भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ पर्व और उत्सव केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति, ऋतु परिवर्तन, सूर्य की गति और कृषि चक्र से गहराई से जुड़े हुए हैं। इन्हीं पर्वों में मकर संक्रांति का विशेष स्थान है। यह पर्व न केवल खगोलीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत व्यापक प्रभाव रखता है।
वर्ष 2026 में मकर संक्रांति की तिथि को लेकर देशभर में चर्चा रही, क्योंकि कहीं इसे 14 जनवरी को मनाने की बात कही गई, तो कहीं 15 जनवरी को। इसके अतिरिक्त, खिचड़ी पर्व, एकादशी नियम, उदयातिथि और पुण्यकाल जैसे विषयों ने इस पर्व को और भी विमर्श का केंद्र बना दिया।
यह लेख मकर संक्रांति 2026 को खगोलीय, पंचांगिक, धार्मिक और लोक-सांस्कृतिक दृष्टि से विस्तारपूर्वक समझाने का प्रयास है।
मकर संक्रांति क्या है? : खगोलीय आधार
मकर संक्रांति मूलतः एक सौर पर्व है। अधिकांश हिंदू त्योहार चंद्रमा की स्थिति पर आधारित होते हैं, किंतु मकर संक्रांति उन गिने-चुने पर्वों में से है जो सूर्य की गति पर आधारित हैं।
सूर्य का राशि परिवर्तन
- इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है।
- इस खगोलीय घटना को मकर संक्रांति कहा जाता है।
- यह सूर्य के उत्तरायण होने का संकेत माना जाता है।
उत्तरायण का महत्व
उत्तरायण का अर्थ है— सूर्य का उत्तर दिशा की ओर गमन। हिंदू धर्मग्रंथों में उत्तरायण को—
- शुभ काल
- देवताओं का दिन
- मोक्षदायक समय
माना गया है। महाभारत में भीष्म पितामह का उत्तरायण में देह त्याग करना इसका प्रसिद्ध उदाहरण है।
मकर संक्रांति 2026: तिथि को लेकर भ्रम क्यों?
वर्ष 2026 में मकर संक्रांति की तिथि को लेकर 14 और 15 जनवरी— दोनों तिथियाँ चर्चा में रहीं। इसके पीछे मुख्य कारण खगोलीय समय, उदयातिथि सिद्धांत और धार्मिक नियम हैं।
खगोलीय गणना (Astronomical Calculation)
- सूर्य का मकर राशि में प्रवेश
14 जनवरी 2026, बुधवार, दोपहर 3:13 बजे
खगोलीय दृष्टि से संक्रांति उसी क्षण मानी जाती है, जब सूर्य राशि बदलता है। इसलिए ज्योतिषीय और वैज्ञानिक रूप से मकर संक्रांति की तिथि 14 जनवरी 2026 ही है।
मकर संक्रांति 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त
मुख्य विवरण
- तिथि: बुधवार, 14 जनवरी 2026
- संक्रांति क्षण: दोपहर 3:13 बजे
- पुण्य काल:
- 3:13 बजे से 5:45 बजे तक
- महापुण्य काल:
- 3:13 बजे से 4:58 बजे तक
धार्मिक मान्यता के अनुसार संक्रांति के बाद का समय विशेष रूप से दान, स्नान और जप के लिए शुभ होता है।
उदयातिथि का सिद्धांत और 15 जनवरी का मत
कुछ धार्मिक परंपराओं में उदयातिथि को प्रधानता दी जाती है।
उदयातिथि क्या है?
जिस तिथि में सूर्योदय होता है, उसी दिन का धार्मिक फल माना जाता है।
- 14 जनवरी को संक्रांति दोपहर बाद हुई
- इसलिए कुछ मतों के अनुसार पुण्यकाल 15 जनवरी को प्रभावी होता है
इसी कारण कई पंडित—
- दान
- खिचड़ी
- पूजा
को 15 जनवरी 2026 को करना अधिक शुभ मानते हैं।
मकर संक्रांति और एकादशी का संयोग (2026 का विशेष पक्ष)
वर्ष 2026 में मकर संक्रांति के दिन एक विशेष स्थिति बनी—
षटतिला एकादशी
- 14 जनवरी 2026 को षटतिला एकादशी भी है
- एकादशी के दिन—
- चावल
- दाल
- खिचड़ी
का सेवन वर्जित माना जाता है
परिणाम
- 14 जनवरी को खिचड़ी बनाना या खाना धार्मिक दृष्टि से उचित नहीं माना गया
- इसलिए कई विद्वानों ने—
- खिचड़ी दान
- खिचड़ी सेवन
को 15 जनवरी या उसके बाद करने की सलाह दी
मकर संक्रांति और खिचड़ी पर्व: क्या दोनों अलग हैं?
