कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन केवल राजनीतिक संघर्ष भर नहीं था, बल्कि वह एक व्यापक सांस्कृतिक, बौद्धिक और साहित्यिक जागरण भी था। इस आंदोलन को दिशा देने में जिन साहित्यकारों, पत्रकारों और विचारकों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनमें श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का नाम विशेष आदर के साथ लिया जाता है। वे ऐसे सर्जक थे जिन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य-बोध तक सीमित न रखकर उसे राष्ट्र-निर्माण, मानवता और सामाजिक चेतना का सशक्त माध्यम बनाया।

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, संस्मरणकार, रेखाचित्रकार और ललित निबंधकार—इन सभी रूपों में समान रूप से प्रतिष्ठित रहे। उनके विचार उदार, राष्ट्रवादी और मानवतावादी थे। देश-प्रेम, मानवीय करुणा, सामाजिक सरोकार और नैतिक मूल्यों की गहरी अनुभूति उनकी रचनाओं में सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। उन्होंने पत्रकारिता को निहित स्वार्थों से मुक्त रखकर उसे उच्च मानवीय आदर्शों की स्थापना का माध्यम बनाया।

Table of Contents

कन्हैयालाल मिश्र “प्रभाकर” : जीवन-परिचय (संक्षिप्त – तालिका)

क्रम सं.विवरण का शीर्षकसंबंधित जानकारी
1.पूरा नामकन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
2.जन्म तिथि29 मई, 1906
3.जन्म स्थानदेवबन्द, सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)
4.मृत्यु तिथि9 मई, 1995
5.प्रमुख व्यवसायपत्रकार, निबंधकार
6.लेखन भाषाहिंदी
7.लेखन शैलीवर्णनात्मक, भावात्मक एवं चित्रात्मक
8.प्रमुख साहित्यिक विधाएँनिबंध, संस्मरण, रेखाचित्र
9.प्रमुख रचनाएँबाजे पायलिया के घंघरू, दीप जले शंख बाजे, माटी हो गई सोना, नई पीढ़ी के विचार, ज़िन्दगी मुस्करायी
10.संपादन कार्यनवजीवन, ज्ञानदेव

कन्हैयालाल मिश्र “प्रभाकर” जी का जीवन-परिचय

जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का जन्म 29 मई सन् 1906 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद नामक ग्राम में हुआ। वे एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार से थे। उनके पिता पं. रामदत्त मिश्र एक संतोषी, सरल स्वभाव वाले और पांडित्य कर्म से जुड़े व्यक्ति थे। पारिवारिक वातावरण धार्मिक, संस्कारपूर्ण तथा नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण था, जिसने प्रभाकर जी के व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हालाँकि पारिवारिक आर्थिक स्थिति अत्यंत सामान्य थी। सीमित साधनों के कारण प्रभाकर जी की औपचारिक विद्यालयी शिक्षा बाधित होती रही, किंतु उनकी जिज्ञासा, आत्मविश्वास और अध्ययन-लगन ने इस अभाव को कभी बाधा नहीं बनने दिया।

शिक्षा एवं स्वाध्याय

विद्यालय की नियमित शिक्षा भले ही सुचारु रूप से न चल सकी हो, परंतु प्रभाकर जी ने स्वाध्याय के माध्यम से संस्कृत, हिंदी और अंग्रेज़ी का गहन अध्ययन किया। वे पुस्तकों के माध्यम से ज्ञान अर्जन में विश्वास रखते थे। उनका अध्ययन केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं था, बल्कि इतिहास, दर्शन, राजनीति, समाज और साहित्य—सभी क्षेत्रों तक विस्तृत था।

बाद में जब वे ‘खुर्जा संस्कृत विद्यालय’ के छात्र बने, उसी समय उनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ आया।

कन्हैयालाल मिश्र “प्रभाकर” जी का स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश

खुर्जा संस्कृत विद्यालय में अध्ययन के दौरान प्रभाकर जी राष्ट्रनेता मौलाना आसिफ अली के ओजस्वी भाषण से अत्यंत प्रभावित हुए। इस भाषण ने उनके अंतर्मन को झकझोर दिया। परिणामस्वरूप उन्होंने परीक्षा त्याग दी और स्वयं को स्वतंत्रता संग्राम में समर्पित कर दिया।

यह निर्णय उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। इसके बाद उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन देशसेवा, स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रनिर्माण के कार्यों में अर्पित कर दिया। स्वतंत्र भारत का स्वप्न उनके जीवन का मूल उद्देश्य बन गया।

स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनके अनुभव, संघर्ष और बलिदान उनके साहित्य में मार्मिक संस्मरणों के रूप में उभरकर सामने आते हैं। उनके लेखन में केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव बोलता है।

पत्रकारिता : साधना और संघर्ष

पत्रकारिता का उद्देश्य

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के लिए पत्रकारिता आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक सेवा और वैचारिक संघर्ष का माध्यम थी। उन्होंने पत्रकारिता को निहित स्वार्थों, राजनीतिक दबावों और व्यक्तिगत लाभ से मुक्त रखने का प्रयास किया।

उनका मानना था कि पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य समाज में सत्य, न्याय, नैतिकता और मानवीय मूल्यों की स्थापना करना है। यही कारण है कि उनकी पत्रकारिता में साहस, स्पष्टता और नैतिक दृढ़ता दिखाई देती है।

संपादन कार्य

प्रभाकर जी ने सहारनपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘नवजीवन’ का संपादन किया। यह पत्रिका राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सुधार और साहित्यिक उन्नयन की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही।

इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘ज्ञानदेव’ तथा ‘विकास’ जैसी पत्रिकाओं का भी संपादन किया। इन पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने अनेक नवोदित साहित्यकारों को प्रोत्साहित किया और हिंदी साहित्य को नई प्रतिभाओं से समृद्ध किया।

यद्यपि व्यावसायिक दृष्टि से उन्हें पत्रकारिता में पूर्ण सफलता नहीं मिली, फिर भी वैचारिक और नैतिक दृष्टि से उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा।

प्रभाकर जी : आदर्शवादी पत्रकार और निर्भीक लेखक

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ आदर्शों के साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक अत्यंत ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकार भी थे। उन्होंने स्वयं स्पष्ट शब्दों में कहा था—
“अपने साहित्य में मैं सबका मित्र हूँ, पर पत्रकारिता में न किसी का मित्र बना और न शत्रु।”
यह कथन उनके पत्रकारिता-सिद्धांतों का सार प्रस्तुत करता है। उनकी पत्रकारिता न किसी दल विशेष की पक्षधर रही और न ही किसी व्यक्ति विशेष से प्रेरित। उनके लिए सत्य, समाजहित और नैतिकता ही सर्वोच्च मूल्य थे।

प्रभाकर जी की पत्रकारिता का उद्देश्य न समर्थन था और न विरोध, बल्कि राजनीति को दिशा देने वाला विवेकपूर्ण मार्गदर्शन था। वे राजनीति को समाज के प्रति उत्तरदायी बनाने के पक्षधर थे। इसी कारण उनकी लेखनी सत्ता के समीप रहते हुए भी स्वतंत्र और निर्भीक बनी रही।

कांग्रेस के सक्रिय सदस्य रहते हुए उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया, जेल गए और लाठियाँ भी खाईं, किंतु देश स्वतंत्र होने के अगले ही दिन उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया। यह कदम उनके गांधीवादी चिंतन और नैतिक दृढ़ता का सशक्त प्रमाण था। उन्होंने सत्ता से दूरी बनाकर यह सिद्ध किया कि उनके लिए आदर्श और मूल्य किसी भी पद या दल से अधिक महत्त्वपूर्ण थे।

रिपोर्ताज विधा के प्रवर्तक

हिंदी साहित्य में प्रभाकर जी को रिपोर्ताज विधा का जनक माना जाता है। उन्होंने इस विधा को न केवल विकसित किया, बल्कि उसे साहित्यिक ऊँचाई भी प्रदान की। आज के दूरदर्शन और ‘लाइव टेलीकास्ट’ के युग में उनके रिपोर्ताज और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं।

