भारतीय आर्य भाषा : उत्पत्ति, स्वरूप और सांस्कृतिक–भाषाई विकास

भारतीय उपमहाद्वीप की भाषाई परंपरा अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और विविधताओं से भरी रही है। हिंदी तथा अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं का इतिहास वस्तुतः वैदिक युग से प्रारंभ माना जाता है, किन्तु वैदिक संस्कृत के उद्भव से पहले भारत की भाषिक स्थिति क्या थी, इसका कोई प्रत्यक्ष लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। भारतीय आर्य भाषा का प्राचीन स्वरूप क्या था, यह एक जिज्ञासा का विषय रहा है। यद्यपि कोई स्पष्ट दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है, फिर भी वैदिक ग्रंथों, पुरातात्विक प्रमाणों और भाषावैज्ञानिक शोधों के आधार पर भारतीय आर्य भाषाओं के विकासक्रम का अनुमान लगाया जा सकता है।

भारतीय आर्य भाषा केवल ‘आर्यों’ द्वारा लाई गई कोई एकरूप भाषा न होकर भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद विविध अनार्य जातियों, समुदायों एवं संस्कृतियों के गहरे संपर्क से निर्मित एक सम्मिलित भाषिक संरचना है। इस लेख में भारतीय आर्य भाषा की उत्पत्ति, आर्यों का आगमन, अनार्य समुदायों का प्रभाव, द्रविड़ एवं ऑस्ट्रिक भाषाओं का योगदान, तथा आधुनिक हिंदी के निर्माण में इन तत्वों की भूमिका का विस्तारपूर्वक अध्ययन किया गया है।

Table of Contents

आर्यों का भारत आगमन : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

आम तौर पर माना जाता है कि ईसा से लगभग 2000 से 1500 ईसा पूर्व के बीच आर्यों के विभिन्न समूह मध्य एशिया से भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमाओं पर पहुँचे। यह वे क्षेत्र थे जिन्हें आज हम अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के पंजाब क्षेत्र के रूप में जानते हैं। आर्य धीरे-धीरे ‘सप्तसिंधु’ प्रदेश में बसने लगे। यही वह क्षेत्र था जिसे बाद में ‘पंजाब’ के नाम से जाना गया।

आर्यों के आगमन के साथ ही स्थानीय अनार्य जातियों के साथ संघर्ष और सांस्कृतिक संपर्क दोनों की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। आर्यों ने पहले पंजाब में अपना आधिपत्य स्थापित किया और फिर क्रमशः पूर्व की ओर बढ़ते हुए मध्यदेश, काशी, कोशल, मगध, विदेह, अंग, बंग और कामरूप तक अपनी सत्ता और संस्कृति का विस्तार किया।

आर्यों की विजय केवल सैन्य शक्ति का परिणाम नहीं थी। वे अपने साथ एक सुव्यवस्थित भाषा—वैदिक संस्कृत—और यज्ञ-परायण, दैवोपासना-प्रधान संस्कृति लेकर आए थे, जिसने भारतीय सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। किन्तु आर्यों से पहले भारत में अनेक उन्नत सभ्यताएँ मौजूद थीं, जिनका प्रभाव आर्यों की भाषा और संस्कृति पर अवश्य पड़ा।

सिन्धु घाटी सभ्यता और आर्य भाषा पर उसका प्रभाव

मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और कालीबंगन जैसी पुरातात्विक स्थलों की खुदाइयों ने सिद्ध कर दिया है कि भारत में आर्यों के आगमन से पहले एक अत्यंत विकसित नगरीय सभ्यता विद्यमान थी। यह सभ्यता कृषि, व्यापार, नगर नियोजन, धातु-कर्म, और सामाजिक संगठन के मामले में काफी उन्नत थी।

यह संभावना प्रबल है कि आर्यों का संपर्क सिन्धु सभ्यता के लोगों से हुआ हो और उस संपर्क ने आर्य भाषा-व्यवस्था पर प्रभाव डाला हो। यद्यपि आर्यों और हड़प्पावासियों के संबंधों को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं, फिर भी भाषाई और सांस्कृतिक संपर्क को नकारा नहीं जा सकता।

भारतीय उपमहाद्वीप में अनार्य जातियाँ और उनका फैलाव

जब आर्य भारत आए, तब यहाँ अनेक अनार्य जातियाँ पहले से ही निवास कर रही थीं। इनमें प्रमुख थीं—

1. निग्रिटो जातियाँ

इनका मूल स्थान अफ्रीका माना जाता है। ये समुद्री किनारों के पास रहती थीं और बाद में दक्षिण-पूर्वी द्वीपों की ओर बढ़ गईं। आर्यों से इनका सीधा संपर्क बहुत कम हुआ।

2. किरात जाति

किरात समुदाय हिमालय के पश्चिम से पूर्व तक फैला हुआ था। आज के नेपाल, उत्तराखंड, सिक्किम, भूटान और अरुणाचल प्रदेश में इनके वंशज मौजूद हैं। किरातों से आर्यों का गहरा संपर्क हुआ।
उनकी संस्कृति—यक्ष, गंधर्व, किन्नर आदि—बाद में वैदिक और उत्तरवैदिक साहित्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

3. ऑस्ट्रिक अथवा निषाद जाति

ये पंजाब के पूर्व में फैले हुए थे। कृषि इनके जीवन का प्रमुख आधार था।
आर्यों ने कृषि-विज्ञान इन्हीं से सीखा। मछली पकड़ना, नाव चलाना तथा हाथी पालना भी इन्हीं की विशिष्ट पहचान थी।
भारतीय इतिहास में हाथी का महत्व—सैन्य और राजकीय दोनों स्तरों पर—निषाद जातियों के ही प्रभाव का परिणाम है।

