दक्खिनी भाषा (दक्षिणी हिंदी) : इतिहास, उत्पत्ति, विकास, साहित्य, लिपि और भाषिक विशेषताएं

भारतीय उपमहाद्वीप की भाषाई विविधता विश्व में अद्वितीय मानी जाती है। इस सांस्कृतिक और भाषाई विशालता में एक ऐसी भाषा भी शामिल है जिसने उत्तर भारत की खड़ी बोली और दक्षिण भारत की द्रविड़ भाषाओं का अनोखा संगम प्रस्तुत किया — दक्खिनी भाषा। दक्खिनी न केवल एक बोलचाल की भाषा थी, बल्कि यह मध्यकालीन दक्षिणी भारत की राजदरबारी, सूफी साहित्य और सामाजिक संवाद की प्रमुख भाषा भी रही। आज के समय में इसे दकनी, दक्खिनी, देहलवी, हिंदवी, हिंदुस्तानी, दक्खिनी हिंदी या दक्खिनी उर्दू के नामों से भी जाना जाता है।

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उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

दक्खिनी भाषा का विकास 13वीं–14वीं शताब्दी के दौरान तब हुआ जब दिल्ली सल्तनत के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से दक्खिन के दौलताबाद (देवगिरि) में स्थानांतरित की। इस राजधानी परिवर्तन के साथ हजारों सैनिक, कवि, सूफी संत, विद्वान, व्यापारी और आम जनता दक्षिण भारत की ओर प्रवासित हुई। उनके साथ जो भाषा दक्षिण पहुंची, वह दिल्ली क्षेत्र की बोलचाल की हरियाणवी-खड़ी बोली थी। यही बोली स्थानीय भाषाओं के संपर्क में आकर नए स्वरूप में ढलने लगी।

14वीं से 18वीं शताब्दी के बीच दक्षिण भारत में स्थापित मुस्लिम सल्तनतें—

  • बहमनी सल्तनत
  • कुतुबशाही शासन
  • आदिलशाही शासन

इन राजवंशों ने दक्खिनी को राजभाषा का दर्जा दिया जिससे इस भाषा का साहित्यिक और सामाजिक विकास अत्यधिक तेज़ी से हुआ।

दक्खिनी के अन्य नाम

इतिहास में दक्खिनी को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया, जिनमें प्रमुख हैं—

नामसंदर्भ
हिंदवीभारतीय मूल की बोली
दक्खिनीदक्षिण भारत में प्रयोग
दकनी / दखनीबोलचाल का व्यावहारिक नाम
देहलवीदिल्ली मूल की भाषा
दक्खिनी उर्दूबाद के चरण में उर्दू से संबद्धता
मुसलमानी हिंदीमुस्लिम जनसंख्या से प्रचलन

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि दक्खिनी साहित्यकारों ने इसे उर्दू नहीं कहा, बल्कि हिंदवी या दक्खिनी हिंदी कहा।

भौगोलिक प्रसार

आज दक्खिनी भाषा मुख्य रूप से दक्खिन भारत में बोली जाती है, विशेष रूप से—

  • हैदराबाद और तेलंगाना
  • महाराष्ट्र का मराठवाड़ा और खानदेश क्षेत्र
  • कर्नाटक का उत्तरी भाग (विशेषकर गुलबर्गा, बीजापुर, रायचूर)
  • आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु का उत्तरी क्षेत्र
  • अल्प मात्रा में केरल और गोवा

दक्खिनी बोलने वालों की संख्या लगभग 1 करोड़ (11 मिलियन) मानी जाती है, जिनमें अधिकांश मुस्लिम हैं।

दक्खिनी भाषा की भाषिक संरचना

1. ध्वन्यात्मक विशेषताएँ

दक्खिनी और खड़ी बोली में कई साम्य हैं, लेकिन उच्चारण में कुछ खास अंतर मिलते हैं:

मानक हिंदीदक्खिनीटिप्पणी
चाँदनीचाननी‘न्द’ → ‘न’
गुम्बजगुम्मज‘म्ब’ → ‘म्म’
मिट्टीमिट्टाद्वित्व व्यंजन
सूखासुक्कादोहरापन / जोर

इसके अतिरिक्त—

  • महाप्राण व्यंजन अक्सर अल्पप्राण हो जाते हैं:
    खूबसूरत → खपसूरत
  • स्वर विस्तार सीमित और बोलचाल की ध्वनि अधिक प्राकृतिक होती है।

2. व्याकरणिक विशेषताएँ

दक्खिनी में कुछ विशेष कारक परसर्गों का प्रयोग मिलता है, जैसे—

कारकपरसर्ग
कर्मकू
करणसू
अधिकरणमने, पो
संबंधक्या, केरा

उदाहरण:

  • हमरेकू मालूम ना (मुझे पता नहीं)
  • इस किताबसू पढ़ (इस पुस्तक से पढ़)

3. सर्वनाम

व्यक्तिदक्खिनी रूप
प्रथम पुरुषमैं → मेरेकूँ, मंज, मुज, हमन
द्वितीय पुरुषतू → तुज, तेंन
तृतीय पुरुषवह → उन्ना, उका