उन्होंने जिन दृश्यों, घटनाओं और ऐतिहासिक क्षणों का शब्दों के माध्यम से चित्रण किया है, वे किसी सजीव प्रसारण से कम नहीं लगते। कांग्रेस के अनेक अधिवेशनों का आँखों देखा विवरण, स्वतंत्रता संग्राम के निर्णायक क्षणों का जीवंत चित्रण और जनआंदोलनों की धड़कन—ये सब उनके रिपोर्ताजों में सुरक्षित हैं। उनके शब्दों में इतिहास बोलता हुआ प्रतीत होता है।

संस्मरण और निबंध : इतिहास और आदर्शों की मशाल

प्रभाकर जी के संस्मरण केवल व्यक्तिगत अनुभवों का लेखा-जोखा नहीं हैं, बल्कि वे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रेरणास्पद व्यक्तित्वों, त्याग और बलिदान की अमूल्य गाथाएँ हैं। उन्होंने इन्हें इतनी सरस और प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत किया कि ये संस्मरण इतिहास के प्रामाणिक दस्तावेज बन गए।

उनके निबंधों में व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और समूची मानवता के लिए आदर्शों के दीपक जलते दिखाई देते हैं। वे पाठक को केवल सोचने के लिए नहीं, बल्कि सही दिशा में चलने के लिए प्रेरित करते हैं। यह आदर्शवादी दृष्टि ही उन्हें अपनी पीढ़ी का प्रिय और आने वाली पीढ़ियों का पूज्य बनाती है।

इस प्रकार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ साहित्य और पत्रकारिता—दोनों क्षेत्रों में नैतिकता, स्वतंत्रता और मानव-मूल्यों के अप्रतिम प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं। उनका लेखन न केवल अपने समय की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करता है, बल्कि भविष्य के लिए भी प्रेरणा का प्रकाश-पुंज है।

कन्हैयालाल मिश्र “प्रभाकर” जी का साहित्यिक व्यक्तित्व

साहित्यिक विधाएँ

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हिंदी साहित्य में विशेष रूप से—

  • रेखाचित्रकार
  • संस्मरणकार
  • ललित निबंधकार

के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

उनकी रचनाओं में आत्मपरकता, संस्मरणात्मकता और मानवीय संवेदना प्रमुख रूप से दिखाई देती है। वे घटनाओं का केवल वर्णन नहीं करते, बल्कि उनमें जीवन-सत्य, भावनात्मक गहराई और मानवीय दृष्टिकोण का समावेश करते हैं।

रचनाओं की विशेषताएँ

  1. मानवतावाद – उनकी रचनाओं में मनुष्य के दुःख-सुख, संघर्ष और आशा का सजीव चित्रण मिलता है।
  2. राष्ट्रवाद – स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना उनकी रचनाओं की आत्मा है।
  3. सरल, भावपूर्ण भाषा – उनकी भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और हृदयग्राही है।
  4. संस्मरणात्मक शैली – व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से व्यापक सामाजिक सत्य की अभिव्यक्ति।

कन्हैयालाल मिश्र “प्रभाकर” जी की प्रमुख रचनाएँ एवं कृतियाँ

कन्हैयालाल मिश्र “प्रभाकर” जी की प्रमुख रचनाएँ एवं कृतियाँ निम्नलिखित हैं –

1. ललित निबंध

  • बाजे पायलिया के घंघरू
  • क्षण बोले कण मुस्काए

इन निबंधों में जीवन की सूक्ष्म अनुभूतियों, सौंदर्य-बोध और भावनात्मक संवेदना का सुंदर संयोजन है।

2. संस्मरण

  • दीप जले शंख बाजे

यह कृति स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अनुभवों और राष्ट्रप्रेम की भावना से ओतप्रोत है।

