भारत की भाषिक विविधता अद्वितीय है और इसी विविधता के अंतर्गत हिमालय की तराई एवं पर्वतीय क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाएँ एक विशिष्ट पहचान रखती हैं। उत्तराखंड राज्य के कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषा को सामान्यतः पहाड़ी हिन्दी या मध्य पहाड़ी भाषा कहा जाता है। भाषावैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार पहाड़ी हिन्दी, खस-प्राकृत की प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी मानी जाती है। इसके भाषा-इतिहास में कई जातीय, सांस्कृतिक और भौगोलिक प्रभावों का समावेश मिलता है, जो इसे विशिष्ट और बहुआयामी बनाते हैं।
इस लेख में हम पहाड़ी हिन्दी की उत्पत्ति, विकास, प्रमुख बोलियों, कुमाउनी और गढ़वाली भाषा की उपशाखाओं तथा उनकी भाषाई विशेषताओं पर विस्तृत विवेचन करेंगे।
पहाड़ी हिन्दी का उद्गम और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
पहाड़ी हिन्दी को भाषाविज्ञान में सामान्यतः मध्य पहाड़ी भाषा समूह के अंतर्गत रखा जाता है। प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने भी इस भाषा को Middle Pahari नाम से वर्गीकृत किया था।
खस-प्राकृत से विकास
भाषावैज्ञानिक शोध बताते हैं कि पहाड़ी हिन्दी का मूल स्रोत खस-प्राकृत है, जो प्राकृत भाषाओं की एक विशिष्ट शाखा रही है। खस प्राकृत का संबंध उत्तर भारत और हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाली खस जाति से माना जाता है।
समय के साथ-साथ खस जाति, राजपूत कुल, स्थानीय जनजातियाँ, किरात और भोटिया समुदायों के सांस्कृतिक संपर्क ने इस भाषा को परिष्कृत, परिवर्तित और समृद्ध किया।
प्राचीन अनार्य संस्कृति का प्रभाव
हिमालय के कई क्षेत्रों में प्राचीन काल से अनार्य जातियों का निवास रहा, जिनकी भाषाएँ तिब्बती-बरमेली या ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषाओं से प्रभावित थीं। बाद में वैदिक सभ्यता और राजपूत शासकों के आगमन के पश्चात् पहाड़ी भाषाओं में संस्कृत और अपभ्रंश तत्वों का मिश्रण होने लगा।
साहित्यिक परम्परा का अभाव
पहाड़ी हिन्दी, विशेषतः कुमाउनी और गढ़वाली, में लोकसाहित्य का अपार भंडार तो मिलता है, परंतु साहित्यिक भाषा के रूप में इनका विकास धीमा रहा। इसी कारण डॉ. बाहरी ने इसे स्वतंत्र भाषा का दर्जा देने में संकोच किया। उनका मत था कि साहित्यिक और व्याकरणिक परंपरा के अभाव में इसे उपभाषा कहना अधिक उपयुक्त है।
पहाड़ी हिन्दी का भौगोलिक विस्तार
पहाड़ी हिन्दी मुख्यतः उत्तराखंड के दो प्रमुख सांस्कृतिक क्षेत्रों में बोली जाती है—
- कुमाऊँ क्षेत्र (अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चम्पावत)
- गढ़वाल क्षेत्र (टिहरी, चमोली, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, देहरादून के कुछ भाग)
दोनों क्षेत्रों की भाषाएँ भिन्न होते हुए भी आपस में पर्याप्त समानताएँ रखती हैं। शब्दभंडार, स्वरों, व्यंजनों, उच्चारण और व्याकरण के स्तर पर इनकी समान जड़ें दिखाई देती हैं।
कुमाउनी भाषा (Kumaoni Language)
कुमाउनी, पहाड़ी हिन्दी की दो मुख्य शाखाओं में से एक है। कुमाऊँ क्षेत्र को प्राचीन ग्रंथों में ‘कुर्मांचल’ के नाम से जाना जाता था। यह भाषा ऐतिहासिक रूप से दरद, तिब्बती, राजस्थानी, खड़ी बोली, किरात और भोट भाषाओं से प्रभावित रही है।
कुमाउनी का ऐतिहासिक विकास
