रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि बिहारी : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली

हिंदी साहित्य के इतिहास में रीतिकाल एक विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण कालखंड के रूप में प्रतिष्ठित है। इस काल में काव्य का केंद्र मुख्यतः श्रृंगार रस, नायिका-भेद, नख-शिख वर्णन, रस, अलंकार और काव्यांगों के सूक्ष्म प्रयोग पर आधारित रहा। रीतिकालीन कवियों में जिन कवियों ने मुक्तक काव्य को चरम उत्कर्ष तक पहुँचाया, उनमें महाकवि बिहारी का नाम सर्वोपरि है। बिहारी न केवल रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं, बल्कि उन्हें श्रृंगार रस का सर्वश्रेष्ठ कवि भी स्वीकार किया गया है।

बिहारी की एकमात्र कृति ‘बिहारी सतसई’ हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। इसमें संकलित दोहे भाव, भाषा, कल्पना और अभिव्यक्ति—सभी दृष्टियों से अद्वितीय हैं। छोटे-से दोहे में गहन भावों और विस्तृत प्रसंगों को समेट देने की उनकी अद्भुत क्षमता के कारण यह कहा गया है कि “बिहारी ने गागर में सागर भर दिया है।”

Table of Contents

बिहारी सतसई की महत्ता और मूल प्रतिपाद्य

‘बिहारी सतसई’ का मूल प्रतिपाद्य श्रृंगार रस है। इसमें श्रृंगार के संयोग और वियोग, दोनों पक्षों का अत्यंत सजीव, मार्मिक और कलात्मक चित्रण मिलता है। बिहारी ने लगभग 700 से कुछ अधिक दोहों की रचना की, जिनमें भावों का सागर लहराता है। प्रत्येक दोहा स्वतंत्र रूप से एक पूर्ण काव्य-इकाई है, जो मुक्तक काव्य की परंपरा को उच्चतम शिखर तक पहुँचाता है।

बिहारी सतसई के दोहों की विशेषता यह है कि वे देखने में छोटे होते हैं, किंतु उनका प्रभाव अत्यंत गहरा होता है। इसी संदर्भ में बिहारी सतसई की प्रशंसा करते हुए प्रसिद्ध दोहा कहा गया है—

“सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगें घाव करें गम्भीर॥”

यह दोहा स्वयं बिहारी की काव्य-शैली और प्रभाव का सटीक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।

भाषा और शैली की विशेषताएँ

बिहारी की भाषा मुख्यतः ब्रजभाषा है, जो रीतिकालीन काव्य की प्रधान भाषा रही है। उनकी भाषा में—

  • समास शक्ति का अद्भुत प्रयोग
  • संक्षिप्तता में व्यापकता
  • संकेतात्मकता और व्यंजना
  • अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग

स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने दोहे जैसे छोटे छंद में बड़े-बड़े प्रसंगों को इस कुशलता से पिरोया कि प्रत्येक दोहा पाठक के मन में स्थायी प्रभाव छोड़ देता है।

महाकवि बिहारी : संक्षिप्त जीवन-परिचय

बिंदुविवरण
पूरा नामबिहारीलाल
प्रसिद्धिहिंदी साहित्य के रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि
राष्ट्रीयताभारतीय
कालरीतिकाल
जन्म➡️ सन् 1595 ईस्वी (अधिकांश विद्वानों के अनुसार)
➡️ (कुछ ग्रंथों में विक्रम संवत् 1660 / सन् 1603 ई. का उल्लेख मिलता है, किंतु यह मत कम संगत माना जाता है।)
जन्म स्थानग्वालियर (बसुवा गोविन्दपुर नामक ग्राम)
पिता का नामकेशवराय
बचपन8 वर्ष की आयु में पिता के साथ ओरछा आए, बुंदेलखंड में बचपन व्यतीत
गुरुनरहरिदास
युवावस्थामथुरा (ससुराल) में व्यतीत
मृत्युसंवत् 1720 विक्रम संवत् (सन् 1663 ई.)
काव्य विषयश्रृंगार, प्रेम, आध्यात्म
प्रमुख रचनाबिहारी सतसई
साहित्यिक महत्वमुक्तक काव्य के श्रेष्ठ कवि, “गागर में सागर” भरने वाले कवि

संबंधित प्रसिद्ध दोहा

“जन्म ग्वालियर जानिये खंड बुंदेले बाल।
तरुनाई आई सुघर मथुरा बसि ससुराल॥”