4. द्रविड़ जाति (दस्यु)

द्रविड़ भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे अधिक उन्नत, संगठित और सांस्कृतिक रूप से विकसित जातियों में से एक थीं।
सिंधु सभ्यता से इनका बहुत गहरा संबंध माना जाता है।
द्रविड़ भाषाओं का प्रभाव आज भी हिंदी, संस्कृत और अन्य इंडो-आर्य भाषाओं में गहराई से मौजूद है।

दक्षिण भारत में द्रविड़ भाषाएँ आज भी तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम आदि के रूप में जीवित हैं, जबकि उत्तर भारत की आर्य भाषाएँ द्रविड़ भाषाओं से प्रभावित होकर अपनी विशिष्ट रूपरेखा विकसित करती चली गईं।

आर्यों के प्रसार की कठिनाइयाँ

आर्यों का प्रसार भारत में सरल नहीं रहा। उन्हें कई प्राकृतिक और सांस्कृतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सिन्धु-सौवीर जैसे क्षेत्रों में द्रविड़ जातियों की शक्ति इतनी अधिक थी कि आर्यों को विजय प्राप्त करने में लंबा संघर्ष करना पड़ा।

बलोचिस्तान में आज भी बोली जाने वाली ब्राहुई भाषा, जो द्रविड़ परिवार की भाषा है, इस बात का प्रमाण है कि द्रविड़ भाषाओं का क्षेत्र कभी बहुत व्यापक रहा होगा।
आर्यों की प्रगति में कई शताब्दियाँ लगीं। इस लंबे काल में भाषा स्थिर नहीं रह सकी, बल्कि निरंतर परिवर्तन और विवर्तन (Evolution) की प्रक्रिया से गुजरती रही।

भारतीय आर्य भाषा पर अनार्य भाषाओं का प्रभाव

भारतीय आर्य भाषाएँ—जिसमें बाद में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और फिर आधुनिक भारतीय भाषाएँ शामिल हैं—एक शुद्ध, अखंड आर्य भाषा नहीं थीं। उनमें अनेक अनार्य भाषाई तत्व प्रारंभ से ही समाहित थे।

द्रविड़ भाषाओं का प्रभाव

हिंदी और संस्कृत दोनों में द्रविड़ तत्वों की उपस्थिति आज भी पहचान योग्य है—

  • टवर्गीय ध्वनियाँ (ट, ठ, ड, ढ, ण)
  • कई अनुकरणात्मक शब्द
  • कुछ विशेष प्रत्यय
  • कर्मवाच्य का विशिष्ट प्रयोग
  • वाक्य-रचना के कुछ लक्षण

ये सभी द्रविड़ भाषा के प्रभाव की ओर संकेत करते हैं।

ऑस्ट्रिक भाषाओं का योगदान

ऑस्ट्रिक–मुंडा समूह से हिंदी ने—

  • प्रकृति सम्बंधी शब्द
  • कृषि से जुड़े शब्द
  • जंगल, पशु-पक्षी, फल-फूल से संबंधित शब्द
    सीधे-सीधे ग्रहण किए।

किरात एवं हिमालयी भाषाओं का योगदान

  • देवताओं के नाम (यक्ष, किन्नर, गंधर्व)
  • पर्वतीय फल-फूल
  • संगीत एवं नृत्य परंपराएं
    ये सभी उत्तरवैदिक साहित्य तक में मिलते हैं।

अन्य जातियों का प्रभाव : शक, हूण, तुर्क, मंगोल, अरब

आर्य काल के बाद भारत में अनेक आक्रांताओं, यात्रियों, व्यापारियों और जनजातियों का आगमन हुआ—

  • शक
  • हूण
  • कुषाण (मंगोल)
  • तुर्क
  • अरब
  • पश्चिमी एशिया के व्यापारी
  • शान और चीनी समुदाय

इन सभी ने भारतीय संस्कृति और भाषाओं पर अपना-अपना प्रभाव छोड़ा।
उदाहरण के लिए—

  • तुर्क–फ़ारसी संपर्क से हिंदी को अनेक शब्द मिले—जैसे ख़ून, बाज़ार, दफ़्तर, कुर्सी, क़िला
  • हूणों से सैन्य शब्दावली प्रभावित हुई
  • मंगोल जातियों से पशु–पालन और युद्ध कौशल से जुड़े तत्व आए

भारतीय आर्य भाषा का स्वरूप इस प्रकार किसी एक जाति की देन नहीं, बल्कि अनेक जातियों, सभ्यताओं और भाषाओं के मेल से तैयार हुई एक दीर्घकालीन प्रक्रिया का परिणाम है।

भारतीय आर्य भाषाओं का वर्गीकरण

भारतीय उपमहाद्वीप में आर्य भाषाओं का विकास एक दीर्घकालिक और क्रमबद्ध प्रक्रिया है, जो सहस्राब्दियों के भाषाई परिवर्तन, सांस्कृतिक संपर्क और सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित रही है। भाषाविज्ञानियों ने इनके विकास को मोटे तौर पर तीन प्रमुख कालखंडों में व्यवस्थित किया है—प्राचीन भारतीय आर्य भाषा, मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा, और आधुनिक भारतीय आर्य भाषा। प्रत्येक चरण अपने भीतर विशिष्ट भाषाई विशेषताओं, साहित्यिक परंपराओं और ध्वनि-रूप संरचनाओं को समेटे हुए है।

