भक्तिकालीन हिंदी साहित्य में गोस्वामी तुलसीदास का स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण और अद्वितीय है। वे सगुण भक्तिधारा की रामभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ और प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। जिस प्रकार वाल्मीकि संस्कृत में रामकथा के प्रथम महाकवि हैं, उसी प्रकार हिंदी में तुलसीदास रामकथा के महाकवि हैं। उनका महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ न केवल हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है, बल्कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता, धर्म, दर्शन और नैतिक जीवन-मूल्यों का विश्वकोश भी है।
तुलसीदास ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्श चरित्र के माध्यम से मानव समाज को धर्म, करुणा, प्रेम, त्याग, मर्यादा, कर्तव्य और लोकमंगल की शिक्षा दी। उनके काव्य में भक्ति, ज्ञान और कर्म की त्रिवेणी समान रूप से प्रवाहित होती है। यही कारण है कि तुलसीदास केवल एक भक्त या कवि ही नहीं, बल्कि समाज-सुधारक, नीति-प्रचारक और लोक-शिक्षक के रूप में भी प्रतिष्ठित हैं।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे महान आलोचक ने तुलसीदास को हिंदी साहित्य का मापदंड कवि माना है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि गोस्वामी तुलसीदास के काव्य में पहली बार हिंदी कविता की सम्पूर्ण शक्ति का साक्षात्कार होता है। वस्तुतः हिंदी साहित्य का कोई भी इतिहास तुलसीदास के बिना पूर्ण नहीं माना जा सकता।
भक्तिकाल और तुलसीदास का काव्य-संस्कार
भक्तिकाल हिंदी साहित्य का वह युग है जिसमें भक्ति को साधना, सामाजिक चेतना और काव्य-अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया गया। इस काल में निर्गुण और सगुण—दो प्रमुख भक्तिधाराएँ प्रवाहित हुईं। निर्गुण धारा में कबीर, रैदास आदि आते हैं, जबकि सगुण धारा में कृष्णभक्ति और रामभक्ति की परंपराएँ विकसित हुईं।
रामभक्ति शाखा के कवियों में गोस्वामी तुलसीदास का स्थान सर्वोपरि है। उन्होंने राम को केवल अवतारी पुरुष नहीं, बल्कि आदर्श मानव के रूप में प्रस्तुत किया। तुलसी के राम लोकनायक, लोकमर्यादा के रक्षक और संपूर्ण समाज के कल्याणकर्ता हैं। यही कारण है कि उनकी रामभक्ति संकीर्ण न होकर लोकव्यापक और समन्वयात्मक है।
गोस्वामी तुलसीदास : संक्षिप्त जीवन-परिचय (तालिका)
| शीर्षक | विवरण |
|---|---|
| पूरा नाम | रामबोला दुबे |
| अन्य नाम / उपाधियाँ | गोस्वामी तुलसीदास, अभिनव वाल्मीकि, रसिकचूड़ामणि |
| जन्म तिथि | 1532 ई. (आधुनिक विद्वानों द्वारा स्वीकृत) (लोकपरंपरा अनुसार : 11 अगस्त 1497 ई.) |
| जन्म संवत् | विक्रम संवत् 1589 (प्रचलित दोहे के अनुसार : विक्रम संवत् 1554) |
| तिथि (पंचांग अनुसार) | श्रावण शुक्ल सप्तमी, शुक्रवार (संवत् 1554 के अनुसार) |
| जन्म स्थान | राजापुर (जिला चित्रकूट) अथवा सोरों, उत्तर प्रदेश, भारत |
| पिता का नाम | आत्माराम दुबे |
| माता का नाम | हुलसी दुबे |
| गुरु / शिक्षक | संत नरहरिदास |
| धर्म | हिन्दू |
| राष्ट्रीयता | भारतीय |
| संतान | तारक |
| मुख्य साहित्यिक कृतियाँ | रामचरितमानस, विनयपत्रिका, दोहावली, कवितावली, हनुमान चालीसा, वैराग्य संदीपनी, बरवै रामायण, गीतावली, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, हनुमान बाहुक, तुलसी सतसई, भूशुंडी रामायण, रामलला नहूछू |
| प्रसिद्ध कथन | “सीयराममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥” (रामचरितमानस 1.8.2) |
| मृत्यु तिथि | 30 अगस्त 1623 ई. (कुछ स्रोतों में 30 जुलाई 1623) |
| मृत्यु संवत् | विक्रम संवत् 1680 |
| मृत्यु तिथि (पंचांग अनुसार) | श्रावण शुक्ल सप्तमी, गुरुवार (संवत् 1680 के अनुसार) |
| मृत्यु स्थान | वाराणसी, अस्सी घाट, उत्तर प्रदेश |
तुलसीदास का जीवन परिचय
गोस्वामी तुलसीदास (1532–1623) सोलहवीं शताब्दी के भक्ति आंदोलन के सर्वाधिक प्रभावशाली रामभक्त कवि, संत एवं समाज सुधारक थे। वे भक्तिकाल की रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। अवधी भाषा में रचित उनका महाकाव्य “श्रीरामचरितमानस” न केवल हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है, बल्कि उसने उत्तर भारत के जनमानस में श्रीराम की भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया। तुलसीदास ने संस्कृत की कठिन दार्शनिक परंपरा को लोकभाषा में रूपांतरित कर भक्ति को सर्वसुलभ बनाया।
जीवन और प्रारंभिक अवस्था
