प्रेरणा है तो दूसरी ओर मानवता, धर्म और मर्यादा की उज्ज्वल परंपरा का संवाहक स्वर। स्वतंत्रता आंदोलन के काल में उनकी कविताओं ने जनमानस में आत्मगौरव और राष्ट्रीय चेतना का संचार किया।

मैथिलीशरण गुप्त (3 अगस्त 1886 – 12 दिसम्बर 1964) हिंदी साहित्य के उन अग्रणी कवियों में हैं जिन्होंने खड़ी बोली को सशक्त काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। साहित्य-जगत में उन्हें स्नेहपूर्वक ‘दद्दा’ कहकर संबोधित किया जाता था। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘भारत-भारती’ ने स्वाधीनता संग्राम के दौर में देशवासियों को जागृत करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी राष्ट्रीय योगदान से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि प्रदान की। उनके साहित्यिक और राष्ट्रीय अवदान के सम्मानस्वरूप उन्हें संसद का सदस्य भी मनोनीत किया गया।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से गुप्त जी ने ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया। उन्होंने अपनी कविताओं के द्वारा खड़ी बोली को काव्य-अभिव्यक्ति की गरिमा प्रदान की और उसे आधुनिक हिंदी काव्य की प्रमुख भाषा के रूप में स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाई। परिणामस्वरूप आने वाली पीढ़ियों के कवियों ने भी इसी भाषा को अपनाया। हिंदी काव्य-इतिहास में यह उनका अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

उनकी रचनाओं में पवित्रता, नैतिकता और पारंपरिक मानवीय संबंधों के संरक्षण की भावना स्पष्ट रूप से विद्यमान है। ‘पंचवटी’, ‘जयद्रथ वध’, ‘यशोधरा’ और विशेष रूप से ‘साकेत’ में ये आदर्श पूर्ण विकसित रूप में दिखाई देते हैं। ‘साकेत’ को उनकी काव्य-साधना का शिखर माना जाता है, जिसमें सांस्कृतिक पुनर्स्मरण और मानवीय संवेदना का अनुपम समन्वय उपस्थित है।

मैथिलीशरण गुप्त : संक्षिप्त जीवन-परिचय

शीर्षकविवरण
नाममैथिलीशरण गुप्त
जन्म3 अगस्त 1886
जन्म-स्थानचिरगाँव, झाँसी (वर्तमान उत्तर प्रदेश), ब्रिटिश भारत
मृत्यु12 दिसम्बर 1964 (78 वर्ष की आयु में)
राष्ट्रीयताभारतीय
पेशा / परिचयकवि, नाटककार, अनुवादक, राजनेता
साहित्यिक पहचानआधुनिक हिन्दी कविता के प्रमुख स्तंभ, ‘राष्ट्रकवि’ के रूप में प्रसिद्ध
साहित्यिक उपाधि ‘राष्ट्रकवि’ (सम्मानसूचक)
शिक्षाप्रारंभिक शिक्षा – चिरगाँव; मिडिल शिक्षा – मैकडोनल हाई स्कूल
प्रमुख कृतियाँभारत-भारती, पंचवटी, सिद्धराज, साकेत, यशोधरा, विश्व-वेदना आदि
साहित्यिक प्रवृत्तिराष्ट्रीय चेतना, गांधीवादी विचारधारा, नारी-जीवन की प्रतिष्ठा, भारतीय संस्कृति एवं इतिहास का गौरव
प्रथम प्रकाशित रचना‘हेमंत’ (सरस्वती पत्रिका, 1907)
प्रमुख सम्मान एवं उपाधियाँहिन्दुस्तान अकादमी पुरस्कार (साकेत के लिए, ₹500, 1935); मंगलाप्रसाद पुरस्कार (हिन्दी साहित्य सम्मेलन, 1937); साहित्यवाचस्पति (1946); पद्मभूषण (1954)

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी का जीवन परिचय

प्रस्तावना

हिंदी साहित्य के आधुनिक इतिहास में जिन कवियों ने कविता को केवल सौंदर्य का माध्यम न बनाकर राष्ट्रीय चेतना, नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त स्वर प्रदान किया, उनमें मैथिलीशरण गुप्त का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। वे खड़ी बोली हिंदी को महाकाव्यात्मक गरिमा प्रदान करने वाले अग्रणी कवियों में से एक थे। राष्ट्रकवि की संज्ञा से विभूषित गुप्त जी ने भारतीय संस्कृति, इतिहास, रामकथा और मानवतावादी दृष्टि को अपनी रचनाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया। उनका काव्य भारतीय आत्मा की अभिव्यक्ति है, जिसमें देशभक्ति, करुणा, धर्म, नैतिकता और सामाजिक चेतना का समन्वय दिखाई देता है।

जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 ई. को उत्तर प्रदेश के झाँसी जनपद के समीप स्थित चिरगाँव नामक कस्बे में हुआ। वे अपने माता-पिता की तीसरी संतान थे। उनके पिता का नाम सेठ रामचरण कनकने था, जो स्वयं एक अच्छे कवि और साहित्य-प्रेमी व्यक्ति थे। माता काशीबाई धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। माता-पिता दोनों वैष्णव विचारधारा से प्रभावित थे, जिसका प्रभाव गुप्त जी के संस्कारों और बाद के काव्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

घर का वातावरण साहित्यिक और धार्मिक होने के कारण बालक मैथिलीशरण के मन में प्रारंभ से ही कविता, भक्ति और संस्कृति के प्रति अनुराग विकसित होने लगा। यह पारिवारिक संस्कार ही उनके संपूर्ण साहित्यिक जीवन की आधारशिला बने।

शिक्षा एवं प्रारंभिक जीवन

मैथिलीशरण गुप्त की औपचारिक विद्यालयी शिक्षा अधिक आगे तक नहीं बढ़ सकी। विद्यालय में उनका मन पढ़ाई की अपेक्षा खेलकूद में अधिक लगता था, जिसके कारण उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई। किंतु औपचारिक शिक्षा का अभाव उनके बौद्धिक और साहित्यिक विकास में कभी बाधा नहीं बना। उन्होंने स्वाध्याय को ही अपना प्रमुख साधन बनाया।

रामस्वरूप शास्त्री, दुर्गादत्त पंत जैसे विद्वानों से उन्हें प्रारंभिक मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। घर पर रहते हुए उन्होंने हिंदी, संस्कृत और बंगला साहित्य का गंभीर अध्ययन किया। यह अध्ययन आगे चलकर उनके साहित्य की व्यापकता और वैचारिक गहराई का आधार बना। प्रसिद्ध साहित्यकार मुंशी अजमेरी जी का मार्गदर्शन भी उन्हें प्राप्त हुआ, जिन्होंने उनके साहित्यिक विकास को सही दिशा प्रदान की।