महाकवि बिहारी का जीवन-परिचय

महाकवि बिहारी का जन्म अधिकांश विद्वानों के अनुसार सन् 1595 ईस्वी में हुआ माना जाता है। कुछ ग्रंथों में उनका जन्म विक्रम संवत् 1660 (सन् 1603 ई.) भी बताया गया है, किंतु यह मत ऐतिहासिक एवं साहित्यिक दृष्टि से कम संगत माना जाता है। उनका जन्मस्थान ग्वालियर के निकट स्थित बसुवा गोविन्दपुर नामक ग्राम माना जाता है। उनके पिता का नाम केशवराय था। महाकवि बिहारी के प्रारंभिक जीवन के संबंध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है, तथापि विद्वानों का मत है कि उन्होंने संस्कृत तथा काव्यशास्त्र का सम्यक ज्ञान प्राप्त किया था, जिसका स्पष्ट प्रभाव उनकी काव्य-रचना बिहारी सतसई में दृष्टिगोचर होता है।

विवाह और प्रारंभिक जीवन

बिहारी का विवाह मथुरा में हुआ। विवाह के बाद वे कुछ समय तक अपने ससुराल में ही रहे। युवावस्था में ही उनमें काव्य-रचना की विलक्षण प्रतिभा विकसित हो चुकी थी। इसके पश्चात वे कुछ समय के लिए आगरा भी गए।

जयपुर दरबार और बिहारी

बिहारी के जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण मोड़ तब आया जब वे जयपुर पहुँचे और वहाँ के शासक मिर्जा राजा जयसिंह के दरबार से जुड़े। उस समय राजा जयसिंह नवविवाह के कारण अपनी पत्नी के प्रेम-पाश में अत्यधिक आसक्त हो गए थे और राजकाज की उपेक्षा करने लगे थे।

श्रृंगारिक अन्योक्ति का प्रभाव

बिहारी ने स्थिति को समझते हुए एक श्रृंगारिक अन्योक्ति के माध्यम से राजा को सचेत किया। वह प्रसिद्ध दोहा है—

“नहिं परागु नहिं मधुर मधु, नहिं विकासु इहिं काल।
अली कली ही सों बिंध्यौ, आगे कौन हवाल॥”

इस दोहे का आशय यह है कि बिना पराग, बिना मधु और बिना खिले ही यदि भौंरा कली में उलझ जाए, तो आगे उसका क्या होगा। इस प्रतीकात्मक और व्यंजक कथन ने राजा जयसिंह की आँखें खोल दीं।

राजकीय संरक्षण

इस दोहे से प्रभावित होकर राजा जयसिंह ने बिहारी को अपने दरबार में सम्मानजनक स्थान प्रदान किया। कहा जाता है कि राजा बिहारी की प्रतिभा से इतने प्रसन्न हुए कि प्रत्येक दोहे की रचना पर उन्हें एक अशर्फी (स्वर्ण मुद्रा) प्रदान की जाती थी। इस राजकीय संरक्षण में रहते हुए बिहारी ने ‘बिहारी सतसई’ के अधिकांश दोहों की रचना की।

पत्नी की मृत्यु और वैराग्य

बिहारी का जीवन केवल श्रृंगार तक सीमित नहीं रहा। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद उनके जीवन में एक गहरा परिवर्तन आया। वे भक्ति और वैराग्य की ओर उन्मुख हो गए। इसका प्रभाव उनके काव्य में भी दिखाई देता है, जहाँ श्रृंगार के साथ-साथ नीति और भक्ति के दोहे भी मिलते हैं।

निधन

महाकवि बिहारी का निधन संवत् 1720 विक्रम संवत् (सन् 1663 ई.) में हुआ। उन्होंने अपेक्षाकृत अल्प जीवन जिया, किंतु अपनी एकमात्र कृति के माध्यम से हिंदी साहित्य में अमर स्थान प्राप्त कर लिया।

बिहारी की रचनाएँ

कविवर बिहारी की साहित्यिक ख्याति का मुख्य आधार उनकी एकमात्र काव्यकृति—

बिहारी सतसई

  • कुल दोहे : 719
  • काव्य-प्रकार : मुक्तक काव्य
  • प्रमुख रस : श्रृंगार (संयोग एवं वियोग)
  • अन्य रस : भक्ति, नीति

‘बिहारी सतसई’ हिंदी साहित्य की ऐसी अनुपम कृति है, जिसका प्रत्येक दोहा एक रत्न के समान माना जाता है।

संपादन कार्य

‘बिहारी सतसई’ का श्रेष्ठ और प्रामाणिक संपादन बाबू जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ ने किया, जो ‘बिहारी-रत्नाकर’ नाम से प्रसिद्ध है।

1. एकमात्र एवं प्रमुख रचना

रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि बिहारी की एकमात्र और सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना ‘बिहारी सतसई’ है। यही कृति उनकी साहित्यिक पहचान और लोकप्रियता का मुख्य आधार है। ‘बिहारी सतसई’ को रीतिकाल की श्रेष्ठतम काव्य-रचनाओं में गिना जाता है।

