21वीं सदी का वैश्विक परिदृश्य तीव्र भू-राजनीतिक परिवर्तन, आपूर्ति श्रृंखला के पुनर्संयोजन, जलवायु संकट और तकनीकी प्रतिस्पर्धा से आकार ले रहा है। ऐसे समय में भारत और यूरोपीय संघ (European Union – EU) के बीच 18 वर्षों के लंबे इंतज़ार के बाद 27 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 16वें भारत–EU शिखर सम्मेलन के दौरान ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement – FTA) की आधिकारिक घोषणा एक युगांतकारी घटना के रूप में सामने आई।
इस समझौते को स्वयं यूरोपीय नेतृत्व ने “Mother of All Deals” की संज्ञा दी, जो न केवल इसके आर्थिक दायरे बल्कि इसके रणनीतिक, सामाजिक और वैश्विक प्रभाव को भी दर्शाता है। यह समझौता भारत–EU संबंधों को एक पारंपरिक व्यापार साझेदारी से आगे ले जाकर रणनीतिक साझेदारी 2.0 के स्तर पर स्थापित करता है।
भारत–EU संबंधों की पृष्ठभूमि
भारत और यूरोपीय संघ के बीच औपचारिक संबंधों की शुरुआत 1962 में हुई थी। समय के साथ यह संबंध व्यापार, विकास सहयोग, विज्ञान–प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक शासन जैसे क्षेत्रों तक विस्तृत हुए।
- 2004 में भारत–EU संबंधों को Strategic Partnership का दर्जा मिला।
- 2007 में FTA वार्ताओं की शुरुआत हुई।
- किंतु कृषि, ऑटोमोबाइल, बौद्धिक संपदा अधिकार, डेटा संरक्षण और पर्यावरण मानकों जैसे मुद्दों पर मतभेदों के कारण वार्ता लंबे समय तक ठप रही।
2020 के बाद वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन पर निर्भरता कम करने, रूस–यूक्रेन युद्ध, इंडो-पैसिफिक रणनीति और जलवायु लक्ष्यों ने भारत और EU को एक-दूसरे के और निकट ला दिया।
2026 का ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन: एक निर्णायक मोड़
जनवरी 2026 में यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फ़ॉन डेर लेयेन का भारत दौरा भारत–EU संबंधों के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
इस दौरे के दौरान:
- FTA वार्ताओं के सफल निष्कर्ष की घोषणा।
- सुरक्षा और रक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर।
- स्वच्छ ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, डिजिटल लेनदेन, आपदा प्रबंधन और विज्ञान–प्रौद्योगिकी में सहयोग के नए आयाम तय किए गए।
यह संवाद 2030 तक दीर्घकालिक सहयोग की साझा दृष्टि पर केंद्रित रहा।
भारत–EU मुक्त व्यापार समझौता: मुख्य विशेषताएँ
1. बाजार पहुंच (Market Access)
FTA का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है व्यापक बाजार पहुंच:
- यूरोपीय संघ ने भारत के 99.5% निर्यातों पर टैरिफ शून्य करने पर सहमति दी।
- भारत ने EU के 97.5% व्यापारिक मूल्य पर चरणबद्ध टैरिफ रियायतें प्रदान कीं।
यह भारत के निर्यातकों, विशेष रूप से MSME और श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए एक बड़ा अवसर है।
2. कपड़ा, परिधान और चमड़ा उद्योग
भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों को इस समझौते से सर्वाधिक लाभ मिलने की संभावना है:
- कपड़ा, परिधान, जूते और चमड़ा उत्पादों पर EU में लगने वाला 10–12% आयात शुल्क समाप्त।
- अनुमान है कि इससे भारत के निर्यात में 4–5 बिलियन डॉलर की वृद्धि होगी।
- लाखों रोजगार सृजन, विशेषकर महिलाओं के लिए।
यह “Make in India” और “Atmanirbhar Bharat” को भी बल देगा।
3. कृषि और खाद्य उत्पाद
FTA के तहत:
- भारतीय चाय, कॉफी, मसाले, बासमती चावल को EU बाजार में बेहतर पहुंच।
- GI टैग वाले भारतीय उत्पादों को संरक्षण।
- किसानों की आय बढ़ाने और कृषि निर्यात विविधीकरण में मदद।
हालाँकि डेयरी और संवेदनशील कृषि उत्पादों को भारत ने संरक्षित रखा है।
4. ऑटोमोबाइल और शराब: संतुलित उदारीकरण
यह सबसे संवेदनशील अध्यायों में से एक रहा:
- भारत ने 25 लाख रुपये से अधिक कीमत वाली यूरोपीय कारों पर आयात शुल्क
- 150–110% से घटाकर 10–30%
- वाइन और स्पिरिट्स पर भी समान रियायत
- यह उदारीकरण कोटा सिस्टम के तहत सीमित मात्रा में होगा।
इससे घरेलू उद्योग की सुरक्षा और उपभोक्ता विकल्पों के बीच संतुलन बना रहेगा।
5. सेवा क्षेत्र (Services Trade)
भारत और EU दोनों सेवा क्षेत्र में वैश्विक शक्ति हैं:
- भारत ने 102 उप-क्षेत्रों को खोला (IT, शिक्षा, वित्तीय सेवाएँ आदि)
