कविवर जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली

कविवर जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ आधुनिक हिंदी साहित्य के उन विरल कवियों में गिने जाते हैं जिन्होंने परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण किया। वे आधुनिक काल में ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ और अंतिम समर्थ कवि माने जाते हैं। उनकी काव्य-प्रतिभा बहुआयामी थी, किंतु उसका सर्वाधिक गरिमामय और प्रभावशाली रूप काव्य के क्षेत्र में ही प्रकट हुआ। रत्नाकर ने अपने काव्य में मध्ययुगीन काव्य-परंपरा, भक्तिकाल की भावधारा और रीतिकाल की कलात्मकता का ऐसा समन्वय प्रस्तुत किया जो न केवल मनोहारी है, बल्कि हिंदी साहित्य की निरंतरता और विकास को भी रेखांकित करता है।

प्रस्तुत लेख में कविवर जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ के जीवन-परिचय, उनकी प्रमुख काव्य एवं गद्य कृतियों, काव्य-विशेषताओं तथा हिंदी साहित्य में उनके स्थान का विस्तृत और क्रमबद्ध विवेचन किया जा रहा है।

Table of Contents

कविवर जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ : जीवन-परिचय (तालिका)

शीर्षकविवरण
पूरा नामजगन्नाथदास रत्नाकर
जन्मसं. 1923 विक्रम संवत (सन् 1866 ई.), भाद्रपद शुक्ल पंचमी
मृत्यु21 जून 1932 ई., आकस्मिक निधन
युग एवं साहित्यिक पहचानआधुनिक युग के श्रेष्ठ ब्रजभाषा कवि
पितामहसंगमलाल अग्रवाल (काशी के प्रतिष्ठित धनिक);
पितापुरुषोत्तमदास
भारतेंदु से संबंधभारतेंदु हरिश्चंद्र से 16 वर्ष छोटे; जन्मतिथि समान
प्रारंभिक शिक्षाप्रारंभिक शिक्षा – फारसी; 12 वर्ष की अवस्था से अंग्रेज़ी अध्ययन
भाषा-ज्ञानसंस्कृत, प्राकृत, ब्रजभाषा, फारसी, उर्दू, अंग्रेज़ी
आरंभिक साहित्यिक नाम‘ज़की’ (फारसी रचनाओं में प्रयुक्त उपनाम)
काव्य-गुरु एवं प्रेरणाहिंदी काव्यगुरु – सरदार कवि; नवनीत चतुर्वेदी से विशेष प्रभाव
आजीविका30–32 वर्ष की आयु में जरदेजी का कार्य; बाद में आवागढ़ रियासत में कोषाध्यक्ष
साहित्यिक जीवन का प्रारंभभारतेंदु के संपर्क व काशी की कविगोष्ठियों से 1889 ई. में ब्रजभाषा काव्य-रचना आरंभ
प्रथम प्रकाशित कृतिहिंडोला (1894 ई.)
पत्रिका-संपादनसाहित्य सुधा निधि (1893 ई.)
संपादित ग्रंथकंठाभरण, हिततरंगिणी, नखशिख, बिहारी रत्नाकर आदि
नागरीप्रचारिणी सभा से संबंधसक्रिय सहयोग एवं सहभागिता
आलोचनात्मक ग्रंथघनाक्षरी नियम रत्नाकर (1897), समालोचनादर्श (1898)
दरबारी सेवा1902 के बाद अयोध्या नरेश प्रतापनारायण सिंह के निजी सचिव
महत्त्वपूर्ण काव्य-रचनाएँगंगावतरण (1921–1923), उद्धवशतक
उद्धवशतक की विशेष घटनाहरिद्वार यात्रा में पांडुलिपि चोरी; स्मृति के आधार पर पुनर्लेखन
साहित्यिक उपलब्धियाँउद्धवशतक को सर्वोत्कृष्ट कृति का स्थान
सम्मान व पद1926 – ओरियंटल कॉन्फ़्रेंस (हिंदी विभाग) के सभापति; 1930 – हिंदी साहित्य सम्मेलन (20वाँ अधिवेशन) के सभापति
काव्यगत विशेषताएँब्रजभाषा पर असाधारण अधिकार, ठेठ शब्दावली, सुंदर प्रयोग, स्वच्छ कल्पना
व्यक्तित्व एवं विद्वत्ताबहुभाषाविद्, उत्कृष्ट टीकाकार, छंद-व्याख्या में अद्वितीय

कविवर जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ जी का जीवन-परिचय

प्रस्तावना

कविवर जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ आधुनिक हिंदी साहित्य के एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ माने जाते हैं। वे ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने परंपरागत ब्रजभाषा काव्य को आधुनिक चेतना और बौद्धिक गहराई से समृद्ध किया। बहुभाषाविद् होने के कारण उनकी दृष्टि व्यापक थी और उनकी रचनाओं में संस्कृत काव्यशास्त्र, फारसी-उर्दू की कोमलता तथा अंग्रेजी साहित्य का अनुशासित विवेक एक साथ दिखाई देता है।