लोकश्रुतियों के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास का जन्म श्रावण शुक्ल सप्तमी को आत्माराम दुबे और हुलसी देवी के घर हुआ। कहा जाता है कि जन्म के समय बालक ने रोने के स्थान पर “राम” नाम का उच्चारण किया, जिसके कारण उनका प्रारंभिक नाम “रामबोला” पड़ा।
बाल्यावस्था में ही माता-पिता के निधन के कारण उनका जीवन कष्टपूर्ण रहा। इसके पश्चात् उनका पालन-पोषण संत नरहरिदास ने किया। नरहरिदास जी ने ही तुलसीदास को राम-मंत्र की दीक्षा दी और अयोध्या में उन्हें धर्म, दर्शन एवं शास्त्रों की शिक्षा प्रदान की। यही संस्कार आगे चलकर उनकी रामभक्ति और काव्य-साधना का आधार बने।
जन्म-संबंधी विवाद
गोस्वामी तुलसीदास के जन्मकाल और जन्मस्थान को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं। उनके जीवन-वृत्त के संबंध में कोई एक प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ उपलब्ध नहीं है। उनके जीवन-परिचय के लिए मुख्यतः महात्मा रघुवरदास कृत ‘तुलसी चरित’, शिवसिंह सरोज का ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ तथा रामभक्त रामगुलाम द्विवेदी की मान्यताओं को आधार माना जाता है।
तुलसीदास के जन्म-वर्ष के संबंध में एक प्रसिद्ध दोहा प्रचलित है—
“पन्द्रह सौ चौवन बिसे, कालिन्दी के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी धर्यो शरीर॥”
इस दोहे के अनुसार तुलसीदास का जन्म विक्रम संवत् 1554, श्रावण शुक्ल सप्तमी को, कालिन्दी (यमुना) के तट पर हुआ माना जाता है। विक्रम संवत् 1554 का ईस्वी रूपांतरण 11 अगस्त 1497 ई. होता है।
किन्तु यदि तुलसीदास का निधन लगभग 1623 ई. (संवत् 1680 के आसपास) माना जाए, तो इस जन्म-वर्ष के आधार पर उनकी आयु लगभग 126 वर्ष बैठती है, जो ऐतिहासिक दृष्टि से अतार्किक और असंगत प्रतीत होती है।
इसी कारण अधिकांश आधुनिक विद्वान और इतिहासकार तुलसीदास का जन्म विक्रम संवत् 1589 (1532 ई.) स्वीकार करते हैं। यह मत उनकी जीवन-घटनाओं, साहित्यिक काल और ऐतिहासिक परिस्थितियों से अधिक संगत एवं विश्वसनीय माना जाता है।
यद्यपि लोकप्रचलित दोहा तुलसीदास का जन्म संवत् 1554 बताता है, फिर भी विद्वानों द्वारा अधिक स्वीकार्य जन्म-वर्ष विक्रम संवत् 1589 (1532 ई.) माना जाता है।
जन्मस्थान और परिवार
तुलसीदास के जन्मस्थान के विषय में भी मतभेद हैं, किंतु प्रामाणिक मत के अनुसार उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था। वे सरयूपारीण ब्राह्मण थे।
बाल्यकाल और संघर्ष
तुलसीदास का जीवन प्रारंभ से ही कष्टमय रहा। बाल्यावस्था में ही वे माता-पिता के स्नेह और संरक्षण से वंचित हो गए। उनकी रचना कवितावली की यह पंक्ति उनके दुखद बाल्यकाल की सजीव अभिव्यक्ति है—
“मात पिता जग जाइ तज्यो बिधि हू न लिख्या कछु भाल भलाई।”
अनाथ बालक तुलसीदास का पालन-पोषण कठिन परिस्थितियों में हुआ। ऐसे समय में उन्हें नरहरिदास जैसे महान गुरु का सान्निध्य प्राप्त हुआ, जिनकी कृपा से उन्होंने वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। यही संस्कार आगे चलकर उनके काव्य की दार्शनिक और सांस्कृतिक दृढ़ता का आधार बने।
वैवाहिक जीवन और वैराग्य
तुलसीदास का विवाह दीनबंधु पाठक की अत्यंत रूपवती पुत्री रत्नावली से हुआ। प्रारंभिक जीवन में तुलसीदास पत्नी के रूप-सौंदर्य में अत्यधिक आसक्त हो गए। किंवदंती के अनुसार, एक बार रत्नावली ने उनके इस आसक्ति-पूर्ण प्रेम पर तीखा व्यंग्य करते हुए कहा—
“अस्थि-चर्ममय देह मम, तामें ऐसी प्रीति।
तैसी यदि श्रीराम में, होती न तौ भवभीति॥”
इस एक वाक्य ने तुलसीदास के जीवन की दिशा ही बदल दी। उनके हृदय में वैराग्य जागृत हो गया और वे सांसारिक मोह छोड़कर रामभक्ति की अखंड साधना में लीन हो गए। यही क्षण उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ।
देहावसान
गोस्वामी तुलसीदास ने अपना अंतिम समय काशी (वाराणसी) में व्यतीत किया। उनके देहावसान के विषय में यह प्रसिद्ध दोहा मिलता है—
“सम्बत सोलह सौ असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला तीज शनि, तुलसी तज्यो शरीर॥”
इसके अनुसार तुलसीदास का देहावसान विक्रम संवत् 1680 (1623 ई.) में हुआ।
साहित्यिक योगदान और रामचरितमानस
गोस्वामी तुलसीदास का सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रंथ “श्रीरामचरितमानस” है। यह ग्रंथ अवधी भाषा में रचित है और इसमें रामकथा को भक्ति, मर्यादा, करुणा और लोकमंगल के आदर्शों के साथ प्रस्तुत किया गया है।