काव्य-रचना का आरंभ

मैथिलीशरण गुप्त ने अत्यंत कम आयु में ही कविता रचना प्रारंभ कर दी थी। मात्र 12 वर्ष की अवस्था में उन्होंने ब्रजभाषा में ‘कनकलता’ उपनाम से कविताएँ लिखनी शुरू कीं। इस समय वे रसिकेन्द्र नाम से भी ब्रजभाषा में दोहा, चौपाई, छप्पय आदि छंदों की रचना करते थे। उनकी ये प्रारंभिक रचनाएँ वैश्योपकारक (कलकत्ता), वेंकटेश्वर (बम्बई) और मोहिनी (कन्नौज) जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में 1904-05 के बीच प्रकाशित हुईं।

बाद में उनका संपर्क हिंदी साहित्य के युग-प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से हुआ। द्विवेदी जी के मार्गदर्शन में गुप्त जी ने खड़ी बोली हिंदी में काव्य-रचना आरंभ की। उनकी कविताएँ प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ में प्रकाशित होने लगीं, जिससे उन्हें साहित्यिक जगत में व्यापक पहचान प्राप्त हुई।

साहित्यिक जीवन का विकास

मैथिलीशरण गुप्त का प्रथम काव्य-संग्रह ‘रंग में भंग’ प्रकाशित हुआ, जिसमें उनकी काव्य-प्रतिभा का प्रारंभिक स्वरूप दिखाई देता है। इसके पश्चात ‘जयद्रथ वध’ जैसे काव्य ग्रंथ प्रकाशित हुए। उन्होंने केवल मौलिक काव्य ही नहीं लिखा, बल्कि अनुवाद के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया। बंगाली के प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ ‘मेघनाथ वध’ तथा ‘ब्रजांगना’ का हिंदी अनुवाद उन्होंने अत्यंत कुशलता से किया।

संस्कृत साहित्य के प्रति भी उनका गहरा अनुराग था। संस्कृत के प्रसिद्ध नाटक ‘स्वप्नवासवदत्ता’ का उन्होंने हिंदी अनुवाद प्रकाशित कराया। इन अनुवादों से हिंदी साहित्य समृद्ध हुआ और भारतीय भाषाओं के बीच साहित्यिक सेतु का निर्माण हुआ।

‘भारत-भारती’ और राष्ट्रीय चेतना

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों (लगभग 1912–13 ई.) में प्रकाशित मैथिलीशरण गुप्त की काव्य-कृति ‘भारत-भारती’ ने हिंदी साहित्य और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन—दोनों पर गहरा प्रभाव डाला। यह रचना राष्ट्रीय भावना, सांस्कृतिक स्वाभिमान और देशभक्ति से अनुप्राणित है। उस समय जब देश स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था, तब इस ग्रंथ ने जन-मानस में नई ऊर्जा और जागरण का संचार किया।

‘भारत-भारती’ को तीन प्रमुख खंडों—अतीत, वर्तमान और भविष्य—में विन्यस्त किया गया है। अतीत खंड में भारत की गौरवशाली परंपराओं और सांस्कृतिक वैभव का चित्रण है; वर्तमान खंड में देश की दयनीय स्थिति और पराधीनता की वेदना का यथार्थ चित्र उपस्थित किया गया है; जबकि भविष्य खंड में राष्ट्रीय पुनर्जागरण और स्वतंत्र भारत की कल्पना को स्वर मिला है। इस त्रिस्तरीय संरचना के माध्यम से कवि ने इतिहास-बोध, आत्ममंथन और आशा—तीनों को एक सूत्र में बाँधा है।

इस कृति की व्यापक लोकप्रियता ने गुप्त जी को ‘राष्ट्रीय कवि’ के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई। उनकी वाणी में देशप्रेम की तीव्रता और राष्ट्रीय अस्मिता का आग्रह स्पष्ट झलकता है। यही कारण था कि अंग्रेजी शासन ने इसकी प्रभावशीलता से भयभीत होकर इसे जब्त भी कर लिया।

स्वाधीनता संग्राम के दौर में ‘भारत-भारती’ के गीतों ने क्रांतिकारियों और सामान्य जनता दोनों को प्रेरित किया। कवि ने राष्ट्रीय गौरव को मनुष्य के चरित्र का अनिवार्य तत्व माना है—

“जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।”

इस प्रकार ‘भारत-भारती’ केवल एक काव्य-ग्रंथ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का घोष-पत्र सिद्ध हुई, जिसने भारतीय समाज को आत्मसम्मान, जागृति और स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया।

महाकाव्य ‘साकेत’ : नवीन दृष्टि और मानवीय संवेदना

मैथिलीशरण गुप्त ने लगभग 1916–17 ई. के आसपास अपने सुप्रसिद्ध महाकाव्य ‘साकेत’ की रचना आरंभ की। यह कृति रामकथा पर आधारित होते हुए भी पारंपरिक आख्यान से भिन्न एक नवीन और मानवीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। ‘साकेत’ की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें उर्मिला के चरित्र को केंद्र में लाया गया है। सामान्यतः रामकथा में उपेक्षित रहने वाली उर्मिला के त्याग, धैर्य, अंतर्द्वंद्व और मौन तपस्या को कवि ने अत्यंत मार्मिकता और सहानुभूति के साथ अभिव्यक्त किया है।

यह महाकाव्य केवल धार्मिक आख्यान भर नहीं है, बल्कि मानवीय आदर्शों, नारी गरिमा और नैतिक मूल्यों का सशक्त प्रस्तुतीकरण भी है। गुप्त जी ने कथा के संवेदनशील प्रसंगों का चयन कर उन्हें प्रभावपूर्ण ढंग से उकेरा है। चित्रकूट का प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहाँ भरत के उज्ज्वल चरित्र और भ्रातृप्रेम की उच्च भावना का हृदयस्पर्शी चित्रण मिलता है। इसी प्रकार कैकेयी के पश्चाताप को कवि ने बड़ी मार्मिकता से प्रस्तुत किया है। उसका आत्मस्वीकार भाव उसकी अंत:पीड़ा को उजागर करता है—

“मैं रहूँ पंकिला पदमकोश है मेरा।”

अर्थात् यदि मैं कीचड़ भी हूँ, तो उसी से भरत जैसे कमल का जन्म हुआ—यही मेरा गौरव है।

‘यशोधरा’ : करुणा और नारी-पीड़ा का चित्रण

‘साकेत’ के अतिरिक्त ‘यशोधरा’ भी गुप्त जी की एक महत्वपूर्ण कृति है। इसमें गौतम बुद्ध के गृह-त्याग से लेकर उनके ज्ञान-प्राप्ति तक की घटनाओं का चित्रण है, किंतु कथा का केंद्र यशोधरा (गोपा) की विरह-वेदना और आंतरिक व्यथा है। कवि ने नारी-हृदय की करुण संवेदनाओं को अत्यंत प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त किया है—

