प्रो. जी. सुन्‍दर रेड्डी : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली

हिन्दी साहित्य का विकास केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि देश के विभिन्न भाषाई क्षेत्रों के विद्वानों ने हिन्दी को समृद्ध, व्यापक और सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दक्षिण भारत के अनेक विद्वानों ने हिन्दी को केवल अपनाया ही नहीं, बल्कि उसे अपनी साधना और अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। ऐसे ही विशिष्ट हिन्दीसेवियों में प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का नाम अत्यन्त आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है।

मूलतः तेलुगू भाषी होते हुए भी प्रो. रेड्डी ने हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में जो योगदान दिया, वह उन्हें हिन्दी जगत में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करता है। वे न केवल एक उत्कृष्ट निबन्धकार और प्रख्यात समालोचक थे, बल्कि तुलनात्मक साहित्य के क्षेत्र में भी उनकी विद्वत्ता अद्वितीय मानी जाती है। हिन्दी और दक्षिण भारतीय भाषाओं के बीच सेतु का कार्य करने वाले प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का सम्पूर्ण साहित्यिक जीवन राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार और विकास को समर्पित रहा।

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प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी जी का हिंदी लेखकों में स्थान और महत्त्व

हिन्दी भाषी हिन्दी लेखकों में प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। वे उन विद्वानों में से थे, जिन्होंने हिन्दी को केवल एक संपर्क भाषा नहीं, बल्कि एक समृद्ध साहित्यिक भाषा के रूप में स्वीकार किया। हिन्दी साहित्य में उनकी पहचान एक उत्कृष्ट निबन्धकार, श्रेष्ठ समालोचक तथा गम्भीर विचारक के रूप में स्थापित हुई।

मूल रूप से तेलुगू भाषी होने के बावजूद हिन्दी पर उनका अधिकार इतना सुदृढ़ था कि उनके लेखन में भाषा की सहजता, प्रवाह और वैचारिक गहराई स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने हिन्दी और तेलुगू के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से दोनों भाषाओं की साहित्यिक परम्पराओं को समझने और समझाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी : संक्षिप्त जीवन एवं साहित्यिक परिचय (सारणी)

क्रम सं.शीर्षकविवरण
1नामसुंदर रेड्डी (Sundar Reddy)
2पूरा नामप्रोफेसर जी. सुन्दर रेड्डी (Professor G. Sundar Reddy)
3जन्म तिथि10 अप्रैल, 1919
4जन्म स्थानबत्तुलपल्लि ग्राम, बेल्लूर, आन्ध्र प्रदेश, भारत
5मृत्यु तिथि30 मार्च, 2005
6आयु86 वर्ष
7ज्ञात भाषाएँहिन्दी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम
8लेखन-शैलीविचारात्मक, समीक्षात्मक, गवेषणात्मक, सूत्रात्मक
9प्रमुख रचनाएँमेरे विचार, साहित्य और समाज, लैंग्वेज प्राब्लम इन इण्डिया
10साहित्यिक कालआधुनिक काल

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी जी का जीवन-परिचय

जन्म और प्रारम्भिक जीवन

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का जन्म 10 अप्रैल 1919 ई. को आन्ध्र प्रदेश के बेल्लूर जनपद के बत्तुलपल्लि नामक ग्राम में हुआ था। उनका परिवार सांस्कृतिक और शैक्षिक दृष्टि से जागरूक था, जिसका प्रभाव उनके व्यक्तित्व और जीवन-दृष्टि पर स्पष्ट रूप से पड़ा। बचपन से ही उनमें अध्ययन के प्रति गहरी रुचि और भाषाओं के प्रति विशेष आकर्षण दिखाई देता था।

शिक्षा

प्रो. रेड्डी की प्रारम्भिक शिक्षा संस्कृत और तेलुगू में हुई। संस्कृत के अध्ययन से उन्हें भारतीय दर्शन, काव्यशास्त्र और परम्परागत साहित्य की गहरी समझ प्राप्त हुई, जबकि तेलुगू भाषा ने उन्हें मातृभाषा की सांस्कृतिक चेतना से जोड़े रखा।

आगे चलकर उन्होंने हिन्दी भाषा को अपनाया और उसमें उच्च कोटि का अध्ययन किया। इसके अतिरिक्त उन्हें तमिल, कन्नड़ और मलयालम भाषाओं का भी गहरा ज्ञान था। इन भाषाओं पर उनका अधिकार केवल व्यवहारिक नहीं, बल्कि साहित्यिक और अकादमिक स्तर का था। यही बहुभाषिक ज्ञान आगे चलकर उनके तुलनात्मक साहित्यिक अध्ययन की आधारशिला बना।