रामचरितमानस ने उस समय के समाज में व्याप्त नैतिक पतन, धार्मिक आडंबर और सामाजिक असमानताओं के विरुद्ध जनमानस को एक नई चेतना दी। इस ग्रंथ ने यह सिद्ध किया कि ईश्वर-भक्ति केवल विद्वानों या संन्यासियों तक सीमित नहीं, बल्कि सामान्य गृहस्थ भी भक्ति के मार्ग पर चल सकता है।
प्रभाव और विरासत
भारतीय परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास को महर्षि वाल्मीकि का अवतार माना जाता है। जिस प्रकार वाल्मीकि ने संस्कृत में रामकथा को अमर किया, उसी प्रकार तुलसीदास ने लोकभाषा में रामकथा को जनसुलभ बनाया।
उनका काव्य मध्यकालीन समाज में धर्म, नीति, मर्यादा और लोकमंगल के आदर्शों को पुनर्जीवित करने वाला सिद्ध हुआ। आज भी भारत, नेपाल, मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी और त्रिनिदाद जैसे देशों में बसे भारतीय प्रवासी समाज के सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन का आधार रामचरितमानस है।
हिंदी साहित्य में तुलसीदास को
- “लोकनायक कवि”,
- “भक्ति युग का सूर्य”,
- और “रामभक्ति परंपरा का सर्वोच्च शिखर”
कहा जाता है।
इस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास केवल एक भक्त कवि ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज के नैतिक शिक्षक, सांस्कृतिक सूत्रधार और लोककल्याण के चिंतक थे। उनके जीवन, काव्य और विचारों ने भक्ति को आडंबर से मुक्त कर जनजीवन की आस्था से जोड़ा। यही कारण है कि सदियों बाद भी तुलसीदास और उनका रामकाव्य भारतीय चेतना में जीवित और प्रासंगिक है।
तुलसीदास की प्रमुख रचनाएँ
गोस्वामी तुलसीदास एक बहुआयामी रचनाकार थे। उन्होंने महाकाव्य, गीतिकाव्य, नीति-काव्य और भक्ति-काव्य—सभी विधाओं में उत्कृष्ट रचनाएँ कीं। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं—
- रामचरितमानस
- विनयपत्रिका
- कवितावली
- गीतावली
- बरवै रामायण
- रामलला नहछु
- रामाज्ञा प्रश्नावली
- दोहावली
- वैराग्य संदीपनी
- जानकी मंगल
- पार्वती मंगल
- कृष्ण गीतावली
इन सभी रचनाओं में रामभक्ति, लोकमंगल और नैतिक आदर्शों का सुंदर समन्वय मिलता है।
गोस्वामी तुलसीदास की रचनाएँ : तालिका
नीचे गोस्वामी तुलसीदास की रचनाओं को स्पष्ट, व्यवस्थित और अकादमिक रूप में तालिका (Table) के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस सूची में परंपरागत रूप से तुलसीदास की मानी जाने वाली रचनाओं के साथ-साथ नागरी प्रचारिणी सभा, काशी द्वारा प्रकाशित एवं प्रामाणिक मानी गई रचनाओं को भी सम्मिलित किया गया है।
अतः प्रस्तुत तालिका न केवल तुलसीदास की काव्य-प्रतिभा का समग्र परिचय देती है, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि उनकी अनेक प्रमुख रचनाएँ नागरी प्रचारिणी सभा, काशी जैसे प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थान द्वारा संपादित एवं प्रकाशित की जा चुकी हैं, जिससे उनकी प्रामाणिकता और साहित्यिक महत्त्व और अधिक पुष्ट होता है। इसमें
- परंपरागत रूप से मानी जाने वाली रचनाएँ
- नागरी प्रचारिणी सभा, काशी द्वारा प्रकाशित/स्वीकृत रचनाएँ
— दोनों को ध्यान में रखा गया है।
(क) तुलसीदास की प्रमुख एवं सर्वमान्य रचनाएँ
| क्रम सं. | ग्रन्थ का नाम | संक्षिप्त परिचय / महत्त्व |
|---|---|---|
| 1 | रामचरितमानस | तुलसीदास की सर्वाधिक लोकप्रिय और कालजयी कृति; अवधी में रामकथा |
| 2 | विनयपत्रिका | ईश्वर के प्रति विनय, भक्ति और आत्मसमर्पण की भावनाएँ |
| 3 | कवितावली | ब्रजभाषा में वीर, भक्ति और नीति काव्य |
| 4 | गीतावली | रामभक्ति से परिपूर्ण गीतात्मक काव्य |
| 5 | कृष्ण-गीतावली | कृष्ण-भक्ति से सम्बद्ध गीत |
| 6 | दोहावली | नीति, भक्ति और जीवन-दर्शन पर आधारित दोहे |
| 7 | सतसई | सात सौ पद्यों का संग्रह |
| 8 | वैराग्य संदीपनी | वैराग्य और अध्यात्म का प्रतिपादन |
| 9 | रामाज्ञा-प्रश्न | दार्शनिक एवं धार्मिक ग्रन्थ |
| 10 | बरवै रामायण | बरवै छन्द में रामकथा |
| 11 | पार्वती-मंगल | शिव-पार्वती विवाह प्रसंग |
| 12 | जानकी-मंगल | राम-सीता विवाह प्रसंग |
| 13 | रामललानहछू | रामकथा से सम्बद्ध काव्य |
| 14 | हनुमान बाहुक | हनुमान जी की स्तुति एवं आत्मकथा |
(ख) नागरी प्रचारिणी सभा, काशी द्वारा प्रकाशित तुलसीदास-कृत ग्रन्थ
| क्रम सं. | ग्रन्थ का नाम |
|---|---|
| 1 | श्रीरामचरितमानस |
| 2 | रामललानहछू |
| 3 | वैराग्य संदीपनी |
| 4 | बरवै रामायण |
| 5 | पार्वती-मंगल |
| 6 | जानकी-मंगल |
| 7 | रामाज्ञाप्रश्न |
| 8 | दोहावली |
| 9 | कवितावली |
| 10 | गीतावली |
| 11 | श्रीकृष्ण-गीतावली |
| 12 | विनयपत्रिका |
| 13 | सतसई |