संक्षिप्त उत्तर: नहीं
मकर संक्रांति और खिचड़ी पर्व मूलतः एक ही पर्व के दो रूप हैं।
खिचड़ी पर्व क्या है?
खिचड़ी पर्व विशेष रूप से—
- उत्तर प्रदेश
- बिहार
- पूर्वी भारत
में प्रचलित है।
इस दिन—
- चावल और दाल से बनी खिचड़ी
- देवताओं को भोग
- गरीबों को दान
- समाज में प्रसाद वितरण
किया जाता है।
मकर संक्रांति और खिचड़ी पर्व: तुलनात्मक विश्लेषण
| पहलू | मकर संक्रांति | खिचड़ी पर्व |
|---|---|---|
| स्वरूप | खगोलीय / धार्मिक | लोक / सांस्कृतिक |
| आधार | सूर्य का मकर में प्रवेश | अन्न और फसल |
| क्षेत्र | सम्पूर्ण भारत | यूपी-बिहार |
| मुख्य कर्म | स्नान, दान, पूजा | खिचड़ी दान/भोग |
| उद्देश्य | उत्तरायण का स्वागत | समृद्धि और अन्न कृतज्ञता |
👉 भाव एक, अभिव्यक्ति अनेक
भारत के विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति का स्वरूप
मकर संक्रांति भारत के उन विरल पर्वों में से एक है, जो संपूर्ण देश में मनाया जाता है, किंतु हर क्षेत्र में इसका स्वरूप, नाम और परंपराएँ अलग-अलग हैं। यह विविधता भारत की सांस्कृतिक बहुरूपता को दर्शाती है। कहीं यह पर्व मुख्य रूप से कृषि उत्सव के रूप में मनाया जाता है, तो कहीं धार्मिक स्नान और दान को प्रधानता दी जाती है, और कहीं लोकगीत, नृत्य तथा सामूहिक उल्लास इसका मुख्य आधार होते हैं।
1. उत्तर और मध्य भारत में मकर संक्रांति
उत्तर और मध्य भारत में मकर संक्रांति मुख्य रूप से धार्मिक आस्था, कृषि चक्र और सामुदायिक जीवन से जुड़ा पर्व है। यहाँ इसे विभिन्न नामों और रूपों में मनाया जाता है।
(क) माघी
पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के कई क्षेत्रों में मकर संक्रांति को माघी के नाम से जाना जाता है। यह नाम ‘माघ मास’ से जुड़ा हुआ है, क्योंकि इस पर्व के साथ माघ माह का आरंभ माना जाता है।
इस अवसर पर—
- लोग अलाव (अग्नि) जलाते हैं
- परिवार और पड़ोसी मिलकर उसके चारों ओर एकत्र होते हैं
- पारंपरिक लोकगीत और लोकनृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं
माघी का पर्व सामूहिकता, आपसी मेल-मिलाप और फसल की सफलता के लिए कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रतीक है।
(ख) लोहड़ी
लोहड़ी उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब और हरियाणा, में अत्यंत लोकप्रिय पर्व है। यह मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाई जाती है और कड़ाके की सर्दी के अंत का प्रतीक मानी जाती है।
लोहड़ी की प्रमुख विशेषताएँ—
- अग्नि पूजा
- तिल, गुड़, मूंगफली, रेवड़ी और पॉपकॉर्न का अर्पण
- पारंपरिक पंजाबी गीत और भांगड़ा
लोहड़ी केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति और सामूहिक आनंद का उत्सव है, जो जीवन में गर्माहट और उल्लास का संचार करता है।
(ग) खिचड़ी पर्व
उत्तर प्रदेश और बिहार में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन—
- चावल और दाल से बनी खिचड़ी
- देवताओं को भोग
- गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न दान
किया जाता है।
खिचड़ी पर्व का मुख्य उद्देश्य—