कुमाउनी भाषा का विकास तीन मुख्य चरणों में देखा जा सकता है—
- प्राकृत-अपभ्रंश काल – खस प्राकृत और स्थानीय पहाड़ी भाषाओं का सम्मिश्रण
- मध्यकाल – कत्यूरी और चंद राजाओं के शासन में भाषा का स्थायित्व
- आधुनिक काल – ब्रजभाषा, संस्कृत और हिन्दी प्रभाव का बढ़ना
कुमाउनी की विभिन्न उपबोलियों में प्राचीन लोककथाएँ, गीत, जागर, जुलूस, नाट्य और धार्मिक आख्यान आज भी जीवंत हैं।
कुमाउनी की उपबोलियाँ
कुमाउनी भाषा अत्यधिक विविधतापूर्ण है। भौगोलिक अंतराल, पर्वतीय दूरी और सांस्कृतिक विविधता के कारण इसमें लगभग 20 से अधिक रूपांतरण पाए जाते हैं।
सरल अध्ययन हेतु इन्हें चार मुख्य भौगोलिक क्षेत्रों में वर्गीकृत किया जाता है—
(1) पिथौरागढ़ क्षेत्र – उत्तर-पूर्वी कुमाउनी
यह उपबोली नेपाल और तिब्बत की सीमाओं के समीप होने के कारण कई तिब्बती और नेपाली प्रभाव रखती है।
(2) अल्मोड़ा एवं उत्तरी नैनीताल – मध्य कुमाउनी
मध्य कुमाउनी को कुमाउनी का मानक रूप माना जाता है। यह कुमाउनी साहित्य और प्रशासन में सबसे अधिक प्रयुक्त होती है।
(3) पश्चिमी अल्मोड़ा एवं नैनीताल – पश्चिमी कुमाउनी
इस रूप में राजस्थानी और पहाड़ी हिन्दी के मिश्रित स्वरूप देखने को मिलते हैं।
(4) दक्षिण-पूर्वी नैनीताल – दक्षिण-पूर्वी कुमाउनी
यह बोली तराई क्षेत्रों के निकट होने के कारण खड़ी बोली और कुमाउनी का सम्मिलित रूप है।
कुमाउनी की प्रमुख बोलियाँ
विस्तृत भौगोलिक विस्तार के कारण कुमाउनी में लगभग 20 प्रमुख बोलियाँ पाई जाती हैं, जैसे—
- जोहारी
- अस्कोटी
- सिराली
- खसपरजिया
- फल्दकोटि
- पछाइ
- सोरयाली
- चुगरख्यैली
- मझ कुमारिया
- दानपुरिया
- कमैया
- गंगोला
- रौचभैसि
इन उपबोलियों में ध्वनि-विन्यास, शब्द-संपदा और उच्चारण में सूक्ष्म अंतर मिलते हैं। उदाहरण के लिए, पिथौरागढ़ में प्रयुक्त जोहारी बोली में तिब्बती ध्वनियाँ अधिक दिखाई देती हैं, जबकि गंगोला बोली में लोकगीत और संस्कृतनिष्ठ शब्दों का उपयोग अधिक है।
गढ़वाली भाषा (Garhwali Language)
गढ़वाली भाषा, पहाड़ी हिन्दी की दूसरी प्रमुख शाखा है। यह गढ़वाल क्षेत्र में बोली जाती है, जिसमें टिहरी, पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग, देहरादून और उत्तरकाशी जैसे जिले शामिल हैं। गढ़वाली में लोकसाहित्य, लोकगीत और लोकनृत्य की समृद्ध परंपरा है।
गढ़वाली का विकास
गढ़वाली भाषा का विकास भी खस प्राकृत से माना जाता है। मध्यकाल में यहां के राजाओं, लोकसंस्कृति और सामाजिक संपर्कों ने इस भाषा को विकसित किया।
गढ़वाली पर ब्रजभाषा, राजस्थानी, पंजाबी और तिब्बती प्रभाव स्पष्ट दिखाई देते हैं।
गढ़वाली के साहित्यिक स्रोत
गढ़वाली में लिखित साहित्य अपेक्षाकृत देर से विकसित हुआ, परंतु मौखिक परंपरा अत्यंत समृद्ध है। विशेषतः—
- चौफला
- थड्या
- मांगल
- जगरी
- पंडव नृत्य
- हरूल
- जौली
जैसे लोकगीत गढ़वाली संस्कृति की आत्मा हैं।
गढ़वाली की प्रमुख उपबोलियाँ
गढ़वाली क्षेत्र की भौगोलिक विविधता के कारण इसमें कई उपबोलियाँ पाई जाती हैं। प्रमुख उपबोलियाँ हैं—
1. जौनसारी
जौनसार-बावर क्षेत्र की प्रमुख बोली। यह राजपूती और पहाड़ी मिश्रित प्रभावों के लिए जानी जाती है। इसमें कई पुराने संस्कृत शब्द सुरक्षित हैं।
2. सलाणी
टिहरी के आसपास बोली जाने वाली यह बोली सरल और मधुर मानी जाती है।
3. श्रीनगरीया
गढ़वाली का परिनिष्ठित या मानक स्वरूप। इसे साहित्यिक गढ़वाली भी कहा जाता है।