| 14 | छन्दावली रामायण |
| 15 | कुण्डलिया रामायण |
| 16 | राम शलाका |
| 17 | संकट मोचन |
| 18 | करखा रामायण |
| 19 | रोला रामायण |
| 20 | झूलना |
| 21 | छप्पय रामायण |
| 22 | कवित्त रामायण |
| 23 | कलिधर्माधर्म निरूपण |
| 24 | हनुमान चालीसा |
(ग) आधुनिक विद्वानों का समर्थन
| संदर्भ | उल्लेख |
|---|---|
| एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ रिलीजन एण्ड एथिक्स | जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने उपर्युक्त प्रथम 12 ग्रन्थों को तुलसीदास की प्रामाणिक रचनाएँ माना है |
विशेष टिप्पणी (महत्त्वपूर्ण)
- तुलसीदास ने स्वयं अपनी रचनाओं की सूची कहीं नहीं दी, इसलिए प्रामाणिकता का निर्धारण अन्तःसाक्ष्य और परंपरा के आधार पर किया गया है।
- रामचरितमानस जैसे वृहद् ग्रन्थ का जन-जन तक पहुँचना उनके अद्वितीय कवि-लोकप्रियता का प्रमाण है।
- तुलसीदास के काव्य पर यह उक्ति पूर्णतः सार्थक प्रतीत होती है—
“पश्य देवस्य काव्यं, न मृणोति न जीर्यति।”
महान और दिव्य कवियों का काव्य अमर होता है—वह न समय के साथ नष्ट होता है और न ही पुराना पड़ता है।
रामचरितमानस : एक महान महाकाव्य
रचना-काल और भाषा
रामचरितमानस तुलसीदास की सर्वश्रेष्ठ और कालजयी रचना है। इसकी रचना विक्रम संवत् 1631 (1574 ई.) में अयोध्या में प्रारंभ हुई और लगभग 2 वर्ष 7 माह में पूर्ण हुई। यह ग्रंथ अवधी भाषा में तथा दोहा-चौपाई छंद-शैली में रचित है, जिससे यह जनसामान्य के लिए सुलभ बन सका।
कांड-विभाजन
रामचरितमानस सात कांडों में विभक्त है—
- बालकांड
- अयोध्याकांड
- अरण्यकांड
- किष्किन्धाकांड
- सुंदरकांड
- लंकाकांड
- उत्तरकांड
इन कांडों में श्रीराम के संपूर्ण जीवन का क्रमबद्ध, मार्मिक और आदर्श चित्रण किया गया है।
काव्यगत विशेषताएँ
रामचरितमानस में तुलसीदास केवल कवि नहीं, बल्कि उपदेशक, दार्शनिक और समाज-सुधारक के रूप में सामने आते हैं। यह ग्रंथ वास्तव में मानव व्यवहार का दर्पण है। राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, हनुमान, दशरथ, कौशल्या, कैकेयी—सभी पात्र मानव जीवन के आदर्श और यथार्थ दोनों रूपों को प्रकट करते हैं।
तुलसी के राम शक्ति, शील और सौंदर्य के भंडार हैं। वे अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वाले, किंतु करुणा से परिपूर्ण लोकनायक हैं। तुलसी ने राम को ईश्वर और मानव—दोनों रूपों में सफलतापूर्वक स्थापित किया।
अन्य प्रमुख रचनाओं का साहित्यिक महत्व
विनयपत्रिका
विनयपत्रिका तुलसीदास का सर्वोत्तम गीतिकाव्य माना जाता है। इसमें एक आर्त भक्त के हृदय की करुण पुकार, दैन्य और आत्मसमर्पण की भावनाएँ व्यक्त हुई हैं। यह ग्रंथ तुलसी की भक्ति-भावना का परिपक्व रूप प्रस्तुत करता है।
कवितावली
कवितावली ब्रजभाषा में रचित काव्य है। इसमें कवित्त और सवैया छंदों के माध्यम से रामकथा का ओजस्वी और भावपूर्ण वर्णन किया गया है।
गीतावली
गीतावली में गेय पदों के माध्यम से रामकथा का सरस और भक्तिपूर्ण प्रस्तुतीकरण किया गया है।
दोहावली
दोहावली में तुलसीदास ने नीति, भक्ति, प्रेम, वैराग्य और जीवन-दर्शन को संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली दोहों में अभिव्यक्त किया है।
हिंदी साहित्य में तुलसीदास का स्थान
हिंदी साहित्य में गोस्वामी तुलसीदास का स्थान सर्वोच्च है। वे न केवल भक्तिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं, बल्कि संपूर्ण हिंदी साहित्य के महानतम रचनाकारों में गिने जाते हैं।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का यह कथन अत्यंत प्रसिद्ध है—
“गोस्वामी जी का प्रादुर्भाव हिंदी काव्य के क्षेत्र में एक चमत्कार समझना चाहिए। हिंदी काव्य की शक्ति का पूर्ण प्रसार इनकी रचनाओं में पहले-पहल दिखाई पड़ा।”
आज भी राजा से लेकर रंक तक के घरों में रामचरितमानस विराजमान है। जीवन के प्रत्येक संस्कार, दुख-सुख और सामाजिक प्रसंग में तुलसी की चौपाइयाँ मार्गदर्शन करती हैं। यही उनकी लोकव्यापकता और कालजयी महानता का प्रमाण है।
उपसंहार
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि गोस्वामी तुलसीदास केवल एक कवि नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के अमर प्रवक्ता हैं। उन्होंने रामभक्ति के माध्यम से समाज को नैतिकता, मर्यादा और लोककल्याण का मार्ग दिखाया। उनका काव्य युगों तक मानवता का पथप्रदर्शक बना रहेगा। हिंदी साहित्य में तुलसीदास का स्थान सूर्य के समान है—जो स्वयं प्रकाशमान है और दूसरों को भी प्रकाश देता है।