शैक्षणिक जीवन और अध्यापन कार्य

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का शैक्षणिक जीवन अत्यन्त गौरवशाली रहा। वे आन्ध्र विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से दीर्घकाल तक जुड़े रहे। लगभग 30 वर्षों से भी अधिक समय तक उन्होंने हिन्दी विभाग के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर अध्ययन एवं अनुसन्धान विभाग के अध्यक्ष के रूप में भी कुछ समय तक सेवाएँ प्रदान कीं। इस अवधि में उन्होंने हिन्दी अध्ययन और अनुसंधान को एक नई दिशा दी। उनके मार्गदर्शन में अनेक शोधार्थियों ने हिन्दी साहित्य के विविध पक्षों पर महत्वपूर्ण शोध कार्य सम्पन्न किए।

राष्ट्रवादी हिन्दी प्रचारक के रूप में भूमिका

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी केवल एक शिक्षाविद् या साहित्यकार ही नहीं थे, बल्कि वे एक राष्ट्रवादी हिन्दी प्रचारक भी थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि हिन्दी भारत की सांस्कृतिक एकता का सशक्त माध्यम बन सकती है।

उन्होंने दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रति व्याप्त भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया और हिन्दी को एक समन्वयकारी भाषा के रूप में प्रस्तुत किया। उनके प्रयासों से दक्षिण भारत के अनेक छात्रों और विद्वानों में हिन्दी के प्रति रुचि और सम्मान का भाव विकसित हुआ।

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी : साहित्यिक परिचय

निबन्धकार के रूप में

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी एक उच्च कोटि के निबन्धकार थे। उनके निबन्धों में विचारों की गहनता, तर्क की स्पष्टता और भाषा की प्रांजलता सहज रूप से देखी जा सकती है। उन्होंने सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषाई और साहित्यिक विषयों पर निबन्ध लिखे।

उनके निबन्ध केवल सूचना प्रदान नहीं करते, बल्कि पाठक को विचार के लिए प्रेरित करते हैं। वे समाज और साहित्य के आपसी सम्बन्ध को गहराई से विश्लेषित करते हैं।

समालोचक के रूप में

समालोचना के क्षेत्र में भी प्रो. रेड्डी का योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। वे तुलनात्मक साहित्य के मूर्धन्य समीक्षक माने जाते हैं। उन्होंने हिन्दी साहित्य का मूल्यांकन भारतीय भाषाओं की व्यापक परम्परा के सन्दर्भ में किया।

उनकी समालोचना में न तो अन्ध-प्रशंसा मिलती है और न ही निराधार आलोचना। वे तथ्य, तर्क और सन्तुलन के आधार पर साहित्य का विश्लेषण करते हैं।

तुलनात्मक साहित्य में योगदान

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान तुलनात्मक साहित्य के क्षेत्र में माना जाता है। उन्होंने हिन्दी और तेलुगू भाषा-साहित्य का गहन तुलनात्मक अध्ययन किया।

उनका मानना था कि भारतीय भाषाएँ एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही सांस्कृतिक धारा की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। इस दृष्टि से उन्होंने हिन्दी और दक्षिण भारतीय भाषाओं के साहित्यिक सम्बन्धों को उजागर किया।

बहुभाषिक साहित्य-साधना

प्रो. रेड्डी ने हिन्दी के साथ-साथ तमिल और मलयालम भाषाओं में भी साहित्य लेखन किया। यह उनकी भाषायी दक्षता और साहित्यिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है।

उन्होंने हिन्दी पाठकों के लिए तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम साहित्य से परिचय कराया और उत्तर भारतीयों को दक्षिण भारतीय साहित्य की समृद्ध परम्परा से अवगत कराया।

पत्र-पत्रिकाओं में योगदान

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी के अनेक निबन्ध और लेख हिन्दी, अंग्रेजी और तेलुगू की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। उनके लेखों ने भाषा, साहित्य और समाज से जुड़े अनेक मुद्दों पर सार्थक विमर्श को जन्म दिया।

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी : प्रमुख कृतियाँ

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी की प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं—

  1. साहित्य और समाज
  2. वैचारिकी : शोध और बोध
  3. मेरे विचार
  4. हिन्दी और तेलुगू : एक तुलनात्मक अध्ययन
  5. दक्षिण भारत की भाषाएँ और उनका साहित्य
  6. तेलुगू दारुल (तेलुगू ग्रन्थ)
  7. Language Problem in India (सम्पादित अंग्रेजी ग्रन्थ)
  8. वैचारिकी