3. रेखाचित्र

  • माटी हो गई सोना
  • नई पीढ़ी के विचार
  • भूले-बिसरे चेहरे
  • जिंदगी मुस्कराई

इन रेखाचित्रों में समाज के विविध चरित्रों का जीवंत चित्रण मिलता है।

4. लघुकथा

  • धरती के फूल
  • आकाश के तारे

इन लघुकथाओं में जीवन की छोटी-छोटी सच्चाइयों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

5. संपादन

  • नया जीवन
  • विकास
  • ज्ञानदेव

कन्हैयालाल मिश्र “प्रभाकर” जी की रचनाओं एवं कृतियों की सारणी (टेबल)

नीचे कन्हैयालाल मिश्र “प्रभाकर” जी की प्रमुख रचनाओं एवं कृतियों को एक सारणी (टेबल) के रूप में प्रस्तुत किया गया है—

क्रम संख्यासाहित्यिक विधाप्रमुख रचनाएँ / कृतियाँसंक्षिप्त विशेषता
1.ललित निबंधबाजे पायलिया के घंघरूक्षण बोले कण मुस्काएइन निबंधों में जीवन की सूक्ष्म अनुभूतियों, सौंदर्य-बोध तथा भावनात्मक संवेदना का सजीव और कलात्मक संयोजन मिलता है।
2.संस्मरणदीप जले शंख बाजेस्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अनुभवों, राष्ट्रप्रेम और त्याग की भावना का प्रभावशाली चित्रण।
3.रेखाचित्रमाटी हो गई सोनानई पीढ़ी के विचारभूले-बिसरे चेहरेजिंदगी मुस्कराईसमाज के विविध वर्गों और चरित्रों का संवेदनशील, जीवंत तथा यथार्थपरक चित्रण।
4.लघुकथाधरती के फूलआकाश के तारेजीवन की छोटी-छोटी सच्चाइयों और मानवीय संवेदनाओं को संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया गया है।
5.संपादननया जीवनविकासज्ञानदेवसाहित्यिक, सामाजिक और वैचारिक चेतना को दिशा देने वाली महत्वपूर्ण संपादित कृतियाँ।

साहित्यकारों के मार्गदर्शक

प्रभाकर जी नए और उभरते साहित्यकारों के लिए स्नेहमयी मार्गदर्शक थे। वे नवलेखकों पर भावपूर्ण लेख लिखते, उन्हें प्रोत्साहित करते और साहित्यिक मंच प्रदान करते थे। इस प्रकार उन्होंने हिंदी साहित्य को नए आयामों से परिचित कराया।

निधन

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का निधन 9 मई 1995 को हुआ। यद्यपि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, किंतु उनका साहित्य, उनके विचार और उनका आदर्श आज भी हिंदी साहित्य और पत्रकारिता को प्रेरणा प्रदान करते हैं।

कन्हैयालाल मिश्र “प्रभाकर” जी की भाषा-शैली का स्वरूप

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ की भाषा उनकी रचनात्मक व्यक्तित्व की सबसे सशक्त पहचान है। उनकी भाषा में अद्भुत प्रवाह, सहजता और स्वाभाविकता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। वे शब्दों को केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं मानते, बल्कि उन्हें भावों का संवाहक और विचारों का जीवंत माध्यम बना देते हैं।

उनका वाक्य-विन्यास अत्यंत लचीला और विषयानुकूल है। कहीं छोटे, सुसंगठित और सूक्तिमय वाक्य मिलते हैं, तो कहीं भावों की तीव्रता के अनुरूप विस्तृत वाक्य संरचना दिखाई देती है। इसी कारण उनकी भाषा बोझिल न होकर पाठक को अपने साथ बहा ले जाती है।

प्रभाकर जी की भाषा की एक विशेषता यह भी है कि उसमें बोलचाल के स्तर पर अंग्रेज़ी और उर्दू के प्रचलित शब्दों का स्वाभाविक प्रयोग मिलता है। यह प्रयोग भाषा को कृत्रिम न बनाकर अधिक जीवंत और समकालीन बनाता है। शब्दों की चमत्कारपूर्ण योजना, भावानुकूल वाक्य-संरचना और सारगर्भित उक्तियाँ उनकी भाषा को अत्यंत आकर्षक बना देती हैं।