रत्नाकर जी केवल सशक्त कवि ही नहीं, बल्कि कुशल संपादक, गंभीर आलोचक और साहित्य-संगठक भी थे। हिंदी नवजागरण के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र के संपर्क से उनकी साहित्यिक चेतना को आधुनिक दिशा मिली, किंतु उन्होंने परंपरा से अपना संबंध कभी नहीं तोड़ा। उनकी काव्य-प्रतिभा, आलोचनात्मक विवेक और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ा सक्रिय योगदान उन्हें अपने समय के प्रमुख साहित्यकारों में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।

जन्म एवं परिवार

कविवर जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ का जन्म संवत् 1923 (सन् 1866 ई.) में भाद्रपद शुक्ल पंचमी के दिन काशी (वर्तमान वाराणसी) के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ। यह संयोग उल्लेखनीय है कि हिंदी नवजागरण के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र की जन्मतिथि भी यही थी, यद्यपि वे रत्नाकर जी से लगभग 16 वर्ष बड़े थे।

रत्नाकर जी के पिता का नाम पुरुषोत्तमदास था, जो फारसी भाषा के विद्वान तथा काव्य-रस के ज्ञाता थे। उनके पितामह संगमलाल अग्रवाल काशी के समृद्ध एवं सम्मानित व्यक्ति थे। घर का साहित्यिक वातावरण और विद्वानों का सतत आगमन रत्नाकर जी की साहित्यिक प्रतिभा के विकास में अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ।

शिक्षा-दीक्षा एवं भाषाज्ञान

रत्नाकर जी की प्रारंभिक शिक्षा पारंपरिक पद्धति से हुई। उन्होंने प्रारंभ में फारसी भाषा का अध्ययन किया और मात्र बारह वर्ष की आयु में अंग्रेजी पढ़ना आरंभ कर दिया। वे अत्यंत प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे। उन्होंने आगे चलकर बी.ए. और एल-एल.बी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। उन्होंने एम.ए. की पढ़ाई प्रारंभ की, किंतु माता के निधन के कारण यह शिक्षा अधूरी रह गई।

रत्नाकर जी संस्कृत, प्राकृत, फारसी, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं के भी विद्वान थे। उनकी बहुभाषिक विद्वत्ता ने उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को व्यापकता और गहराई प्रदान की।

साहित्यिक प्रेरणा एवं गुरुजन

रत्नाकर जी के हिंदी काव्य गुरु सरदार कवि थे। वे मथुरा के प्रसिद्ध कवि नवनीत चतुर्वेदी से भी अत्यंत प्रभावित थे। प्रारंभिक काल में वे ‘ज़की’ उपनाम से फारसी में काव्य-रचना करते थे।

काशी की साहित्यिक गोष्ठियों तथा भारतेंदु हरिश्चंद्र के संपर्क ने उनके साहित्यिक जीवन को नई दिशा प्रदान की। भारतेंदु मंडल के प्रभाव से उन्होंने 1889 ई. से ब्रजभाषा में काव्य-रचना प्रारंभ की और शीघ्र ही ब्रजभाषा के प्रमुख कवियों में प्रतिष्ठित हो गए।

व्यावसायिक जीवन एवं सामाजिक योगदान

रत्नाकर जी ने लगभग 30–32 वर्ष की आयु में आजीविका के लिए जरदोजी का कार्य आरंभ किया। बाद में वे आवागढ़ रियासत में कोषाध्यक्ष नियुक्त हुए। सन् 1902 के बाद वे अयोध्या नरेश राजा प्रतापनारायण सिंह के निजी सचिव बने और जीवनपर्यंत अयोध्या दरबार से जुड़े रहे।

उन्होंने साहित्यिक संस्थाओं और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी भाषा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सन् 1893 में उन्होंने ‘साहित्य सुधानिधि’ नामक मासिक पत्रिका का संपादन प्रारंभ किया। इसके अतिरिक्त वे नागरी प्रचारिणी सभा के कार्यों में सक्रिय रूप से जुड़े रहे।

पत्रिका संपादन एवं साहित्यिक पत्रकारिता में योगदान

कविवर जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ ने हिंदी साहित्य के विकास में केवल काव्य-रचना के माध्यम से ही नहीं, बल्कि साहित्यिक पत्रकारिता और संपादन कार्य द्वारा भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘सरस्वती’ के प्रारंभिक संपादक मंडल के सदस्य रहे।