“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।”

इस प्रकार ‘साकेत’ और ‘यशोधरा’ दोनों ही कृतियाँ गुप्त जी की काव्य-दृष्टि की व्यापकता, संवेदनशीलता और नारी-चेतना के प्रति उनकी गहरी सहानुभूति को स्पष्ट करती हैं। इन रचनाओं ने हिंदी महाकाव्य परंपरा को नई दिशा और ऊँचाई प्रदान की।

अन्य प्रमुख कृतियाँ

मैथिलीशरण गुप्त ने अनेक खंडकाव्य, काव्यगीत और नाटिकाओं की रचना की। भारत-भारती, साकेत, ‘पंचवटी’, ‘यशोधरा’ (1932), ‘जयद्रथ वध’ आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। ‘यशोधरा’ में उन्होंने बौद्ध दर्शन और करुणा के तत्वों को काव्यात्मक रूप दिया।

1931 ई. के आसपास ‘साकेत’ और ‘पंचवटी’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ पूर्ण हुए। इसी समय उनका संपर्क राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से निकट हुआ। गांधी जी के विचारों का प्रभाव उनके काव्य और जीवन-दृष्टि पर स्पष्ट दिखाई देता है।

स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका

मैथिलीशरण गुप्त केवल साहित्यकार ही नहीं थे, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी भी थे। वे महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े। 16 अप्रैल 1941 को व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पहले उन्हें झाँसी और फिर आगरा जेल ले जाया गया। सात महीने तक कारावास के बाद आरोप सिद्ध न होने पर उन्हें रिहा कर दिया गया।

इस अनुभव ने उनके काव्य को और अधिक संवेदनशील तथा राष्ट्र-समर्पित बनाया।

सम्मान एवं उपाधियाँ

मैथिलीशरण गुप्त को उनके साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान प्राप्त हुए। 1948 ई. में आगरा विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की उपाधि प्रदान की। बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने भी उन्हें डी.लिट. की मानद उपाधि से सम्मानित किया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में वे मानद प्रोफेसर के रूप में भी नियुक्त हुए।

1952 से 1964 तक वे राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। 1953 ई. में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उन्हें पद्म भूषण सम्मान भी प्राप्त हुआ। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1962 ई. में उन्हें अभिनंदन ग्रंथ भेंट किया।

राष्ट्रकवि (सम्मानसूचक उपाधि)

मैथिलीशरण गुप्त को उनकी राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत काव्यधारा के कारण ‘राष्ट्रकवि’ के सम्मान से विभूषित किया गया। उनकी रचनाओं, विशेषतः भारत-भारती, ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में जनमानस में देशभक्ति और सांस्कृतिक आत्मगौरव की भावना जागृत की। इसी कारण साहित्य-जगत और जनता ने उन्हें राष्ट्रीय भावनाओं के प्रतिनिधि कवि के रूप में स्वीकार किया।

यह उल्लेखनीय है कि ‘राष्ट्रकवि’ कोई औपचारिक सरकारी पदवी नहीं, बल्कि उनके साहित्यिक अवदान और राष्ट्रीय प्रभाव के प्रति आदरभाव से प्रदान की गई सम्मानसूचक उपाधि है।

साहित्यिक संस्थाएँ और प्रकाशन कार्य

मैथिलीशरण गुप्त ने साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए स्वयं भी महत्वपूर्ण प्रयास किए। 1911 ई. में चिरगाँव में उन्होंने ‘साहित्य सदन’ नामक अपनी स्वयं की प्रेस की स्थापना की। बाद में 1954-55 में झाँसी में ‘मानस-मुद्रण’ की स्थापना की। इन प्रेसों के माध्यम से उन्होंने अपनी तथा अन्य साहित्यकारों की रचनाओं का प्रकाशन किया।

इसी काल में प्रयाग में ‘सरस्वती’ पत्रिका की स्वर्ण जयंती समारोह का आयोजन हुआ, जिसकी अध्यक्षता गुप्त जी ने की। यह उनके साहित्यिक कद और प्रतिष्ठा का प्रमाण था।

व्यक्तिगत जीवन और अंतिम समय

1963 ई. में उनके अनुज सियाराम शरण गुप्त के निधन से उन्हें गहरा आघात पहुँचा, जिससे वे मानसिक रूप से अत्यंत व्यथित हो गए। 12 दिसंबर 1964 ई. को उन्हें हृदयाघात हुआ और इस प्रकार हिंदी साहित्य का यह उज्ज्वल नक्षत्र अस्त हो गया। वे 78 वर्ष की आयु तक जीवित रहे।

साहित्यिक योगदान और महत्व

मैथिलीशरण गुप्त ने अपने जीवनकाल में दो महाकाव्य, उन्नीस खंडकाव्य, अनेक काव्यगीत, नाटिकाएँ और अनुवाद ग्रंथों की रचना की। उनके काव्य में राष्ट्रीय चेतना, धार्मिक भावना और मानवीय उत्थान की स्पष्ट झलक मिलती है। वे मानववादी, नैतिक और सांस्कृतिक काव्यधारा के विशिष्ट कवि थे।

उन्होंने खड़ी बोली हिंदी को साहित्यिक गरिमा प्रदान की और उसे गंभीर काव्य-रचना के योग्य सिद्ध किया। ‘भारत भारती’ जैसी कृतियाँ आज भी राष्ट्रीय चेतना का स्रोत बनी हुई हैं।

हिन्दी साहित्य में स्थान

मैथिलीशरण गुप्त आधुनिक हिन्दी काव्यधारा के प्रमुख स्तंभों में गिने जाते हैं। वे केवल एक कवि ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के सशक्त प्रवक्ता भी थे। उनकी रचनाओं ने जनमानस में देशभक्ति और सांस्कृतिक आत्मबोध की भावना को दृढ़ किया, इसी कारण उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।

खड़ी बोली हिन्दी को काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उस समय ब्रजभाषा को ही काव्य के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता था, परंतु गुप्त जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सिद्ध किया कि खड़ी बोली में भी वही मधुरता, कोमलता और अभिव्यक्ति की क्षमता विद्यमान है। उनकी भाषा सरल, सरस और जन-सुलभ होने के साथ-साथ भावाभिव्यक्ति में अत्यंत प्रभावी है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी उनके काव्य-महत्त्व को स्वीकार करते हुए उन्हें हिन्दी समाज का प्रतिनिधि कवि कहा है। वस्तुतः गुप्त जी का साहित्यिक अवदान हिन्दी काव्य को नई दिशा देने और उसे राष्ट्रीय जीवन से जोड़ने के लिए सदैव स्मरणीय रहेगा।