  1. प्राचीन भारतीय आर्यभाषा (2000 ई.पू. से 500 ई.पू. तक)
    1. वैदिक संस्कृत (2000 ई.पू. से 800 ई.पू. तक)
    2. संस्कृत अथवा लौकिक संस्कृत (800 ई.पू. से 500 ई.पू. तक)
  2. मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा (500 ई.पू. से 1000 ई. तक) यद्यपि इससे पहले भी प्राकृतें थी।
    1. पालि (500 ई.पू. से 1 ई. तक)
    2. प्राकृत (1 ई. से 500 ई. तक)
    3. अपभ्रंश (500 ई. से 1000 ई. तक)
  3. आधुनिक भारतीय आर्यभाषा (1000 ई. से अब तक) 
    • हिंदी और हिंदीतर बंगला, गुजराती, मराठी, सिंधी, पंजाबी आदि।

1. प्राचीन भारतीय आर्य भाषा (1500 ई.पू. – 500 ई.पू.)

प्राचीन भारतीय आर्य भाषाओं की शुरुआत उस काल से मानी जाती है जब वैदिक आर्यों ने अपने धार्मिक, दार्शनिक और सामाजिक चिंतन को भाषिक रूप देना प्रारंभ किया। यह काल आगे दो विशिष्ट भाषाई चरणों में विभाजित किया जाता है:

  1. वैदिक संस्कृत (1500–800 ई.पू.)
  2. लौकिक अथवा शास्त्रीय संस्कृत (800–500 ई.पू.)

(क) वैदिक संस्कृत (1500–800 ई.पू.) — आर्य भाषा का मूल स्वरूप

वैदिक संस्कृत भारतीय आर्य भाषाओं की सबसे प्राचीन एवं प्रामाणिक रूप-रचना को दर्शाती है। इसका उपयोग वैदिक साहित्य की रचना में हुआ, जिसमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की संहिताएँ, ब्राह्मण ग्रंथ तथा उपनिषद सम्मिलित हैं। यही वह चरण था जब भारतीय भाषाशास्त्र अपने प्रारंभिक रूप में विकसित होने लगा।

वैदिक ध्वनि–प्रणाली की विशेषताएँ
भाषा-वैज्ञानिकों ने वैदिक संस्कृत की ध्वनि-संरचना को अत्यंत समृद्ध माना है।

  • विद्वान जैसे डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. कपिल देव द्विवेदी आदि के अनुसार वैदिक ध्वनियों की संख्या 52 है—
    • 13 स्वर
    • 39 व्यंजन
  • जबकि डॉ. हरदेव बाहरी ने वैदिक स्वरों की संख्या 14 मानी है, जिससे स्पष्ट होता है कि इस भाषा-रूप में स्वरवर्णों की विविधता और सूक्ष्मता अधिक थी।

वैदिक संस्कृत को वैदिकी, छन्दस या छान्दस् भी कहा गया है। यह भाषा केवल धार्मिक ग्रंथों की भाषा नहीं थी, बल्कि उस समय के समाज, प्रकृति, दर्शन, विज्ञान, अनुष्ठानों और सांस्कृतिक धारणाओं को अभिव्यक्त करने का माध्यम भी थी।

(ख) लौकिक या शास्त्रीय संस्कृत (800–500 ई.पू.) — परिष्कृत और व्यवस्थित भाषा

वैदिक संस्कृत के बाद भारतीय आर्य भाषा का जो रूप विकसित हुआ, वह लौकिक संस्कृत कहलाता है। पाणिनि की महान कृति ‘अष्टाध्यायी’ ने इस भाषा को एक अत्यंत व्यवस्थित और वैज्ञानिक रूप प्रदान किया।

यह भाषा-रूप वैदिक संस्कृत की अपेक्षा अधिक परिष्कृत, सुव्यवस्थित और मानकीकृत था।

ध्वनि-संरचना में परिवर्तन
लौकिक संस्कृत में कुल 48 ध्वनियाँ प्रचलित रहीं। वैदिक संस्कृत में मौजूद निम्नलिखित ध्वनियाँ क्रमशः प्रचलन से बाहर हो गईं:

  • ळ‍ह
  • जिह्वामूलीय
  • उपध्मानीय

इन विशिष्ट ध्वनियों के लोप ने भाषा को अधिक सरल, एकरूप और प्रयोगशील बना दिया। यही संस्कृत बाद में भारतीय साहित्य, दर्शन, व्याकरण, नाटक, काव्य और शास्त्रों की प्रमुख भाषा बनी।

2. मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा (500 ई.पू. – 1000 ई.)

मध्यकालीन काल (लगभग 500 ई.पू. से 1000 ई.) भारतीय आर्य भाषाओं के विकास का अत्यंत महत्त्वपूर्ण चरण रहा है। इस दौरान वैदिक–संस्कृत की परंपरा से आगे बढ़कर भाषाएँ आम जनता की वाणी के रूप में विकसित हुईं और क्रमशः पाली (500 ई.पू.–1 ई.)प्राकृत (1 ई.–500 ई.)अपभ्रंश (500 ई.–1000 ई.) के रूप में एक स्पष्ट भाषाई क्रम दिखाई देता है। यही क्रम आगे चलकर आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं की नींव बना।

(क) पाली : बुद्ध-वचन की भाषा (500 ई.पू. – 1 ई.)