शब्द-चयन एवं अलंकरण

मिश्र जी शब्दों की लाक्षणिक शक्ति के कुशल प्रयोगकर्ता हैं। वे सामान्य और परिचित शब्दों को भी नए अर्थ-संदर्भ, नई भंगिमा और नई संवेदना प्रदान कर देते हैं। यही कारण है कि उनकी भाषा पर उनका पूर्ण अधिकार स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।

मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग उनकी भाषा में अत्यंत सहज और स्वाभाविक रूप में हुआ है। ये प्रयोग भाषा को न केवल सजीव बनाते हैं, बल्कि विचारों को अधिक प्रभावशाली भी बनाते हैं। इसके साथ-साथ अलंकारों का संयमित प्रयोग उनकी भाषा को सौंदर्यपूर्ण बनाता है, परंतु कहीं भी कृत्रिमता नहीं आने देता।

उनके छोटे-छोटे वाक्यों में सूक्ति जैसी संक्षिप्तता और अर्थ की गहनता मिलती है। इन वाक्यों में व्यंग्य, करुणा, चुटीलापन और भावुकता—सभी तत्त्व संतुलित रूप में उपस्थित रहते हैं।

प्रभाकर जी की शैलीगत विशेषताएँ

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ की शैली एकरूप नहीं है, बल्कि विषय और विधा के अनुसार निरंतर रूप बदलती रहती है। उनकी शैली में यही लचीलापन उन्हें अन्य गद्यकारों से अलग पहचान देता है। वे जिस विषय को जिस रूप में अभिव्यक्त करना चाहते हैं, उसी के अनुरूप शैली का चयन करते हैं। उनकी रचनाओं में मुख्यतः तीन शैलियों का प्रभावशाली प्रयोग देखने को मिलता है—

वर्णनात्मक शैली

प्रभाकर जी ने अपने संस्मरणों तथा रिपोर्ताजों में वर्णनात्मक शैली का अत्यंत सफल प्रयोग किया है। इस शैली में उनकी भाषा सरल, स्वाभाविक और प्रवाहपूर्ण है। भावों और घटनाओं की प्रकृति के अनुसार उनकी वाक्य-संरचना में पर्याप्त विविधता दिखाई देती है—कहीं छोटे, सटीक और प्रभावपूर्ण वाक्य हैं, तो कहीं भावों की गहराई को व्यक्त करने के लिए अपेक्षाकृत लंबे वाक्यों का प्रयोग किया गया है।

इस शैली की प्रमुख विशेषता यह है कि वर्णन केवल तथ्यात्मक स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसमें जीवन्तता और अनुभूति का समावेश होता है। प्रभाकर जी स्थान, समय, पात्र और वातावरण का ऐसा सजीव चित्र प्रस्तुत करते हैं कि पाठक के सामने घटनाएँ चलचित्र की भाँति साकार हो उठती हैं और उसे ऐसा प्रतीत होता है मानो वह स्वयं घटनास्थल पर उपस्थित हो।

उदाहरण (शैलीगत स्वरूप का संकेतात्मक उदाहरण)

“चारों ओर उमड़ी भीड़, उठते नारों की गूँज और आँखों में आज़ादी का स्वप्न—उस क्षण पूरा वातावरण जैसे साँस ले रहा था।”

इस प्रकार का वर्णन घटनाओं को केवल बताता नहीं, बल्कि उन्हें अनुभव करा देता है।

भावात्मक शैली

भावात्मक शैली को प्रभाकर जी की प्रमुख और सर्वाधिक प्रभावशाली शैली माना जा सकता है। उनकी अधिकांश रचनाएँ इसी शैली में लिखी गई हैं। इस शैली में भाषा सरस, संवेदनशील और प्रवाहयुक्त है।