‘सरस्वती’ पत्रिका के आरंभिक काल (1899–1900) में इसके संपादन का कार्य किसी एक व्यक्ति के अधीन न होकर एक संपादक मंडल द्वारा संचालित किया जाता था। इस संपादक मंडल में जगन्नाथदास रत्नाकर के साथ श्यामसुंदर दास, किशोरीलाल गोस्वामी, कार्तिक प्रसाद खत्री तथा राधाकृष्ण दास जैसे विद्वान साहित्यकार सम्मिलित थे। इस मंडल ने पत्रिका की प्रारंभिक दिशा और स्वरूप निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके पश्चात् सन् 1903 में प्रसिद्ध साहित्यकार महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन कार्यभार संभाला। उन्होंने लगभग सत्रह वर्षों (1903–1920) तक इसका सफल संचालन किया और पत्रिका को हिंदी नवजागरण तथा आधुनिक हिंदी साहित्य के विकास का सशक्त माध्यम बना दिया।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि रत्नाकर जी ‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रारंभिक संपादक मंडल के महत्वपूर्ण सदस्य थे, किंतु वे इसके संस्थापक या एकमात्र संपादक नहीं थे।

साहित्य-सृजन एवं प्रमुख कृतियाँ

रत्नाकर जी की प्रथम प्रकाशित काव्यकृति ‘हिंडोला’ (1894 ई.) है। उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना एवं संपादन किया। उनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं—

  • हिंडोला (1894 ई.) – मुक्तक काव्य
  • घनाक्षरी नियम रत्नाकर (1897 ई.) – छंद संबंधी ग्रंथ
  • समालोचनादर्श (1898 ई.) – पोप के ‘Essay on Criticism’ का अनुवाद
  • बिहारी रत्नाकर – बिहारी सतसई का संपादन
  • गंगावतरण (1923 ई.) – पुराख्यान काव्य
  • उद्धवशतक – उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जाती है

‘गंगावतरण’ काव्य की रचना उन्होंने 14 मई 1921 से आरंभ की और 1923 में पूर्ण की। ‘उद्धवशतक’ की रचना के दौरान हरिद्वार यात्रा में उनकी पांडुलिपि का एक भाग चोरी हो गया, किंतु उन्होंने अपनी अद्भुत स्मरणशक्ति के आधार पर उन छंदों को पुनः लिख डाला।

साहित्यिक विशेषताएँ एवं योगदान

रत्नाकर जी ब्रजभाषा के महान कवि थे। उनकी भाषा पर अद्भुत अधिकार था तथा उनकी रचनाओं में ठेठ ब्रज शब्दावली और सुंदर प्रयोग मिलते हैं। वे स्वच्छ कल्पना और मार्मिक संवेदना के कवि थे। उनकी काव्य-दृष्टि में रस, अलंकार और छंद-शास्त्र का गहन ज्ञान झलकता है।

वे केवल कवि ही नहीं, बल्कि उत्कृष्ट टीकाकार और समीक्षक भी थे। अनेक विद्वानों ने उनकी टीकाओं और व्याख्याओं की सराहना की है।

सम्मान एवं साहित्यिक पद

रत्नाकर जी की साहित्यिक प्रतिष्ठा के कारण उन्हें अनेक महत्वपूर्ण पदों पर सम्मानित किया गया। वे सन् 1926 में ओरिएंटल कॉन्फ्रेंस के हिंदी विभाग के सभापति बने तथा सन् 1930 में हिंदी साहित्य सम्मेलन के बीसवें अधिवेशन के सभापति चुने गए।

निधन

साहित्य-साधना और समाज-सेवा से युक्त यह महान जीवन 21 जून 1932 ई. को समाप्त हो गया। उनके निधन के साथ आधुनिक युग में ब्रजभाषा की एक सशक्त परंपरा का अवसान माना जाता है।

काव्यात्मक व्यक्तित्व और साहित्यिक प्रवृत्तियाँ

रत्नाकर का काव्यात्मक व्यक्तित्व अनेक विशेषताओं से युक्त है। वे ऐसे कवि थे जिन्होंने भक्तिकाल की भाव-गंभीरता और रीतिकाल की कलात्मक चमत्कारिता को समान रूप से आत्मसात किया। उनके काव्य में प्रेम, भक्ति, करुणा, वीरता, सौंदर्य और मानवीय संवेदनाओं का समृद्ध संसार दिखाई देता है।

भाषा की दृष्टि से वे ब्रजभाषा के प्रबल समर्थक थे। जब आधुनिक काल में खड़ी बोली हिंदी का वर्चस्व बढ़ रहा था, उस समय भी रत्नाकर ने ब्रजभाषा की काव्यात्मक क्षमता को सिद्ध किया। उनकी ब्रजभाषा पर अधिकार अत्यंत प्रौढ़ और स्वाभाविक था। शब्द-चयन, लय, छंद और अलंकार—सभी पर उनका पूर्ण नियंत्रण दिखाई देता है।

उनकी रचनाओं में भाव और कला का संतुलन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। न तो भावात्मक प्रवाह में कला की उपेक्षा होती है और न ही अलंकारिक चमत्कार के कारण भाव बोझिल बनते हैं। यही कारण है कि उनका काव्य पाठक को सहज रूप से आकर्षित करता है।

कविवर जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ | प्रमुख काव्य कृतियाँ