4. मार्छी
मार्छा जनजाति द्वारा बोली जाने वाली उपबोली। तिब्बती प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
5. राठी
राठ क्षेत्र (पौड़ी) में बोली जाने वाली यह बोली गीतों, कहावतों और सांस्कृतिक रूपों में प्रसिद्ध है।
6. जधी
उत्तरकाशी क्षेत्र में बोली जाती है। इसमें कठोर ध्वनियों और संक्षिप्त शब्दों का प्रयोग अधिक है।
7. चौंदकोटी
पौड़ी में बोली जाने वाली यह बोली गढ़वाली का अत्यंत प्रचलित रूप है।
पहाड़ी हिन्दी की भाषाई विशेषताएँ
कुमाउनी और गढ़वाली की भाषाई विशेषताएँ व्यापक अध्ययन का विषय हैं। दोनों भाषाओं में आपसी समानताओं के साथ-साथ कई विशिष्ट गुण भी देखे जाते हैं।
ध्वनि-विन्यास (Phonetics)
- स्वरों की संख्या हिन्दी से कुछ अधिक है।
- कई स्थानों पर अर्ध-स्वर और अर्ध-व्यंजन का प्रयोग होता है।
- ‘ष’, ‘श’ और ‘स’ ध्वनियों का अदला-बदली रूप में प्रयोग।
- ‘ळ’ ध्वनि का प्रयोग काफी मिलता है।
शब्दावली (Vocabulary)
कुमाउनी और गढ़वाली में संस्कृत, तिब्बती, राजस्थानी, नेपाली और खड़ी बोली के शब्दों का अद्भुत सम्मिश्रण मिलता है।
उदाहरण—
- बगड़, छौलिया, ल्याठ, म्यर, भितरी, खुखुरी आदि।
व्याकरणिक विशेषताएँ
- क्रियाओं के रूप बहुविध और लचीले होते हैं।
- सर्वनामों में ‘मी’, ‘ती’, ‘हमूं’, ‘तुमूं’ जैसे रूप।
- वाक्य विन्यास में ‘कर्ता–कर्म–क्रिया’ का सामान्य नियम।
लोक संस्कृति के साथ जुड़ाव
पहाड़ी हिन्दी का विकास मुख्यतः लोकसंगीत, लोकनृत्य, धार्मिक आख्यानों और पर्वों के माध्यम से हुआ। यहां की भाषाएँ केवल संचार का साधन नहीं, बल्कि जीवन के सभी पक्षों से जुड़ी सांस्कृतिक धरोहर हैं।
पहाड़ी हिन्दी की वर्तमान स्थिति
आज कुमाउनी और गढ़वाली भाषाएँ शिक्षा, तकनीक और प्रशासन में कम उपयोग होने के कारण चुनौतियों का सामना कर रही हैं। युवा पीढ़ी में हिन्दी और अंग्रेज़ी का प्रयोग बढ़ने से इनका प्रयोग सीमित होता जा रहा है।
फिर भी—
- सोशल मीडिया
- क्षेत्रीय साहित्य
- संगीत
- फिल्मों
- सांस्कृतिक उत्सवों
ने इन भाषाओं को नई पहचान दी है। उत्तराखंड सरकार भी इन्हें संवैधानिक मान्यता दिलाने का प्रयास कर रही है।
निष्कर्ष
पहाड़ी हिन्दी, कुमाउनी और गढ़वाली—तीनों मिलकर उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा का निर्माण करते हैं। इनका इतिहास, उत्पत्ति, उपबोलियाँ और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अत्यंत समृद्ध है। खस-प्राकृत से विकसित होकर ये भाषाएँ आज भी अपनी मौलिकता और सरलता को संरक्षित किए हुए हैं।
भाषाई विविधता, साहित्यिक समृद्धि और सांस्कृतिक विरासत के दृष्टिकोण से पहाड़ी हिन्दी भारतीय भाषाओं की अनमोल धरोहर है। इसके संवर्धन और संरक्षण की आवश्यकता आज पहले से अधिक महसूस की जा रही है।
इन्हें भी देखें –
- गढ़वाली भाषा : उत्पत्ति, विकास, उपबोलियाँ और सांस्कृतिक धरोहर
- कुमाउनी भाषा: स्वरूप, इतिहास, उपबोलियाँ और भाषायी विशेषताएँ
- मालवी भाषा : उद्भव, स्वरूप, विशेषताएँ और साहित्यिक परंपरा
- वागड़ी भाषा : इतिहास, स्वरूप, विशेषताएँ और सांस्कृतिक महत्ता
- मेवाती भाषा : इतिहास, बोली क्षेत्र, भाषाई संरचना, साहित्य और आधुनिक स्वरूप
- हाड़ौती भाषा: राजस्थान की एक समृद्ध उपभाषा का भाषिक और सांस्कृतिक अध्ययन
- चंडीगढ़ को अनुच्छेद 240 के दायरे में लाने की तैयारी: केंद्र का बड़ा संवैधानिक कदम और इसके दूरगामी प्रभाव