2. रचना का स्वरूप

‘बिहारी सतसई’ एक मुक्तक काव्य संग्रह है, जिसमें लगभग 700 से 719 दोहे संगृहीत हैं। दोहों की संख्या विभिन्न संस्करणों में कुछ भिन्न पाई जाती है, किंतु इसकी मूल प्रकृति एक सतसई की ही है।
इस कृति का प्रत्येक दोहा अपने आप में पूर्ण और स्वतंत्र है तथा किसी क्रमबद्ध कथा से बँधा हुआ नहीं है।

3. भाषा

‘बिहारी सतसई’ की भाषा शुद्ध, परिष्कृत और साहित्यिक ब्रजभाषा है। भाषा में मधुरता, संक्षिप्तता और भाव-गंभीरता का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है, जो रीतिकालीन काव्य की विशेषता है।

4. विषय-वस्तु

(क) श्रृंगार रस

‘बिहारी सतसई’ मुख्यतः श्रृंगार रस की कृति है। इसमें श्रृंगार के दोनों पक्ष—

  • संयोग श्रृंगार
  • वियोग श्रृंगार
    का अत्यंत सरस और चित्ताकर्षक चित्रण किया गया है। राधा-कृष्ण की लीलाओं, नायक-नायिका के हाव-भाव तथा प्रेम-भावनाओं का सूक्ष्म वर्णन इसमें मिलता है।

(ख) भक्ति

श्रृंगार के साथ-साथ इसमें कृष्ण भक्ति का भी सुंदर समावेश है। राधा-कृष्ण के प्रेम में भक्ति-भाव अंतर्निहित रूप से विद्यमान है, जिससे यह कृति केवल लौकिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक स्तर पर भी प्रभाव डालती है।

(ग) नीति और लोक-जीवन

बिहारी ने कई दोहों में नीति, व्यवहारिक बुद्धि और लोक-जीवन के अनुभवों को भी व्यक्त किया है। इन दोहों में जीवन की सच्चाइयाँ, सामाजिक अनुभव और नैतिक उपदेश संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली रूप में मिलते हैं।

5. मुक्तक काव्य की विशेषता

‘बिहारी सतसई’ मुक्तक काव्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रत्येक दोहा—

  • अर्थ की दृष्टि से पूर्ण है,
  • स्वतंत्र भाव प्रस्तुत करता है,
  • तथा पाठक पर तत्काल प्रभाव डालता है।

इसी कारण बिहारी को एक सफल मुक्तककार कहा जाता है।

6. अलंकार और व्यंजना

बिहारी ने अपने दोहों में अलंकारों और व्यंजना का अत्यंत सधा हुआ प्रयोग किया है। उनके यहाँ अलंकार कविता के प्रदर्शन का साधन नहीं, बल्कि भाव-प्रकाशन का माध्यम हैं। श्लेष, यमक, उपमा, रूपक आदि अलंकारों के साथ व्यंजना शक्ति उनकी कविता को गहराई प्रदान करती है।

7. प्रकृति और लोक-चित्रण

‘बिहारी सतसई’ में प्रकृति के आलंबन रूप तथा लोक-जीवन के सजीव चित्र भी मिलते हैं। ऋतु-वर्णन, वातावरण और दैनिक जीवन की स्थितियाँ दोहों में संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली रूप में उभर आती हैं।

8. रचना-विन्यास

‘बिहारी सतसई’ के दोहों को रस और भावों के तकनीकी वर्गीकरण के आधार पर व्यवस्थित किया गया है। यह व्यवस्था रीतिकालीन काव्यशास्त्रीय परंपरा के अनुरूप है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि बिहारी की संपूर्ण साहित्यिक साधना का केंद्र ‘बिहारी सतसई’ है। यह कृति अपनी संक्षिप्तता, भाव-गंभीरता, मुक्तक-कला, अलंकार-सौंदर्य और विषय-विविधता के कारण हिंदी साहित्य में अमर मानी जाती है।

इसी कारण यह उक्ति पूर्णतः सार्थक सिद्ध होती है—
“बिहारी ने गागर में सागर भर दिया है।”

श्रृंगार रस का अद्वितीय चित्रण

श्रृंगार रस के ग्रंथों में ‘बिहारी सतसई’ को सर्वोत्कृष्ट माना गया है। बिहारी ने—

  • नायक-नायिका के भाव
  • संयोग की मधुरता
  • वियोग की पीड़ा
  • नारी-सौंदर्य
  • प्रेम की सूक्ष्म अनुभूतियाँ

को अत्यंत कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है।

रीतिसिद्ध कवि के रूप में बिहारी

यद्यपि बिहारी ने कोई स्वतंत्र रीति-ग्रंथ (लक्षण ग्रंथ) नहीं लिखा, फिर भी उन्हें रीतिसिद्ध कवि कहा जाता है। इसका कारण यह है कि—