- EU ने भारत के लिए 144 उप-क्षेत्रों में बाजार पहुंच सुनिश्चित की
यह भारत के सेवा निर्यात और स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
6. कुशल पेशेवरों की गतिशीलता (Mobility Framework)
FTA का एक ऐतिहासिक पहलू:
- भारतीय IT, इंजीनियरिंग, हेल्थकेयर और अन्य पेशेवरों के लिए
EU में काम करने का व्यापक मोबिलिटी फ्रेमवर्क - वीज़ा पारदर्शिता, योग्यता की पारस्परिक मान्यता
यह भारत की “Skill India” नीति को वैश्विक मंच प्रदान करेगा।
7. CBAM और जलवायु सहयोग
EU का Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) भारत के लिए चिंता का विषय था।
समझौते के तहत:
- भारत को तकनीकी सहयोग
- MFN सुरक्षा
- कार्बन उत्सर्जन घटाने हेतु संयुक्त परियोजनाएँ
यह भारत के हरित उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाएगा।
सुरक्षा और रक्षा साझेदारी: FTA से आगे
FTA के साथ-साथ भारत और EU ने एक नई सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर किए:
- साइबर सुरक्षा
- समुद्री सुरक्षा
- आतंकवाद विरोधी सहयोग
- रक्षा सूचना साझा करने हेतु India–EU Security Information Agreement पर वार्ता
यह साझेदारी इंडो-पैसिफिक में स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
द्विपक्षीय व्यापार और आर्थिक महत्व
- वित्त वर्ष 2024–25 में भारत–EU वस्तु व्यापार:
136.5 बिलियन डॉलर - भारत को 15 बिलियन डॉलर का व्यापार अधिशेष
FTA से अगले दशक में व्यापार दोगुना होने की संभावना है।
विशाल बाजार और वैश्विक प्रभाव
- भारत–EU संयुक्त बाजार: 2 बिलियन लोग
- वैश्विक GDP का 25%
- वैश्विक व्यापार का लगभग एक-तिहाई
यह समझौता WTO व्यवस्था, दक्षिण–दक्षिण सहयोग और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को नई दिशा देगा।
स्वच्छ ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन सहयोग
- ग्रीन हाइड्रोजन टास्क फोर्स का गठन
- प्रौद्योगिकी साझाकरण
- जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप ऊर्जा संक्रमण
यह भारत के Net Zero लक्ष्य (2070) के अनुरूप है।
विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार
- 2025–2030 के लिए भारत–EU S&T सहयोग समझौते का नवीनीकरण
- Horizon Europe कार्यक्रम में भारत की संभावित भागीदारी
इससे भारतीय शोधकर्ताओं को वैश्विक फंडिंग और नेटवर्क मिलेगा।
आपदा प्रबंधन और मानवीय सहयोग
- NDMA और EU के DG-ECHO के बीच प्रशासनिक व्यवस्था
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ
- जलवायु जनित आपदाओं से निपटने की क्षमता में वृद्धि
त्रिपक्षीय और वैश्विक सहयोग परियोजनाएँ
भारत–EU त्रिपक्षीय सहयोग के तहत:
- महिला और युवा डिजिटल नवाचार
- महिला किसानों के लिए सौर समाधान
- अफ्रीका, इंडो-पैसिफिक और छोटे द्वीपीय देशों में सतत ऊर्जा परियोजनाएँ
कार्यान्वयन और आगे की राह: भारत–यूरोपीय संघ FTA का भविष्य पथ
भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते की घोषणा के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण चरण इसका प्रभावी कार्यान्वयन है। किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते की तरह, घोषणा के पश्चात् इसे कानूनी, संस्थागत और राजनीतिक प्रक्रियाओं से गुजरना होता है, ताकि यह व्यावहारिक रूप से लागू किया जा सके। इस संदर्भ में निम्नलिखित बिंदु विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:
1. कानूनी सत्यापन (Legal Scrubbing) की प्रक्रिया
FTA पर राजनीतिक सहमति बनने के बाद पहला औपचारिक कदम Legal Scrubbing होता है। इसका आशय समझौते के पूरे पाठ की विस्तृत कानूनी समीक्षा से है, जिसमें यह सुनिश्चित किया जाता है कि:
- समझौते की सभी धाराएँ कानूनी रूप से स्पष्ट, सुसंगत और अस्पष्टताओं से मुक्त हों
- विभिन्न अध्यायों (व्यापार, सेवाएँ, निवेश, पर्यावरण, श्रम, विवाद निपटान आदि) के बीच कोई विरोधाभास न हो
- यह समझौता भारत तथा यूरोपीय संघ दोनों की घरेलू कानूनी व्यवस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों (जैसे WTO नियमों) के अनुरूप हो
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, इस प्रक्रिया को तेज़ गति से पूरा करने का निर्णय लिया गया है, ताकि समझौते को अनावश्यक देरी के बिना अगले चरण में ले जाया जा सके।
