भारत जैव विविधता की दृष्टि से विश्व के सर्वाधिक समृद्ध देशों में गिना जाता है। हिमालय से लेकर समुद्री तटों तक और मरुस्थलों से लेकर वर्षावनों तक फैली इसकी भौगोलिक विविधता, असंख्य वनस्पति और जीव-जंतुओं को आश्रय प्रदान करती है। इसी जैविक संपदा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटक हैं — पक्षी (Birds), जिन्हें पारिस्थितिक तंत्र का संवेदनशील संकेतक (Ecological Indicators) माना जाता है। हाल के वर्षों में भारत में पक्षियों की संख्या, वितरण और आवास में तेजी से बदलाव देखने को मिला है, जिसका प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण, वनों की कटाई और मानवीय हस्तक्षेप है।
इसी पृष्ठभूमि में गोवा द्वारा अपने पहले राज्य-स्तरीय ‘बर्ड एटलस ऑफ गोवा’ (Bird Atlas of Goa) का विमोचन न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में उभरा है। इस पहल के साथ गोवा, केरल के बाद भारत का दूसरा राज्य बन गया है जिसने पक्षियों के वैज्ञानिक और व्यवस्थित दस्तावेजीकरण का यह महत्त्वपूर्ण कार्य पूरा किया है।
बर्ड एटलस क्या है?
पक्षी एटलस (Bird Atlas) पक्षियों के वितरण (Distribution), बहुतायत (Abundance) और मौसमी उपस्थिति (Seasonal Occurrence) का एक वैज्ञानिक, स्थान-आधारित और समयबद्ध डेटाबेस होता है। इसे केवल पक्षियों की सूची या चेकलिस्ट नहीं माना जा सकता, बल्कि यह उससे कहीं अधिक व्यापक और गहन अध्ययन प्रस्तुत करता है।
सामान्य चेकलिस्ट और बर्ड एटलस में अंतर
जहाँ एक सामान्य पक्षी चेकलिस्ट किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रजातियों की केवल उपस्थिति दर्ज करती है, वहीं बर्ड एटलस:
- ग्रिड-आधारित सर्वेक्षण (Grid-based Survey) पर आधारित होता है
- एक निश्चित समयावधि में व्यवस्थित रूप से डेटा एकत्र करता है
- पक्षियों के आवास (Habitats), उनकी स्थिति और मानवीय गतिविधियों के प्रभाव का विश्लेषण करता है
- समय के साथ होने वाले परिवर्तनों को समझने के लिए Baseline Data उपलब्ध कराता है
इस प्रकार, बर्ड एटलस संरक्षण, नीति-निर्माण और दीर्घकालिक पारिस्थितिक निगरानी का एक सशक्त उपकरण बन जाता है।
गोवा बर्ड एटलस: पृष्ठभूमि और विमोचन
गोवा का यह ऐतिहासिक बर्ड एटलस राज्य के 9वें बर्ड फेस्टिवल के दौरान जारी किया गया, जिसका आयोजन वाल्पोई में किया गया था। इस उत्सव की थीम थी —
“मैजेस्टिक महादेई” (Majestic Mhadei)
यह थीम विशेष रूप से महादेई (मंडोवी) नदी बेसिन की जैव विविधता और पारिस्थितिक महत्ता पर केंद्रित थी। महादेई नदी पश्चिमी घाट के सबसे महत्वपूर्ण नदी तंत्रों में से एक है और यह क्षेत्र पक्षी विविधता का एक प्रमुख हॉटस्पॉट माना जाता है।
गोवा बर्ड एटलस की प्रमुख विशेषताएं
1. वैज्ञानिक और व्यवस्थित पद्धति
गोवा बर्ड एटलस को पूरी तरह वैज्ञानिक पद्धति के अनुरूप तैयार किया गया। इसके अंतर्गत:
- पूरे राज्य को छोटे-छोटे ग्रिड्स (Grids) में विभाजित किया गया
- प्रत्येक ग्रिड में निर्धारित समयावधि में पक्षियों की गणना की गई
- समान पद्धति अपनाने से डेटा की तुलनात्मकता (Comparability) और विश्वसनीयता (Reliability) सुनिश्चित हुई
यह पद्धति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है और इसे पहले केरल बर्ड एटलस में भी अपनाया गया था।
2. नागरिक विज्ञान (Citizen Science) की भागीदारी
गोवा बर्ड एटलस की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक है — नागरिक विज्ञान का समावेश।
इस परियोजना में:
- पेशेवर वैज्ञानिकों
- अनुभवी पक्षी विशेषज्ञों
- और सैकड़ों स्वयंसेवकों (Volunteers)
ने सक्रिय भागीदारी की। इससे न केवल बड़े पैमाने पर डेटा संग्रह संभव हो सका, बल्कि समाज में प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूकता और स्वामित्व की भावना भी विकसित हुई।
3. eBird India Portal का उपयोग
सर्वेक्षण के दौरान सभी रिकॉर्ड ई-बर्ड इंडिया पोर्टल (eBird India Portal) पर अपलोड किए गए।
इसके लाभ:
- डेटा की पारदर्शिता