  • उन्हें काव्यशास्त्र और रीति की पूर्ण जानकारी थी
  • उन्होंने रस, अलंकार, नायिका-भेद आदि काव्यांगों का प्रयोग अत्यंत कुशलता से किया
  • उनके दोहे स्वयं रीति-सिद्ध उदाहरण बन गए

हिंदी साहित्य में बिहारी का स्थान

हिंदी साहित्य में बिहारी को—

  • सर्वश्रेष्ठ मुक्तककार
  • रीतिकाल का मूर्धन्य कवि
  • श्रृंगार रस का अप्रतिम कलाकार

माना जाता है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मत

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में मुक्तक काव्य के गुणों पर विचार करते हुए लिखा—

“इसके लिए कवि को मनोरम वस्तुओं और व्यापारों का एक छोटा-सा स्तवक कल्पित कर उन्हें अत्यन्त संक्षिप्त और सशक्त भाषा में प्रदर्शित करना पड़ता है। अतः जिस कवि में कल्पना की समाहार शक्ति के साथ भाषा की समास शक्ति जितनी ही अधिक होगी, उतना ही वह मुक्तक रचना में सफल होगा।”

यह सभी गुण बिहारी के दोहों में पूर्णतः विद्यमान हैं।

बिहारी की काव्यगत विशेषताएँ

रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि बिहारी हिंदी साहित्य में अपने अद्वितीय काव्य-कौशल, सूक्ष्म भाव-व्यंजना और अलंकार-प्रधान शैली के लिए विशेष स्थान रखते हैं। उनकी कविता में भाव और शिल्प का ऐसा अद्भुत समन्वय दिखाई देता है, जो उन्हें रीतिकाल के अन्य कवियों से विशिष्ट बनाता है। बिहारी की काव्यगत विशेषताएँ विषय-वस्तु, भाषा, शैली, रस, छंद और अलंकार—सभी दृष्टियों से अत्यंत समृद्ध हैं।

1. वर्ण्य विषय (काव्य-विषय)

बिहारी की कविता का प्रमुख विषय श्रृंगार रस है। उन्होंने श्रृंगार के संयोग और वियोग—दोनों पक्षों का प्रभावशाली चित्रण किया है।

(क) संयोग श्रृंगार

संयोग श्रृंगार में नायक-नायिका के हाव-भाव, नेत्र-संकेत, चेष्टाएँ और प्रेम-क्रीड़ा का अत्यंत सूक्ष्म एवं सजीव वर्णन मिलता है—

बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।
सोह करे, भौंहनु हंसे दैन कहे, नटि जाय॥

इस दोहे में प्रेम की चंचलता और कोमल भावों का सुंदर चित्रण हुआ है।

(ख) वियोग श्रृंगार

बिहारी का वियोग-वर्णन तीव्र और अतिशयोक्तिपूर्ण है। इसमें विरह की गहन पीड़ा तो है, किंतु कहीं-कहीं स्वाभाविकता का अभाव भी दिखाई देता है—

इति आवत चली जात उत, चली, छसातक हाथ।
चढ़ी हिंडोरे सी रहे, लगी उसासनु साथ॥

उनके वियोग-वर्णन पर सूफी कवियों की अहंभाव-प्रधान (अहात्मक) पद्धति का प्रभाव भी स्पष्ट है—

औंधाई सीसी सुलखि, बिरह विथा विलसात।
बीचहिं सूखि गुलाब गो, छीटों छुयो न गात॥

2. भक्ति-भावना

बिहारी मूलतः श्रृंगारी कवि हैं, फिर भी उनकी कविता में राधा-कृष्ण के प्रति भक्ति-भावना का सीमित किंतु मधुर स्वरूप मिलता है। ‘बिहारी सतसई’ के आरंभ में मंगला-चरण के रूप में राधा-भक्ति का सुंदर उदाहरण है—

मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाई परे, स्याम हरित दुति होय॥

3. नीति और ज्ञान

बिहारी ने नीति और ज्ञान संबंधी दोहे भी रचे हैं, यद्यपि उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है। धन-संग्रह के विषय में उनकी व्यावहारिक दृष्टि इस दोहे में व्यक्त होती है—

मति न नीति गलीत यह, जो धन धरिये जोर।
खाये खर्चे जो बचे तो जोरिये करोर॥

4. प्रकृति-चित्रण

प्रकृति-चित्रण में बिहारी अत्यंत सिद्धहस्त हैं। उन्होंने षट् ऋतुओं का सजीव और प्रभावशाली चित्रण किया है। ग्रीष्म ऋतु का यह वर्णन विशेष रूप से उल्लेखनीय है—