इन कृतियों में उनके विचार, भाषायी दृष्टि और साहित्यिक दर्शन स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं।

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी की रचनाएँ / कृतियाँ (वर्गीकृत सारणी)

क्रम सं.कृति का वर्गग्रन्थ / कृति का नामभाषा
1निबन्ध-संग्रहसाहित्य और समाजहिन्दी
2निबन्ध-संग्रहमेरे विचारहिन्दी
3आलोचना / वैचारिक ग्रन्थवैचारिकीहिन्दी
4शोध एवं समालोचनावैचारिकी : शोध और बोधहिन्दी
5तुलनात्मक साहित्यहिन्दी और तेलुगू : एक तुलनात्मक अध्ययनहिन्दी
6भाषा एवं साहित्य अध्ययनदक्षिण भारत की भाषाएँ और उनका साहित्यहिन्दी
7तेलुगू साहित्यतेलुगू दारुलतेलुगू
8भाषा समस्या / सम्पादित ग्रन्थLanguage Problem in Indiaअंग्रेजी

व्यक्तित्व और वैचारिक दृष्टि

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का व्यक्तित्व अत्यन्त सरल, विद्वत्तापूर्ण और प्रेरणादायक था। वे विचारों में गम्भीर, पर व्यवहार में सहज और सौम्य थे।

उनकी वैचारिक दृष्टि में राष्ट्रीय एकता, भाषायी समन्वय और सांस्कृतिक चेतना प्रमुख स्थान रखती थी। वे भाषा को विभाजन का नहीं, बल्कि एकता का माध्यम मानते थे।

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी : निधन

इस राष्ट्रवादी हिन्दी प्रचारक, प्रख्यात साहित्यकार और तुलनात्मक साहित्य के मूर्धन्य समीक्षक प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का 30 मार्च 2005 को निधन हो गया। उनके निधन से हिन्दी और भारतीय साहित्य-जगत को अपूरणीय क्षति पहुँची।

भाषा-शैली और अभिव्यक्ति का स्वरूप

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी की भाषा-शैली उनकी विद्वत्ता, संतुलित चिंतन और गहन साहित्यिक संस्कारों का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करती है। उनकी भाषा परिमार्जित, संयमित और विषयानुकूल है। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग उनकी रचनाओं में स्वाभाविक रूप से दृष्टिगोचर होता है, किंतु यह कहीं भी बोझिल नहीं लगती। वे कठिन और गूढ़ विषयों को भी सरल, स्पष्ट और सुबोध रूप में प्रस्तुत करने में पूर्णतः सक्षम रहे हैं।

उनकी भाषा में व्यावहारिक दृष्टिकोण का विशेष स्थान है। वे केवल सैद्धांतिक विचारों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि भाषा और साहित्य से जुड़े व्यावहारिक सुझाव भी प्रस्तुत करते हैं। आधुनिक संदर्भों को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने यथास्थान अंग्रेजी भाषा के शब्दों का प्रयोग भी किया है, जिससे उनकी भाषा समकालीन युगबोध से जुड़ी हुई प्रतीत होती है।

शैलीगत विविधता

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी की रचनाओं में शैलीगत बहुरूपता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। विषय और उद्देश्य के अनुसार वे शैली में परिवर्तन करते हैं, जिससे उनके लेखन में एकरसता नहीं आती। उनकी प्रमुख शैलियाँ निम्नलिखित हैं—

विचारप्रधान शैली

जब प्रो. रेड्डी किसी विषय पर अपने विचारों को क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत करते हैं, तब वे विचारप्रधान शैली का प्रयोग करते हैं। इस शैली में भाषा सहज और प्रवाहपूर्ण है। छोटे तथा बड़े—दोनों प्रकार के वाक्यों का संतुलित प्रयोग उनकी लेखन क्षमता को दर्शाता है।

विषयानुसार भाषा में परिवर्तन उनकी इस शैली की प्रमुख विशेषता है। दार्शनिक विषयों पर भाषा गंभीर हो जाती है, जबकि सामाजिक या भाषाई मुद्दों पर वही भाषा अधिक सरल और संवादात्मक बन जाती है। उदाहरणस्वरूप, भाषा और संस्कृति के संबंध को स्पष्ट करते हुए उनके विचार अत्यंत तार्किक और बोधगम्य रूप में सामने आते हैं।

