हिमालयी वनों में मशरूम की नई प्रजाति Hemileccinum indicum की खोज: भारत की फंगल जैव-विविधता में एक नया अध्याय

प्रकृति का संसार जितना विशाल है, उतना ही रहस्यमय भी। मानव सभ्यता ने जीव-जगत की अनेक प्रजातियों की पहचान कर ली है, किंतु आज भी पृथ्वी पर असंख्य जीव ऐसे हैं जिनका वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण नहीं हो पाया है। विशेष रूप से कवक (Fungi) जगत—जिसे लंबे समय तक वनस्पति और जीव-जगत के बीच एक उपेक्षित वर्ग माना गया—आज वैश्विक वैज्ञानिक अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है।

भारत, जो विश्व के 17 मेगा-बायोडायवर्स देशों में शामिल है, अपनी समृद्ध वनस्पति और जीव-जंतुओं के लिए जाना जाता है। इसके बावजूद भारत की फंगल जैव-विविधता अब भी काफी हद तक अन्वेषित है, खासकर हिमालयी और समशीतोष्ण वनों में। इसी संदर्भ में हाल ही में उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में मशरूम की एक नई और पहले अज्ञात प्रजाति की खोज ने वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है।

इस नई प्रजाति का नाम Hemileccinum indicum (हेमिलेसिनम इंडिकम) रखा गया है। यह खोज न केवल भारत में Hemileccinum वंश का पहला आधिकारिक रिकॉर्ड है, बल्कि यह हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में कवकों की महत्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित करती है।

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खोज की पृष्ठभूमि और वैज्ञानिक सहयोग

खोज करने वाली संस्थाएँ

Hemileccinum indicum (हेमिलेसिनम इंडिकम) की पहचान एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग का परिणाम है। इस खोज में निम्नलिखित संस्थानों के शोधकर्ताओं ने संयुक्त रूप से कार्य किया:

  • भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (Botanical Survey of India – BSI)
  • सेंट जेवियर्स कॉलेज, झारखंड
  • यूनिवर्सिटी ऑफ टोरिनो (University of Torino), इटली

यह सहयोग इस तथ्य को दर्शाता है कि आधुनिक जैव-विविधता अनुसंधान अब केवल राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक स्तर पर साझा ज्ञान और तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।

प्रमुख शोधकर्ता

इस अध्ययन के प्रमुख वैज्ञानिकों में शामिल हैं:

  • डॉ. कनाड दास (Kanad Das) – भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण से संबद्ध, भारत में फंगल टैक्सोनॉमी के एक जाने-माने विशेषज्ञ
  • अनिकेत घोष – युवा शोधकर्ता, जिन्होंने फील्ड सर्वेक्षण और विश्लेषण में महत्वपूर्ण योगदान दिया

इनके नेतृत्व में शोध दल ने वर्षों तक हिमालयी क्षेत्रों में फील्ड अध्ययन किए, जिनका प्रतिफल यह महत्वपूर्ण खोज बनी।

खोज का स्थान और भौगोलिक संदर्भ

भौगोलिक क्षेत्र

यह नई मशरूम प्रजाति उत्तराखंड राज्य के बागेश्वर ज़िले में स्थित धाकुरी (या धकुरी) क्षेत्र में खोजी गई है। यह क्षेत्र हिमालय की मध्यवर्ती श्रेणियों में आता है और अपनी समृद्ध जैव-विविधता के लिए जाना जाता है।

ऊँचाई और पर्यावरण

  • खोज की ऊँचाई: लगभग 2,600 मीटर समुद्र तल से ऊपर
  • वन प्रकार: समशीतोष्ण वन (Temperate Forests)
  • प्रमुख वृक्ष प्रजाति: ओक / बाँज (Quercus)

ऊँचाई वाले हिमालयी क्षेत्र आमतौर पर कठोर जलवायु परिस्थितियों के लिए जाने जाते हैं। ऐसे वातावरण में पनपने वाले कवक विशेष अनुकूलन क्षमताएँ रखते हैं, जो उन्हें वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं।

खोज की प्रक्रिया: कैसे हुई नई प्रजाति की पहचान?

मैक्रोफंगल सर्वेक्षण (Macrofungal Forays)

इस मशरूम की खोज मानसून के मौसम में की गई, जब कवकों की वृद्धि सबसे अधिक होती है। शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से मैक्रोफंगल सर्वेक्षण यात्राएँ आयोजित कीं, जिनका उद्देश्य बड़े आकार के कवकों (जैसे मशरूम) का दस्तावेजीकरण करना था।

इन सर्वेक्षणों के दौरान:

  • जंगलों में व्यवस्थित रूप से भ्रमण किया गया
  • विभिन्न प्रजातियों के मशरूम एकत्र किए गए
  • उनके पर्यावास, वृक्षों के साथ संबंध और भौतिक विशेषताओं का रिकॉर्ड रखा गया

प्रारंभिक भ्रम और वैज्ञानिक चुनौती

शुरुआत में यह मशरूम उत्तरी अमेरिका और चीन में पाई जाने वाली कुछ Hemileccinum प्रजातियों से मिलता-जुलता प्रतीत हुआ। यही कारण था कि वैज्ञानिकों के लिए यह तय करना चुनौतीपूर्ण था कि यह कोई ज्ञात प्रजाति है या वास्तव में नई।

पहचान की पुष्टि: उन्नत वैज्ञानिक विधियाँ

मल्टीजीन मॉलिक्यूलर फाइलोजेनेटिक विश्लेषण

इस मशरूम की वास्तविक पहचान सुनिश्चित करने के लिए शोधकर्ताओं ने बहु-जीन आणविक वंशावली (Multigene Molecular Phylogenetic Analysis) का सहारा लिया। इस प्रक्रिया में:

  • मशरूम के डीएनए के विभिन्न जीन अनुक्रमों का विश्लेषण किया गया
  • इन अनुक्रमों की तुलना विश्वभर की ज्ञात Hemileccinum प्रजातियों से की गई
  • विकासवादी संबंधों (Evolutionary Relationships) का अध्ययन किया गया

महत्वपूर्ण निष्कर्ष

विश्लेषण के परिणामों से यह स्पष्ट हुआ कि:

  • यह प्रजाति फ्लोरिडा (अमेरिका) की एक प्रजाति से निकट संबंध रखती है
  • किंतु आनुवंशिक रूप से यह पूर्णतः अलग और विशिष्ट है
  • इसलिए इसे एक नई प्रजाति के रूप में मान्यता दी गई

इसी आधार पर इसका नाम Hemileccinum indicum (हेमिलेसिनम इंडिकम) रखा गया।

नामकरण का महत्व: Hemileccinum indicum

  • Genus (वंश): Hemileccinum
  • Species (प्रजाति): indicum

Indicum’ शब्द लैटिन भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है—भारत से संबंधित। यह नामकरण न केवल इस प्रजाति की भौगोलिक उत्पत्ति को दर्शाता है, बल्कि भारत की जैव-विविधता के वैश्विक महत्व को भी रेखांकित करता है।

यह तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि भारत में Hemileccinum वंश का यह पहला आधिकारिक रिकॉर्ड है।

Hemileccinum indicum की शारीरिक (Morphological) विशेषताएँ

1. बोलेट मशरूम का प्रकार

Hemileccinum indicum बोलेट (Bolete) समूह से संबंधित है। बोलेट मशरूम की सबसे प्रमुख पहचान यह होती है कि:

  • इनकी टोपी (Cap) के नीचे गलफड़े (Gills) नहीं होते
  • इसके स्थान पर छोटे-छोटे छिद्र (Pores) पाए जाते हैं

2. टोपी (Cap)

  • प्रारंभिक रंग: बैंगनी-भूरा (Purple-brown)
  • परिपक्व अवस्था में: चमड़े जैसा भूरा (Leather-like brown)
  • सतह: झुर्रीदार (Wrinkled)

3. छिद्र (Pores)

  • रंग: हल्का पीला (Light yellow)
  • विशेषता:
    • चोट लगने या रगड़ने पर रंग नहीं बदलता
    • यह गुण इसे कई अन्य बोलेट प्रजातियों से अलग करता है

4. तना (Stipe)