कहलाने एकत बसत अहि मयूर मृग बाघ।
जगत तपोतवन सो कियो, दारिग दाघ निदाघ॥

सुगंध विक्रेताओं पर किया गया उनका व्यंग्य भी अत्यंत सटीक है—

कर फुलेल को आचमन मीठो कहत सराहि।
रे गंधी मतिअंध तू इत्र दिखावत काहि॥

5. बहुज्ञता

बिहारी बहुश्रुत और बहुज्ञ कवि थे। उन्हें ज्योतिष, वैद्यक, गणित और विज्ञान का अच्छा ज्ञान था, जिसका उन्होंने अपने दोहों में प्रभावशाली उपयोग किया है। गणित संबंधी उदाहरण देखिए—

कहत सवै वेदीं दिये आंगु दस गुनो होतु।
तिय लिलार बेंदी दियैं अगिनतु बढ़त उदोतु॥

6. भाषा

बिहारी की भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा है। इसमें सूरदास की चलती ब्रजभाषा का परिष्कृत रूप दिखाई देता है।
उनकी भाषा की प्रमुख विशेषताएँ हैं—

  • पूर्वी हिंदी, बुंदेलखंडी, उर्दू और फ़ारसी शब्दों का सुंदर समन्वय
  • शब्द-चयन अत्यंत सटीक और भावानुकूल
  • कहीं भी शब्द-भार या कृत्रिमता नहीं
  • मुहावरों का प्रभावशाली प्रयोग—

मूड चढ़ाऐऊ रहै फरयौ पीठि कच-भारु।
रहै गिरैं परि, राखिबौ तऊ हियैं पर हारु॥

7. शैली

विषय के अनुसार बिहारी की शैली के तीन प्रमुख रूप माने जाते हैं—

  1. माधुर्यपूर्ण, व्यंजना-प्रधान शैली – वियोग के दोहों में
  2. प्रसादगुणयुक्त, सरस शैली – भक्ति और नीति के दोहों में
  3. चमत्कारपूर्ण शैली – दर्शन, ज्योतिष और गणित विषयक दोहों में

8. रस

बिहारी के काव्य में शांत, हास्य, करुण आदि रसों के भी उदाहरण मिलते हैं, किंतु उनका प्रधान रस श्रृंगार ही है।

9. छंद

बिहारी ने मुख्यतः दो छंदों का प्रयोग किया है—

  • दोहा (प्रधान)
  • सोरठा

उनके दोहे समास-शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। छोटे छंद में गहन भाव भर देना उनकी अनुपम विशेषता है।

10. अलंकार

अलंकार-प्रयोग में बिहारी अत्यंत निपुण हैं।

  • लगभग प्रत्येक दोहे में कोई न कोई अलंकार
  • कई दोहों में एक साथ अनेक अलंकार
  • प्रिय अलंकार—अतिशयोक्ति, अन्योक्ति, सांगरूपक

अन्योक्ति अलंकार का उदाहरण—

स्वारथ सुकृत न श्रम वृथा देखु विहंग विचारि।
बाज पराये पानि पर तू पच्छीनु न मारि॥

इस प्रकार स्पष्ट है कि बिहारी की कविता श्रृंगार-प्रधान होते हुए भी बहुआयामी है। भाषा, शैली, रस, छंद और अलंकार—सभी दृष्टियों से उनकी कविता रीतिकाल की श्रेष्ठतम उपलब्धि मानी जाती है। यही कारण है कि बिहारी को हिंदी साहित्य में अत्यंत उच्च और स्थायी स्थान प्राप्त है।

महाकवि बिहारी का साहित्यिक परिचय और काव्य-महत्त्व

किसी कवि की साहित्यिक प्रतिष्ठा उसकी रचनाओं की संख्या पर नहीं, बल्कि उनके गुण, प्रभाव और स्थायित्व पर निर्भर करती है। इस दृष्टि से महाकवि बिहारी का स्थान हिंदी साहित्य में अत्यंत ऊँचा है। यद्यपि उन्होंने केवल एक ही ग्रंथ— ‘बिहारी सतसई’—की रचना की, तथापि यही एक कृति उन्हें हिंदी काव्य-जगत में अमर कवि के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए पर्याप्त सिद्ध हुई।

श्रृंगार रस से संबंधित काव्य-ग्रंथों में बिहारी सतसई को जो ख्याति प्राप्त हुई, वैसी लोकप्रियता किसी अन्य रचना को नहीं मिल सकी। इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि इसके दोहे न केवल भाव की दृष्टि से गहन हैं, बल्कि रसिक पाठकों के हृदय को भी गहराई से प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि इस कृति पर समय-समय पर अनेक विद्वानों द्वारा टीकाएँ लिखी गईं और अनेक कवियों ने इसके दोहों को आधार बनाकर कवित्त, छप्पय, सवैया जैसे विभिन्न छंदों में रचनाएँ कीं।