उपसंहार

मैथिलीशरण गुप्त हिंदी साहित्य के ऐसे कवि हैं, जिनका योगदान केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय भी है। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से भारतीय समाज को आत्मगौरव, नैतिकता और मानवता का संदेश दिया। उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा। हिंदी साहित्य के इतिहास में उनका नाम सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।

जयंती एवं ‘कवि दिवस’

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की स्मृति को सम्मानित करने के उद्देश्य से मध्य प्रदेश शासन ने उनकी जयंती को विशेष रूप से मनाने का निर्णय लिया है। प्रदेश के संस्कृति राज्य मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के अनुसार, प्रतिवर्ष 3 अगस्त को गुप्त जी की जयंती ‘कवि दिवस’ के रूप में आयोजित की जाएगी।

इस पहल का उद्देश्य नई पीढ़ी को भारतीय साहित्य की गौरवशाली परंपरा से परिचित कराना है। संस्कृति विभाग द्वारा प्रदेश भर में विभिन्न साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनका केंद्र भारतीय कवियों का योगदान और उनकी रचनात्मक धरोहर होगी। इस प्रकार यह आयोजन न केवल गुप्त जी को श्रद्धांजलि है, बल्कि साहित्यिक चेतना के संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है।

मैथिलीशरण गुप्त जी की कृतियाँ, रचनाएँ

मैथिलीशरण गुप्त का साहित्यिक अवदान अत्यंत व्यापक और बहुविध है। उन्होंने महाकाव्य, खंडकाव्य, नाटक, अनुवाद, पत्र-साहित्य तथा विविध फुटकर रचनाओं के माध्यम से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। उनकी प्रमुख कृतियों को निम्नलिखित वर्गों में प्रस्तुत किया जा सकता है—

1. महाकाव्य

गुप्त जी के महाकाव्य उनकी काव्य-प्रतिभा की पराकाष्ठा माने जाते हैं—

  • साकेत (1931)
  • यशोधरा (1932)

2. खंडकाव्य

खंडकाव्य के क्षेत्र में भी उनकी रचनाएँ अत्यंत प्रसिद्ध हैं। इनमें ऐतिहासिक, पौराणिक, राष्ट्रीय और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर समन्वय मिलता है—
जयद्रथ-वध (1910), भारत-भारती (1912), किसान (1917), पंचवटी (1925), झंकार (1929), गुरुकुल (1929), द्वापर (1936), जय भारत (1952), नहुष, सिद्धराज, अंजलि और अर्घ्य, अजित, अर्जन और विसर्जन, काबा और कर्बला, कुणाल गीत, गुरु तेग बहादुर, युद्ध, पृथ्वीपुत्र, वक-संहार, शकुंतला, विश्व-वेदना, राजा-प्रजा, विष्णुप्रिया, उर्मिला, लीला, प्रदक्षिणा, दिवोदास, भूमि-भाग आदि।

3. नाटक

गुप्त जी ने नाटक-रचना के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके प्रमुख नाटक हैं—
रंग में भंग (1909), राजा-प्रजा, विकट भट, विरहिणी, वैतालिक, शक्ति, सैरन्ध्री, स्वदेश संगीत, हिड़िम्बा, हिन्दू, चंद्रहास आदि।

इसके अतिरिक्त उन्होंने भास के नाटकों से प्रेरित होकर कुछ मौलिक नाटकों की भी रचना की, जैसे—

  • अनघ (स्वप्नवासवदत्ता पर आधारित)
  • चरणदास (प्रतिमा पर आधारित)
  • तिलोत्तमा (अभिषेक पर आधारित)
  • निष्क्रिय प्रतिरोध (अविमारक पर आधारित)

4. अनूदित कृतियाँ (मधुप नाम से)

गुप्त जी ने ‘मधुप’ उपनाम से अनेक महत्वपूर्ण अनुवाद किए—

  • संस्कृत से: स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिमा, अभिषेक, अविमारक (भास), रत्नावली (हर्षवर्धन)
  • बंगला से: मेघनाथ-वध, विहारिणी वज्रांगना (माइकल मधुसूदन दत्त), पलासी का युद्ध (नवीनचंद्र सेन)
  • फारसी से: रुबाइयात-ए-उमर खय्याम

5. अन्य रचनाएँ

  • कविताओं का संग्रह: उच्छवास
  • पत्र-संग्रह: पत्रावली
  • फुटकर रचनाएँ: केशों की कथा, स्वर्गसहोदर (ये रचनाएँ मंगल घट में संग्रहीत हैं)

6. ग्रंथावली

मैथिलीशरण गुप्त की समग्र मौलिक एवं अनूदित रचनाओं का संकलन ‘मैथिलीशरण गुप्त ग्रंथावली’ के रूप में 12 खंडों में प्रकाशित हुआ है। इसका संपादन डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल ने किया है और यह वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित है।

इस प्रकार गुप्त जी की कृतियाँ विषय-विविधता, भाव-गंभीरता और साहित्यिक गरिमा की दृष्टि से हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।

मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएँ : वर्गीकृत सारणी

श्रेणीप्रमुख कृतियाँवर्ष (जहाँ उपलब्ध)टिप्पणी
महाकाव्यसाकेत1931रामकथा पर आधारित, उर्मिला-केन्द्रित दृष्टि
यशोधरा1932बुद्ध के जीवन प्रसंग, नारी-वेदना का चित्रण
खंडकाव्यजयद्रथ-वध1910पौराणिक प्रसंग
भारत-भारती1912राष्ट्रीय चेतना का स्वर
किसान1917ग्रामीण जीवन व सामाजिक भाव
पंचवटी1925रामकथा प्रसंग
झंकार1929काव्य-संग्रहात्मक स्वर
गुरुकुल1929सांस्कृतिक आदर्श
द्वापर1936पौराणिक पृष्ठभूमि
जय भारत1952राष्ट्रवादी काव्य
अन्य प्रमुख कृतियाँनहुष, सिद्धराज, अंजलि और अर्घ्य, अजित, अर्जन और विसर्जन, काबा और कर्बला, कुणाल-गीत, गुरु तेग बहादुर, युद्ध, पृथ्वीपुत्र, वक-संहार, शकुंतला, विश्व-वेदना, राजा-प्रजा, विष्णुप्रिया, उर्मिला, लीला, प्रदक्षिणा, दिवोदास, भूमि-भाग आदि
नाटक (मौलिक)रंग में भंग1909प्रारंभिक नाटक
अन्य नाटकराजा-प्रजा, विकट भट, विरहिणी, वैतालिक, शक्ति, सैरन्ध्री, स्वदेश संगीत, हिड़िम्बा, हिन्दू, चंद्रहास आदि
भास के नाटकों पर आधारित मौलिक नाटकअनघस्वप्नवासवदत्ता पर आधारित
चरणदासप्रतिमा पर आधारित
तिलोत्तमाअभिषेक पर आधारित
निष्क्रिय प्रतिरोधअविमारक पर आधारित
अनूदित कृतियाँ (मधुप नाम से)स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिमा, अभिषेक, अविमारकसंस्कृत (भास)
रत्नावलीसंस्कृत (हर्षवर्धन)
मेघनाथ-वध, विहारिणी वज्रांगनाबंगला (माइकल मधुसूदन दत्त)
पलासी का युद्धबंगला (नवीनचंद्र सेन)
रुबाइयात-ए-उमर खय्यामफारसी से अनूदित
अन्य रचनाएँउच्छवासकविताओं का संग्रह
पत्रावलीपत्र-संग्रह
केशों की कथा, स्वर्गसहोदरफुटकर रचनाएँ
ग्रंथावलीमैथिलीशरण गुप्त ग्रंथावली (12 खंड)2008 (प्रथम संस्करण)संपादक: डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल, वाणी प्रकाशन