कविवर जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ की साहित्यिक देन अत्यंत व्यापक है। उन्होंने मुक्तक, प्रबंध, खंडकाव्य और आलोचनात्मक गद्य—सभी क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। उनकी प्रमुख काव्य कृतियाँ निम्नलिखित हैं—

  1. उद्धव शतक
  2. गंगावतरण
  3. वीराष्टक
  4. शृंगार लहरी
  5. रत्नाष्टक
  6. कलकाशी
  7. हरिश्चंद्र
  8. गंगा लहरी
  9. विष्णु लहरी
  10. हिंडोला
  11. समालोचनादर्श

इनके अतिरिक्त उन्होंने अनेक ग्रंथों का संपादन भी किया, जिनमें प्रमुख हैं—

  1. बिहारी रत्नाकर
  2. हिततरंगिणी
  3. सूरसागर

इन संपादित ग्रंथों के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य की पुरानी धरोहर को आधुनिक पाठकों के लिए सुलभ और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया।

कविवर जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ की रचनाएँ : वर्गीकृत तालिका

रचना-प्रकारउपवर्गरचनाएँ / ग्रंथों के नाम
पद्य रचनाएँखंडकाव्य / प्रबंध काव्य / पुराख्यान काव्यहरिश्चंद्र (खंडकाव्य), गंगावतरण (1923, पुराख्यान काव्य), उद्धवशतक (प्रबंध काव्य)
मुक्तक काव्यहिंडोला (1894), कलकाशी, शृंगारलहरी, गंगालहरी, विष्णुलहरी, रत्नाष्टक, वीराष्टक
मुक्तक संग्रहप्रकीर्णक पद्यावली
पद्य-निबंधसमालोचनादर्श
गद्य रचनाएँ(क) साहित्यिक लेखरोला छंद के लक्षण, महाकवि बिहारीलाल की जीवनी, बिहारी सतसई संबंधी साहित्य, साहित्यिक ब्रजभाषा तथा उसके व्याकरण की सामग्री, बिहारी सतसई की टीकाएँ, बिहारी पर स्फुट लेख
(ख) ऐतिहासिक लेखमहाराज शिवाजी का एक नया पत्र, शुगवंश का एक शिलालेख, एक ऐतिहासिक पाषाणाश्व की प्राप्ति, एक प्राचीन मूर्ति, समुद्रगुप्त का पाषाणाश्व
छंद एवं काव्य-शास्त्रीय लेखघनाक्षरी नियम रत्नाकर, वर्ण, सवैया, छंद आदि
संपादित रचनाएँसुधासागर (प्रथम भाग), कविकुल कंठाभरण, दीपप्रकाश, सुंदरशृंगार, नृपशंभुकृत नखशिख, हम्मीर हठ, रसिक विनोद, समस्यापूर्ति (भाग–1), हिततरंगिणी, केशवदासकृत नखशिख, सुजानसागर, बिहारी रत्नाकर, सूरसागर

उद्धव शतक : काव्यात्मक विश्लेषण

‘उद्धव शतक’ रत्नाकर की सर्वाधिक प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण रचना मानी जाती है। यह एक मुक्तक काव्य होते हुए भी प्रबंधात्मकता का गुण लिए हुए है। इस कृति में श्रीकृष्ण के सखा उद्धव और ब्रज की गोपियों के संवाद को आधार बनाकर भक्ति और प्रेम की श्रेष्ठता को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

इस काव्य में गोपियाँ उद्धव के ज्ञानोपदेश को स्वीकार करने के लिए तत्पर नहीं दिखाई देतीं। उनके लिए प्रेम और भक्ति ही जीवन का सर्वस्व है। वे निर्गुण ज्ञान की अपेक्षा सगुण भक्ति को अधिक महत्त्व देती हैं। रत्नाकर ने गोपियों की इस भावनात्मक दृढ़ता को कोमलकांत पदावली में अत्यंत प्रभावशाली रूप से चित्रित किया है।

‘उद्धव शतक’ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भाव-व्यंजना है। स्वाभाविकता, मार्मिकता और संवेदनशीलता के कारण यह कृति पाठक के हृदय को गहराई से स्पर्श करती है। उद्धव की पराजित मनोदशा का चित्रण भी इसमें अत्यंत प्रभावी है। अंततः ज्ञान प्रेम के सामने पराजित होता है—यही इस काव्य का केंद्रीय संदेश है।

प्रतिपाद्य की दृष्टि से यह कृति भक्तिकालीन परंपरा से जुड़ी है, किंतु इसकी प्रस्तुति शैली रीतिकालीन चमत्कार और अलंकारिक सौंदर्य से युक्त है। इस प्रकार ‘उद्धव शतक’ भक्तिकाल और रीतिकाल के मणिकांचन संयोग का उत्कृष्ट उदाहरण बन जाता है।

गंगावतरण : खंडकाव्य के रूप में

‘गंगावतरण’ रत्नाकर का एक महत्वपूर्ण खंडकाव्य है। इसमें गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की पौराणिक कथा को आधार बनाकर काव्य-सृजन किया गया है। इस रचना में कवि की भाव-संपदा और कल्पनाशीलता अनेक रूपों में प्रकट हुई है।