आज भी ‘बिहारी सतसई’ रसिकजनों के लिए एक काव्य-आभूषण के समान मानी जाती है, जिसे पढ़कर पाठक सौंदर्य, प्रेम और कला का रसास्वादन करता है।

‘गागर में सागर’ की उक्ति और बिहारी की काव्य-प्रतिभा

बिहारी की कविता की सबसे बड़ी विशेषता उनकी कल्पना की समाहार शक्ति और भाषा की समास शक्ति है। उन्होंने अत्यंत छोटे छंद—दोहा—में इतने व्यापक और गहन भाव भर दिए हैं कि उनके दोहे देखने में भले ही छोटे प्रतीत हों, किंतु अर्थ और प्रभाव की दृष्टि से अत्यंत गहरे होते हैं। इसी विशेषता के कारण उनके संबंध में प्रसिद्ध उक्ति कही गई—

सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गंभीर॥

यह दोहा स्वयं बिहारी की काव्य-शक्ति और उनकी रचना की प्रभावशीलता को स्पष्ट कर देता है।

महाकवि के रूप में बिहारी का स्थान

यह उल्लेखनीय तथ्य है कि बिहारी ने किसी महाकाव्य की रचना नहीं की, फिर भी वे हिंदी साहित्य में महाकवियों की श्रेणी में स्थान पाते हैं। इसका कारण उनकी कविता का असाधारण गुण, भाव-गंभीरता और कलात्मक उत्कृष्टता है। उनके काव्य-वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए स्वर्गीय राधाकृष्णदास जी की यह प्रसिद्ध उक्ति अत्यंत सार्थक प्रतीत होती है—

यदि सूरदास सूर्य हैं, तुलसीदास चंद्रमा हैं और केशवदास नक्षत्रों के समान हैं, तो बिहारी उस अमृत-वर्षक मेघ के तुल्य हैं, जिसके प्रकट होते ही अन्य सभी प्रकाश ढक जाते हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि बिहारी की साहित्यिक महत्ता उनकी रचनाओं की संख्या में नहीं, बल्कि उनकी अद्वितीय काव्य-प्रतिभा में निहित है। ‘बिहारी सतसई’ ने उन्हें हिंदी साहित्य में जो स्थान दिलाया है, वह स्थायी और अद्वितीय है। यही कारण है कि बिहारी आज भी पाठकों और आलोचकों—दोनों के लिए समान रूप से आदरणीय बने हुए हैं।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि महाकवि बिहारी हिंदी साहित्य के ऐसे कवि हैं, जिन्होंने एक ही ग्रंथ के माध्यम से साहित्य में अमिट छाप छोड़ दी। ‘बिहारी सतसई’ न केवल रीतिकाल की, बल्कि समस्त हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ मुक्तक कृति है। भावों की गहराई, भाषा की सघनता, कल्पना की समाहार शक्ति और अभिव्यक्ति की तीव्रता—इन सभी दृष्टियों से बिहारी अद्वितीय हैं।

निस्संदेह, बिहारी रीतिकाल के प्रतिनिधि और मूर्धन्य कवि हैं तथा उनका काव्य हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है।


  • बिहारी सतसई की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए उसकी लोकप्रियता के कारण स्पष्ट कीजिए।
  • बिहारी के दोहों में भाव-गाम्भीर्य और भाषा-सौष्ठव का विवेचन उदाहरण सहित कीजिए।
  • बिहारी को रीतिकाल का प्रतिनिधि मुक्तककार क्यों माना जाता है? तर्क एवं उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
  • बिहारी की लोकप्रियता के कारण बताइए।
  • “बिहारी ने गागर में सागर भर दिया है।” उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
  • “बिहारी एक सफल मुक्तककार हैं” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
  • मुक्तक रचना के रूप में बिहारी सतसई की विशेषताओं पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।

बिहारी सतसई : लोकप्रियता, मुक्तक-कला और ‘गागर में सागर’

रीतिकालीन हिंदी काव्यधारा में बिहारी का स्थान अत्यंत विशिष्ट और गौरवपूर्ण है। वे रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं और उनकी ख्याति का आधार उनका एकमात्र ग्रंथ ‘बिहारी सतसई’ है। इस ग्रंथ में लगभग सात सौ से कुछ अधिक दोहे संकलित हैं, किंतु आश्चर्य की बात यह है कि मात्र दोहे जैसे छोटे छंद में बिहारी ने मानव-जीवन, प्रेम, सौंदर्य, प्रकृति, नीति, व्यंग्य और दर्शन के इतने व्यापक भावों को समेट दिया है कि आलोचकों ने उनके विषय में प्रसिद्ध उक्ति कही— “बिहारी ने गागर में सागर भर दिया है।”