काव्यगत विशेषताएँ

मैथिलीशरण गुप्त मूलतः लोकजीवन से जुड़े हुए कवि थे। वे अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक समस्याओं के प्रति गहरी संवेदना रखते थे। उनके काव्य में एक ओर वैष्णव भक्ति की करुणा और आदर्शवाद दिखाई देता है, तो दूसरी ओर नवजागरण काल की राष्ट्रीय और नैतिक चेतना का सशक्त स्वर भी मिलता है। उनके विचारों पर लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिनचंद्र पाल, गणेश शंकर विद्यार्थी और मदनमोहन मालवीय जैसे राष्ट्रवादी चिंतकों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।

महात्मा गांधी के राजनीतिक जीवन में सक्रिय होने से पूर्व ही गुप्त जी का युवा मानस गरम दल और तत्कालीन क्रांतिकारी विचारधाराओं से प्रेरित हो चुका था। यही कारण है कि जयद्रथ-वध और भारत-भारती जैसी आरंभिक रचनाओं में तीखा राष्ट्रीय और क्रांतिकारी स्वर सुनाई देता है। कालांतर में महात्मा गांधी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और विनोबा भावे के संपर्क में आने के बाद उनके विचारों में संतुलन आया और वे गांधीवाद के व्यावहारिक पक्ष तथा सुधारवादी आंदोलनों के समर्थक बने। इसका प्रभाव उनके उत्तरकालीन साहित्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

गुप्त जी के काव्य की प्रमुख विशेषताओं को इस प्रकार संक्षेपित किया जा सकता है—

  • राष्ट्रीय चेतना और गांधीवादी विचारधारा का प्राधान्य
  • भारत के गौरवशाली अतीत और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा सम्मान
  • पारिवारिक जीवन और उसके नैतिक मूल्यों को यथोचित महत्व
  • नारी-जीवन के प्रति विशेष संवेदना और सम्मानपूर्ण दृष्टि
  • प्रबंध और मुक्तक, दोनों काव्य-रूपों में समान अधिकार
  • शब्द-शक्ति, अलंकारों और मुहावरों का सशक्त एवं स्वाभाविक प्रयोग
  • विरहिणी एवं पतिवियुक्ता नारी की मनोवैज्ञानिक पीड़ा का मार्मिक चित्रण

इस प्रकार मैथिलीशरण गुप्त का काव्य लोकमंगल, राष्ट्रीय चेतना और मानवीय मूल्यों का संतुलित एवं प्रभावशाली समन्वय प्रस्तुत करता है, जो उन्हें आधुनिक हिन्दी कविता में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।

राष्ट्रीयता और गांधीवादी दृष्टि

मैथिलीशरण गुप्त के व्यक्तित्व और कृतित्व में राष्ट्रीय चेतना गहराई से समाई हुई थी। उनकी रचनाएँ देशप्रेम, सांस्कृतिक स्वाभिमान और नैतिक जागरण की भावना से प्रेरित हैं। वे भारतीय इतिहास और परंपरा के प्रति श्रद्धावान थे, किंतु जड़ रूढ़ियों और निरर्थक आडंबरों के समर्थक नहीं थे। उनका उद्देश्य भारतीय संस्कृति को नवीन, प्रगतिशील और जीवनोपयोगी स्वरूप में प्रस्तुत करना था।

भारत-भारती में उन्होंने राष्ट्र की तत्कालीन दयनीय स्थिति पर वेदना व्यक्त करते हुए भारत के उज्ज्वल अतीत का ओजपूर्ण स्मरण किया। उनकी दृष्टि में भारत केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि ऋषियों की तपोभूमि और सांस्कृतिक वैभव का केंद्र है—

भूलोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ?
फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल कहाँ?
संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है।

गांधीजी के संपर्क के पश्चात उनके काव्य में सत्य, अहिंसा, कर्मशीलता और लोकमंगल की भावना और अधिक स्पष्ट हुई। उन्होंने आदर्श समाज, सुसंस्कृत परिवार और उच्च चरित्र वाले स्त्री-पुरुषों की कल्पना को अपने काव्य का आधार बनाया। जयद्रथ-वध, साकेत, पंचवटी, यशोधरा, द्वापर, नहुष, जयभारत, विष्णुप्रिया आदि रचनाएँ इस दृष्टि का प्रमाण हैं।

दार्शनिक चेतना और कर्मवाद

गुप्त जी का चिंतन केवल आध्यात्मिक भावभूमि तक सीमित नहीं है; उसमें सामाजिक यथार्थ और कर्मप्रधान जीवन-दृष्टि का समन्वय है। उनके लिए दर्शन जीवन से पृथक कोई अमूर्त विचार नहीं, बल्कि व्यवहार में उतरने वाली प्रेरणा है। वे अंतर्मुखी साधक की अपेक्षा बहिर्मुखी कर्मयोगी कलाकार के रूप में अधिक दिखाई देते हैं।

साकेत में राम के माध्यम से उन्होंने कर्म की महिमा का उद्घोष किया—

सन्देश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया,
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।

राम का यह स्वर जीवन में सक्रियता और उत्तरदायित्व की प्रेरणा देता है। लक्ष्मण के शब्दों में भी मानवता के प्रति उदार दृष्टि प्रकट होती है—

मैं मनुष्यता को सुरत्व की
जननी भी कह सकता हूँ,
किन्तु पतित को पशु कहना भी
कभी नहीं सह सकता हूँ।

रहस्यात्मकता और आध्यात्मिक भावभूमि

वैष्णव संस्कारों से पोषित वातावरण में पले-बढ़े गुप्त जी के काव्य में भक्ति और अध्यात्म की स्वाभाविक धारा प्रवाहित होती है। साकेत में राम का चित्रण केवल ऐतिहासिक नायक के रूप में नहीं, बल्कि दैवी चेतना के प्रतीक रूप में भी हुआ है। कवि की भक्ति-वेदना इन पंक्तियों में मुखर होती है—

राम, तुम मानव हो? ईश्वर नहीं हो क्या?
विश्व में रमे हुए नहीं सभी कहीं हो क्या?

