उस्मानी साम्राज्य (Ottoman Empire): उदय, विस्तार और ऐतिहासिक भूमिका

विश्व इतिहास में अनेक साम्राज्य ऐसे रहे हैं जिन्होंने केवल भौगोलिक विस्तार तक ही स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक और बौद्धिक क्षेत्रों में भी गहरी और स्थायी छाप छोड़ी। उस्मानी साम्राज्य (Ottoman Empire), जिसे तुर्की साम्राज्य अथवा सल्तनत-ए-उस्मानिया के नाम से भी जाना जाता है, ऐसा ही एक दीर्घजीवी और प्रभावशाली साम्राज्य था। यह साम्राज्य लगभग छः शताब्दियों तक अस्तित्व में रहा और अपने उत्कर्ष काल में एशिया, यूरोप तथा उत्तरी अफ्रीका के विशाल भू-भाग पर शासन करता रहा।

उस्मानी साम्राज्य ने पश्चिमी और पूर्वी सभ्यताओं के बीच एक सेतु के रूप में कार्य किया। इसने न केवल मध्यकालीन यूरोप और इस्लामी विश्व को आपस में जोड़ा, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक संपर्क के माध्यम से विश्व इतिहास की दिशा को भी निर्णायक रूप से प्रभावित किया। इसकी ऐतिहासिक भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इसने मध्यकालीन विश्व को आधुनिक युग से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

विशेष रूप से 1453 ई. में कुस्तुन्तुनिया (कॉन्स्टेंटिनोपल) की विजय उस्मानी इतिहास की एक निर्णायक घटना थी। इस विजय के साथ ही बीजान्टिन साम्राज्य का अंत हो गया और यूरोपीय इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। अनेक इतिहासकार मानते हैं कि इस घटना ने यूरोप में पुनर्जागरण की प्रक्रिया को गति दी तथा मध्यकाल के अंत और आधुनिक युग के आरंभ का मार्ग प्रशस्त किया।

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उस्मानी साम्राज्य की परिभाषा और नामकरण

उस्मानी साम्राज्य की स्थापना 1299 ईस्वी में पश्चिमोत्तर अनातोलिया (एशिया माइनर) में हुई थी। इसका नाम इसके संस्थापक उस्मान ग़ाज़ी के नाम पर पड़ा। अरबी और फ़ारसी परंपरा में इसे सल्तनत-ए-उस्मानिया कहा गया, जबकि यूरोपीय भाषाओं में यह Ottoman Empire के नाम से प्रसिद्ध हुआ। “ऑटोमन” शब्द वास्तव में “उस्मान” का ही यूरोपीय रूपांतरण है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सेल्जुकों का पतन और अनातोलिया की स्थिति

तेरहवीं शताब्दी के अंत तक एशिया माइनर (अनातोलिया) की राजनीतिक स्थिति अत्यंत अस्थिर हो चुकी थी। कभी शक्तिशाली रहे सेल्जुक तुर्कों का साम्राज्य लगभग 1300 ईस्वी तक पतन की ओर बढ़ चुका था। मंगोल आक्रमणों, आंतरिक संघर्षों और कमजोर नेतृत्व के कारण सेल्जुक सत्ता विखंडित हो गई थी।

इस विघटन के परिणामस्वरूप अनातोलिया में अनेक छोटे-छोटे तुर्की राज्यों (बेइलिक) का उदय हुआ। इन्हीं छोटे तुर्की सरदारों में से एक थे अर्तग्रुल, जिनकी भूमिका उस्मानी साम्राज्य के उदय में आधारशिला के समान रही।

अर्तग्रुल का योगदान और प्रारंभिक संघर्ष

अर्तग्रुल एक तुर्क प्रधान थे, जो अपने कबीले के साथ अनातोलिया की ओर कूच कर रहे थे। ऐतिहासिक कथाओं के अनुसार, एक अवसर पर उन्होंने लगभग चार सौ घुड़सवारों के साथ एक युद्ध में हस्तक्षेप किया। उन्होंने उस पक्ष का साथ दिया जो पराजय की ओर बढ़ रहा था। यह पक्ष सेल्जुकों का था।

अर्तग्रुल की साहसिक रणनीति और युद्ध-कौशल के कारण युद्ध का परिणाम पलट गया और सेल्जुकों को विजय प्राप्त हुई। इस सहायता से प्रसन्न होकर सेल्जुक शासक ने अर्तग्रुल को उपहार स्वरूप एक छोटा-सा सीमावर्ती प्रदेश प्रदान किया। यही क्षेत्र आगे चलकर उस्मानी साम्राज्य का प्रारंभिक केंद्र बना।