- नई फसल के अन्न के प्रति कृतज्ञता
- सामाजिक सेवा और दान-पुण्य
- सामूहिक भोजन और प्रसाद वितरण
है। यह पर्व लोक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है।
2. पश्चिमी भारत में मकर संक्रांति
पश्चिमी भारत में मकर संक्रांति का स्वरूप अत्यंत रंगीन, उत्सवधर्मी और उल्लासपूर्ण होता है।
(क) उत्तरायण – गुजरात
गुजरात में मकर संक्रांति को उत्तरायण कहा जाता है, जो सूर्य के उत्तर दिशा में गमन का प्रतीक है। यहाँ यह पर्व विश्वप्रसिद्ध पतंग उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
उत्तरायण की विशेषताएँ—
- रंग-बिरंगी पतंगें
- छतों पर सामूहिक उत्सव
- तिल और गुड़ से बनी मिठाइयाँ
यह पर्व सामाजिक समरसता, आनंद और सूर्य उपासना का प्रतीक है।
(ख) महाराष्ट्र में मकर संक्रांति
महाराष्ट्र में मकर संक्रांति का केंद्र बिंदु है—
तिल और गुड़ का आदान-प्रदान।
इस अवसर पर लोग एक-दूसरे से कहते हैं—
“तिळगुळ घ्या, गोड गोड बोला”
अर्थात—
तिल-गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो।
यह संदेश—
- आपसी प्रेम
- मधुर संबंध
- सामाजिक सौहार्द
को दर्शाता है। यह पर्व सामाजिक व्यवहार को शुद्ध और मधुर बनाने का प्रतीक माना जाता है।
3. दक्षिण भारत में मकर संक्रांति
दक्षिण भारत में मकर संक्रांति मुख्यतः कृषि और प्रकृति पूजा से जुड़ा हुआ पर्व है।
(क) पोंगल – तमिलनाडु
तमिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल के रूप में मनाया जाता है। यह चार दिनों तक चलने वाला पर्व है।
पोंगल के चार दिन—
- भोगी
- सूर्य पोंगल
- मट्टू पोंगल
- कानूम पोंगल
इस पर्व में—
- नई फसल के चावल से पोंगल पकाया जाता है
- सूर्य देव, पशुओं और प्रकृति की पूजा की जाती है
यह पर्व किसान, पशु और प्रकृति के आपसी संबंध को दर्शाता है।
(ख) संक्रांति / सुग्गी
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में यह पर्व संक्रांति या सुग्गी कहलाता है।
इस अवसर पर—
- गन्ना
- तिल
- विशेष व्यंजन
- सामूहिक भोज
का आयोजन किया जाता है।
यह पर्व खुशी, समृद्धि और सामूहिक उत्सव का प्रतीक है।
4. पूर्वी भारत में मकर संक्रांति
पूर्वी भारत में मकर संक्रांति का स्वरूप कृषि उत्सव और धार्मिक स्नान के रूप में दिखाई देता है।
(क) माघ बिहू – असम
असम में मकर संक्रांति को माघ बिहू कहा जाता है। यह पर्व—
- नई फसल
- सामूहिक भोजन
- सामुदायिक मेल-मिलाप
का प्रतीक है।
इस दिन लोग पारंपरिक व्यंजन बनाते हैं और एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं।
(ख) गंगासागर स्नान – पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल में मकर संक्रांति के अवसर पर गंगासागर स्नान का विशेष महत्व है।
इस दिन—
- गंगा और सागर के संगम पर पवित्र स्नान
- विशाल धार्मिक मेले
- पूजा-अर्चना
का आयोजन होता है।
मान्यता है कि इस दिन गंगासागर में स्नान करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
भारत के विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति के विविध रूप यह सिद्ध करते हैं कि—
- पर्व एक है
- भावना एक है