2. 2026 के भीतर लागू होने की संभावना
Legal Scrubbing के बाद समझौते के अंतिम पाठ पर औपचारिक हस्ताक्षर किए जाएंगे। इसके पश्चात्:
- भारत की ओर से केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति
- यूरोपीय संघ की संस्थागत स्वीकृतियाँ
प्राप्त होने पर यह समझौता कैलेंडर वर्ष 2026 के भीतर लागू किए जाने की प्रबल संभावना रखता है। यदि यह समयसीमा प्राप्त होती है, तो यह भारत–EU संबंधों में अभूतपूर्व तेजी का संकेत होगा, क्योंकि अतीत में ऐसे व्यापक समझौतों को लागू होने में कई वर्ष लग जाते थे।
3. यूरोपीय संसद और सदस्य देशों द्वारा अनुसमर्थन
यूरोपीय संघ की संरचना के कारण यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत जटिल है:
- समझौते को पहले यूरोपीय संसद (European Parliament) से अनुमोदन प्राप्त करना होगा
- इसके बाद EU के 27 सदस्य देशों की राष्ट्रीय संसदों द्वारा अनुसमर्थन आवश्यक होगा, क्योंकि यह एक व्यापक और मिश्रित (Mixed Agreement) समझौता है, जिसमें व्यापार के साथ-साथ निवेश, सेवाएँ और नियामक सहयोग जैसे विषय शामिल हैं
यह चरण समय लेने वाला हो सकता है, क्योंकि प्रत्येक सदस्य देश अपनी घरेलू राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं के आधार पर समझौते की समीक्षा करता है।
4. भारत के लिए रणनीतिक तैयारी
इस संक्रमणकाल में भारत के लिए यह आवश्यक होगा कि:
- घरेलू उद्योगों और MSMEs को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया जाए
- श्रम-प्रधान क्षेत्रों, किसानों और सेवा प्रदाताओं को FTA के लाभों की जानकारी दी जाए
- मानक, गुणवत्ता, पर्यावरण और डिजिटल नियमों के अनुपालन हेतु संस्थागत क्षमता बढ़ाई जाए
इससे समझौते के लागू होते ही भारत इसके अधिकतम लाभ उठा सकेगा।
संक्षेप में, भारत–EU मुक्त व्यापार समझौते का भविष्य अब घोषणा से क्रियान्वयन की दिशा में बढ़ चुका है। Legal Scrubbing, अनुसमर्थन और संस्थागत स्वीकृतियों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, यदि इसे 2026 के भीतर लागू कर दिया जाता है, तो यह भारत–EU साझेदारी को आर्थिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर एक नई ऊँचाई प्रदान करेगा। यह चरण यह भी निर्धारित करेगा कि यह ऐतिहासिक समझौता कागज़ से निकलकर ज़मीनी हकीकत में कितनी प्रभावी भूमिका निभा पाता है।
निष्कर्ष
भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता केवल एक व्यापारिक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह आर्थिक समृद्धि, रणनीतिक स्वायत्तता, हरित भविष्य और बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था की साझा दृष्टि का प्रतीक है।
यह समझौता भारत को वैश्विक विनिर्माण, सेवा और नवाचार केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है, वहीं EU के लिए यह एशिया में एक भरोसेमंद, लोकतांत्रिक और स्थिर साझेदार सुनिश्चित करता है।
निस्संदेह, यह FTA 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारत–EU साझेदारी को एक नए शिखर पर ले जाने वाला मील का पत्थर सिद्ध होगा।
इन्हें भी देखें –
- PM-YUVA 3.0 योजना | प्रधानमंत्री युवा लेखक मेंटरशिप योजना 3.0
- 8वां वेतन आयोग 1 जनवरी 2026 से प्रभावी
- भारत की पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन: लंबी दूरी की रेल यात्रा में नए युग की शुरुआत
- खेलो इंडिया बीच गेम्स 2026 (Khelo India Beach Games 2026)
- तक्षशिला के भीर माउंड से कुषाणकालीन खोज: गांधार सभ्यता का आर्थिक-सांस्कृतिक अध्ययन
- गूगल का यूनिवर्सल कॉमर्स प्रोटोकॉल (UCP): AI युग में डिजिटल कॉमर्स की नई संरचना
- आर्यन वर्शनेय: भारत के 92वें शतरंज ग्रैंडमास्टर
- भारतीय रेलवे का पहला स्वदेशी ह्यूमनॉइड रोबोट ‘ASC अर्जुन’: सुरक्षा, तकनीक और आधुनिकीकरण की नई पहचान
- UGC के नए ‘समता विनियम 2026’: जाति आधारित भेदभाव उन्मूलन या नया संवैधानिक और सामाजिक विवाद?
- भारत की BRICS अध्यक्षता 2026: वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में जन-केंद्रित और समावेशी नेतृत्व की दिशा
- वीर रस के महाकवि भूषण : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली