हिंद-आर्यभाषा परिवार की उत्तर-भारतीय पहाड़ी शाखा में कुमाउनी भाषा एक विशिष्ट, प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भाषा मानी जाती है। यह भाषा उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में बोली जाती है, जिसे ऐतिहासिक रूप से कुर्मांचल या कुर्माचल प्रदेश कहा जाता था। भाषा-वैज्ञानिकों के अनुसार कुमाउनी का विकास अनेक भाषाओं, जनजातियों और क्षेत्रों के संपर्क एवं ऐतिहासिक परिवर्तनों से प्रभावित होकर हुआ है। इसलिए इसे दरद, तिब्बती, राजस्थानी, खड़ी बोली, किरात तथा भोट भाषाओं का मिश्रित स्वरमान माना जाता है।
कुमाउनी भाषा मात्र संचार का माध्यम नहीं बल्कि लोकसाहित्य, संस्कृति, रीति-रिवाज, पौराणिक आख्यान और पीढ़ियों की जीवनशैली की पहचान भी है। इस भाषा में लोकगीत, जागर, हुड़किया बौल, लोकनाट्य, देवी-देवता कथाएँ और ऐतिहासिक लोक आख्यान आज भी जीवित रूप में प्रचलित हैं।
कुमाउनी का ऐतिहासिक विकास
कुमाउनी भाषा का गठन एक लंबी भाषिक और सांस्कृतिक यात्रा का हिस्सा है। इसके विकास को मुख्यतः तीन चरणों में देखा जा सकता है—
1. प्राकृत-अपभ्रंश काल
इस काल में खस प्राकृत और स्थानीय पहाड़ी भाषाएँ एक-दूसरे के संपर्क में आईं। दरद, किरात तथा अन्य जनजातियों की बोली का प्रभाव भी इसी काल में देखने को मिलता है। भाषा-वैज्ञानिकों के अनुसार कुमाउनी इसी काल में प्राकृत से अपभ्रंश और फिर बोलचाल की भाषा में विकसित हुई।
2. मध्यकाल
कत्यूरी और चंद राजवंशों के शासन में कुमाऊँ क्षेत्र राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक रूप से विकसित हुआ। इस काल में कुमाउनी भाषा को स्थिरता मिली। लोकभाषा के रूप में यह प्रशासन, साहित्य और धार्मिक कार्यों में प्रयुक्त होने लगी। कुछ शिलालेख, ताम्रपत्र तथा लोकगीत इसी काल की भाषा का प्रारंभिक स्वरूप प्रस्तुत करते हैं।
3. आधुनिक काल
भारत में ब्रजभाषा, संस्कृत और बाद में खड़ी बोली हिंदी के प्रभाव के साथ कुमाउनी भाषा में आधुनिक परिवर्तन हुए। शिक्षा, संचार माध्यमों और साहित्यिक गतिविधियों के बढ़ने से कुमाउनी भाषा अधिक मानकीकृत रूप में सामने आई।
भाषायी संरचना एवं विशेषताएँ
कुमाउनी ध्वन्यात्मक, व्याकरणिक और शब्द-संपदा की दृष्टि से अत्यंत विशिष्ट है। इसमें—
- स्वर एवं व्यंजनों के विशिष्ट मिश्रण
- ध्वन्यात्मक लयात्मकता
- स्वराघात आधारित उच्चारण
- क्रियापदों का सरल और बोलचाल-प्रधान उपयोग
दिखाई देता है।
उदाहरण:
| हिंदी | कुमाउनी |
|---|---|
| तुम कहाँ जा रहे हो? | तैँ क्यां जांलु? |
| मैं घर जा रहा हूँ। | मैं घर जांलु। |
| वह आएगा। | वो आँल। |
कुमाउनी ध्वनि-विन्यास में लयात्मकता और मधुरता इसकी प्रमुख पहचान है।
कुमाउनी भाषा की उपबोलियाँ
कुमाउनी भाषा अत्यधिक विविधतापूर्ण है, और भौगोलिक स्थिति, पर्वतीय दूरी, संस्कृति और जनजातीय संपर्कों के आधार पर इसमें अनेक उपबोलियाँ विकसित हुईं। भाषा-वैज्ञानिकों ने अध्ययन की सुविधा हेतु इन्हें चार मुख्य भौगोलिक वर्गों में विभाजित किया है।
1. पिथौरागढ़ क्षेत्र – उत्तर-पूर्वी कुमाउनी
नेपाल और तिब्बत सीमा के समीप स्थित होने के कारण इस क्षेत्र की कुमाउनी में तिब्बती और नेपाली प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
यहाँ की प्रमुख बोलियाँ—
- जोहारी
- अस्कोटी
इन बोलियों में तिब्बती ध्वनियों, शब्दों और ध्वनि-संरचना का मिश्रण पाया जाता है।
2. अल्मोड़ा एवं उत्तरी नैनीताल – मध्य कुमाउनी
इसे कुमाउनी भाषा का मानक स्वरूप माना जाता है। प्रशासन, साहित्य, गीतों और शिक्षण माध्यम में इसका उपयोग सर्वाधिक मिलता है।
3. पश्चिमी अल्मोड़ा एवं नैनीताल – पश्चिमी कुमाउनी
इस क्षेत्र की कुमाउनी पर राजस्थानी भाषाओं तथा पहाड़ी हिंदी का विशेष प्रभाव देखा जाता है। यहाँ शब्द-संपदा में अनेक राजस्थानी मूल के शब्द शामिल हैं।