गंगा के अवतरण की कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं रह जाती, बल्कि वह मानवीय भावनाओं, प्रकृति-चित्रण और आध्यात्मिक चेतना का माध्यम बन जाती है। रत्नाकर ने इसमें भाव-निरूपण, रस-व्यंजना और प्रकृति-चित्रण का अद्भुत सामंजस्य प्रस्तुत किया है।

इस काव्य में करुण, शांत और भक्ति रस की प्रधानता है। प्रकृति के विविध रूपों—पर्वत, आकाश, जल और पृथ्वी—का चित्रण अत्यंत सजीव और मनोहारी बन पड़ा है। इससे स्पष्ट होता है कि रत्नाकर न केवल भावों के कवि थे, बल्कि प्रकृति के सूक्ष्म पर्यवेक्षक भी थे।

अन्य कृतियाँ और उनका महत्व

रत्नाकर की अन्य कृतियाँ भी अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं। ‘वीराष्टक’ में वीर रस का ओजस्वी रूप देखने को मिलता है। ‘शृंगार लहरी’ और ‘रत्नाष्टक’ में शृंगार रस की कोमल और कलात्मक अभिव्यक्ति है। ‘गंगा लहरी’ और ‘विष्णु लहरी’ में भक्ति और आध्यात्मिकता का स्वर प्रमुख है।

‘समालोचनादर्श’ उनके आलोचनात्मक दृष्टिकोण का परिचायक है। इस ग्रंथ में उन्होंने काव्य-समालोचना के सिद्धांतों पर विचार प्रस्तुत किए हैं, जिससे उनके विद्वान और चिंतक रूप का भी परिचय मिलता है।

हिंदी साहित्य में स्थान

हिंदी साहित्य के इतिहास में कविवर जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे पुरानी पीढ़ी के सशक्त ब्रजभाषा कवि माने जाते हैं। आधुनिक काल में उनके समान ब्रजभाषा काव्य का मर्मज्ञ कोई अन्य कवि नहीं हुआ।

‘बिहारी रत्नाकर’ के रूप में उन्होंने हिंदी को ऐसा ग्रंथ दिया जिसकी महत्ता से संपूर्ण हिंदी जगत परिचित है। इसी प्रकार ‘उद्धव शतक’ भ्रमरगीत परंपरा की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

भक्तिकाल और रीतिकाल का जो सशक्त समन्वय उनके काव्य में दिखाई देता है, वह हिंदी साहित्य में उन्हें विशिष्ट स्थान प्रदान करता है। उन्होंने भक्तिकाल की भावधारा को आधुनिक काल में रीतिकालीन शैली के माध्यम से अभिव्यक्त किया और पाठकों तथा विद्वानों—दोनों की प्रशंसा प्राप्त की।

उपसंहार

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कविवर जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ हिंदी साहित्य के ऐसे महान कवि थे जिन्होंने परंपरा की जड़ों को मजबूती से थामे रखते हुए आधुनिक युग में ब्रजभाषा काव्य को नई गरिमा प्रदान की। उनका जीवन साहित्य-साधना, विद्वत्ता और सांस्कृतिक चेतना का आदर्श उदाहरण है।

उनकी कृतियाँ आज भी हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और रसिक पाठकों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। निश्चय ही उनके अमूल्य योगदान के लिए हिंदी साहित्य और हिंदी जनता सदैव उनकी ऋणी रहेगी।


  • ‘उद्धव शतक’ के आधार पर रत्नाकर के काव्य में निहित भावात्मक गहराई एवं कलात्मक अभिव्यक्ति को स्पष्ट कीजिए।
  • रत्नाकर जी के ‘उद्धव प्रसंग’ की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  • रत्नाकर जी का ‘उद्धव शतक’ भक्तिकालीन आत्मा एवं रीतिकालीन कलेवर का मणिकांचन संयोग है’ इस कथन को सिद्ध कीजिए।
  • ‘उद्धव शतक’ में रत्नाकर द्वारा ज्ञान-योग के खण्डन और सगुण भक्ति की प्रतिष्ठा को स्पष्ट कीजिए।
  • ‘उद्धव शतक’ को भ्रमरगीत परम्परा की एक विशिष्ट काव्यकृति सिद्ध कीजिए।
  • उद्धव शतक’ के कलापक्ष एवं भावपक्ष का सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए।
  • उद्धव-गोपियों के संवाद के माध्यम से ‘उद्धव शतक’ में प्रेम-भक्ति की विजय का विवेचन कीजिए।
  • उद्धव प्रसंग के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि रत्नाकर के काव्य में भावावेश के साथ-साथ कलात्मक सौष्ठव का भी समावेश है।
  • रत्नाकर जी के ‘उद्धव शतक’ के आधार पर यह स्पष्ट कीजिए कि उन्हें मार्मिक स्थलों की भलीभांति पहचान है।