उस्मान ग़ाज़ी और उस्मानी साम्राज्य की स्थापना

अर्तग्रुल की मृत्यु 1281 ईस्वी में हुई। इसके पश्चात उनके पुत्र उस्मान ने कबीले का नेतृत्व संभाला। उस्मान एक कुशल योद्धा, दूरदर्शी नेता और महत्वाकांक्षी शासक थे। उन्होंने धीरे-धीरे अपने क्षेत्र का विस्तार किया और पड़ोसी बीजान्टिन क्षेत्रों पर आक्रमण आरंभ किए।

1299: स्वतंत्रता की घोषणा

1299 ईस्वी में उस्मान ने स्वयं को सेल्जुक सत्ता से स्वतंत्र घोषित कर दिया। इसी वर्ष को परंपरागत रूप से उस्मानी साम्राज्य की स्थापना का वर्ष माना जाता है। यह घोषणा केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं थी, बल्कि एक नए साम्राज्य के जन्म का संकेत थी, जिसने आगे चलकर विश्व इतिहास की दिशा बदल दी।

प्रारंभिक उस्मानी राज्य की विशेषताएँ

प्रारंभिक उस्मानी राज्य कई दृष्टियों से विशिष्ट था—

  1. सैन्य शक्ति: घुड़सवार सेना और बाद में विकसित होने वाली संगठित पैदल सेना।
  2. धार्मिक सहिष्णुता: गैर-मुस्लिम प्रजा को धार्मिक स्वतंत्रता।
  3. प्रशासनिक लचीलापन: स्थानीय परंपराओं को स्वीकार करने की नीति।
  4. सीमावर्ती युद्ध नीति (ग़ाज़ी परंपरा): धर्म और विस्तार का संयोजन।

उस्मानी साम्राज्य और बीजान्टिन साम्राज्य का संघर्ष

उस्मानी साम्राज्य का प्रारंभिक विस्तार मुख्यतः बीजान्टिन साम्राज्य के क्षेत्रों की ओर हुआ। बीजान्टिन साम्राज्य उस समय अपने अंतिम चरण में था—आंतरिक कलह, आर्थिक कमजोरी और बाहरी दबावों से जूझ रहा था।

क़ुस्तुन्तुनिया (कॉन्स्टेंटिनोपल) का महत्व

बीजान्टिन साम्राज्य की राजधानी क़ुस्तुन्तुनिया (Constantinople) न केवल राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण थी, बल्कि यह व्यापार, संस्कृति और धर्म का भी प्रमुख केंद्र थी। यूरोप और एशिया को जोड़ने वाला यह नगर विश्व व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।

1453: क़ुस्तुन्तुनिया की विजय और साम्राज्य का रूपांतरण

1453 ईस्वी में उस्मानी सुल्तान महमद द्वितीय (महमद फ़ातेह) ने क़ुस्तुन्तुनिया (कॉन्स्टेंटिनोपल) पर विजय प्राप्त की। इस ऐतिहासिक घटना के साथ—

  • बीजान्टिन साम्राज्य का अंत हुआ।
  • उस्मानी राज्य औपचारिक रूप से एक साम्राज्य में परिवर्तित हो गया।
  • क़ुस्तुन्तुनिया का नाम आगे चलकर इस्ताम्बुल पड़ा और यह उस्मानी साम्राज्य की राजधानी बनी।

इस्ताम्बुल की विजय का वैश्विक प्रभाव

इस्ताम्बुल की विजय केवल एक नगर पर अधिकार नहीं थी, बल्कि इसके दूरगामी वैश्विक प्रभाव पड़े—

  1. यूरोप में पुनर्जागरण (Renaissance) को अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन मिला।
  2. यूनानी विद्वानों का पश्चिम की ओर पलायन हुआ।
  3. व्यापारिक मार्गों में परिवर्तन आया।
  4. यूरोपीय शक्तियों को नए समुद्री मार्ग खोजने की प्रेरणा मिली।

“1453 में कॉन्स्टेंटिनोपल की विजय के साथ ही उस्मानी राज्य ने साम्राज्य का रूप ग्रहण कर लिया। इसके पश्चात अगले दो शताब्दियों में साम्राज्य का तीव्र संस्थागत विकास और अभूतपूर्व विस्तार देखने को मिलता है।”

