पंजाब केसरी लाला लाजपत राय: मातृभूमि के अमर सपूत की 161वीं जयंती पर विशेष लेख

भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक आंदोलनों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह उन महान व्यक्तित्वों की गाथा है जिन्होंने अपने विचारों, त्याग, संघर्ष और बलिदान से राष्ट्र की आत्मा को जागृत किया। ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी, विचारक, समाज सुधारक, शिक्षाविद् और राष्ट्रवादी नेता थे ‘पंजाब केसरी’ लाला लाजपत राय। उनकी 161वीं जयंती के अवसर पर 28 जनवरी, 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए “मातृभूमि का अमर पुत्र” कहा। यह संबोधन केवल शब्द नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक भूमिका की स्वीकृति है, जो लाला लाजपत राय ने भारत की स्वतंत्रता, सामाजिक जागरण और राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में निभाई।

लाला लाजपत राय का जीवन बहुआयामी था। वे केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि एक समाज सुधारक, आर्थिक राष्ट्रवाद के प्रवर्तक, शिक्षण संस्थानों के निर्माता, लेखक, पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की आवाज़ बनने वाले अग्रदूत भी थे। उनका पूरा जीवन भारत को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराने और भारतीय समाज को आत्मसम्मान, स्वावलंबन तथा नैतिक शक्ति से सशक्त करने के लिए समर्पित रहा।

प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी, 1865 को तत्कालीन पंजाब प्रांत के मोगा जिले के धुड़के गाँव में हुआ था। उनका परिवार साधारण था, किंतु विचारों से अत्यंत समृद्ध। उनके पिता मुंशी राधा कृष्ण आज़ाद एक शिक्षित व्यक्ति और आर्य समाज के अनुयायी थे, जबकि माता गुलाब देवी धार्मिक और संस्कारवान महिला थीं। माता-पिता से मिले संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व में सत्यनिष्ठा, देशभक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को गहराई से स्थापित किया।

बाल्यकाल से ही लाला लाजपत राय में असाधारण प्रतिभा और नेतृत्व क्षमता दिखाई देने लगी थी। वे पढ़ाई में तेज थे और सामाजिक विषयों में विशेष रुचि रखते थे। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े लाजपत राय ने भारत की सामाजिक विषमताओं, गरीबी और पराधीनता को बहुत करीब से देखा, जिसने उनके मन में राष्ट्र के लिए कुछ कर गुजरने की प्रबल इच्छा पैदा की।

शिक्षा और वैचारिक निर्माण

लाला लाजपत राय ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा के लिए लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में प्रवेश लिया, जहाँ उन्होंने कानून (एलएलबी) की पढ़ाई की। शिक्षा के दौरान ही वे राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित होने लगे।

उनके वैचारिक निर्माण में स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज की शिक्षाओं की गहरी छाप थी। आर्य समाज के सिद्धांत – वेदों की ओर लौटो, सामाजिक कुरीतियों का विरोध, नारी शिक्षा, जातिगत भेदभाव का उन्मूलन और आत्मसम्मान – लाला लाजपत राय के जीवन दर्शन का अभिन्न हिस्सा बन गए।

इसके अतिरिक्त, वे इटली के महान क्रांतिकारी ज्यूसेपे मेजिनी (Mazzini) से अत्यंत प्रभावित थे और उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। मेजिनी के राष्ट्रवाद, बलिदान और जनजागरण के विचारों ने लाला लाजपत राय को यह विश्वास दिलाया कि स्वतंत्रता केवल याचना से नहीं, बल्कि संगठित संघर्ष और त्याग से प्राप्त होती है।

स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश

कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद लाला लाजपत राय ने वकालत शुरू की, किंतु शीघ्र ही उनका झुकाव पूरी तरह राष्ट्रीय आंदोलन की ओर हो गया। उन्होंने महसूस किया कि व्यक्तिगत उन्नति से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्र की स्वतंत्रता और समाज का उत्थान है।

वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और जल्द ही उग्र राष्ट्रवादी धारा के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। कांग्रेस के भीतर वे उस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे, जो ब्रिटिश शासन के प्रति नरम नीति के बजाय सक्रिय और संघर्षशील दृष्टिकोण अपनाने के पक्ष में थी।

‘गरम दल’ और लाल–बाल–पाल की ऐतिहासिक तिकड़ी

लाला लाजपत राय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ‘गरम दल’ के प्रमुख स्तंभ थे। इस धारा का मानना था कि केवल संवैधानिक सुधारों और प्रार्थनाओं से स्वतंत्रता संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए जन आंदोलन, बहिष्कार और प्रतिरोध आवश्यक है।

इसी विचारधारा के तहत बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल की प्रसिद्ध तिकड़ी अस्तित्व में आई, जिसे इतिहास में ‘लाल–बाल–पाल’ के नाम से जाना जाता है। यह तिकड़ी भारतीय राष्ट्रवाद की उग्र, आत्मविश्वासी और जनोन्मुखी धारा का प्रतीक बनी।

लाल–बाल–पाल ने देश के युवाओं में आत्मबल, स्वाभिमान और बलिदान की भावना जगाई। उनके भाषण, लेख और आंदोलन जनता को ब्रिटिश शासन के अन्याय के विरुद्ध संगठित करने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुए।

स्वदेशी आंदोलन और पंजाब में नेतृत्व

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में शुरू हुए स्वदेशी आंदोलन ने पूरे देश में राष्ट्रवादी चेतना को नई ऊर्जा दी। लाला लाजपत राय ने इस आंदोलन को पंजाब में व्यापक रूप से फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने लोगों से विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी उत्पादों के उपयोग का आह्वान किया। उनके नेतृत्व में पंजाब में जनसभाएँ, जुलूस और आंदोलन हुए, जिनका उद्देश्य आर्थिक स्वावलंबन और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना था।

स्वदेशी आंदोलन के दौरान लाला लाजपत राय ने यह स्पष्ट किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आर्थिक स्वतंत्रता भी उतनी ही आवश्यक है। यही विचार आगे चलकर उनके बैंकिंग और आर्थिक प्रयासों में भी दिखाई देता है।

कांग्रेस अध्यक्षता और असहयोग आंदोलन

लाला लाजपत राय का राजनीतिक कद इतना बढ़ चुका था कि 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। यह वही अधिवेशन था, जिसमें महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया गया।

यद्यपि लाला लाजपत राय और गांधीजी के तरीकों में कुछ वैचारिक भिन्नताएँ थीं, फिर भी वे राष्ट्रीय हित में एक-दूसरे का सम्मान करते थे। लाला लाजपत राय ने असहयोग आंदोलन को भारतीय जनता के आत्मसम्मान और राजनीतिक जागरण का महत्वपूर्ण चरण माना।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की आवाज़

लाला लाजपत राय केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की स्वतंत्रता के लिए सक्रिय थे। 1917 में न्यूयॉर्क में उन्होंने ‘इंडियन होम रूल लीग ऑफ अमेरिका’ की स्थापना की।

इस संस्था का उद्देश्य अमेरिका और पश्चिमी देशों में भारत की दयनीय स्थिति, ब्रिटिश अत्याचारों और भारतीयों की स्वतंत्रता की आकांक्षा को उजागर करना था। उन्होंने विदेशी अखबारों, सभाओं और लेखों के माध्यम से भारत के पक्ष में जनमत तैयार करने का प्रयास किया।

उनका यह प्रयास इस बात का प्रमाण है कि वे स्वतंत्रता संग्राम को केवल राष्ट्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक समर्थन से जोड़कर देखते थे।