पाली को मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा का प्रारंभिक और अत्यंत महत्त्वपूर्ण रूप माना जाता है। ‘पाली’ शब्द का अर्थ ही ‘बुद्ध-वचन’ माना गया है; इसलिए यह शब्द विशेष रूप से त्रिपिटक ग्रंथों के लिए प्रतिष्ठित हुआ।

पालि भाषा

पालि को मध्यकालीन आर्यभाषा का प्रारम्भिक रूप माना गया है। ‘पालि’ शब्द का तात्पर्य ‘बुद्ध वचन’ से है—
“पा रक्खतीति बुद्धवचनं इति पालि”
अर्थात् यह वही भाषा है जिसमें बुद्ध के उपदेशों का संरक्षण हुआ।

त्रिपिटक— जो बौद्ध धर्मग्रन्थों का मूल आधार हैं—पालि भाषा में ही रचित हैं। त्रिपिटकों की तीन प्रमुख संहिताएँ हैं:

  1. सुत्त पिटक
  2. विनय पिटक
  3. अभिधम्म पिटक

बौद्ध धर्म के विस्तार में पालि की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। सम्राट अशोक के पुत्र कुमार महेन्द्र त्रिपिटकों के साथ श्रीलंका गए, जहाँ राजा वट्टगामनी (ई.पू. 291) के संरक्षण में थेरवादी शाखा का त्रिपिटक लिपिबद्ध किया गया। इस दृष्टि से पालि को भारत की प्रथम देशभाषा कहा जाता है।

पाली की प्रमुख विशेषताएँ

  • त्रिपिटक की रचना पाली में — सुत्त पिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक।
  • सम्राट अशोक के पुत्र कुमार महेन्द्र द्वारा पाली साहित्य को लंका में प्रतिष्ठा मिली।
  • लंका के राजा वट्टगामनी के संरक्षण में थेरवादी त्रिपिटक को विधिवत् रूप से लिपिबद्ध किया गया।
  • इसे भारत की प्रथम ‘देशभाषा’ भी कहा जाता है, क्योंकि यह संस्कृत की अपेक्षा अधिक सरल और बोलचाल के निकट थी।

(ख) प्राकृत : जनभाषाओं का साहित्यिक रूप (1 ई. – 500 ई.)

पाली के बाद भारतीय आर्य भाषाओं का दूसरा प्रमुख चरण प्राकृत के नाम से जाना गया। यह मध्यकालीन जनभाषा का साहित्यिक रूप था।

प्राकृत भाषा

मध्यकालीन आर्यभाषाओं की दूसरी अवस्था प्राकृत के रूप में विकसित हुई। ‘प्राकृत’ शब्द की उत्पत्ति और अर्थ को लेकर दो मत प्रमुख हैं:

  1. प्रचलित जनभाषा होने के नाते इसे ‘प्रकृति से उत्पन्न’ कहा गया है। नमि साधु ने इसका निर्वचन इस प्रकार किया है—
    “प्राक् पूर्व कृतं प्राकृतम्”
    अर्थात् वह भाषा जो आदिकाल से प्रचलित है, वही प्राकृत है।
  2. दूसरी व्याख्या में नमि साधु ने सहज, असंस्कारित, लोक-प्रयुक्त भाषा को प्राकृत कहा है—
    “प्राकृतेति सकल-जगज्जन्तूनां व्याकरणादि मिरनाहत संस्कारः सहजो वचन व्यापारः प्रकृति: प्रकृति तत्र भवः स एव वा प्राकृतम्।”

वाक्पतिराज ने इसके सार्वभौमिक स्वरूप को निम्न पंक्तियों में व्यक्त किया है—

“सयलाओ इमं वाया विसंति एत्तो यणेति वायाओ॥
एंति समुद्धं चिह णेति सायराओ च्चिय जलाई।।”

अर्थात् जिस प्रकार जल समुद्र में आता है और वहीं से बहकर पुनः फैलता है, उसी प्रकार सभी भाषाएँ प्राकृत में मिलती तथा उससे पुनः प्रवाहित होती हैं।

प्राकृत की व्युत्पत्ति और स्वरूप

प्राकृत शब्द की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों ने दो प्रमुख मत प्रस्तुत किए हैं—

  1. ‘प्राक् कृत’ — अर्थात् पहले से चली आ रही प्राकृतिक भाषा।
  2. नामि साधु के अनुसार प्राकृत वह सहज वाणी है जो व्याकरणिक अनुशासन से मुक्त होकर जनसामान्य के बीच प्रयोग की जाती है।

भाषाई दृष्टि से प्राकृत

  • भरतीय जनसमुदायों की बोलियों का परिष्कृत साहित्यिक स्वरूप
  • शौरसेनी, अर्धमागधी, महाराष्ट्री आदि इसके महत्त्वपूर्ण रूप।
  • वाक्पतिराज के अनुसार समस्त भाषाओं का उद्गम और विस्तार प्राकृत से ही हुआ, ठीक वैसे ही जैसे सभी जल प्रवाह समुद्र में समाते और वहीं से निकलते हैं।

(ग) अपभ्रंश : आधुनिक भारतीय भाषाओं की सेतु-अवस्था (500 ई. – 1000 ई.)