विकास काल (1453–1683): उस्मानी साम्राज्य का संस्थागत सुदृढ़ीकरण

1453 ईस्वी के बाद का काल उस्मानी इतिहास में केवल क्षेत्रीय विस्तार का नहीं, बल्कि राज्य और सेना के गहन पुनर्गठन का भी काल था। इस परिवर्तन की नींव मुराद द्वितीय के पुत्र महमद द्वितीय ने रखी, जिन्होंने शासन-संरचना को अधिक संगठित, केंद्रीकृत और प्रभावी बनाया।

महमद द्वितीय ने सैन्य व्यवस्था में सुधार करते हुए तोपखाने और संगठित पैदल सेना को विशेष महत्व दिया। प्रशासनिक स्तर पर उन्होंने कर-प्रणाली, भूमि व्यवस्था और न्यायिक संस्थाओं को सुदृढ़ किया, जिससे साम्राज्य एक स्थायी और नियंत्रित सत्ता के रूप में उभर सका।

कॉन्स्टेंटिनोपल की विजय और धार्मिक नीति

29 मई 1453 को कॉन्स्टेंटिनोपल की विजय ने उस्मानी राज्य को एक क्षेत्रीय शक्ति से विश्वस्तरीय साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया। इस विजय के बाद महमद द्वितीय ने केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी संतुलित नीति अपनाई।

उन्होंने पूर्वी रूढ़िवादी चर्च को आंतरिक स्वायत्तता प्रदान की और उसके धार्मिक अधिकारों को सुरक्षित रखा। इसके बदले चर्च ने उस्मानी प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया। चूँकि अंतिम बीजान्टिन काल में पश्चिमी यूरोप और बीजान्टिन साम्राज्य के संबंध तनावपूर्ण थे, इसलिए अनेक रूढ़िवादी ईसाइयों ने वेनिस जैसे पश्चिमी शासकों की तुलना में उस्मानी शासन को अधिक स्वीकार्य माना।

विस्तार और समृद्धि का युग (15वीं–16वीं शताब्दी)

पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में उस्मानी साम्राज्य निरंतर विस्तार की राह पर अग्रसर हुआ। इस काल में सत्ता ऐसे सुल्तानों के हाथों में रही जो न केवल युद्ध-कौशल में निपुण थे, बल्कि प्रशासनिक दृष्टि से भी दूरदर्शी थे।

भौगोलिक दृष्टि से साम्राज्य का सबसे बड़ा लाभ यह था कि वह यूरोप और एशिया को जोड़ने वाले प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण रखता था। इससे कर-राजस्व में वृद्धि हुई और राज्य की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती चली गई। व्यापार, शिल्प और नगरों का विकास इस काल की प्रमुख विशेषता रहा।

सुल्तान सलीम प्रथम और पूर्वी विस्तार

सुल्तान सलीम प्रथम (1512–1520) के शासनकाल में उस्मानी साम्राज्य ने पूर्व और दक्षिण की दिशा में उल्लेखनीय विस्तार किया। उन्होंने 1514 ईस्वी में चल्द्रान के युद्ध में सफ़ावी शासक शाह इस्माइल को पराजित कर दिया। इस विजय से उस्मानियों का प्रभाव ईरान की सीमा तक स्थापित हो गया।

इसके पश्चात सलीम प्रथम ने मिस्र पर अधिकार कर लिया, जिससे ममलूक सत्ता का अंत हुआ और उस्मानी साम्राज्य का प्रभाव अरब क्षेत्रों तक फैल गया। मिस्र की विजय के साथ ही लाल सागर में उस्मानी नौसेना की स्थापना हुई। इस क्षेत्र में उपस्थिति के कारण पुर्तगाल और उस्मानी साम्राज्य के बीच समुद्री वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो गई।

सुलेमान का युग: साम्राज्य की चरम शक्ति

सुल्तान सुलेमान प्रथम, जिन्हें इतिहास में शानदार सुलेमान के नाम से जाना जाता है, का शासनकाल (1520–1566) उस्मानी साम्राज्य की शक्ति, प्रतिष्ठा और विस्तार का सर्वोच्च चरण माना जाता है।

बाल्कन और मध्य यूरोप में विजय

सुलेमान ने 1521 ईस्वी में बेलग्रेड पर अधिकार किया, जिससे बाल्कन क्षेत्र में उस्मानी स्थिति और मजबूत हो गई। इसके बाद उस्मानी-हंगरी संघर्षों में निर्णायक बढ़त मिली।

1526 ईस्वी में मोहैच के युद्ध में हंगरी की सेना पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त कर उस्मानियों ने मध्य और दक्षिणी हंगरी को अपने अधीन कर लिया। इस विजय के पश्चात आज के अधिकांश हंगरी और अन्य मध्य यूरोपीय क्षेत्रों में तुर्की प्रशासन स्थापित हो गया।

वियना अभियान और अधीनस्थ रियासतें

1529 में सुलेमान ने वियना पर आक्रमण किया, किंतु नगर पर अधिकार नहीं कर सके। 1532 में दूसरा प्रयास भी गून्स की घेराबंदी के दौरान विफल रहा। यद्यपि वियना विजय संभव नहीं हुई, फिर भी ट्रान्सिल्व्हेनिया, वलाचिया और मोल्दाविया जैसी रियासतें उस्मानी अधीनता स्वीकार करने को विवश हो गईं।

पूर्वी मोर्चे पर सफलता

पूर्व की दिशा में 1535 ईस्वी में उस्मानी सेनाओं ने फारसियों से बग़दाद जीत लिया। इससे उन्हें मेसोपोटामिया पर नियंत्रण मिला और फारस की खाड़ी तक पहुँचने का नौसैनिक मार्ग सुरक्षित हुआ। यह विजय साम्राज्य की रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई।

हंगरी का औपचारिक विलय और यूरोपीय राजनीति

सोलहवीं शताब्दी के मध्य में यूरोप की राजनीति में उस्मानी साम्राज्य एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभरा। हैब्सबर्ग वंश के विरुद्ध फ्रांस और उस्मानी साम्राज्य के बीच गठबंधन स्थापित हुआ।

1543 में नीस और 1553 में कोर्सिका पर प्राप्त सफलताएँ इसी सहयोग का परिणाम थीं। इन अभियानों में उस्मानी नौसेनाध्यक्ष बर्बरोस्सा हय्रेद्दीन पाशा और तुर्गुत रेइस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। निरंतर दबाव के फलस्वरूप 1547 ईस्वी में हैब्सबर्ग शासक फेर्दिनंद को हंगरी के उस्मानी साम्राज्य में विलय को औपचारिक रूप से स्वीकार करना पड़ा।

साम्राज्य की शक्ति, जनसंख्या और ऐतिहासिक मूल्यांकन

सुलेमान के शासनकाल के अंत तक उस्मानी साम्राज्य की जनसंख्या लगभग डेढ़ करोड़ तक पहुँच चुकी थी और यह साम्राज्य एशिया, यूरोप और अफ्रीका—तीनों महाद्वीपों में फैला हुआ था। इस समय तक वह एक प्रमुख नौसैनिक महाशक्ति बन चुका था, जिसका भूमध्य सागर के अधिकांश भाग पर नियंत्रण था।

यूरोपीय विद्वानों और राजनीतिक विचारकों ने उस्मानी साम्राज्य की तुलना प्राचीन रोमन साम्राज्य से की। इतालवी विद्वान फ्रांसेस्को संसोविनो और फ्रांसीसी राजनीतिक दार्शनिक जीन बोदिन ने इसे यूरोप की एकमात्र ऐसी शक्ति माना जो सार्वभौमिक शासन का दावा कर सकती थी। बोदिन के अनुसार, उस्मानी सुल्तान ही ऐसे शासक थे जो स्वयं को रोमन सम्राटों की परंपरा का वास्तविक उत्तराधिकारी कह सकते थे।

विद्रोह और पुनरुत्थान का काल (1566–1683)

सुलेमान प्रथम की मृत्यु (1566) के बाद उस्मानी साम्राज्य एक ऐसे युग में प्रवेश करता है, जिसे एक साथ आंतरिक संकट, बाहरी चुनौतियों और सीमित पुनरुत्थान का काल कहा जा सकता है। यद्यपि साम्राज्य की विस्तारवादी प्रवृत्ति बनी रही, किंतु शासन और सैन्य संरचना में धीरे-धीरे शिथिलता दिखाई देने लगी।