उनके लिए राम-चरित जीवन के रहस्य और लोकमंगल की भावना का प्रतीक है।

नारी-जीवन की प्रतिष्ठा

गुप्त जी ने अपने साहित्य में नारी को सम्मान और सहानुभूति का विशेष स्थान दिया। समाज में उपेक्षित एवं पीड़ित नारी की व्यथा उनके हृदय को द्रवित करती है। यशोधरा, विष्णुप्रिया और विशेषतः साकेत की उर्मिला इसके सशक्त उदाहरण हैं। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ—

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।

नारी की करुण स्थिति का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती हैं।

पतिवियुक्ता नारी का मार्मिक चित्रण

गुप्त जी की विशेष उपलब्धि विरहिणी नारी के अंतर्मन का सूक्ष्म और संवेदनापूर्ण चित्रण है। साकेत की उर्मिला, यशोधरा की गोपा और विष्णुप्रिया—इन पात्रों में पतिवियोग की पीड़ा, आत्मसंयम और नैतिक दृढ़ता का अद्वितीय समन्वय दिखाई देता है। उर्मिला का चरित्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसे पूर्ववर्ती काव्यों में अपेक्षित स्थान नहीं मिला था। गुप्त जी ने उसे त्याग, धैर्य और प्रेम की सजीव प्रतिमा के रूप में प्रतिष्ठित किया।

आचार्य द्विवेदी का प्रभाव

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के मार्गदर्शन ने गुप्त जी की साहित्य-साधना को दिशा दी। उनकी प्रेरणा से ही गुप्त जी की प्रारंभिक रचनाएँ ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुईं। उनकी पहली खड़ी बोली कविता ‘हेमंत’ (1907) इसी पत्रिका में छपी थी।

प्रकृति-चित्रण

प्रकृति के मनोहारी रूप का सजीव चित्रण भी गुप्त जी के काव्य की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। पंचवटी में वन-जीवन, चाँदनी रात, शीतल समीर और प्रकृति की शांति का अत्यंत चित्रात्मक वर्णन मिलता है। उनकी पंक्तियाँ—

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल-थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।

प्रकृति के सौंदर्य को सजीव बना देती हैं। उनके प्रकृति-वर्णन में केवल दृश्य-सौंदर्य ही नहीं, बल्कि भावात्मक आत्मीयता भी विद्यमान है।

इस प्रकार मैथिलीशरण गुप्त का काव्य राष्ट्रीय भावना, गांधीवादी चिंतन, दार्शनिक दृष्टि, नारी-संवेदना और प्रकृति-चित्रण—सभी पक्षों से समृद्ध है। उनके साहित्य में आदर्श और यथार्थ का संतुलित समन्वय उन्हें आधुनिक हिन्दी काव्य के अग्रणी कवियों में स्थापित करता है।

भाषा और शैली

मैथिलीशरण गुप्त की काव्य-भाषा मुख्यतः खड़ी बोली हिन्दी है, जिस पर उनका असाधारण अधिकार था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि खड़ी बोली भी गंभीर, मार्मिक और कलात्मक अभिव्यक्ति में पूर्णतः सक्षम है। उनके शब्द-भंडार की व्यापकता उल्लेखनीय है, जिसके माध्यम से वे विविध भावों को सशक्त रूप में व्यक्त करते हैं।

उनकी आरंभिक रचनाओं में संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दों की अधिकता दिखाई देती है, जिससे भाषा अपेक्षाकृत कठोर प्रतीत होती है। भारत-भारती में खड़ी बोली का स्वाभाविक ओज तो है, पर उसमें कहीं-कहीं कठोरता भी अनुभव होती है। समय के साथ उनकी भाषा अधिक परिष्कृत, प्रवाहपूर्ण और सरस बनती गई। यद्यपि उन्होंने संस्कृत से पर्याप्त शब्द-सामग्री ग्रहण की, तथापि प्रियप्रवास जैसी कृतियों में भाषा अपेक्षाकृत सरल और सहज रूप में सामने आती है। भावों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने के लिए वे संस्कृत शब्दावली का सहारा लेते हैं, साथ ही उनकी भाषा में कहीं-कहीं प्रांतीय प्रभाव भी झलकता है। समग्रतः उनके काव्य में भाव-पक्ष और कला-पक्ष का संतुलित समन्वय मिलता है।

शैलीगत विविधता

शैली के चयन में गुप्त जी ने उल्लेखनीय विविधता दिखाई, यद्यपि उनके काव्य में प्रबंधात्मक इतिवृत्तात्मक शैली की प्रधानता है। रंग में भंग, जयद्रथ-वध, नहुष, सिद्धराज और साकेत जैसी कृतियाँ इसी शैली में रची गई हैं। प्रबंध शैली के अंतर्गत उनके साहित्य में दो रूप स्पष्ट दिखाई देते हैं—

  • खंडकाव्यात्मक शैली
  • महाकाव्यात्मक शैली

साकेत को महाकाव्य का स्वरूप प्राप्त है, जबकि अन्य अनेक रचनाएँ खंडकाव्य की श्रेणी में आती हैं।

इसके अतिरिक्त उन्होंने वर्णनात्मक शैली का भी प्रयोग किया है, जिसका उदाहरण भारत-भारती और हिन्दू में देखा जा सकता है। गीत-शैली में उन्होंने नाटकीय तत्वों का समावेश किया, जिसका उदाहरण अनघ है। आत्मोद्गार शैली में रचित द्वापर में अंतर्मन की अभिव्यक्ति प्रमुख है। वहीं यशोधरा में नाटक, गीत, गद्य और पद्य के सम्मिश्रण से एक मिश्रित शैली का सृजन हुआ है।

यद्यपि सभी शैलियों में उन्हें समान सफलता नहीं मिली, फिर भी उनकी लेखन-शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें उनका व्यक्तित्व स्पष्ट रूप से झलकता है। उनकी भाषा में स्वाभाविक प्रवाह है और वह भाव-अभिव्यक्ति को समर्थ ढंग से वहन करती है।

निष्कर्ष

मैथिलीशरण गुप्त आधुनिक हिन्दी साहित्य के उन विशिष्ट कवियों में हैं जिन्होंने कविता को केवल भावाभिव्यक्ति का माध्यम न मानकर उसे राष्ट्रीय जागरण, सामाजिक सुधार और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का सशक्त उपकरण बनाया। उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी को काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई और यह सिद्ध किया कि यह भाषा भी उतनी ही मधुर, प्रभावपूर्ण और गंभीर अभिव्यक्ति में सक्षम है जितनी ब्रजभाषा।