प्राकृत के बाद भाषा विकास का तीसरा महत्त्वपूर्ण चरण अपभ्रंश कहलाता है। यह वह रूप है जिसमें मध्यकालीन जनभाषाएँ आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं की ओर अग्रसर होने लगीं।

अपभ्रंश भाषा

अपभ्रंश को मध्यकालीन और आधुनिक आर्यभाषाओं के बीच की संक्रमणीय कड़ी माना जाता है। इसी कारण विद्वान इसे सन्धिकालीन भाषा कहते हैं।

‘अपभ्रंश’ शब्द का प्रथम प्रयोग भर्तृहरि के ‘वाक्यपदीयम्’ में उपलब्ध है, जहाँ उन्होंने व्याडि की परिभाषा का उल्लेख किया है:

“शब्दसंस्कारहीनो यः गौरिति प्रयुयुक्षते।
तमपभ्रंशमिच्छन्ति विशिष्टार्थनिवेशिनम्॥”

पतंजलि के महाभाष्य में भी अपभ्रंश का प्रयोग ‘अपशब्द’ के अर्थ में मिलता है—

“भयां सोऽपशब्दाः अल्पीयांसाः शब्दाः इति।
एकैकस्य हि शब्दस्य बहवोऽप्रभंशाः।।’’

अपभ्रंश के प्रारम्भिक प्रमाण भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में मिलते हैं, जहाँ इसे ‘विभ्रष्ट’ कहा गया है।

भाषा के संदर्भ में ‘अपभ्रंश’ शब्द का सुविन्यस्त उपयोग सर्वप्रथम चण्ड (6वीं शताब्दी) के प्राकृत-लक्षण ग्रन्थ में मिलता है—
“न लोपोऽभंशेऽधो रेफस्य।”

इतिहास में ‘अपभ्रंश’ नाम का प्रमाण बलभी के राजा धारसेन द्वितीय (वि.सं. 650 के पूर्व) के शिलालेख में मिलता है, जिसमें उसके पिता गुहसेन को संस्कृत, प्राकृत एवं अपभ्रंश—तीनों भाषाओं का कवि कहा गया है।

भामह के काव्यालंकार में अपभ्रंश को एक काव्योपयोगी भाषा माना गया है—

“संस्कृतं प्राकृतं चान्यदपभ्रंश इति त्रिधा।”

आचार्य दण्डिन ने काव्यादर्श में वाङ्मय को चार श्रेणियों में विभाजित किया—संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और मिश्र—

“तदेतद् वाङ्मयं भूयः संस्कृतं प्राकृतं तथा।
अपभ्रंशश्च मिश्रं चेत्याहुश्शास्त्रविदो जनाः॥”

उसी ग्रन्थ में अपभ्रंश को ‘आभीर’ भी कहा गया है—

“आभीरादि गिरथः काव्येष्वपभ्रंशः इति स्मृताः।”

समय के साथ अपभ्रंश अनेक नामों से जाना गया, जैसे— अवहट्ट, अवहंस, विभ्रष्ट, औहट, अवहत्थ, पटमंजरी इत्यादि। आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ने इसे सहज और जनभाषिक प्रवृत्ति के कारण ‘ण–ण भाषा’ की संज्ञा दी है।

अपभ्रंश की परिभाषा और उद्गम

  • सर्वप्रथम व्याडि ने संस्कृत के मानक रूप से भिन्न, अपशब्द-स्वरूप शब्दों को अपभ्रंश कहा।
  • पतंजलि के ‘महाभाष्य’ में भी इसका प्रयोग ‘अपशब्द’ अर्थ में मिलता है।
  • भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में अपभ्रंश को ‘विभ्रष्ट’ नाम से उल्लेख किया गया।
  • चाण्ड (6वीं शताब्दी) को भाषा-अर्थ में ‘अपभ्रंश’ शब्द का प्रथम प्रमाणित प्रयोगकर्ता माना गया है।

अपभ्रंश का साहित्यिक और ऐतिहासिक महत्व

  • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसका शुरुआती प्रमाण बलभी नरेश धारसेन द्वितीय के शिलालेख में बताया है जिसमें राजा को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश—तीनों का कवि कहा गया है।
  • भामह ने काव्य निर्माण में संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश को समान रूप से काव्योपयोगी भाषाएँ माना।
  • दण्डी ने ‘काव्यादर्श’ में वाङ्मय को चार वर्गों—संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और मिश्र में विभाजित किया और अपभ्रंश को आभीर भाषाओं के समान बताया।

अपभ्रंश के वैकल्पिक नाम

इसके अनेक नाम प्रचलित रहे—
विभ्रष्ट, आभीर, अवहट्ट, अवहंस, पटमंजरी, औहट आदि।
आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ने इसे ‘ण–ण भाषा’ कहा है।

आधुनिक भारतीय भाषाओं का जन्मस्थान

मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाओं की यह त्रयी—पाली, प्राकृत और अपभ्रंश—एक क्रमबद्ध भाषा-विकास यात्रा प्रस्तुत करती है। पाली ने धर्मग्रंथों की भाषा बनकर जनमानस से निकटता स्थापित की; प्राकृत ने साहित्यिक परंपरा का प्रसार किया; और अपभ्रंश ने आधुनिक भारतीय भाषाओं—विशेषकर हिंदी—के लिए आधारभूमि तैयार की।

इस प्रकार 500 ई.पू. से 1000 ई. तक का यह पूरा काल भारतीय भाषाई इतिहास में संक्रमण और सृजन का स्वर्णिम युग माना जाता है।

3. आधुनिक भारतीय आर्य भाषा (1000 ई. – वर्तमान)

मध्यकाल के पश्चात् भारतीय आर्य भाषाएँ अपनी आधुनिक संरचना में स्थापित होने लगीं। इसी काल में हिंदी, बंगला, गुजराती, मराठी, राजस्थानी, सिंधी, पंजाबी और कई अन्य आधुनिक भाषाओं का जन्म हुआ।

इन भाषाओं ने देश की विविधता, जनजीवन, सामाजिक परिवर्तन, सांस्कृतिक संपर्क और स्थानीय बोलियों की बारीकियों को अपने भीतर समाहित करते हुए भारतीय आर्य भाषा-परिवार की समृद्ध परंपरा को नई दिशा दी।

आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का विकास

आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का विकास अपभ्रंश से माना जाता है। लगभग 1000 ई. से नए भाषाई रूप उभरने लगे, जो आगे चलकर उत्तर भारत, पश्चिम भारत, पूर्वी भारत और दक्षिण भारत की प्रमुख आधुनिक भाषाओं के रूप में विकसित हुए। आधुनिक भारतीय आर्यभाषा शब्द का प्रयोग उस अविभाजित भारतीय उपमहाद्वीप के लिए किया जाता है जिसमें 1947 से पहले भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश सम्मिलित थे। कुछ विद्वान इस दायरे में श्रीलंका और बर्मा (वर्तमान म्यांमार) को भी शामिल करते हैं, क्योंकि अंग्रेजी शासन से पूर्व ये क्षेत्र सांस्कृतिक दृष्टि से भारत से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे।

आधुनिक आर्यभाषाओं के प्रारंभिक वर्गीकरण

1. डॉ. ए. एफ. आर. हार्नले का मूल वर्गीकरण (1880 ई.)

आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का सर्वप्रथम व्यवस्थित वर्गीकरण डॉ. ए. एफ. आर. हार्नले ने सन् 1880 ई. में प्रस्तुत किया। उन्होंने आर्यभाषाओं को ‘भीतरी आर्य’ और ‘बाहरी आर्य’ की संकल्पनाओं के आधार पर चार प्रमुख समूहों में बाँटा:

  • पूर्वी गौड़ियन – पूर्वी हिन्दी, बंगला, असमी, उड़िया
  • पश्चिमी गौड़ियन – पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, गुजराती, सिन्धी, पंजाबी
  • उत्तरी गौड़ियन – गढ़वाली, नेपाली, पहाड़ी
  • दक्षिणी गौड़ियन – मराठी

हार्नले के अनुसार मध्यदेश में स्थित आर्यजाति ‘भीतरी आर्य’ कहलाती है, जबकि चारों दिशाओं में फैली जाति ‘बाहरी आर्य’ मानी जाती है।

2. डॉ जॉर्ज ग्रियर्सन का विस्तृत वर्गीकरण

लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया तथा अन्य शोध-पत्रों (लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया-भाग-1 तथा बुलेटिन ऑफ द स्कूल ऑफ ओरियंटल स्टडीज, लण्डन इन्स्टिट्यूशन- भाग-1 खण्ड 3, 1920) के आधार पर ग्रियर्सन ने आर्यभाषाओं को तीन बड़ी उपशाखाओं—बाहरी, मध्य, और भीतरी—में व्यवस्थित किया।

(अ) बाहरी उपशाखा

  • उत्तरी-पश्चिमी समूह – लहँदा, सिन्धी
  • दक्षिणी समूह – मराठी
  • पूर्वी समूह – उड़िया, बिहारी, बंगला, असमिया

(ब) मध्य उपशाखा

  • पूर्वी हिन्दी

(स) भीतरी उपशाखा

केन्द्रीय समुदाय – पश्चिमी हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, भीरनी, खानदेशी, राजस्थानी
पहाड़ी समुदाय – नेपाली (पूर्वी पहाड़ी), मध्य पहाड़ी, पश्चिमी पहाड़ी

ग्रियर्सन का वर्गीकरण भौगोलिक वितरण और ऐतिहासिक प्रसार पर आधारित था।

3. डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी का वैज्ञानिक वर्गीकरण

ध्वनि-विज्ञान और व्याकरण को केंद्र में रखते हुए चटर्जी ने ग्रियर्सन के वर्गीकरण में संशोधन कर पाँच नए समूह प्रस्तावित किए:

  • उदीच्य – सिन्धी, लहँदा, पंजाबी
  • प्रतीच्य – राजस्थानी, गुजराती
  • मध्य देशीय – पश्चिमी हिन्दी
  • प्राच्य – पूर्वी हिन्दी, बिहारी, उड़िया, असमिया, बंगला
  • दक्षिणात्य – मराठी

इस वर्गीकरण में ध्वन्यात्मक मिलान और संरचनात्मक समानताओं को प्राथमिकता दी गई।

4. डॉ. धीरेन्द्र वर्मा का संसोधित रूप

डॉ. वर्मा ने चटर्जी के मॉडल को और परिष्कृत करते हुए आधुनिक आर्यभाषाओं को इस प्रकार समूहित किया:

  • उदीच्य – सिन्धी, लहँदा, पंजाबी
  • प्रतीच्य – गुजराती
  • मध्य देशीय – राजस्थानी, पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी, बिहारी
  • प्राच्य – उड़िया, असमिया, बंगला
  • दक्षिणात्य – मराठी

उन्होंने मध्यदेशीय भाषाओं का विस्तारपूर्वक समावेशन किया।

5. सीताराम चतुर्वेदी का परसर्ग-आधारित वर्गीकरण

चतुर्वेदी ने एक अनोखा दृष्टिकोण अपनाते हुए भाषाओं की पहचान संबंध सूचक परसर्गों के आधार पर की। उन्होंने भाषाओं को संबंधबोधक परसर्गों (का, दा, ज, नो, एर) के आधार पर वर्गीकृत किया—

  • कासमूह – हिन्दी, पहाड़ी, जयपुरी, भोजपुरी
  • दासमूह – पंजाबी, लहँदा
  • समूह – सिन्धी, कच्छी
  • नोसमूह – गुजराती
  • एर समूह – बंगाली, उड़िया, असमिया

यह वर्गीकरण व्याकरणिक प्रवृत्तियों पर केंद्रित है।

6. डॉ. भोलानाथ तिवारी की अपभ्रंश-आधारित रूपरेखा

तिवारी ने प्रत्येक आधुनिक भाषा को उसके मूल अपभ्रंश से जोड़ते हुए यह वर्गीकरण प्रस्तुत किया:

अपभ्रंशआधुनिक भाषाएँ
शौरसेनीपश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, पहाड़ी, गुजराती
मागधीबिहारी, बंगाली, उड़िया, असमिया
अर्धमागधीपूर्वी हिन्दी
महाराष्ट्रिमराठी
व्राचड/पैशाचीसिन्धी, लहँदा, पंजाबी

यह वर्गीकरण ऐतिहासिक भाषिक विकास और रूपांतरण की गहरी समझ पर आधारित है।

प्रमुख आधुनिक भारतीय आर्यभाषाएँ: स्वरूप, विशेषताएँ और विविधता

भारतीय आर्य भाषा परिवार में अनेक आधुनिक भाषाएँ सम्मिलित हैं, जिनका विकास अपभ्रंश और मध्यकालीन आर्यभाषाओं से हुआ। उत्तर और पश्चिम भारत में बोली जाने वाली ये भाषाएँ भौगोलिक, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर अपनी विशिष्ट पहचान रखती हैं। निम्नलिखित उपशीर्षकों में प्रमुख आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की संरचना, बोलियाँ, लिपियाँ और भाषाई विशेषताओं का परिचय प्रस्तुत है—

1. सिन्धी भाषा

सिन्धी भाषा का उद्भव उस क्षेत्र में हुआ जिसे प्राचीन काल में सिन्धु देश कहा जाता था, अर्थात् सिन्धु नदी के दोनों तटों का विशाल क्षेत्र। सिन्धी शब्द का मूल संस्कृत शब्द ‘सिन्धु’ है।

भाषाई रूपांतरण एवं बोलियाँ:
सिन्धी क्षेत्रीय प्रभाव के कारण विविध भाषाई रूपों में विकसित हुई। इसकी प्रमुख बोलियाँ—

  • विचोली
  • सिराइकी
  • थरेली
  • लासी
  • लाड़ी

लिपि परंपरा:
सिन्धी की अपनी ऐतिहासिक लिपि लंडा है, किन्तु समय के साथ राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव के कारण इसे गुरुमुखी और फ़ारसी-लिपि में भी लिखा जाने लगा।

2. लहँदा भाषा

‘लहँदा’ शब्द का अर्थ है ‘पश्चिमी’, इसलिए इसे पश्चिमी पंजाबी भी कहा जाता है। क्षेत्रानुसार इसे विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे— हिन्दकी, मुल्तानी, जटकी, पोठवारी, चिभाली आदि।

लिपि एवं परंपरा:
इस भाषा की भी सिन्धी की भाँति अपनी लिपि लंडा है। यह लिपि कश्मीर में प्रचलित शारदा लिपि की एक उपशाखा मानी जाती है।

3. पंजाबी भाषा

पंजाबी भाषा का नाम स्वयं उसके भूगोल पर आधारित है—पंज (पांच) + आब/आब (जल) अर्थात् पाँच नदियों का प्रदेश

भाषीय विशेषताएँ और बोलियाँ:
पंजाबी भाषा की प्रमुख बोलियाँ हैं—

  • माझी (मुख्य साहित्यिक रूप)
  • डोगरी
  • दोआबी
  • राठी

लिपि विकास:
प्रारंभिक काल में पंजाबी लंडा लिपि में लिखी जाती थी। बाद में सिक्ख गुरुओं के समय गुरु अंगद देव द्वारा संशोधित रूप में गुरुमुखी लिपि का विकास हुआ, जो वर्तमान में मानक लिपि है।

4. गुजराती भाषा

गुजराती भाषा गुजरात राज्य की प्रमुख भाषा है। इसका नाम ‘गुर्जर’ जाति से संबंधित माना जाता है—गुर्जर → गुर्जरत्रा → गुजरात

लिपि एवं ध्वनि स्वरूप:
गुजराती की अपनी लिपि है, जो स्वरूप में कैथी लिपि से मिलती-जुलती है। इसकी सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि इसमें शिरोरेखा (मात्रा रेखा) नहीं लगती, जो इसे देवनागरी से अलग पहचान प्रदान करती है।

5. मराठी भाषा

मराठी महाराष्ट्र की प्रमुख भाषा है। इस भाषा का उद्भव अपभ्रंश और पूर्वी रांझा बोलियों से हुआ।

बोलियाँ:
मराठी की विविध क्षेत्रीय बोलियाँ हैं, जैसे—

  • कोंकणी
  • नागपुरी
  • कोष्टी
  • माहारी

लिपि परंपरा:
मराठी मुख्यतः देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। ऐतिहासिक काल में प्रशासनिक कार्य हेतु मोडी लिपि का भी उपयोग किया जाता था।

6. बंगला भाषा

बंगला भाषा का निर्माण संस्कृत से हुआ है और इसका नाम ‘बंग + आल (प्रत्यय)’ से माना जाता है, अर्थात् बंग क्षेत्र की भाषा

सांस्कृतिक महत्त्व:
बंगला भाषा को नवीन यूरोपीय विचारों, पुनर्जागरण और आधुनिक भारतीय साहित्य को दिशा देने वाली प्रथम भारतीय भाषा माना जाता है।

लिपि:
यह भाषा प्राचीन देवनागरी से विकसित बंगला लिपि में लिखी जाती है।

7. असमी भाषा

असमी या असमिया भाषा असम राज्य की प्रमुख भाषा है।

बोली भेद:
इसकी मुख्य बोली विश्नुपुरिया मानी जाती है।

लिपि:
इतिहास और भाषाई संबंधों के कारण असमी को बंगला लिपि में लिखा जाता है, यद्यपि ध्वन्यात्मक संरचना में दोनों भाषाओं में अंतर है।