  • बनावट: चिकना (Smooth)
  • जबकि इसी समूह की अन्य प्रजातियों में तना अक्सर रेशेदार या पपड़ीदार होता है

5. बीजाणु (Spores)

  • अध्ययन विधि: स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (SEM)
  • विशेषता:
    • बीजाणुओं की सतह पर छोटे और जटिल गड्ढे (Pits) पाए गए
    • यही इसकी सबसे विशिष्ट सूक्ष्म पहचान है

पारिस्थितिक (Ecological) महत्व

एक्टोमाइकोराइज़ल सहजीविता

Hemileccinum indicum एक एक्टोमाइकोराइज़ल (Ectomycorrhizal) कवक है। इसका अर्थ है कि यह:

  • ओक (Quercus / बाँज) के पेड़ों की जड़ों के साथ सहजीवी संबंध बनाता है
  • पेड़ और कवक एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं

पोषक तत्वों का आदान-प्रदान

इस सहजीविता में:

  • मशरूम
    • मिट्टी से पानी, फॉस्फोरस, नाइट्रोजन जैसे पोषक तत्व अवशोषित करता है
    • इन्हें पेड़ तक पहुँचाता है
  • पेड़
    • प्रकाश संश्लेषण से बनी शर्करा (Sugars) कवक को प्रदान करता है

वन स्वास्थ्य में भूमिका

इस प्रकार के कवक:

  • जंगल के पोषक तत्व चक्र (Nutrient Cycling) को बनाए रखते हैं
  • मिट्टी की संरचना और स्थिरता में योगदान देते हैं
  • पेड़ों को जलवायु तनाव से निपटने में मदद करते हैं

कवक केवल खाद्य नहीं: पारिस्थितिकी तंत्र के मौन संरक्षक

आमतौर पर मशरूम को केवल खाद्य पदार्थ या विषैले जीव के रूप में देखा जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है।

कवक:

  • अपघटक (Decomposers) के रूप में मृत कार्बनिक पदार्थ को तोड़ते हैं
  • पोषक तत्वों को पुनः मिट्टी में लौटाते हैं
  • पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की नींव को मजबूत करते हैं

Hemileccinum indicum (हेमिलेसिनम इंडिकम) जैसी प्रजातियाँ इस मौन लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का सजीव उदाहरण हैं।

भारत की फंगल जैव-विविधता: एक अनदेखा खजाना

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि:

  • विश्व में लगभग 30–50 लाख फंगल प्रजातियाँ हो सकती हैं
  • जिनमें से केवल 10–15% का ही अब तक दस्तावेजीकरण हुआ है

भारत में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है, विशेषकर:

  • हिमालयी क्षेत्र
  • पूर्वोत्तर भारत
  • समशीतोष्ण और अल्पाइन वन

Hemileccinum indicum (हेमिलेसिनम इंडिकम) जैसी खोजें यह संकेत देती हैं कि भारत के वनों में अभी भी असंख्य अज्ञात प्रजातियाँ मौजूद हैं।

संरक्षण की आवश्यकता

यह खोज केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि एक चेतावनी भी है—

  • वनों की कटाई
  • जलवायु परिवर्तन
  • मानव गतिविधियों का बढ़ता दबाव

इन सभी से न केवल बड़े जीव, बल्कि सूक्ष्म कवक भी प्रभावित हो रहे हैं।

अतः:

  • वनों का संरक्षण
  • जैव-विविधता आधारित अनुसंधान
  • स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र की समझ

आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

निष्कर्ष

उत्तराखंड के हिमालयी वनों में Hemileccinum indicum (हेमिलेसिनम इंडिकम) की खोज भारत की फंगल जैव-विविधता में एक मील का पत्थर है। यह खोज न केवल एक नई प्रजाति का परिचय देती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि प्रकृति के रहस्य अभी पूरी तरह उजागर नहीं हुए हैं।

यह मशरूम हमें याद दिलाता है कि जंगल केवल पेड़ों और जानवरों से नहीं बनते, बल्कि उनके नीचे छिपी वह सूक्ष्म दुनिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जो पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को जीवन देती है।

Hemileccinum indicum—एक छोटा सा मशरूम, लेकिन वैज्ञानिक और पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत बड़ा योगदान।


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