उनकी कृतियों में राष्ट्रीय चेतना, गांधीवादी विचारधारा, भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा सम्मान, नारी-जीवन की संवेदनशील प्रस्तुति तथा दार्शनिक दृष्टि का संतुलित समन्वय दिखाई देता है। भारत-भारती ने स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक ऊर्जा प्रदान की, तो साकेत और यशोधरा ने उपेक्षित पात्रों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं को नई ऊँचाई दी। विशेष रूप से उर्मिला, यशोधरा और विष्णुप्रिया जैसे चरित्रों के माध्यम से उन्होंने नारी के त्याग, धैर्य और अंतर्मन की पीड़ा को साहित्य में प्रतिष्ठा दिलाई।

गुप्त जी का काव्य आदर्श और यथार्थ के बीच संतुलन स्थापित करता है। उनमें एक ओर भक्ति और अध्यात्म की आस्था है, तो दूसरी ओर कर्मप्रधान जीवन-दृष्टि और लोकमंगल की भावना भी है। उनकी लेखनी में राष्ट्रप्रेम, नैतिकता और मानवता का जो समन्वित स्वर मिलता है, वही उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ के रूप में विशिष्ट पहचान दिलाता है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मैथिलीशरण गुप्त का साहित्य हिन्दी काव्य परंपरा की अमूल्य धरोहर है। उनकी रचनाएँ आज भी राष्ट्रीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय मूल्यों की प्रेरणा देती हैं। वे न केवल अपने युग के प्रतिनिधि कवि थे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी मार्गदर्शक बने रहेंगे।


  • “कैकेयी का अनुताप” काव्य के आधार पर कैकेयी के व्यक्तित्व का समालोचनात्मक विवेचन कीजिए।
  •  “कैकेयी का अनुताप” के आधार पर कैकेयी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  • मैथिलीशरण गुप्त द्वारा प्रस्तुत कैकेयी के चरित्र की नवीन व्याख्या पर उदाहरणों सहित प्रकाश डालिए।
  • “कैकेयी का अनुताप” में कैकेयी के पश्चात्ताप, आत्मग्लानि और मानसिक परिवर्तन का वर्णन कीजिए।
  • मैथिलीशरण गुप्त ने कैकेयी के चरित्र में जो नवीनताएँ उत्पन्न की हैं, उन्हें उदाहरण सहित समझाइए।
  • परंपरागत रामकथा की कैकेयी और मैथिलीशरण गुप्त की मानवीय एवं संवेदनशील कैकेयी में अंतर स्पष्ट कीजिए।

कैकेयी का पश्चाताप : आत्मबोध और अपराध-स्वीकार

साकेत में मैथिलीशरण गुप्त ने कैकेयी के चरित्र को केवल अपराधिनी रानी के रूप में सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे आत्मबोध और पश्चाताप के माध्यम से एक मानवीय ऊँचाई प्रदान की है। राम के मुख से जब यह स्वीकार कराया जाता है कि उन्होंने जान-बूझकर भी भरत को दोषी नहीं माना, तब कैकेयी का अन्तर्मन पूरी तरह जाग उठता है। वह स्वयं को अपराधी मानते हुए स्वीकार करती है कि यदि यह सत्य है, तो राम को वन भेजने का दोष उसी का है, न कि भरत या किसी अन्य का।

रघुकुल-कलंक का भय और ऐतिहासिक आत्मग्लानि

कैकेयी को यह गहरा बोध होता है कि उसका नाम इतिहास में रघुकुल को कलंकित करने वाली रानी के रूप में अंकित हो जाएगा और पीढ़ियों तक यह कथा कही जाएगी कि स्वार्थवश उसने राम जैसे आदर्श पुत्र को वनवास दिया। इसी आत्मग्लानि की तीव्रता को गुप्तजी ने उसके शब्दों में अत्यन्त मार्मिक रूप में अभिव्यक्त किया है—

युग-युग तक चलती रहे कठोर कहानी,
रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी।
निज जन्म-जन्म में सुने जीव यह मेरा,
धिक्कार! उसे था महा स्वार्थ ने घेरा।

राम की उदार दृष्टि और भरत-माता की महिमा

कैकेयी का यह पश्चाताप केवल आत्मनिंदा तक सीमित नहीं रहता। राम, जिनका चरित्र करुणा और उदारता का प्रतीक है, इस अवसर पर कैकेयी को धिक्कारने के बजाय भरत की महानता का स्मरण कराते हैं। वे कहते हैं कि जिस माता ने भरत जैसे त्यागी और धर्मनिष्ठ पुत्र को जन्म दिया, वह निश्चय ही धन्य है—

सौ बार धन्य वह एक लाल की माई,
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई।

राम के इन शब्दों का समर्थन पूरी सभा करती है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कैकेयी का एक अपराध उसके सम्पूर्ण मातृत्व को नकार नहीं सकता।

मौन असंभव है : अनुताप की अनिवार्यता

कैकेयी अनुभव करती है कि इतने बड़े पाप को करके मौन रहना उसके लिए असंभव है। कैकेयी अपने अपराध को पहाड़ के समान भारी मानते हुए स्वीकार करती है कि वह चुप रहकर या बिना पश्चाताप किए इस पाप का भार नहीं सह सकती। वह स्पष्ट रूप से कहती है कि मन्थरा को दोष देना व्यर्थ है, क्योंकि वास्तविक दुर्बलता उसके अपने मन की थी, जिसे वह नियंत्रित नहीं कर सकी—

करके पहाड़-सा पाप मौन रह जाऊँ?
राई-भर भी अनुताप न करने पाऊँ?

यह स्वीकारोक्ति कैकेयी के चरित्र को अपराध से ऊपर उठाकर आत्मसमीक्षा के स्तर पर प्रतिष्ठित करती है।

मातृत्व की रक्षा की आकांक्षा

यद्यपि कैकेयी अपने पाप के लिए किसी भी दण्ड को सहने को तैयार है, किन्तु उसकी सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि कहीं उससे भरत का मातृपद न छीन लिया जाए। वह लोकप्रचलित धारणा को स्मरण करती है कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती—और अपने कर्म से इस मान्यता को खंडित कर देने का भय उसे भीतर तक व्यथित कर देता है—

छीने न मातृपद किन्तु भरत का मुझसे,
रे राम, दुहाई करूँ और क्या तुझसे?