8. उड़िया भाषा

उड़िया भाषा वर्तमान ओडिशा (पुराना नाम—उड़ीसा/उत्कल) की प्रमुख आर्य भाषा है।

बोलियाँ:
उड़िया की मुख्य बोलियाँ—

  • गंजामी
  • सम्भलपुरी
  • भत्री

लिपि विकास:
उड़िया भाषा की लेखन परंपरा ब्राह्मी की उत्तरी शैली से विकसित मानी जाती है। इसका लिपि स्वरूप बंगला से मिलता-जुलता है, परंतु रूप और अक्षर विन्यास में स्पष्ट भिन्नता है।

इन सभी भाषाओं की उत्पत्ति एक ही भाषा परिवार से हुई होने पर भी लिपि, बोली, ध्वनि, शब्दसंपदा और साहित्यिक परंपराओं में उल्लेखनीय विविधता देखी जाती है। यही विविधता भारतीय भाषिक संस्कृति को जीवंत, समृद्ध और बहुवर्णीय बनाती है।

भारतीय आर्य भाषा का वास्तविक स्वरूप : एक निष्कर्ष

भारतीय आर्य भाषा—और उससे विकसित हिंदी—को यदि केवल आर्यों द्वारा लाई गई भाषा मान लिया जाए, तो यह अधूरा और गलत निष्कर्ष होगा।
भारतीय आर्य भाषा वास्तव में—

  • आर्यों की भाषा
  • द्रविड़ भाषाएँ
  • ऑस्ट्रिक–मुंडा भाषाएँ
  • किरात–हिमालयी भाषाएँ
  • सिन्धु सभ्यता के भाषिक अवशेष
  • और बाद में आने वाले शक, हूण, तुर्क, मंगोल, अरबी, फ़ारसी प्रभाव

—इन सभी के सम्मिलित योग से निर्मित एक बहुस्तरीय, बहुसांस्कृतिक और बहुभाषिक संरचना है।

भारत की भाषाएँ ‘समन्वित’ भाषाएँ हैं। यहाँ की भाषाएँ एक-दूसरे से लड़ती नहीं, बल्कि मिलकर विकसित होती हैं। यही कारण है कि हिंदी जैसी भाषा में—

  • संस्कृत के तत्सम शब्द
  • प्राकृत–अपभ्रंश के देशज शब्द
  • द्रविड़ शब्द
  • अरबी–फ़ारसी शब्द
  • अंग्रेज़ी शब्द

—सभी एक साथ प्रयोग में आते हैं और यह भाषा फिर भी स्वाभाविक, सरल और जीवंत बनी रहती है।

समापन

भारतीय आर्य भाषाओं का विकास एक सीधी रेखा में नहीं हुआ, बल्कि यह अत्यंत बहुआयामी और व्यापक प्रक्रिया थी।

  • वैदिक संस्कृत ने इसकी नींव रखी,
  • लौकिक संस्कृत ने उसकी संरचना को मजबूत किया,
  • पाली–प्राकृत–अपभ्रंश ने इसे जनभाषा का रूप दिया,
  • और अंततः आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं ने इसे विविधता, शक्ति और अभिव्यक्ति के असंख्य रूप प्रदान किए।

इन सभी चरणों के क्रमिक विकास से आज की हिंदी सहित भारतीय उपमहाद्वीप की अधिकांश भाषाएँ अस्तित्व में आईं।

भारतीय आर्य भाषा का अध्ययन हमें यह सिखाता है कि भाषा किसी जाति या संस्कृति की स्थिर, सीमित और बंद इकाई नहीं होती। भाषा मानव संपर्क, प्रवास, संघर्ष, सहयोग और सांस्कृतिक आदान–प्रदान की उपज होती है।
आर्य जब भारत आए, तब यहाँ पहले से ही विविध जनजातियाँ, संस्कृतियाँ और भाषाएँ विद्यमान थीं। आर्यों ने इन सबके साथ संवाद किया, उनसे सीखा, उन्हें अपनाया और स्वयं को भी बदलते गए।
परिणामस्वरूप भारतीय आर्य भाषा, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और अंततः हिंदी—सभी एक समन्वित, मिश्रित और सार्वभौमिक भारतीय तत्वों वाली भाषाएँ बनीं।

इसी समन्वयशीलता ने हिंदी को विश्व की सर्वाधिक बोलने वाली भाषाओं में स्थान दिलाया और भारतीय भाषाओं को अद्वितीय भाषिक संपदा प्रदान की।


इन्हें भी देखें –

भारत की भाषाएँ: संवैधानिक मान्यता, आधिकारिक स्वरूप और विश्व परिप्रेक्ष्य में भाषाई विविधता

    हिन्दी की उपभाषाएं (हिन्दी की बोलियां):

    भारतीय आर्य भाषाएं:

    • प्राचीन आर्य भाषा: वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत।
    • मध्यकालीन आर्यभाषा: पालि भाषा, प्राकृत भाषा, अपभ्रंश भाषा।
    • आधुनिक आर्यभाषा

    Leave a Comment

    Table of Contents

    Contents
    सर्वनाम (Pronoun) किसे कहते है? परिभाषा, भेद एवं उदाहरण भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग | नाम, स्थान एवं स्तुति मंत्र प्रथम विश्व युद्ध: विनाशकारी महासंग्राम | 1914 – 1918 ई.