रत्नाकर कृत ‘उद्धव शतक’ : परिचय एवं परम्परा

‘उद्धव शतक’ रत्नाकर द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण काव्यकृति है, जो हिन्दी साहित्य की भ्रमरगीत परम्परा से सम्बद्ध है। इस काव्य का केन्द्रीय कथ्य उद्धव और गोपियों के संवाद के माध्यम से प्रेम-भक्ति की श्रेष्ठता की स्थापना करना है। ग्रन्थ में सगुण भक्ति का समर्थन तथा ज्ञान-योग और निर्गुण निराकार ब्रह्म का खण्डन किया गया है।

भावभूमि की दृष्टि से यह कृति सूरदास जैसे भक्त कवियों की परम्परा का अनुसरण करती है, जबकि शिल्प और अलंकरण की दृष्टि से यह रीतिकालीन काव्य प्रवृत्तियों से जुड़ी हुई है। इसी कारण इसे “भक्तिकालीन आत्मा और रीतिकालीन कलेवर का मणिकांचन संयोग” कहा जाता है।

‘उद्धव शतक’ का विषय और साहित्यिक आधार

‘उद्धव शतक’ का मूल कथानक कृष्ण द्वारा उद्धव को ब्रज भेजने की कथा पर आधारित है। कृष्ण चाहते हैं कि उद्धव गोपियों को ज्ञान-योग का उपदेश देकर उन्हें विरह वेदना से मुक्त करें, किंतु ब्रज पहुँचने पर उद्धव स्वयं गोपियों की प्रेम-भक्ति के प्रभाव में परिवर्तित हो जाते हैं।

इस काव्य का मुख्य उद्देश्य प्रेम और भक्ति की विजय को स्थापित करना है।

‘उद्धव शतक’ का भावपक्ष

(क) निर्गुण ब्रह्म का खंडन

रत्नाकर ने गोपियों के माध्यम से निर्गुण और निराकार ब्रह्म की उपासना को चुनौती दी है। गोपियों के लिए कृष्ण का साकार रूप ही सर्वश्रेष्ठ है।

उद्धरण :
“रावरो अनूप कोऊ अलख अरूप ब्रह्म,
ऊधौ कहौ कौन धौ हमारे काम आइहै।”

इस पद में गोपियाँ स्पष्ट रूप से कहती हैं कि जो ब्रह्म निराकार और अगोचर है, वह उनके लिए उपयोगी नहीं है। उनके लिए कृष्ण का साकार प्रेम ही जीवन का आधार है।

(ख) ज्ञान-योग की सीमाएँ

उद्धव ज्ञान और योग के प्रतीक हैं, जबकि गोपियाँ सहज प्रेम-भक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। गोपियाँ नियम और संयम को प्रेम के मार्ग में बाधा मानती हैं।

उद्धरण :
“नेम व्रत संजम के पीजरे परे को जब,
लाज कुल कानि प्रतिबन्धहू निवारि चुकी।”

इस पद के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि गोपियाँ सामाजिक बंधनों और नियमों से ऊपर उठकर कृष्ण-प्रेम में पूर्ण रूप से समर्पित हो चुकी हैं।

(ग) उद्धव की दयनीय स्थिति का चित्रण

गोपियाँ उद्धव के ज्ञान-उपदेशों को अस्वीकार कर देती हैं और उन्हें ब्रज से लौट जाने की सलाह देती हैं।

उद्धरण :
“चुप रहौ ऊधौ सूधो पथ मथुरा को गहौ।”

यह पंक्ति गोपियों की स्पष्टवादिता और प्रेम की दृढ़ता को व्यक्त करती है।

(घ) उद्धव का आत्मपरिवर्तन

रत्नाकर ने उद्धव के चरित्र में आए परिवर्तन का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया है। ब्रज से लौटते समय उद्धव का अहंकार समाप्त हो चुका होता है।

उद्धरण :
“आए लौटि लज्जित नवाए नैन ऊधौ अब,
सब सुख साधन को सूधो सो जतन लै।”

यह पद दर्शाता है कि गोपियों की भक्ति ने उद्धव के ज्ञान-गर्व को समाप्त कर दिया।

(ङ) विरह का मार्मिक चित्रण

रत्नाकर ने गोपियों के विरह की वेदना का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया है।

उद्धरण :
“सूखि जाति स्याही लेखनी के नेक डंक लागें,
अंक लागें कागद बररि बरिजात हैं।”

इस पद में विरह की तीव्रता को अतिशयोक्ति के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

‘उद्धव शतक’ का कलापक्ष

(क) चमत्कारपूर्ण काव्य शैली

रत्नाकर ने श्लेष और यमक अलंकारों के माध्यम से काव्य में चमत्कार उत्पन्न किया है।

उद्धरण :
“रस के प्रयोगनि के सुखद सुजोगनि के,
जेते उपचार चारु मंजु सुखदाई है।
तिनके चलाबन की चरचा चलावें कौन,
देत ना सुदर्शन हूँ यो सुधि सिराई है।”