- पर अभिव्यक्ति क्षेत्रीय संस्कृति के अनुसार भिन्न-भिन्न है,
यही भारत की सांस्कृतिक आत्मा है—
एकता में विविधता।
भारत के विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति: तालिकात्मक प्रस्तुति
| क्रम | क्षेत्र | पर्व का नाम | संबंधित राज्य | प्रमुख परंपराएँ / विशेषताएँ | सांस्कृतिक अर्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | उत्तर एवं मध्य भारत | माघी | पंजाब, हरियाणा, राजस्थान | अलाव जलाना, लोकगीत, सामूहिक उत्सव | शीत ऋतु का अंत, माघ मास का आरंभ |
| 2 | उत्तर भारत | लोहड़ी | पंजाब, हरियाणा | अग्नि पूजा, तिल, गुड़, मूंगफली, लोकनृत्य | गर्माहट, फसल उत्सव, सामुदायिक उल्लास |
| 3 | उत्तर भारत | खिचड़ी पर्व | उत्तर प्रदेश, बिहार | खिचड़ी दान, अन्न दान, सामाजिक सेवा | नई फसल, दान-पुण्य, लोक परंपरा |
| 4 | पश्चिमी भारत | उत्तरायण | गुजरात (राजस्थान के कुछ भाग) | पतंग उत्सव, सूर्य उपासना, मिठाइयाँ | उत्तरायण का स्वागत, आनंद और ऊर्जा |
| 5 | पश्चिमी भारत | मकर संक्रांति | महाराष्ट्र | तिल-गुड़ का आदान-प्रदान, “तिळगुळ घ्या…” | सामाजिक मधुरता, सौहार्द |
| 6 | दक्षिण भारत | पोंगल | तमिलनाडु | चार दिवसीय पर्व, सूर्य-पशु-प्रकृति पूजा | कृषि कृतज्ञता, प्रकृति संतुलन |
| 7 | दक्षिण भारत | संक्रांति / सुग्गी | कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना | गन्ना, तिल, सामूहिक भोज | समृद्धि, सामूहिक उल्लास |
| 8 | पूर्वी भारत | माघ बिहू | असम | सामूहिक भोजन, लोक परंपराएँ | कृषि उत्सव, सामुदायिक एकता |
| 9 | पूर्वी भारत | मकर संक्रांति (गंगासागर स्नान) | पश्चिम बंगाल | पवित्र स्नान, धार्मिक मेला | आध्यात्मिक पुण्य, आस्था |
तालिका से स्पष्ट निष्कर्ष
- मकर संक्रांति पूरे भारत में मनाया जाने वाला एक साझा पर्व है।
- नाम, परंपराएँ और उत्सव की शैली क्षेत्रीय संस्कृति के अनुसार भिन्न हैं।
- हर क्षेत्र में इसका मूल भाव—
सूर्य उपासना, कृषि कृतज्ञता, दान-पुण्य और सामूहिकता—एक ही है।
मकर संक्रांति का धार्मिक और सामाजिक महत्व
धार्मिक महत्व
- सूर्य देव की आराधना
- पुण्य, मोक्ष और आत्मिक शुद्धि
- दान का अक्षय फल
सामाजिक महत्व
- सामूहिकता
- समरसता
- दान और सेवा भावना
कृषि महत्व
- नई फसल का स्वागत
- किसान की कृतज्ञता
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था का उत्सव
मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है?
- अंधकार से प्रकाश की ओर
- शीत से ऊष्मा की ओर
- जड़ता से सक्रियता की ओर
यह पर्व प्रकृति और मनुष्य के संतुलन का प्रतीक है।
निष्कर्ष
🔹 मकर संक्रांति 2026 का खगोलीय पर्व 14 जनवरी को है।
🔹 धार्मिक परंपराओं में दान-खिचड़ी 15 जनवरी को भी मान्य है।
🔹 खिचड़ी पर्व मकर संक्रांति का ही लोक रूप है।
🔹 एकादशी नियम के कारण तिथि-भेद की स्थिति बनी।
सार रूप में
मकर संक्रांति सूर्य का पर्व है,
और खिचड़ी उसका लोक-सांस्कृतिक स्वाद।
भारत की यही विशेषता है—
एक पर्व, अनेक नाम;
एक भावना, अनेक रूप।
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