कमजोर सुल्तान और संस्थागत दबाव

सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कई ऐसे सुल्तान सत्ता में आए जो अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में न तो उतने प्रभावी प्रशासक थे और न ही सशक्त सेनानायक। इसका सीधा प्रभाव उस सैन्य और नौकरशाही तंत्र पर पड़ा, जो पिछली शताब्दी में साम्राज्य की शक्ति का आधार रहा था।

धार्मिक और बौद्धिक रूढ़िवादिता के बढ़ते प्रभाव ने नवीन विचारों और सुधारों को सीमित कर दिया। परिणामस्वरूप उस्मानी सेना सैन्य तकनीक और संगठन के क्षेत्र में धीरे-धीरे पश्चिमी यूरोपीय शक्तियों से पिछड़ने लगी। इसके बावजूद साम्राज्य एक प्रमुख सैन्य शक्ति बना रहा और उसका क्षेत्रीय विस्तार 1683 तक जारी रहा।

व्यापारिक मार्गों में परिवर्तन और आर्थिक संकट

इसी काल में वैश्विक व्यापार व्यवस्था में एक मौलिक परिवर्तन हुआ। पश्चिमी यूरोपीय शक्तियों ने नए समुद्री मार्गों की खोज कर उस्मानी साम्राज्य के पारंपरिक व्यापारिक एकाधिकार को चुनौती दी।

केप ऑफ गुड होप की खोज के साथ ही यूरोप और एशिया के बीच समुद्री व्यापार को नया मार्ग मिला, जिससे उस्मानी भूमि मार्गों का महत्व कम होने लगा। इसके साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र में उस्मानी और पुर्तगाली शक्तियों के बीच नौसैनिक संघर्ष आरंभ हुए, जो पूरी सोलहवीं शताब्दी तक चलते रहे।

उधर, अमेरिका से स्पेन के माध्यम से बड़ी मात्रा में चाँदी यूरोप पहुँची। इस चाँदी की बाढ़ का प्रभाव उस्मानी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा। मुद्रा का अवमूल्यन हुआ और महँगाई तेज़ी से बढ़ी, जिससे आम जनता और प्रशासन—दोनों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया।

उत्तरी मोर्चा: रूस और क्रीमियाई खानत

पूर्वी यूरोप में इस समय एक नई शक्ति के रूप में रूसी जारशाही उभर रही थी। इवान चतुर्थ (इवान द टेरिबल) के शासनकाल में रूस ने वोल्गा और कैस्पियन क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाया, जो पहले तातार खानतों के अधीन थे।

1571 में क्रीमियाई खान देवलेत प्रथम जीरेय ने उस्मानी समर्थन से मॉस्को पर आक्रमण कर उसे जला दिया। हालांकि अगले वर्ष मोलोदी की लड़ाई में उसे निर्णायक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद क्रीमियाई खानत ने लंबे समय तक पूर्वी यूरोप पर छापामार आक्रमण और दास-व्यापार की नीति जारी रखी और सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक एक प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्ति बनी रही।

लेपैंटो की लड़ाई और नौसैनिक चुनौती

दक्षिणी यूरोप में उस्मानी साम्राज्य को एक प्रतीकात्मक, किंतु महत्त्वपूर्ण झटका 1571 ईस्वी में लेपैंटो की लड़ाई में लगा। स्पेन के राजा फिलिप द्वितीय के नेतृत्व में बने कैथोलिक गठबंधन ने उस्मानी नौसेना को पराजित किया।

यद्यपि इस युद्ध में उस्मानियों को जहाजों से अधिक अनुभवी नाविकों और अधिकारियों का नुकसान हुआ, फिर भी उनकी नौसैनिक क्षमता शीघ्र ही पुनः स्थापित हो गई। कुछ ही वर्षों में बेड़े का पुनर्निर्माण कर लिया गया और 1573 में वेनिस को शांति समझौते के लिए विवश कर दिया गया। इस समझौते ने उस्मानियों को उत्तरी अफ्रीका में अपने प्रभुत्व को संगठित और विस्तारित करने का अवसर प्रदान किया।

हैब्सबर्ग मोर्चा और आंतरिक अशांति

यूरोप के मध्य भाग में हैब्सबर्ग शक्तियों के साथ संघर्ष धीरे-धीरे स्थिरता के चरण में पहुँच गया। ऑस्ट्रिया द्वारा विकसित मजबूत रक्षा-प्रणाली के कारण उस्मानी विस्तार को रोकना संभव हो सका।