इस पद में दोहरे अर्थों की योजना द्वारा काव्य को अत्यंत प्रभावशाली बनाया गया है।

(ख) बहुज्ञता का प्रदर्शन

रत्नाकर ने ज्योतिष, इतिहास और शास्त्रीय ज्ञान का सुंदर समावेश किया है।

उद्धरण :
“काम विधि वाम की कला में मीन-मेष कहा,
ऊधौ नित बसत बसन्त बरसाने में।”

यह पद ज्योतिषीय संकेतों और काव्यात्मक कल्पना का सुंदर संयोजन प्रस्तुत करता है।

(ग) अलंकारों का प्रयोग

‘उद्धव शतक’ में रूपक, उत्प्रेक्षा, यमक और श्लेष जैसे अलंकारों का अत्यंत प्रभावी प्रयोग हुआ है।

उदाहरण :

  • “वारन कितेक तुम्हें वारन कितेक करें।” (यमक अलंकार)
  • “हेत खेत माँहि खोदि खाई सुद्ध स्वारथ की।” (सांगरूपक)

ये अलंकार काव्य को सौंदर्य और प्रभाव प्रदान करते हैं।

(घ) भाषा सौष्ठव और मधुरता

रत्नाकर ने ब्रजभाषा का अत्यंत मधुर और कोमल प्रयोग किया है।

उद्धरण :
“नेकु कही बैननि अनेक कही नैननि सों,
रही सही सोऊ कहि दीनी हिचकीन सौं।”

इस पद में शब्दों की मधुरता तथा भावों की चित्रात्मकता स्पष्ट दिखाई देती है।

मार्मिक स्थलों की पहचान

रत्नाकर की विशेषता यह है कि उन्होंने कथा के अत्यंत संवेदनशील प्रसंगों का प्रभावशाली चित्रण किया है। गोपियों का विरह, उद्धव का आत्मपरिवर्तन और कृष्ण-प्रेम की गहनता जैसे प्रसंग पाठकों को भावविभोर कर देते हैं।

भक्तिकालीन आत्मा और रीतिकालीन कलेवर का समन्वय

‘उद्धव शतक’ की विषयवस्तु भक्तिकाल की भावधारा से प्रेरित है, जबकि इसकी शैली, भाषा और अलंकार योजना रीतिकालीन काव्य की विशेषताओं को प्रस्तुत करती है। इस प्रकार यह काव्य भक्तिकालीन भावनाओं और रीतिकालीन कलात्मकता का अद्भुत संगम है।

निष्कर्ष

रत्नाकर कृत ‘उद्धव शतक’ हिंदी साहित्य की एक उत्कृष्ट काव्यरचना है, जिसमें प्रेम और भक्ति की श्रेष्ठता का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया गया है। गोपियों की निष्काम भक्ति, उद्धव का आत्मपरिवर्तन तथा कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम इस काव्य की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

अपनी विषयवस्तु, भावात्मक गहराई, भाषा सौंदर्य और कलात्मक अभिव्यक्ति के कारण ‘उद्धव शतक’ भ्रमरगीत परंपरा की श्रेष्ठ कृति मानी जाती है। इसमें भक्तिकाल की आत्मा और रीतिकाल की कलात्मकता का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है, जो इसे हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।


  • ‘गंगावतरण’ अंश के आधार पर काव्य की भावात्मक एवं कलात्मक विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
  • ‘गंगावतरण’ में निहित काव्यगत सौन्दर्य को भावपक्ष और कलापक्ष के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
  • पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘गंगावतरण’ अंश की काव्यात्मक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  • पाठ्य पुस्तक में संकलित अंश ‘गंगावतरण’ के काव्य सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।

‘गंगावतरण’ का काव्य सौन्दर्य

ब्रजभाषा के सुप्रसिद्ध कवि बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर द्वारा रचित ‘गंगावतरण’ एक अत्यंत प्रभावशाली खण्डकाव्य है, जिसमें गंगा के दिव्य अवतरण की पौराणिक कथा को अत्यंत कलात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है। कवि ने इस रचना में धार्मिक आस्था, प्रकृति-सौन्दर्य और काव्य-कलात्मकता का सुंदर समन्वय किया है। इस काव्यांश में गंगा के ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर अवतरण की प्रक्रिया को सजीव और भावपूर्ण रूप में चित्रित किया गया है, जिससे काव्य का सौन्दर्य और अधिक निखर कर सामने आता है।

कथावस्तु की प्रभावशीलता

इस काव्य की कथा गंगा के दिव्य उद्गम और पृथ्वी पर उनके अवतरण से संबंधित है। कवि के अनुसार गंगा ब्रह्मा के कमण्डल से प्रकट होकर अत्यंत तीव्र वेग से प्रवाहित होती है। उनकी धारा इतनी प्रचण्ड होती है कि उसके वेग से तीनों लोक विचलित हो उठते हैं। गंगा की इस तीव्र गति और शक्ति का वर्णन कवि ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया है—