- वैश्विक स्तर पर उपलब्धता और मान्यता
- शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं के लिए आसान पहुंच
eBird एक अंतरराष्ट्रीय नागरिक विज्ञान प्लेटफॉर्म है, जिससे गोवा के पक्षी डेटा को वैश्विक डेटाबेस से जोड़ा गया।
4. स्थानीय संस्कृति और भाषा का संरक्षण
गोवा बर्ड एटलस के साथ-साथ एक विशेष मार्गदर्शिका भी जारी की गई जिसका नाम है:
“Birds of Goa: Konkani Nomenclature – Olakh Suknayanchi”
इस गाइड में:
- पक्षियों के स्थानीय कोंकणी नामों का संकलन किया गया है
- यह पहल स्थानीय ज्ञान (Traditional Knowledge) और आधुनिक विज्ञान के बीच सेतु का कार्य करती है
- इससे आम जनता और स्थानीय समुदायों को पक्षियों से जुड़ने में मदद मिलती है
5. गोवा में पक्षी विविधता
गोवा, भौगोलिक रूप से भले ही भारत का एक छोटा राज्य हो, लेकिन पक्षी विविधता के मामले में यह अत्यंत समृद्ध है।
- गोवा में 497 से अधिक पक्षी प्रजातियां दर्ज की गई हैं
- यह भारत में पाई जाने वाली कुल पक्षी प्रजातियों का लगभग 40% है
इनमें शामिल हैं:
- स्थलीय पक्षी
- आर्द्रभूमि (Wetland) पक्षी
- और दुर्लभ समुद्री पक्षी (Seabirds) जैसे:
- शॉर्ट-टेल्ड शियरवॉटर
- वाइट-टेल्ड ट्रॉपिकबर्ड
यह गोवा की समुद्री और तटीय जैव विविधता की महत्ता को दर्शाता है।
6. मस्कट: मालाबार ग्रे हॉर्नबिल
गोवा बर्ड एटलस के लिए ‘मालाबार ग्रे हॉर्नबिल’ (Malabar Grey Hornbill) को मस्कट के रूप में चुना गया है।
- यह प्रजाति पश्चिमी घाट की स्थानिक (Endemic) है
- हाल के वर्षों में इसकी संख्या में गिरावट देखी गई है
- यह चयन संरक्षण के प्रति प्रतीकात्मक संदेश देता है
केरल बर्ड एटलस: भारत का पहला राज्य-स्तरीय बर्ड एटलस
गोवा से पहले, केरल ने वर्ष 2022 में भारत का पहला राज्य-स्तरीय बर्ड एटलस प्रकाशित किया था, जिसे केरल बर्ड एटलस (KBA) के नाम से जाना जाता है।
प्रमुख विशेषताएं:
- इसे एशिया का सबसे बड़ा बर्ड एटलस माना जाता है
- इसमें 25,000 से अधिक चेकलिस्ट का विश्लेषण किया गया
- सर्वेक्षण अवधि: 2015 से 2020 (5 वर्ष)
सर्वेक्षण पद्धति:
- वर्ष में दो बार सर्वेक्षण
- गीला मौसम: जुलाई–सितंबर
- सूखा मौसम: जनवरी–मार्च
डेटा:
- लगभग 361 पक्षी प्रजातियां
- स्थानिक और प्रवासी प्रजातियों का सटीक मानचित्रण
केरल बर्ड एटलस ने अन्य राज्यों, विशेषकर गोवा, के लिए एक मॉडल (Model) प्रदान किया।
गोवा बर्ड एटलस का महत्व
1. संरक्षण और नीति निर्माण
गोवा बर्ड एटलस:
- दीर्घकालिक पारिस्थितिक निगरानी के लिए आधारभूत डेटा उपलब्ध कराता है
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने में मदद करता है
- संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण हेतु रणनीति बनाने में सहायक है
2. जैव विविधता संरक्षण
यह एटलस:
- IUCN रेड लिस्ट में शामिल प्रजातियों की पहचान करता है
- संरक्षण प्राथमिकताओं (Conservation Priorities) को तय करने में मदद करता है
3. पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था
- बर्ड वॉचिंग पर्यटन को बढ़ावा
- ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्थायी आजीविका (Sustainable Livelihood) के अवसर
- गोवा की छवि को केवल समुद्र तट पर्यटन से आगे ले जाना
निष्कर्ष
गोवा का राज्य-स्तरीय बर्ड एटलस केवल एक वैज्ञानिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह संरक्षण, संस्कृति, नागरिक सहभागिता और सतत विकास का एक समन्वित मॉडल है। यह पहल दर्शाती है कि कैसे वैज्ञानिक अनुसंधान और जनभागीदारी मिलकर जैव विविधता संरक्षण की दिशा में प्रभावी कदम उठा सकते हैं।
केरल के बाद गोवा द्वारा यह प्रयास भारत में अन्य राज्यों को भी प्रेरित करेगा कि वे अपने प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक और संवेदनशील दस्तावेजीकरण करें। बदलते जलवायु परिदृश्य में, ऐसे एटलस आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने का आधार सिद्ध होंगे।
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