समीक्षात्मक शैली

साहित्यिक कृतियों और विचारधाराओं के मूल्यांकन के संदर्भ में प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी की समीक्षात्मक शैली अत्यंत प्रभावशाली है। वे एक सजग और संतुलित समीक्षक के रूप में सामने आते हैं, जिनके विश्लेषण में गहराई और निष्पक्षता दोनों विद्यमान हैं।

इस शैली में उनकी भाषा अपेक्षाकृत अधिक संस्कृतनिष्ठ हो जाती है। आवश्यकता के अनुसार वे छोटे, सटीक वाक्यों के साथ-साथ दीर्घ और विश्लेषणात्मक वाक्य-रचना का भी प्रयोग करते हैं। उनकी समीक्षा का उद्देश्य केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि साहित्य के विकास की संभावनाओं को रेखांकित करना होता है।

शोधपरक (गवेषणात्मक) शैली

प्रो. रेड्डी के शोधात्मक निबंधों में गवेषणात्मक शैली का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इस शैली में भाषा गंभीर, सुसंस्कृत और तथ्यप्रधान है। वे विषय का विवेचन करते समय मौलिक दृष्टिकोण अपनाते हैं और निष्कर्ष तक पहुँचने से पूर्व पर्याप्त तर्क और प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

इस शैली में उनका ध्यान भाषा की स्पष्टता और अभिव्यक्ति की सटीकता पर केंद्रित रहता है। वे मानते थे कि यदि भाषा में स्पष्टता और निश्चितता न हो, तो वह दीर्घकाल तक जीवंत नहीं रह सकती। इसी कारण उनके शोधपरक लेखन में बौद्धिक अनुशासन और तार्किकता विशेष रूप से परिलक्षित होती है।

सूत्रात्मक शैली

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी की निबंध-शैली का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी सूत्रात्मक अभिव्यक्ति है। जहाँ वे किसी विषय पर अपना अंतिम मत या निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं, वहाँ वे कम से कम शब्दों में गहन अर्थ व्यक्त करने में दक्ष दिखाई देते हैं।

उनके सूत्रवाक्य न केवल विचारोत्तेजक हैं, बल्कि पाठक को गहरे चिंतन के लिए प्रेरित भी करते हैं। भाषा, साहित्य और संस्कृति से जुड़े उनके ऐसे सूत्रात्मक कथन आज भी प्रासंगिक प्रतीत होते हैं और उनके वैचारिक व्यक्तित्व को रेखांकित करते हैं।

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी जी का हिन्दी साहित्य में स्थान और मूल्यांकन

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी ने हिन्दी भाषा की सेवा करके अहिन्दी भाषी साहित्यकारों के समक्ष एक प्रेरणास्पद आदर्श प्रस्तुत किया है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि हिन्दी केवल मातृभाषा होने से नहीं, बल्कि साधना, अध्ययन और समर्पण से आत्मसात की जाती है।

एक श्रेष्ठ विचारक, सशक्त निबन्धकार और विद्वान समीक्षक के रूप में उनका स्थान हिन्दी साहित्य में सुरक्षित और सम्मानित है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति अपने कर्तव्य का पूर्ण निष्ठा के साथ निर्वहन किया।

तेलुगू भाषी होते हुए भी हिन्दी के विकास के लिए आजीवन समर्पित रहना उनकी व्यापक राष्ट्रीय चेतना का प्रमाण है। उनके साहित्यिक योगदान ने हिन्दी प्रेमियों को न केवल प्रेरित किया है, बल्कि यह विश्वास भी दृढ़ किया है कि हिन्दी समस्त भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली सशक्त कड़ी बन सकती है। निस्संदेह, हिन्दी साहित्य के इतिहास में प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का योगदान सदैव स्मरणीय और अविस्मरणीय रहेगा।

निष्कर्ष

प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का सम्पूर्ण जीवन हिन्दी भाषा और भारतीय भाषाओं के बीच सेतु-निर्माण को समर्पित रहा। उन्होंने यह सिद्ध किया कि भाषा जन्म से नहीं, बल्कि साधना से आती है। एक तेलुगू भाषी होकर हिन्दी में जो स्थान उन्होंने प्राप्त किया, वह उन्हें हिन्दी साहित्य के इतिहास में सदैव स्मरणीय बनाए रखेगा।

हिन्दी के विकास, तुलनात्मक साहित्य के विस्तार और राष्ट्रीय एकता की भावना के लिए उनका योगदान अमूल्य है। वे निश्चय ही उन विरले साहित्यकारों में से हैं, जिन्होंने भाषायी सीमाओं से ऊपर उठकर साहित्य को राष्ट्र की साझा धरोहर के रूप में देखा और संवारा।


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