- तुलसीदास के काव्य में समन्वय भावना पर प्रकाश डालते हुए उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
- भक्ति, ज्ञान और कर्म का समन्वय तुलसीदास के साहित्य में किस रूप में दिखाई देता है? विवेचन कीजिए।
- मध्यकालीन सामाजिक-धार्मिक परिस्थितियों में तुलसीदास की भूमिका का मूल्यांकन करते हुए उनके लोकनायक रूप पर प्रकाश डालिए।
- तुलसीदास एक युगद्रष्टा कवि हैं—इस कथन की सार्थकता उनके काव्य के आधार पर सिद्ध कीजिए।
- “तुलसीदास का सम्पूर्ण काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है।” इस कथन पर प्रकाश डालिए।
- “अपने युग की विषम परिस्थितियों में तुलसीदास जी ने समन्वय की विराट चेष्टा की है।” इस कथन की तर्क पूर्ण समीक्षा कीजिए।
- तुलसीदास जी के लोकनायकत्व पर सारगर्भित विचार व्यक्त कीजिए।
तुलसीदास का सम्पूर्ण काव्य : समन्वय की विराट चेष्टा
(तुलसीदास के लोकनायकत्व का आलोचनात्मक अध्ययन)
हिंदी साहित्य के इतिहास में गोस्वामी तुलसीदास का स्थान केवल एक भक्त कवि के रूप में नहीं, बल्कि एक महान समाज-चिन्तक, दार्शनिक और लोकनायक के रूप में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनका प्रादुर्भाव ऐसे समय में हुआ, जब भारतीय समाज राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और दार्शनिक स्तर पर गंभीर संकटों से जूझ रहा था। मध्यकालीन भारत में मुगल शासन का विस्तार हो रहा था, सामाजिक संरचना जातिगत असमानताओं से ग्रस्त थी, धार्मिक क्षेत्र में शैव-वैष्णव, सगुण-निर्गुण, ज्ञान-भक्ति जैसे मतभेद उग्र रूप धारण कर चुके थे।
ऐसे विषम और विघटनकारी वातावरण में तुलसीदास जैसे महापुरुष का अवतरण हुआ, जिन्होंने अपने काव्य के माध्यम से विरोधों को मिटाकर समरसता, सह-अस्तित्व और समन्वय की स्थापना की। इसी कारण आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने तुलसीदास को लोकनायक की संज्ञा देते हुए कहा—
“लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके। तुलसी का सम्पूर्ण काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है।”
वास्तव में तुलसीदास का सम्पूर्ण साहित्य जीवन, समाज, धर्म और दर्शन के विविध पक्षों के बीच संतुलन और सामंजस्य स्थापित करने का महान प्रयास है।
समन्वय की अवधारणा और तुलसीदास
समन्वय का अर्थ है— विरोधों को समाप्त कर पारस्परिक भेद-भाव को मिटाते हुए सामंजस्य और समरसता की स्थापना करना। तुलसीदास ने न तो किसी एक मत या संप्रदाय का अंध समर्थन किया और न ही किसी दूसरे का उग्र विरोध। उन्होंने प्रत्येक विचारधारा के सार तत्व को स्वीकार कर उसे लोकहित की कसौटी पर कसा।
तुलसीदास का समन्वय केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक, लोकमंगलकारी और जीवनोपयोगी है। यही कारण है कि उनका काव्य आज भी जनसाधारण से लेकर विद्वानों तक समान रूप से लोकप्रिय है।
शैव और वैष्णव संप्रदाय का समन्वय
तुलसीदास के युग में शैव और वैष्णव संप्रदायों के बीच तीव्र वैचारिक संघर्ष विद्यमान था। शैव अपने आराध्य शिव को सर्वोच्च मानते थे, जबकि वैष्णव विष्णु को। इस संघर्ष ने धार्मिक एकता को खंडित कर दिया था।
तुलसीदास ने इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए एक अत्यंत उदात्त दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने राम को विष्णु का अवतार मानते हुए भी शिव को राम का परम भक्त और गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया। रामचरितमानस में राम स्वयं कहते हैं—
“सिव द्रोही मम दास कहावा।
सो नर मोहि सपनेहुं नहिं भावा॥”
अर्थात जो शिव का द्रोही होकर स्वयं को मेरा भक्त कहता है, वह मुझे कभी प्रिय नहीं हो सकता।
दूसरी ओर शिव स्वयं राम को अपना इष्ट देव मानते हैं—
“सोइ मम इष्ट देव रघुवीरा।
सेवत जाहि सदा मुनिधीरा॥”
इस प्रकार तुलसीदास ने यह सिद्ध किया कि शिव और राम, वैष्णव और शैव, एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो रूप हैं।
सगुण और निर्गुण का समन्वय
भक्ति आंदोलन के काल में सगुण और निर्गुण भक्ति के बीच गहरा मतभेद था। कबीर, दादू जैसे संत निर्गुण निराकार ईश्वर की उपासना करते थे, जबकि तुलसीदास सगुण साकार राम के भक्त थे।
किन्तु तुलसीदास ने इस विवाद को भी समन्वय की दृष्टि से देखा। उनके अनुसार—
“अगुन अरूप अलख अज जोई।
भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥”
अर्थात जो ईश्वर निर्गुण, निराकार और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेम के वशीभूत होकर सगुण साकार हो जाता है।