बिहारी सतसई की लोकप्रियता केवल उसकी संक्षिप्तता के कारण नहीं, बल्कि उसमें निहित गहन भावार्थ, कलात्मक सौंदर्य, चमत्कार, व्यंजना और मुक्तक-कला की पूर्णता के कारण है। इस ग्रंथ के प्रत्येक दोहे को स्वतंत्र रूप से पढ़ा और समझा जा सकता है। यही कारण है कि बिहारी को एक सफल मुक्तककार माना जाता है और उनकी सतसई को मुक्तक काव्य का उत्कृष्ट उदाहरण स्वीकार किया गया है।

सतसइया के दोहरे ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगें घाव करै गम्भीर।।

यह दोहा स्वयं बिहारी सतसई की प्रकृति को स्पष्ट कर देता है। छोटे-से दोहे में छिपा हुआ गहन भाव पाठक के मन पर गहरा प्रभाव डालता है। प्रस्तुत लेख में बिहारी सतसई की इन्हीं विशेषताओं के आधार पर बिहारी की लोकप्रियता, उनकी मुक्तक-कला तथा ‘गागर में सागर’ वाली उक्ति की सार्थकता को क्रमबद्ध और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है।

बिहारी : रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि

रीतिकालीन काव्य परंपरा में काव्य-रचना का प्रमुख उद्देश्य रस, अलंकार और नायिका-भेद आदि का कलात्मक प्रदर्शन था। बिहारी ने इस परंपरा को अपनाते हुए भी उसे केवल शास्त्रीय नियमों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने जीवन के विविध अनुभवों को अपनी कविता का विषय बनाया। प्रेम, श्रृंगार, वियोग, नीति, व्यंग्य, प्रकृति और समाज—सभी उनके दोहों में स्थान पाते हैं।

रीतिकाल के अन्य कवियों ने जहाँ विस्तृत काव्य-रचनाएँ कीं, वहीं बिहारी ने मात्र दोहे जैसे छोटे छंद को माध्यम बनाकर अपनी प्रतिभा का अद्भुत परिचय दिया। यही कारण है कि वे रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि कहलाते हैं।

‘बिहारी सतसई’ : एकमात्र किंतु अमर कृति

बिहारी की साहित्यिक प्रसिद्धि का आधार उनका एकमात्र ग्रंथ ‘बिहारी सतसई’ है। इस ग्रंथ में संगृहीत दोहे विषय-विविधता, भाव-गंभीरता और शिल्प-सौंदर्य की दृष्टि से अद्वितीय हैं। सतसई शब्द का अर्थ ही सात सौ पदों का संग्रह होता है, किंतु बिहारी की सतसई मात्र संख्या का नहीं, बल्कि गुणवत्ता का प्रतीक है।

प्रत्येक दोहा अपने आप में पूर्ण है और किसी अन्य दोहे पर आश्रित नहीं। इस दृष्टि से बिहारी सतसई मुक्तक काव्य का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

मुक्तक काव्य और बिहारी की सफलता

मुक्तक काव्य वह होता है जो अर्थ की दृष्टि से अपने में पूर्ण हो तथा जिसमें पूर्वापर संबंध का अभाव हो। बिहारी सतसई का प्रत्येक दोहा स्वतंत्र इकाई है। पाठक किसी भी दोहे को अलग से पढ़ सकता है और उसका पूर्ण रसास्वादन कर सकता है।

बिहारी ने मुक्तक रचना की सभी शर्तों को पूर्ण किया है—

  1. अर्थ की पूर्णता
  2. भाव की तीव्रता
  3. भाषा की संक्षिप्तता
  4. व्यंजना और संकेतात्मकता

इन्हीं गुणों के कारण बिहारी को एक सफल मुक्तककार कहा गया है।

भाषा की समास-शक्ति

बिहारी की भाषा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समास-शक्ति है। कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक भाव प्रकट करने की अद्भुत क्षमता उनकी भाषा में दिखाई देती है। वे बड़े से बड़े प्रसंग को भी दो पंक्तियों में समेट देते हैं।

उदाहरण के लिए, नायक-नायिका के नेत्र-संकेतों द्वारा होने वाले संवाद का चित्रण देखिए—

कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात।
भरे भौन में करत हैं नैननु ही सौं बात।।

इस दोहे में आँखों के भावों के माध्यम से संपूर्ण प्रेम-संवाद साकार हो उठता है।

कल्पना की समाहार-शक्ति

बिहारी की काव्य-प्रतिभा का मूल आधार उनकी विलक्षण कल्पना-शक्ति है। उनकी कल्पना दूर की सूझ रखती है और वह असंबद्ध प्रतीत होने वाली वस्तुओं में भी अद्भुत साम्य खोज लेती है।