1593 से 1606 तक चले दीर्घ युद्ध ने उस्मानी सेना में आग्नेयास्त्रों से लैस बड़ी पैदल सेना की आवश्यकता को उजागर किया। इसके चलते भर्ती नियमों में ढील दी गई, जिससे अनुशासनहीनता और सत्ता के दुरुपयोग की समस्याएँ बढ़ीं।

इसी पृष्ठभूमि में अनातोलिया में जेलाली विद्रोहों (1595–1610) का उदय हुआ, जिसमें बेरोजगार सैनिकों और निशानेबाजों ने व्यापक लूटमार की। सोलहवीं शताब्दी के अंत और सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत में इससे पूरे क्षेत्र में अराजकता का वातावरण बन गया। बढ़ती जनसंख्या और सीमित भूमि संसाधनों ने संकट को और गहरा किया।

केंद्रीय सत्ता का पुनर्स्थापन: मुराद चतुर्थ

सत्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में सुल्तान मुराद चतुर्थ ने केंद्रीय सत्ता को पुनः मजबूत करने का प्रयास किया। उन्होंने कठोर प्रशासनिक कदम उठाए और सैन्य अनुशासन को बहाल किया।

उनके शासनकाल में 1635 में येरेवन और 1639 में बग़दाद को सफ़ाविदों से पुनः जीत लिया गया। इन सफलताओं ने कुछ समय के लिए साम्राज्य की प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित किया।

‘महिलाओं की सल्तनत’ और कोप्रुलू युग

मुराद चतुर्थ के बाद का काल, विशेषकर 1648 से 1656 के बीच, ‘महिलाओं की सल्तनत’ के नाम से जाना जाता है। इस समय कम उम्र के सुल्तानों की ओर से उनकी माताओं ने शासन संभाला। कोसिम सुल्तान और तुर्हान हातिस इस दौर की सबसे प्रभावशाली महिलाएँ थीं। सत्ता संघर्ष का अंत 1651 में कोसिम सुल्तान की हत्या के साथ हुआ।

इसके पश्चात कोप्रुलू परिवार से आने वाले प्रधान वज़ीरों के हाथों में वास्तविक सत्ता केंद्रित हो गई। कोप्रुलू वज़ीरों ने प्रशासनिक सुधार किए और सैन्य अभियानों में सफलता प्राप्त की। इस काल में ट्रान्सिल्व्हेनिया पर पुनः अधिकार, 1669 में क्रीट की विजय तथा पोलैंड के दक्षिणी यूक्रेन में विस्तार संभव हुआ।

वियना की दूसरी घेराबंदी और निर्णायक मोड़ (1683)

पुनरुत्थान के इस दौर का अंत अत्यंत विनाशकारी सिद्ध हुआ। मई 1683 में प्रधान वज़ीर कारा मुस्तफा पाशा के नेतृत्व में उस्मानी सेना ने वियना की घेराबंदी की। निर्णायक आक्रमण में हुई देरी के कारण हैब्सबर्ग, जर्मन और पोलिश सेनाओं के संयुक्त मोर्चे ने उस्मानी सेना को पराजित कर दिया।

पोलैंड के राजा जॉन तृतीय के नेतृत्व में बनी इस गठबंधन सेना की विजय ने यूरोप में उस्मानी विस्तार का स्थायी अंत कर दिया। इसके बाद शुरू हुए महान तुर्की युद्ध (1683–1699) का समापन कर्लोवित्ज़ की संधि से हुआ, जिसके तहत उस्मानी साम्राज्य को कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों से हाथ धोना पड़ा।

1566 से 1683 का काल उस्मानी इतिहास में एक संक्रमणकाल सिद्ध हुआ—जहाँ एक ओर आंतरिक विद्रोह, आर्थिक संकट और सैन्य चुनौतियाँ थीं, वहीं दूसरी ओर पुनर्स्थापन और अस्थायी सफलता के प्रयास भी दिखाई देते हैं। वियना की विफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब साम्राज्य का विस्तार युग समाप्त हो चुका है और पतन की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है।

ठहराव और दोषनिवृत्ति का काल (1683–1827)

1683 में वियना की असफल घेराबंदी और उसके बाद हुए महान तुर्की युद्ध के परिणामस्वरूप उस्मानी साम्राज्य एक नए युग में प्रवेश करता है। यह काल न तो पूर्ण पतन का है और न ही पहले जैसी विस्तारवादी शक्ति का, बल्कि इसे राजनीतिक ठहराव, सैन्य पुनर्मूल्यांकन और सीमित पुनर्संरचना का समय कहा जा सकता है। इस अवधि में साम्राज्य का मुख्य लक्ष्य अब विस्तार नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और सीमाओं की रक्षा बन गया।