निष्कर्ष : पश्चाताप द्वारा चरित्र-परिमार्जन

उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि पश्चाताप की अग्नि में तपकर कैकेयी का चरित्र निर्मल और पवित्र हो जाता है। गुप्तजी ने रामकथा में उसके अनुताप को स्थान देकर यह सिद्ध किया है कि मानवीय दुर्बलता अपराध का कारण बन सकती है, पर आत्मबोध, पश्चाताप और प्रायश्चित के माध्यम से उसका परिमार्जन भी संभव है। मोहवश किया गया उसका अपराध मानवीय दुर्बलता का परिणाम था, पर भूल का बोध होने पर पश्चाताप और प्रायश्चित के माध्यम से आत्मशुद्धि भी संभव है—इस सत्य को कवि ने अत्यन्त संवेदनशील ढंग से स्थापित किया है। इसी कारण साकेत का यह प्रसंग न केवल करुण है, बल्कि पाठक के हृदय को गहराई से स्पर्श करता है।


  • ‘साकेत’ के आधार पर उर्मिला के विरह की करुणा और मानसिक संघर्ष का वर्णन कीजिए।
  • मैथिलीशरण गुप्त ने उर्मिला के विरह को किन भावात्मक विशेषताओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया है? स्पष्ट कीजिए।
  •  ‘साकेत’ में संकलित अंश के आधार पर उर्मिला के विरह वर्णन पर प्रकाश डालिए।
  • ‘साकेत’ में उर्मिला के विरह-वर्णन की मानवीय संवेदना और काव्यात्मक सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
  • उर्मिला के विरह प्रसंग के माध्यम से मैथिलीशरण गुप्त की नारी-दृष्टि को स्पष्ट कीजिए।

‘साकेत’ में उर्मिला का विरह-वर्णन

मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ रामकथा पर आधारित एक महत्त्वपूर्ण महाकाव्य है, जिसमें कवि ने पारंपरिक कथा से भिन्न दृष्टिकोण अपनाते हुए उपेक्षित पात्र उर्मिला को केंद्र में स्थापित किया है। विशेषतः नवम सर्ग में उर्मिला के विरह का अत्यंत संवेदनापूर्ण, मार्मिक और मनोवैज्ञानिक चित्रण मिलता है। यहाँ उनका वियोग केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि त्याग, धैर्य और नारी-संवेदना का सजीव रूप बनकर उभरता है।

प्रकृति में प्रिय का दर्शन

उर्मिला के विरह-वर्णन की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह प्रकृति के प्रत्येक दृश्य में अपने प्रिय लक्ष्मण की छवि देखती है। शरद ऋतु के आगमन के साथ जब आकाश निर्मल होता है, खंजन पक्षी दिखाई देते हैं, सरोवर जल से परिपूर्ण हो उठते हैं और हंस विहार करते हैं, तब विरहिणी के लिए ये सब केवल ऋतु-परिवर्तन के संकेत नहीं रह जाते—वे उसके प्रिय के स्मृति-चिह्न बन जाते हैं।

वह अपनी सखी से कहती है—

निरख सखी ये खंजन आए।
फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मनभाए।
फैला उनके तन का आतप मन से सर सरसाए।
घूमे वे इस ओर वहाँ ये हंस यहाँ उड़ छाए॥

इन पंक्तियों में खंजन पक्षियों की चंचल आँखों में उसे लक्ष्मण की दृष्टि का स्मरण होता है, सूर्य की धूप में उनके तेजस्वी शरीर का आभास और हंसों के विहार में उनके गमन की छवि। इस प्रकार प्रकृति उर्मिला के लिए स्मृतियों का दर्पण बन जाती है।

ऋतु-परिवर्तन और विरह की तीव्रता

जैसे-जैसे ऋतुएँ बदलती हैं, उर्मिला की मनोदशा भी उनके अनुरूप रूपायित होती है। शिशिर और पतझड़ का वातावरण उसके अंतर्मन की सूनी अवस्था को और स्पष्ट कर देता है। वन-उपवनों का शुष्क होना मानो उसके क्षीण होते शरीर और कुम्हलाए मुख का प्रतीक बन जाता है।

वह कहती है—

शिशिर न फिर वन-वन में,
जितना मांगे पतझड़ दूंगी मैं इस निज नन्दन में।
कितना कम्पन तुझे चाहिए ले मेरे इस तन में,
सखी कह रही पाण्डुरता का क्या अभाव आनन में॥

इन पंक्तियों में उसकी शारीरिक क्षीणता, कंपित तन और पांडुर मुख का चित्र उपस्थित है। आँसू मोतियों की तरह झरते रहते हैं और समूचा अस्तित्व वियोग की अग्नि में तपता दिखाई देता है।

कामदेव से करुण निवेदन

विरह केवल स्मृति और शारीरिक क्षीणता तक सीमित नहीं है; उसमें काम-भावना की पीड़ा भी अंतर्निहित है। उर्मिला कामदेव से विनम्र निवेदन करती है कि वह एक अबला, वियोग से संतप्त नारी पर अपने बाण न चलाए। उसकी वाणी में करुणा, व्यथा और आत्मगौरव का सुंदर समन्वय है—

मुझे फूल मत मारो।
मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो॥
होकर मधु के मीत मदन पटु तुम कटु गरल न गारो।
मुझे विकलता, तुम्हें विफलता—ठहरो, श्रम परिहारो॥

यहाँ उर्मिला की संवेदनशीलता के साथ-साथ उसका आत्मसम्मान भी झलकता है। वह अपनी पीड़ा को स्वीकार करती है, परंतु अपनी मर्यादा और गरिमा को बनाए रखती है।

विरह की मौलिकता और काव्य-सौंदर्य

उर्मिला का यह विरह-वर्णन ‘साकेत’ की विशिष्ट उपलब्धि है। रामकथा के पारंपरिक आख्यानों में जहाँ उर्मिला का उल्लेख संक्षेप में मिलता है, वहीं गुप्तजी ने उसे संवेदनशील, त्यागमयी और अंतर्मुखी नायिका के रूप में प्रतिष्ठित किया है। प्रकृति-सौंदर्य, ऋतु-चित्रण, मानवीय भावनाओं और मनोवैज्ञानिक गहराई के माध्यम से उन्होंने उर्मिला के वियोग को अत्यंत सजीव और हृदयस्पर्शी बना दिया है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि ‘साकेत’ में उर्मिला का विरह-वर्णन केवल करुण प्रसंग नहीं, बल्कि नारी-मन की सूक्ष्म अनुभूतियों का कलात्मक और प्रभावपूर्ण चित्रण है। यह गुप्तजी की मौलिक उद्भावना तथा काव्य-कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है।


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सर्वनाम (Pronoun) किसे कहते है? परिभाषा, भेद एवं उदाहरण भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग | नाम, स्थान एवं स्तुति मंत्र प्रथम विश्व युद्ध: विनाशकारी महासंग्राम | 1914 – 1918 ई.