इस प्रकार तुलसीदास ने यह सिद्ध किया कि सगुण और निर्गुण में कोई वास्तविक विरोध नहीं है, बल्कि दोनों एक ही ब्रह्म की अभिव्यक्तियाँ हैं।
भक्ति और ज्ञान का समन्वय
तुलसीदास मूलतः भक्त कवि हैं, किंतु उन्होंने ज्ञान मार्ग की उपेक्षा नहीं की। वे मानते हैं कि ज्ञान और भक्ति दोनों ही मोक्ष के साधन हैं। अंतर केवल इतना है कि ज्ञान मार्ग कठिन है और भक्ति मार्ग सरल तथा सहज।
वे स्पष्ट कहते हैं—
“भगतहिं ग्यानहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भव सम्भव खेदा॥”
अर्थात भक्ति और ज्ञान में कोई मूलभूत भेद नहीं है; दोनों ही संसार के दुःखों का नाश करते हैं।
इस प्रकार तुलसीदास ने ज्ञान और भक्ति को विरोधी न मानकर पूरक के रूप में प्रस्तुत किया।
दार्शनिक क्षेत्र में समन्वय
भारतीय दर्शन में अद्वैत, द्वैत और विशिष्टाद्वैत के बीच गहन मतभेद रहे हैं। तुलसीदास ने इन दार्शनिक विवादों को सामान्य जन के लिए सरल बनाते हुए उनका समन्वय किया।
वे कहते हैं—
“कोउ कह सत्य झूठ कह कोऊ,
जुगल प्रबल कोइ मानै।
तुलसीदास परिहरै तीन भ्रम,
सो आपन पहिचानै॥”
अर्थात कोई सत्य कहता है, कोई असत्य, कोई द्वैत को मानता है— पर तुलसी इन तीनों भ्रमों को छोड़कर ईश्वर की पहचान प्रेम और भक्ति में करता है।
तुलसी का दर्शन लोकानुभव आधारित समन्वयवादी दर्शन है।
राजा और प्रजा का समन्वय
तुलसीदास केवल आध्यात्मिक कवि नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ राजनीतिक चिंतक भी हैं। उन्होंने रामराज्य की अवधारणा के माध्यम से आदर्श शासन व्यवस्था का चित्र प्रस्तुत किया।
रामराज्य में राजा धर्मपरायण, न्यायप्रिय और लोकहितैषी है, जबकि प्रजा कर्तव्यनिष्ठ, संयमी और समर्पित है। राजा और प्रजा के बीच टकराव नहीं, बल्कि पारस्परिक सहयोग है।
इस प्रकार तुलसीदास ने राज्य और समाज के बीच संतुलन और समन्वय की स्थापना की।
सामाजिक समन्वय और मानवतावाद
तुलसीदास ने समाज में व्याप्त ऊँच-नीच, जातिवाद और असमानता का समर्थन नहीं किया। उन्होंने प्रेम, करुणा और मानवता को सर्वोच्च मूल्य माना—
“परहित सरिस धरम नहि भाई।
पर पीड़ा सम नहि अधमाई॥”
उनका मानवतावाद समन्वय की ही व्यापक अभिव्यक्ति है।
साहित्यिक क्षेत्र में समन्वय
तुलसीदास ने भाषा, शैली और काव्यरूप— तीनों स्तरों पर समन्वय किया।
- अवधी और ब्रज— दोनों भाषाओं का प्रयोग
- महाकाव्य, गीतिकाव्य, स्तोत्र— सभी विधाओं में रचना
- शास्त्रीयता और लोकप्रचलित तत्वों का सुंदर मेल
रामचरितमानस अवधी में रचकर उन्होंने उसे जन-जन तक पहुँचाया, जबकि विनयपत्रिका, कवितावली आदि में ब्रजभाषा की काव्यात्मक ऊँचाई दिखाई।
तुलसीदास का लोकनायकत्व
उपरोक्त सभी समन्वयात्मक प्रयासों के कारण तुलसीदास एक सच्चे लोकनायक सिद्ध होते हैं। वे न किसी वर्ग विशेष के कवि हैं, न किसी संप्रदाय के। उनका काव्य सम्पूर्ण समाज के लिए है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार—
लोकनायक वही होता है, जो अपने युग की विषमताओं का समाधान समन्वय के माध्यम से कर सके। इस कसौटी पर तुलसीदास पूर्णतः खरे उतरते हैं।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि तुलसीदास का सम्पूर्ण काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है।
शैव-वैष्णव, सगुण-निर्गुण, भक्ति-ज्ञान, अद्वैत-द्वैत, राजा-प्रजा, शास्त्र-लोक— सभी क्षेत्रों में उन्होंने विरोधों को मिटाकर सामंजस्य स्थापित किया।
इसी समन्वयात्मक दृष्टि के कारण तुलसीदास न केवल मध्यकालीन हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ कवि हैं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के अमर लोकनायक भी हैं।
- तुलसीदास के काव्य में राम-भक्ति की विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।
- तुलसीदास की भक्ति सगुण है या निर्गुण? तर्क एवं उदाहरण सहित विवेचन कीजिए।
- तुलसीदास की भक्ति भावना का सामाजिक एवं नैतिक महत्व स्पष्ट करते हुए उस पर प्रकाश डालिए।
- तुलसीदास की भक्ति-भावना पर अपने विचार प्रतिपादित कीजिए।
- तुलसी की भक्ति भावना पर प्रकाश डालिए।
तुलसीदास की भक्ति-भावना : एक समग्र विवेचन
भक्तिकालीन हिंदी साहित्य में गोस्वामी तुलसीदास का स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण है। वे न केवल रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं, बल्कि भारतीय भक्ति-परंपरा के ऐसे सशक्त संवाहक हैं, जिन्होंने भक्ति को जनसुलभ, लोकमंगलकारी और जीवनोपयोगी बनाया। तुलसीदास की भक्ति भावना केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें समाज, संस्कृति, नैतिकता और आध्यात्मिक कल्याण की व्यापक चेतना समाहित है।