सामाजिक और आर्थिक योगदान

बैंकिंग और आर्थिक राष्ट्रवाद

लाला लाजपत राय आर्थिक स्वावलंबन को स्वतंत्रता की आधारशिला मानते थे। इसी सोच के तहत उन्होंने 1894 में पंजाब नेशनल बैंक (PNB) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह बैंक भारतीय पूंजी और भारतीय हितों से संचालित होने वाला एक सशक्त संस्थान बना।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने लक्ष्मी बीमा कंपनी की स्थापना भी की, जिससे भारतीयों को वित्तीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का अवसर मिला।

समाज सेवा और लोक सेवक मंडल

1921 में उन्होंने ‘सर्वेंट्स ऑफ द पीपुल सोसाइटी’ (लोक सेवक मंडल) की स्थापना की। इसका उद्देश्य समाज सेवा, शिक्षा का प्रसार, अछूतों और वंचित वर्गों का उत्थान तथा नैतिक मूल्यों का विकास था।

यह संस्था आज भी उनके आदर्शों को आगे बढ़ा रही है और समाज सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

शिक्षा और DAV आंदोलन

लाला लाजपत राय शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम मानते थे। उन्होंने लाला हंसराज के साथ मिलकर दयानंद एंग्लो-वैदिक (DAV) कॉलेजों के विस्तार में अहम योगदान दिया।

DAV संस्थाएँ भारतीय संस्कृति और आधुनिक शिक्षा के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण बनीं और आज भी देशभर में शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी हैं।

साहित्यिक और पत्रकारिता योगदान

लाला लाजपत राय एक प्रखर लेखक और पत्रकार थे। उनकी रचनाएँ केवल साहित्य नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी विचारों की मशाल थीं।

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं:

  • ‘अनहैप्पी इंडिया (Unhappy India)’ – यह पुस्तक कैथरीन मेयो की ‘मदर इंडिया’ के जवाब में लिखी गई, जिसमें भारत की वास्तविक स्थिति और औपनिवेशिक शोषण को उजागर किया गया।
  • ‘यंग इंडिया (Young India)’ – भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना की व्याख्या।
  • ‘द स्टोरी ऑफ माई डिपोर्टेशन’ – मांडले जेल में बिताए गए कारावास के अनुभव।
  • आत्मकथा – ‘द स्टोरी ऑफ माय लाइफ’
  • जीवनी लेखन – शिवाजी, श्रीकृष्ण, मेजिनी और गैरीबाल्डी की जीवनियाँ।

उनका साहित्य आज भी राष्ट्रवाद और आत्मसम्मान की प्रेरणा देता है।

साइमन कमीशन का विरोध और बलिदान

1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तो उसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। यह भारतीयों के आत्मसम्मान पर सीधा आघात था। लाला लाजपत राय ने इसका पुरजोर विरोध किया।

शांतिपूर्ण मार्च

उन्होंने लाहौर में एक शांतिपूर्ण मार्च का नेतृत्व किया, जिसमें “साइमन गो बैक” के नारे गूँज उठे।

लाठीचार्ज

30 अक्टूबर, 1928 को पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट के आदेश पर उन पर निर्मम लाठीचार्ज किया गया। लाठीचार्ज में वे गंभीर रूप से घायल हो गए।

ऐतिहासिक कथन

घायल अवस्था में उन्होंने कहा –
“मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की आखिरी कील साबित होगी।”

शहादत

इन चोटों के कारण 17 नवंबर, 1928 को उनका निधन हो गया। उनकी शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया और क्रांतिकारी आंदोलन को नई दिशा दी।

निष्कर्ष: अमर विरासत

लाला लाजपत राय का जीवन भारत के स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरक गाथा है। उन्होंने अपने विचारों, कर्मों और बलिदान से यह सिद्ध किया कि राष्ट्र सेवा सर्वोच्च धर्म है।

आज, उनकी 161वीं जयंती पर, उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का संकल्प है। वे सचमुच “मातृभूमि के अमर पुत्र” थे, जिनकी विरासत भारत की आत्मा में सदैव जीवित रहेगी।


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