रूसी विस्तार और उत्तरी संकट

सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में रूस उस्मानी साम्राज्य के लिए सबसे गंभीर और स्थायी चुनौती के रूप में उभरा। उत्तरी और पूर्वी यूरोप में रूसी जारशाही के निरंतर विस्तार ने काला सागर और बाल्कन क्षेत्रों में उस्मानी प्रभुत्व को सीधे खतरे में डाल दिया।

इसी संदर्भ में 1709 ईस्वी में पोल्टावा की लड़ाई में स्वीडन के राजा चार्ल्स द्वादश को रूस के हाथों पराजय झेलनी पड़ी। इस पराजय के बाद चार्ल्स द्वादश ने शरण के लिए उस्मानी साम्राज्य का रुख किया और इस्ताम्बुल में उसे एक संभावित सहयोगी के रूप में सम्मानित किया गया।

पृथ नदी अभियान और अस्थायी सैन्य सफलता

स्वीडिश राजा के प्रभाव और बढ़ते रूसी खतरे को ध्यान में रखते हुए सुल्तान अहमद तृतीय को रूस के विरुद्ध युद्ध के लिए प्रेरित किया गया। इसके परिणामस्वरूप 1710–1711 में पृथ नदी अभियान शुरू हुआ।

इस अभियान में उस्मानी सेनाओं को रूस के विरुद्ध उल्लेखनीय सफलता प्राप्त हुई, जिससे कुछ समय के लिए साम्राज्य की सैन्य प्रतिष्ठा को बल मिला। हालाँकि यह सफलता दीर्घकालिक संतुलन को बदलने में सक्षम नहीं थी, फिर भी इसने यह स्पष्ट कर दिया कि साम्राज्य अभी पूरी तरह निर्बल नहीं हुआ था।

ऑस्ट्रिया के साथ संघर्ष और पैसरोविच की संधि

इसके कुछ ही वर्षों बाद उस्मानी साम्राज्य को मध्य यूरोप में ऑस्ट्रिया से पुनः संघर्ष का सामना करना पड़ा। 1716 से 1718 के बीच हुए ऑस्ट्रो-तुर्की युद्ध में उस्मानी पक्ष को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी।

युद्ध का अंत पैसरोविच की संधि (1718) के साथ हुआ, जिसके अंतर्गत बनत, सर्बिया और ‘लिटिल वलाकिया’ (वर्तमान ओल्टेनिआ) जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र ऑस्ट्रिया को सौंप दिए गए। इस संधि ने स्पष्ट संकेत दिया कि अब उस्मानी साम्राज्य यूरोप में आक्रामक नीति अपनाने की स्थिति में नहीं रहा था।

यूरोप में रक्षात्मक नीति की स्थापना

पैसरोविच की संधि के बाद उस्मानी साम्राज्य की यूरोपीय नीति में एक मौलिक परिवर्तन दिखाई देता है। जहाँ पहले वह एक विस्तारवादी शक्ति के रूप में उभरता था, वहीं अब उसकी भूमिका मुख्यतः रक्षात्मक बन गई।

यूरोप में आगे बढ़ने के स्थान पर साम्राज्य ने अपने शेष क्षेत्रों को सुरक्षित रखने और आंतरिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना आरंभ किया। यह स्थिति उस्मानी इतिहास में एक ऐसे चरण को रेखांकित करती है, जिसमें शक्ति के प्रदर्शन से अधिक राजनीतिक यथार्थवाद और संतुलन की आवश्यकता प्रमुख हो गई।

1683 से 1827 का यह काल उस्मानी साम्राज्य के इतिहास में ठहराव और आत्म-परीक्षण का समय रहा। सीमित सैन्य सफलताओं के बावजूद साम्राज्य अब यह स्वीकार करने लगा था कि यूरोप में उसकी भूमिका बदल चुकी है। यह चरण आगे चलकर उन्नीसवीं शताब्दी में होने वाले गहन सुधारों और अंततः साम्राज्य के विघटन की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

उस्मानी साम्राज्य: पूर्व और पश्चिम के बीच सेतु

उस्मानी साम्राज्य ने एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच एक सांस्कृतिक और बौद्धिक सेतु का कार्य किया। इस साम्राज्य के अंतर्गत—