तुलसीदास की भक्ति का केंद्र मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हैं। वे राम के शील, शक्ति, सौंदर्य, करुणा और लोककल्याणकारी स्वरूप से पूर्णतः अभिभूत थे। राम उनके लिए केवल आराध्य देव नहीं, बल्कि सर्वस्व, आधार, आश्रय और जीवन-सत्य थे। तुलसीदास की भक्ति भावना का मूल स्वर दास्य-भाव, अनन्यता, निष्कामता और समर्पण है।
तुलसीदास और रामभक्ति परंपरा
भक्तिकाल की सगुण भक्ति धारा में रामभक्ति शाखा का विशेष महत्व है। इस शाखा में राम को सगुण, साकार, करुणामय और मर्यादित देवता के रूप में स्वीकार किया गया है। तुलसीदास इसी परंपरा के सर्वोच्च कवि हैं।
तुलसी के राम केवल वैकुंठवासी ईश्वर नहीं, बल्कि लोक में अवतरित होकर मानवता का मार्गदर्शन करने वाले आदर्श पुरुष हैं। इसी कारण तुलसी की भक्ति भावना लोकधर्म से जुड़ी हुई है।
तुलसी स्वयं स्वीकार करते हैं कि भवसागर से पार होने का एकमात्र उपाय सेवक-सेव्य भाव है—
“सेवक सेव्य भाव बिनु, भव न तरिय उरगारि।”
यह पंक्ति तुलसी की भक्ति-दृष्टि का मूलमंत्र है।
दास्य-भाव : तुलसी की भक्ति का मूल आधार
तुलसीदास की भक्ति का सबसे प्रमुख और केंद्रीय तत्व दास्य-भाव है। वे स्वयं को राम का दास, सेवक और चाकर मानते हैं। राम उनके स्वामी हैं और वे स्वयं को पूर्णतः उनके अधीन स्वीकार करते हैं।
तुलसी की दृष्टि में दास्य-भाव ही भक्ति का सर्वोच्च रूप है, क्योंकि इसमें अहंकार का पूर्ण त्याग और समर्पण की चरम स्थिति प्राप्त होती है।
“हम चाकर रघवीर के, पटो लिखो दरबार।”
यहाँ ‘पट्टा’ लिखवाने का अर्थ है—जीवन भर की सेवाभक्ति का वचन। तुलसी का दास्य-भाव आत्महीनता नहीं, बल्कि ईश्वर की महत्ता का स्वीकार है। इसी भाव से उनकी भक्ति में दीनता, करुणा-याचना और अनुनय-विनय का स्वर उभरता है—
“तू दयालु दीन हौं, तू दानि हौं भिखारी।
हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप पुंज हारी।”
आत्महीनता और ईश्वर-महिमा का संतुलन
तुलसीदास ने अपनी लघुता और राम की महत्ता को पूरी स्पष्टता से पहचाना। उनकी भक्ति में आत्मगौरव नहीं, बल्कि आत्म-स्वीकृति है। वे स्वयं को दोषी, पापी और अयोग्य मानते हैं, जबकि राम को पूर्ण, पावन और उद्धारकर्ता स्वीकार करते हैं—
“राम सों बड़ौ है कौन, मोसो कौन छोटो।
राम सो खरौ है कौन, मोसो कौन खोटो।”
यह आत्मस्वीकृति तुलसी की भक्ति को दृढ़ता प्रदान करती है। उन्हें यह पूर्ण विश्वास है कि जो स्वयं को हीन मानकर प्रभु की शरण में जाता है, वही सच्चा भक्त है।
अनन्यता की भावना
तुलसीदास की भक्ति पूर्णतः अनन्य है। वे राम के अतिरिक्त किसी अन्य देव, साधन या आश्रय को स्वीकार नहीं करते। उनके लिए राम ही एकमात्र विश्वास, बल और आशा हैं—
“एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास।
एक राम घनश्याम हित चातक तुलसीदास।”
यहाँ तुलसी स्वयं को चातक के समान बताते हैं, जो केवल मेघ की वर्षा पर निर्भर रहता है। तुलसी की भक्ति में यह एकनिष्ठता इतनी दृढ़ है कि वे कृष्ण-मूर्ति के सामने भी राम के स्वरूप की कामना करते हैं—
“का बरनों छवि आजु की, भले बने हो नाथ।
तुलसी मस्तक जब नवे, धनुष बान लेउ हाथ।”
यह प्रसंग तुलसी की भक्ति-निष्ठा और दृढ़ता को दर्शाता है।
सम्पूर्ण समर्पण का भाव
तुलसीदास की भक्ति में सम्पूर्ण आत्म-समर्पण का भाव है। वे जीवन के प्रत्येक संबंध—माता, पिता, गुरु, मित्र, स्वामी—सबको राम में ही देखते हैं—
“ब्रह्म तू हौं जीव तू, ठाकुर हौं चेरी।
तात मात गुरु सखा, तू सब विधि हितू मेरौ।”
यह भक्ति केवल धार्मिक नहीं, बल्कि संबंधात्मक और भावात्मक है। तुलसी स्वयं को जीव और राम को ब्रह्म मानते हुए अद्वैत और भक्ति का सुंदर समन्वय करते हैं।
निष्काम भक्ति
तुलसीदास की भक्ति पूर्णतः निष्काम है। वे राम से न तो धन चाहते हैं, न यश, न मोक्ष की लालसा रखते हैं। वे केवल राम-चरणों में अनुराग की कामना करते हैं—
“तुलसी चाहत जन्म भरि, राम चरन अनुराग।”
उनकी भक्ति में स्वार्थ नहीं, सौदा नहीं, बल्कि सहज प्रेम है। यह भक्ति गीता के निष्काम कर्मयोग की भाँति फल-त्याग पर आधारित है।
इष्टदेव के प्रति अनन्य प्रेम
तुलसीदास के लिए राम सर्वाधिक प्रिय हैं। राम-विमुख व्यक्ति, चाहे कितना ही निकट क्यों न हो, तुलसी के लिए त्याज्य है—
“जाके प्रिय न राम बैदेही।
तजिए ताहि कोटि बैरी सम, यद्यपि परम सनेही।”
यहाँ तुलसी का प्रेम भावात्मक ही नहीं, वैचारिक भी है। उनके लिए राम-भक्ति ही जीवन की कसौटी है।
कल्याणकारी भावना