युवावस्था और नदी के प्रवाह में समानता स्थापित करते हुए बिहारी कहते हैं—

इक भीजै चहलैं परै बूड़े बहैं हजार।
किते न औगुन जग करै वै नै चढ़ती बार।।

इस दोहे में युवावस्था की उछल-कूद और नदी की चंचलता को एक साथ प्रस्तुत कर दिया गया है।

चमत्कार-प्रदर्शन

रीतिकालीन काव्य की एक प्रमुख प्रवृत्ति चमत्कार-प्रदर्शन थी। बिहारी ने भी अपने काव्य में श्लेष, यमक और अन्य अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया है।

यमक अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण देखिए—

कनक कनक तै सौ गुनी मादकता अधिकाय।
या खाए बौराय नर वा पाए बौराय।।

यहाँ ‘कनक’ शब्द का दो बार प्रयोग अलग-अलग अर्थों में हुआ है—एक बार सोने के अर्थ में और दूसरी बार धतूरे के अर्थ में।

बहुज्ञता का परिचय

बिहारी केवल प्रेम और सौंदर्य के कवि नहीं थे, बल्कि वे बहुज्ञ थे। उन्हें ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद, इतिहास और पुराणों का भी अच्छा ज्ञान था। यह ज्ञान उनके दोहों में सहज रूप से प्रकट होता है।

ज्योतिष संबंधी ज्ञान का उदाहरण—

मंगल बिन्दु सुरंग, मुख ससि केसर आड़ गुरु।
इक नारी लहि संग, रसमय किय लोचन जगत।।

श्रृंगार रस की प्रधानता

बिहारी सतसई में श्रृंगार रस का विशेष महत्व है। संयोग और वियोग—दोनों ही पक्षों का अत्यंत मार्मिक चित्रण इसमें मिलता है।

संयोग श्रृंगार का उदाहरण—

तरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाइ।
सौह करै भौंहनु हँसे देन कहै नटि जाइ।।

वियोग श्रृंगार में विरह की तीव्रता का चित्रण—

औंधाई सीसी सुलखि विरह बरनि विललात।
बिच ही सूखि गुलाबु गौ छींटौं छुई न गाता।।

प्रकृति चित्रण

बिहारी ने प्रकृति को आलंबन रूप में प्रस्तुत किया है। उनके प्रकृति-चित्रण में भी जीवन का गहरा संबंध दिखाई देता है।

ग्रीष्म ऋतु का सजीव चित्रण—

कहलाने एकत बसत अहि, मयूर, मृग बाघ।
जगत तपोवन सो कियो दीरघ दाघ निदाघ।।

सरस प्रसंगों का चित्रण

जीवन के छोटे-छोटे, किंतु अत्यंत सरस प्रसंगों का चित्रण बिहारी की कविता को जनप्रिय बनाता है।

उदाहरण

नासा मोरि नचाय द्रग करी कका की सौंह।
कांटे सी कसकति हिए बहै कटीली भौंह।।

व्यंजना और अन्योक्ति का सौंदर्य

बिहारी के अनेक दोहों में व्यंजना और अन्योक्ति का अत्यंत प्रभावशाली प्रयोग हुआ है। साधारण अर्थ के पीछे छिपा हुआ गूढ़ संकेत पाठक को सोचने पर विवश कर देता है।

नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास इहि काल।
अली कली ही सौं विंध्यौ आगे कौन हवाल।।

बिहारी की लोकप्रियता के कारण

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि बिहारी की लोकप्रियता के अनेक कारण हैं—

  1. संक्षिप्तता में व्यापक भाव
  2. मुक्तक-कला में पूर्णता
  3. भाषा की समास-शक्ति
  4. कल्पना और चमत्कार
  5. श्रृंगार रस की सरस अभिव्यक्ति
  6. व्यंजना और संकेतात्मकता

निष्कर्ष

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि बिहारी सतसई हिंदी साहित्य का एक बेजोड़ ग्रंथ है। भाव-पक्ष और कला-पक्ष—दोनों ही दृष्टियों से यह कृति अद्वितीय है। बिहारी ने दोहे जैसे छोटे छंद में जीवन और काव्य का विशाल संसार समेट दिया है। इसी कारण यह कथन पूर्णतः सार्थक सिद्ध होता है कि— “बिहारी ने गागर में सागर भर दिया है।”

अपनी मुक्तक-कला, चमत्कार, सरसता और गहन भावार्थ के कारण बिहारी आज भी हिंदी साहित्य में अत्यंत लोकप्रिय और आदरणीय कवि बने हुए हैं।


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