भावों की अभिव्यक्ति के लिए वे छोटे-छोटे, लेकिन अर्थपूर्ण वाक्यों का प्रयोग करते हैं। कहीं-कहीं अलंकारिकता का सौम्य पुट भी दिखाई देता है, जो भावों को और अधिक प्रभावी बना देता है। इस शैली में करुणा, मातृत्व, सेवा, राष्ट्रप्रेम और मानवीय संवेदना अत्यंत मार्मिक रूप में व्यक्त होती है।

उदाहरण (प्रभाकर जी की भावात्मक शैली का प्रतिनिधि उद्धरण)

“हाँ, वह माँ ही थी—होम की अध्यक्षा मदर टेरेसा; मातृभूमि जिसकी फ्रांस और कर्मभूमि भारत। उभरती तरुणाई से उम्र के इस ढलाव तक रोगियों की सेवा में लवलीन।”

इस उदाहरण में भावों की तीव्रता, करुणा और मातृत्व की भावना अत्यंत सघन रूप में व्यक्त हुई है।

चित्रात्मक शैली

रेखाचित्रों में प्रभाकर जी की चित्रात्मक शैली अपने चरम रूप में दिखाई देती है। वे शब्दों के माध्यम से व्यक्ति या दृश्य का ऐसा चित्र उकेरते हैं कि पाठक के सामने उस पात्र का संपूर्ण व्यक्तित्व सजीव हो उठता है।

शारीरिक गठन, रंग-रूप, हाव-भाव और आंतरिक व्यक्तित्व—सब कुछ इतनी कुशलता से प्रस्तुत किया जाता है कि रेखाचित्र मात्र शब्दों का समूह न रहकर सजीव अनुभव बन जाता है। इस शैली में उनकी निरीक्षण शक्ति और अभिव्यक्ति क्षमता का अद्भुत संयोजन देखने को मिलता है।

उदाहरण (चित्रात्मक शैली का संकेतात्मक उदाहरण)

“देह उनकी कोई पैंतालीस वसंत देखी थी, वर्ण हिमश्वेत था, किंतु अरुणोदय की हल्की रेखाओं से अनुरंजित; कद लंबा और शरीर सुडौल।”

इस प्रकार का वर्णन पाठक की आँखों के सामने व्यक्ति की पूरी आकृति साकार कर देता है।

कन्हैयालाल मिश्र “प्रभाकर” जी का हिन्दी साहित्य में स्थान एवं महत्व

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हिन्दी गद्य साहित्य, विशेषतः निबंध और रिपोर्ताज विधा के सशक्त स्तंभ माने जाते हैं। उनकी भाषा और शैली की मौलिकता ने उन्हें गद्यकारों की पंक्ति में विशिष्ट स्थान प्रदान किया है।

उनका गद्य सशक्त, विचार मौलिक और विषय-वस्तु की प्रस्तुति अत्यंत प्रभावशाली है। वे हिन्दी रिपोर्ताज विधा के विकासकर्ता माने जाते हैं। साथ ही वे मानवीय मूल्यों के सजग प्रहरी और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत साहित्यकार थे।

वस्तु और शिल्प—दोनों ही दृष्टियों से उनका साहित्यिक कृतित्व अद्वितीय और बेजोड़ है। हिन्दी साहित्य जगत उनकी सेवाओं का ऋणी है और उनका नाम सदैव आदर और श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता रहेगा।

निष्कर्ष

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का जीवन संघर्ष, साधना और समर्पण का प्रतीक है। वे ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने लेखनी को राष्ट्रसेवा का अस्त्र बनाया। पत्रकारिता और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में उनका योगदान अमूल्य है।

स्वतंत्रता, मानवता और नैतिक मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा उन्हें हिंदी साहित्य का एक विशिष्ट स्तंभ बनाती है। उनका जीवन और कृतित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-स्रोत बना रहेगा।


इन्हें भी देखें –

Leave a Comment

Table of Contents

Contents
सर्वनाम (Pronoun) किसे कहते है? परिभाषा, भेद एवं उदाहरण भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग | नाम, स्थान एवं स्तुति मंत्र प्रथम विश्व युद्ध: विनाशकारी महासंग्राम | 1914 – 1918 ई.