4. शब्दभंडार (Vocabulary)

दक्खिनी का शब्दसंग्रह बहुभाषीय प्रभावों का मिश्रण है:

स्रोत भाषाउदाहरण
हिंदी-ब्रज-अवधीपवन, यौवन, कला, जीव
अरबी-फ़ारसीमोहब्बत, इश्क, हुकूमत
मराठीकाढ़ना, झोपा
तेलुगुपुड़ी, चिट्ठी
कन्नड़अक्का, थन्ना

दक्खिनी भाषा की लिपि (Script of Dakhini Language)

दक्खिनी भाषा की लिपि-परंपरा का इतिहास उतना ही रोचक है जितना इसका भाषिक विकास। खड़ी बोली से विकसित होने के बावजूद दक्खिनी भाषा ने दक्षिण भारतीय राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक प्रभावों के कारण लिपि के क्षेत्र में अलग पहचान बनाई। प्रारंभिक काल में दक्खिनी लोक उपयोग में थी और लिखित रूप में इसका प्रयोग बहुत कम था, परंतु राजकीय संरक्षण मिलने के बाद इस भाषा का लेखन प्रारंभ हुआ।

प्रारंभिक लिपि: देवनागरी और संस्कृत आधार

दक्खिनी जब दिल्ली के निकट विकसित हो रही थी तब उसका स्वरूप मुख्यतः हिंदवी या खड़ी बोली जैसा ही था। उस समय भारत की कई भाषाओं की तरह इसका संपर्क देवनागरी और शारदा जैसी लिपियों से था।
हालांकि लिखित प्रमाण कम मिलते हैं, किंतु प्रारंभिक बोलियों में देवनागरी तत्वों का प्रभाव स्पष्ट माना जाता है।

नस्तालीक़ लिपि का प्रवेश

दक्खिनी भाषा में सबसे बड़ा परिवर्तन तब आया जब इसे दक्षिण भारत की मुस्लिम सल्तनतों— विशेष रूप से बहमनी, कुतुबशाही और आदिलशाही शासनों का संरक्षण मिला। चूँकि इन राजवंशों की दरबारी भाषा फ़ारसी थी, इसलिए दक्खिनी भाषा धीरे-धीरे फ़ारसी-आधारित नस्तालीक़ (Nastaʿlīq) लिपि में लिखी जाने लगी।

इस प्रकार:

समयलिपि
प्रारंभिक काल (14वीं सदी)लोकभाषा रूप (संभवतः देवनागरी से प्रभावित)
राजकीय और साहित्यिक काल (15वीं-18वीं सदी)फ़ारसी-आधारित नस्तालीक़ लिपि

नस्तालीक़ लिपि में दक्खिनी का लेखन उर्दू से मिलता-जुलता जरूर है, लेकिन उच्चारण, शब्दचयन और संरचना पूर्णतः भिन्न हैं।

धार्मिक और सांस्कृतिक प्रभाव

दक्खिनी का संबंध सूफी कवियों, सूफी परंपरा और फकीरी साहित्य से होने के कारण धार्मिक ग्रंथ, कविता और भजन समान रूप से नस्तालीक़ में लिखे जाने लगे। कई पांडुलिपियाँ आज भी हैदराबाद, बीजापुर और मुंबई के पुस्तकालयों में संरक्षित हैं।

द्रविड़ लिपियों का क्षेत्रीय अनुप्रयोग

दक्खिनी के मौखिक उपयोग के विस्तार के साथ-साथ इसका शब्दसंग्रह तेलुगु, मराठी, कन्नड़ और तमिल के संपर्क में आया, किंतु इनके लिपि-प्रयोग का दक्खिनी पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ा।

हालांकि कुछ स्थानीय प्रशासनिक दस्तावेज़ों में दक्खिनी शब्दों को स्थानीय लिपियों में लिखा गया, जैसे—

  • हैदराबाद में तेलुगु लिपि में दक्खिनी शब्दों के उदाहरण
  • बीजापुर और कलबुर्गी क्षेत्र में कन्नड़ अभिलेखों में दक्खिनी शब्दों का उल्लेख

परंतु यह प्रयोग सीमित और दस्तावेज़ीय रहा, साहित्यिक नहीं।

आधुनिक दक्खिनी और लिपि विविधता

आज दक्खिनी भाषा दो प्रकार की लिपियों में पाई जाती है:

उपयोगलिपि
पारंपरिक साहित्य, धार्मिक लेखन, कव्वाली, सूफी साहित्यनस्तालीक़ उर्दू लिपि
आधुनिक अध्ययन, भाषावैज्ञानिक शोध और शिक्षण कार्यदेवनागरी, रोमन (English Alphabet) और कभी-कभी IPA

इंटरनेट, सोशल मीडिया और नई पीढ़ी की सुविधा के कारण आज दक्खिनी का लिखित रूप रोमन में अधिक दिखाई देता है।
उदाहरण:

  • “Kya bol rey?”, “Kidhar ko jaate?”, “Humku maloom nai”