“निकसि कमण्डल तै उमंडि नभ-मण्डल-खण्डति।
धाई धार अपार वेग सौं वायु बिहण्डति।। ”

इन पंक्तियों में गंगा की धारा का वेग और उसका व्यापक प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। गंगा का प्रवाह प्रकृति की असीम शक्ति का प्रतीक बनकर सामने आता है।

आगे चलकर जब गंगा भगवान शिव के समीप पहुँचती है, तो उनके दिव्य और मनोहर स्वरूप को देखकर उसका उग्र रूप शांत हो जाता है। उसके भीतर कोमल भावनाओं का संचार होने लगता है—

“भई थकित छवि चकित हेरि हर-रूप मनोहर।
भयो कोप को लोप चोप और उमगाई।। ”

भगवान शिव गंगा की भावना को समझते हुए उसे स्नेहपूर्वक अपनी जटाओं में स्थान देते हैं। इस प्रकार कथा में प्रेम, भक्ति और करुणा का सुंदर संगम दिखाई देता है।

चित्रोपमता और दृश्यात्मकता

इस काव्यांश की प्रमुख विशेषता इसकी चित्रात्मकता है। कवि ने गंगा के प्रवाह को इस प्रकार शब्दों में ढाला है कि पाठक के सामने पूरा दृश्य सजीव हो उठता है। गंगा की गर्जना और उसका तीव्र प्रवाह प्रलयकालीन बादलों की गर्जना जैसा प्रतीत होता है—

“भयौ घोर अति शब्द धमक सौं त्रिभुवन तरजे।
महामेघ मिलि मनहु एक संगहि सब गरजे।। ”

इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने गंगा की धारा का ऐसा दृश्य प्रस्तुत किया है, जिससे पाठक उसकी तीव्रता और भव्यता को सहज रूप से अनुभव कर सकता है। यह चित्रोपमता कवि की कल्पनाशक्ति और वर्णन-कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है।

रस योजना की सुंदरता

‘गंगावतरण’ में विभिन्न रसों का अत्यंत प्रभावशाली प्रयोग हुआ है। गंगा की प्रचण्ड धारा और उसकी तीव्र गति के वर्णन में वीर रस तथा रौद्र रस का सशक्त प्रदर्शन मिलता है—

“इहि विधि धावति धंसति धरति ढरकति सुखदेनी।
मनहु संवारित सुरपुर की सुगम निसेनी।। ”

इन पंक्तियों में गंगा की तीव्रता और ओज का सजीव चित्रण हुआ है। इसके अतिरिक्त जब गंगा भगवान शिव के सौम्य रूप से प्रभावित होकर शांत हो जाती है, तब वहाँ श्रृंगार रस की सुंदर अभिव्यक्ति देखने को मिलती है—

“हरहराति हरषाति सम्भु सनमुख जब आई।
विपुल वेग बल विक्रम कैं ओजनि उमगाई।। ”

इस प्रकार कवि ने विभिन्न रसों के संतुलित प्रयोग से काव्य को अधिक प्रभावशाली और सरस बना दिया है।

अलंकारों की कलात्मक योजना

इस काव्यांश में अलंकारों का प्रयोग अत्यंत आकर्षक ढंग से किया गया है। कवि ने उपमा, उत्प्रेक्षा और सन्देह अलंकारों के माध्यम से गंगा के सौन्दर्य और चंचलता का सजीव चित्रण किया है—

“मीन मकर जल व्यालन की बहु चिलक सुहाई।
सौजनु चपला चमचमाति चंचल छबि छाई।। ”

यहाँ गंगा की धारा में जलचर जीवों की गति और बिजली की चमक की उपमा देकर उसकी चंचलता और सौन्दर्य को अत्यंत प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया गया है। अलंकारों के प्रयोग से काव्य की भाषा अधिक मधुर और प्रभावपूर्ण बन गई है।

भाषा और शैली की विशेषताएँ

रत्नाकर जी ने इस काव्य में ब्रजभाषा का अत्यंत मधुर और प्रवाहपूर्ण प्रयोग किया है। उनकी भाषा भावानुकूल, लयात्मक और सौन्दर्यपूर्ण है। शब्दों की कोमलता तथा ध्वनि-सौन्दर्य पाठक को सहज ही आकर्षित करता है। साथ ही उनकी शैली वर्णनात्मक होने के साथ-साथ भावात्मक भी है, जो पाठक को कथा से भावनात्मक रूप से जोड़ देती है।

उपसंहार

समग्र रूप से ‘गंगावतरण’ काव्य सौन्दर्य की दृष्टि से अत्यंत उत्कृष्ट रचना है। इसमें रोचक कथानक, चित्रात्मक वर्णन, विविध रसों की योजना तथा अलंकारों का सुंदर प्रयोग काव्य को अत्यंत प्रभावशाली बनाता है। रत्नाकर जी ने गंगा के दिव्य अवतरण की कथा को जिस कलात्मकता और भावनात्मकता के साथ प्रस्तुत किया है, वह इस रचना को हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।


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