4. दक्षिण-पूर्वी नैनीताल – दक्षिण-पूर्वी कुमाउनी
यह खड़ी बोली हिंदी और कुमाउनी के मिश्रित रूप के रूप में विकसित हुई। तराई क्षेत्र की नजदीकी के कारण यहाँ भाषा सरल और खुली ध्वनि-विन्यास वाली दिखाई देती है।
कुमाउनी की प्रमुख बोलियाँ
कुल मिलाकर कुमाउनी भाषा में लगभग 20 प्रमुख उपबोलियाँ पहचानी गई हैं। इनमें ध्वन्यात्मकता, व्याकरण, शब्दावली और उच्चारण में हल्का अंतर मिलता है। ये बोलियाँ हैं—
- जोहारी
- अस्कोटी
- सिराली
- खसपरजिया
- फल्दकोटि
- पछाइ
- सोरयाली
- चुगरख्यैली
- मझ कुमारिया
- दानपुरिया
- कमैया
- गंगोला
- रौचभैसि
इनमें से सोरयाली, कमैया और गंगोला बोलियाँ कुमाउनी लोकगीतों और पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के लिए अत्यंत प्रसिद्ध हैं।
कुमाउनी लोकसाहित्य और संस्कृति
कुमाउनी भाषा केवल बोली नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्कृति है। इसके लोकसाहित्य में निम्न रूप विशेष स्थान रखते हैं—
1. लोकगीत
- छोलिया नृत्य गीत
- बिरहा गीत
- सोहर (जन्म गीत)
- प्यूँली गीत
2. जागर
देवी-देवताओं, स्थानीय षष्टियों और पूर्वजों की पूजा में गाए जाने वाले पारंपरिक मंत्र-गीत।
3. लोकनाट्य
- हिरण्या
- भकुना
- रामलीला (कुमाउनी रूप)
4. आख्यान
यहाँ के लोक आख्यान कठोर भौगोलिक परिस्थितियों, वीरता, प्रेम और आस्था के रंगों से भरे हैं।
आधुनिक संदर्भ में कुमाउनी भाषा
कुमाउनी भाषा आज के डिजिटल युग में नए स्वरूप में उभर रही है। रेडियो, टेलीविजन, सोशल मीडिया, स्वतंत्र साहित्यिक मंच, लोकगायक और ऑनलाइन प्रकाशन इसके संरक्षण में भूमिका निभा रहे हैं। आधुनिक साहित्य, शोध कार्य, वेबसाइट्स और युवाओं की भागीदारी भाषा संरक्षण के नए संकेतक हैं।
कुमाउनी भाषा की चुनौतियाँ
यद्यपि कुमाउनी एक समृद्ध भाषिक पहचान रखती है, फिर भी यह कुछ चुनौतियों का सामना कर रही है—
- शिक्षा में स्थान का अभाव
- हिंदी और अंग्रेज़ी के बढ़ते प्रभाव से भाषा उपयोग में कमी
- मानकीकरण और व्याकरणिक संहिताकरण की कमी
- सरकारी संरक्षण का सीमित दायरा
संरक्षण प्रयास और भविष्य
कुमाउनी भाषा को आज पुनर्जीवन और मान्यता की आवश्यकता है। इसके लिए कुछ प्रयास किए जा रहे हैं—
- भाषिक शोध
- साहित्य प्रकाशन
- संगीत और सांस्कृतिक महोत्सव
- स्कूल स्तर पर पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रयास
- भाषायी आंदोलन और जनजागरण
यदि समाज, संस्थान और सरकार मिलकर भाषा को संवर्धित करें, तो कुमाउनी भविष्य में भी अपनी पहचान और गौरव बनाए रख सकती है।
निष्कर्ष
कुमाउनी भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि कुमाऊँ क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहर, भावनात्मक पहचान और सांस्कृतिक आत्मा है। विविध उपबोलियों, समृद्ध इतिहास, लोककथाओं और विशिष्ट व्याकरणिक संरचना वाली यह भाषा भारतीय भाषाई परंपरा का एक अनमोल हिस्सा है।
लोकवाक्य है—
“जै भाषा, तै संस्कृति, जै संस्कृति तै पहचान।”
कुमाउनी इसी पहचान की जीवित विरासत है।
इन्हें भी देखें –
- पहाड़ी हिन्दी : उत्पत्ति, विकास, बोलियाँ और भाषाई विशेषताएँ
- गढ़वाली भाषा : उत्पत्ति, विकास, उपबोलियाँ और सांस्कृतिक धरोहर
- मालवी भाषा : उद्भव, स्वरूप, विशेषताएँ और साहित्यिक परंपरा
- वागड़ी भाषा : इतिहास, स्वरूप, विशेषताएँ और सांस्कृतिक महत्ता
- मेवाती भाषा : इतिहास, बोली क्षेत्र, भाषाई संरचना, साहित्य और आधुनिक स्वरूप
- हाड़ौती भाषा: राजस्थान की एक समृद्ध उपभाषा का भाषिक और सांस्कृतिक अध्ययन
- कौरवी बोली और नगरी (नागरी) बोली : उद्भव, क्षेत्र, विशेषताएँ और आधुनिक हिन्दी पर प्रभाव
- ब्रजभाषा : उद्भव, विकास, बोली क्षेत्र, कवि, साहित्य-परंपरा एवं भाषिक विशेषताएँ
- बुंदेली – बुंदेली बोली – बुंदेलखंडी भाषा – पश्चिमी हिन्दी : उत्पत्ति, क्षेत्र, विशेषताएँ और भाषिक वैभव