  • इस्लामी, ईसाई और यहूदी समुदाय सह-अस्तित्व में रहे।
  • विज्ञान, चिकित्सा, स्थापत्य, कला और साहित्य का विकास हुआ।
  • अरबी, फ़ारसी और तुर्की परंपराओं का समन्वय देखने को मिला।

शासन व्यवस्था और सुल्तान की भूमिका

उस्मानी साम्राज्य में सुल्तान सर्वोच्च शासक होता था। वह—

  • राजनीतिक प्रमुख
  • सैन्य सेनापति
  • और इस्लामी परंपरा में ख़लीफ़ा की भूमिका भी निभाता था (बाद के काल में)

पहले सुल्तान उस्मान ग़ाज़ी से लेकर अंतिम सुल्तान तक, सुल्तान की संस्था साम्राज्य की रीढ़ बनी रही।

उस्मानी साम्राज्य का दीर्घकालीन प्रभुत्व

सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में उस्मानी साम्राज्य अपनी शक्ति के चरमोत्कर्ष पर था। इस काल में यह—

  • एशिया के बड़े हिस्से,
  • यूरोप के बाल्कन क्षेत्र,
  • और उत्तरी अफ्रीका तक फैला हुआ था।

(इस काल के विस्तार और विकास पर विस्तृत चर्चा आपके अगले निर्देशानुसार अलग से की जाएगी।)

प्रथम विश्वयुद्ध और उस्मानी साम्राज्य का पतन

प्रथम विश्वयुद्ध (1914–1918) में उस्मानी साम्राज्य ने जर्मनी के पक्ष में भाग लिया। युद्ध में पराजय के बाद—

  • 1919 में साम्राज्य का विभाजन कर लिया गया।
  • विजयी मित्र राष्ट्रों ने इसके अधिकांश क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।
  • राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य रूप से साम्राज्य पूरी तरह कमजोर हो गया।

तुर्की स्वतंत्रता संग्राम और साम्राज्य का अंत

उस्मानी साम्राज्य के पतन के बाद तुर्की में स्वतंत्रता आंदोलन प्रारंभ हुआ, जिसका नेतृत्व मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क ने किया।

29 अक्टूबर 1922

  • सल्तनत का औपचारिक अंत हुआ।
  • उस्मानी साम्राज्य को समाप्त घोषित किया गया।
  • आगे चलकर तुर्की गणराज्य की स्थापना हुई।

यह तिथि उस्मानी साम्राज्य के छह सौ वर्ष लंबे इतिहास का अंतिम अध्याय बनी।

निष्कर्ष

उस्मानी साम्राज्य केवल एक राजनीतिक सत्ता नहीं था, बल्कि यह एक ऐसी ऐतिहासिक शक्ति थी जिसने सदियों तक विश्व राजनीति, संस्कृति और सभ्यता को प्रभावित किया। इसके उत्थान और पतन में हमें—

  • सत्ता की गतिशीलता,
  • सभ्यताओं के संपर्क,
  • और इतिहास की अनिवार्य परिवर्तनशीलता

का गहन पाठ मिलता है। उस्मानी साम्राज्य का इतिहास आज भी वैश्विक अध्ययन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए अत्यंत प्रासंगिक बना हुआ है।

सन्दर्भ

  1. Erickson, Edward J., Defeat in Detail: The Ottoman Army in the Balkans (1912–1913), Praeger Publishers, संयुक्त राज्य अमेरिका।
  2. Adams, Jonathan M. एवं Hall, Thomas D., “East–West Orientation of Historical Empires and Modern States”, Journal of World-Systems Research, खंड 12, अंक 2, 2006।
  3. Dündar, Orhan एवं Dündar, Erhan, 1. Dünya Savaşı, Millî Eğitim Bakanlığı Yayınları, तुर्की, 1999।
  4. सिंह, प्रदीप, “उस्मानिया साम्राज्य: खिलाफ़त और ख़लीफ़ा का संक्षिप्त इतिहास”, शंखनाद.ऑर्ग, 22 मई 2015 (अभिगमन तिथि: 30 जून 2017)।
  5. “उस्मानी साम्राज्य”, आईना विश्व का (संग्रहित ऐतिहासिक सामग्री), वेबैक मशीन में 6 सितम्बर 2017 को सुरक्षित।

इन्हें भी देखें –

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