दक्खिनी लिपि का विकास सार

चरणअवधिप्रयुक्त लिपि
लोकभाषा चरणप्रारंभिक (13–14वीं सदी)मौखिक, देवनागरी-प्रभावित
शाही एवं साहित्यिक चरण15वीं–18वीं सदीफ़ारसी–अरबी नस्तालीक़
परिवर्तनीय/संक्रमणकाल19वीं–20वीं सदीनस्तालीक़ के साथ रोमन व देवनागरी
आधुनिक चरण21वीं सदीउर्दू नस्तालीक़ + रोमन + देवनागरी

दक्खिनी की लिपि यात्रा बहुभाषीय और बहु-सांस्कृतिक इतिहास का प्रतिबिंब है। जहाँ इसकी जड़ें हिंदी की बोलियों में हैं, वहीं इसकी साहित्यिक पहचान फ़ारसी-नस्तालीक़ लिपि में मजबूत रूप से स्थापित हुई। आज भी दक्खिनी भाषा के जीवंत प्रयोग और बहुलता को देखकर यह स्पष्ट होता है कि यह भाषा केवल संवाद माध्यम नहीं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।

दक्खिनी साहित्य परंपरा

दक्खिनी भाषा के साहित्य की जड़ें सूफी और भक्ति आंदोलन में हैं। दक्खिनी में प्रेम, आध्यात्मिकता, सूफी दर्शन, लोककथाएँ और सामाजिक व्यंग्य प्रमुख विषय रहे।

प्रमुख साहित्यकार

नामक्षेत्रयोगदान
ख्वाज़ा बंदानवाज़ गेसूदराजगुलबर्गाप्रारंभिक दक्खिनी साहित्य
मुहम्मद कुली कुतुबशाहगोलकोंडादक्खिनी कविता का स्वर्णकाल
वजहीबीजापुरसबरस की रचना
इब्न-ए-निशातीदक्कनकथा साहित्य

दक्खिनी भाषा की उपबोलियाँ

दक्खिनी समय के साथ अनेक क्षेत्रीय स्वरूपों में विकसित हुई:

  • हैदराबादी दक्खिनी
  • मैसूरी बोली
  • बीजापुरी शैली
  • गुलबर्गी दक्खिनी
  • बिदरी दक्खिनी

प्रत्येक उपबोली में स्थानीय भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट मिलता है।

दक्खिनी और उर्दू संबंध

दक्खिनी को आधुनिक उर्दू का प्रारंभिक रूप माना जाता है। एक समय दक्खिनी साहित्य में अरबी-फ़ारसी शब्दों की अधिकता हुई, और दक्खिनी नस्तालीक़ लिपि में लिखी जाने लगी। दिल्ली के पुनः सांस्कृतिक केंद्र बनने के बाद उर्दू का मुख्य विकास उत्तर भारत में हुआ और दक्खिनी धीरे-धीरे स्थानीय बोली के रूप में सीमित हो गई।

फिर भी, दक्खिनी भाषा आज भी हैदराबाद और दक्षिण भारत के मुस्लिम समुदाय में पहचान और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

दक्खिनी हिंदी के कुछ ऐतिहासिक शब्द और भाषिक उदाहरण

प्राचीन ग्रंथों में दक्खिनी के शब्द इस प्रकार दर्ज हैं:

  • संचित, इन्द्रिय, अलिप्त, स्थूल (बुरहानुद्दीन)
  • गगन, पवन, नीर, अधर (कुली कुतुबशाह)
  • गम्भीर, भाल, जीव (वजही)

इन शब्दों से सिद्ध होता है कि दक्खिनी पर प्रारंभिक समय में शुद्ध हिंदी का गहरा प्रभाव था।

सांस्कृतिक पहचान और आधुनिक स्थिति

आज दक्खिनी सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि दक्षिण भारतीय मुस्लिम समुदाय की सांस्कृतिक पहचान है। हैदराबादी अंदाज़ की बोलचाल जैसे—
“कायको”, “इधरकू आओ”, “बोल रहा हूँ न!”, “कित्ता सौदा देगा?”
लोकप्रिय संस्कृति और फिल्मों में दक्खिनी के प्रयोग से यह आज भी जीवंत है।

निष्कर्ष

दक्खिनी भारतीय भाषाओं की उस ऐतिहासिक धरोहर का नाम है जिसने उत्तर और दक्षिण भारत की भाषाओं को एक विशिष्ट भाषिक स्वरूप में पिरोया। यह भाषा केवल शब्दों का मेल नहीं, बल्कि शताब्दियों की सांस्कृतिक यात्राओं, प्रवास, सत्ता परिवर्तन, धार्मिक विचारों और सामाजिक जीवन का दस्तावेज़ है।

दक्खिनी ने भारतीय साहित्य में एक ऐसी शैली विकसित की जो न तो केवल हिंदी थी, न उर्दू, बल्कि दोनों का साझा सांस्कृतिक रूप—हिंदवी। यही कारण है कि भाषाविज्ञान के अध्ययन में दक्खिनी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट माना जाता है।

अंत में, दक्खिनी केवल भाषा नहीं—एक इतिहास, संस्कृति और पहचान है।


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