तुलसी की भक्ति केवल आत्म-कल्याण तक सीमित नहीं है। उसमें समस्त प्राणी जगत के कल्याण की भावना निहित है। वे मानते हैं कि राम-भक्ति के बिना जीवन व्यर्थ है—
“परिहरि राम भगति सुर-सरिता, आस करत ओसकन की।”
राम-भक्ति को वे गंगा के समान पवित्र और जीवनदायिनी मानते हैं।
अवतारवादी दृष्टि
तुलसीदास के राम विष्णु के साक्षात अवतार हैं। वे अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना के लिए बार-बार अवतरित होते हैं—
“जब-जब होय धरम के हानी।
बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।
तब-तब प्रभु धरि मनुज सरीरा।
हरहिं कृपा निधि सज्जन पीरा।”
यह अवतारवाद तुलसी की भक्ति को लोकधर्मी बनाता है।
नाम-स्मरण की महत्ता
तुलसीदास ने राम-नाम को सबसे सरल और प्रभावी साधन माना है। उनके अनुसार नाम-स्मरण भवसागर से पार लगाने वाली नाव है—
“रामु जपु, राम जपु, रामु जपु बाबरे।
घोर भव नीर निधि, नाम निज नाव रे।”
नाम-स्मरण उनकी भक्ति का प्राणतत्व है।
निष्कर्ष
इस प्रकार स्पष्ट है कि तुलसीदास की भक्ति-भावना अत्यंत व्यापक, गहन और संतुलित है। उसमें दास्य-भाव, अनन्यता, निष्कामता, समर्पण, लोकमंगल, अवतारवाद और नाम-महिमा का सुंदर समन्वय है। तुलसी ने भक्ति को कर्म और ज्ञान से श्रेष्ठ मानते हुए भी उनका विरोध नहीं किया, बल्कि भक्ति के माध्यम से उन्हें आत्मसात किया।
तुलसीदास की भक्ति भावना का मूल आधार दैन्य है, परंतु यह दैन्य आत्म-परिष्कार और आत्म-उत्थान का साधन बन जाता है। इसी कारण तुलसीदास न केवल भक्त कवि हैं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के अमर प्रवक्ता भी हैं।
- ‘भरत-महिमा’ काव्यांश के आधार पर भरत के आदर्श भ्रातृ-प्रेम और त्याग भावना पर प्रकाश डालिए।
- भरत का चरित्र रामकथा में आदर्श मानव मूल्यों का प्रतीक है—इस कथन की समीक्षा पठित काव्य के आधार पर कीजिए।
- गोस्वामी तुलसीदास ने भरत के माध्यम से भक्ति, त्याग और मर्यादा का जो आदर्श प्रस्तुत किया है, उसे उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
- ‘भायप भगति’ को स्पष्ट करते हुए इसके आधार पर भरत के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
- “भरत के चारित्रिक गुणों एवं शील की सराहना राम ने किन शब्दों में की है”। ‘भरत महिमा’ नामक काव्यांश के आधार पर इसकी समीक्षा कीजिए।
- भरत महिमा गोस्वामी तुलसीदास की भक्ति का मनोरम उदाहरण है- पठित काव्य के आधार पर समीक्षा कीजिये।
‘भायप भगति’ और भरत महिमा : रामचरितमानस के आलोक में भरत का उदात्त चरित्र
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस न केवल भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर है, बल्कि भारतीय संस्कृति, नैतिकता और जीवन-दर्शन का जीवंत ग्रंथ भी है। इसके प्रत्येक कांड में मानवीय मूल्यों की ऐसी उदात्त अभिव्यक्ति मिलती है, जो पाठक को आत्ममंथन और आत्मोन्नति के लिए प्रेरित करती है। अयोध्याकाण्ड का ‘भरत महिमा’ प्रसंग इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह प्रसंग भ्रातृ-प्रेम, त्याग, शील, नीति, भक्ति और आदर्श मानवीय संबंधों का अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत करता है।
‘भरत महिमा’ का केंद्रीय भाव ‘भायप भगति’ है, जो राम और भरत के पारस्परिक प्रेम, श्रद्धा और विश्वास को प्रकट करता है। यह प्रसंग आज के स्वार्थप्रधान युग में भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना त्रेता युग में था। तुलसीदास ने इस प्रसंग के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि सच्चा प्रेम अधिकार-लालसा से नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण से पुष्ट होता है।
प्रसंग परिचय : भरत का चित्रकूट गमन
रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में वर्णित ‘भरत महिमा’ का प्रसंग उस समय घटित होता है, जब भगवान राम चौदह वर्षों के लिए वनवास को चले जाते हैं और अयोध्या का राज्य रिक्त हो जाता है। राजा दशरथ का देहांत हो चुका होता है और अयोध्या शोक में डूबी होती है। ऐसे समय में भरत, जो ननिहाल में थे, जब अयोध्या लौटते हैं, तो उन्हें माता कैकेयी के द्वारा किए गए अनुचित कार्य का ज्ञान होता है।
भरत न केवल इस कृत्य से दुखी होते हैं, बल्कि इसे घोर पाप मानते हुए इसका प्रायश्चित करना अपना कर्तव्य समझते हैं। वे राज्य स्वीकार करने से स्पष्ट रूप से इंकार कर देते हैं और राम को वन से वापस लाकर अयोध्या का राजा बनाने का निश्चय करते हैं। इसी उद्देश्य से वे गुरु, माताओं और अयोध्यावासियों सहित चित्रकूट जाते हैं।
‘भायप भगति’ का अर्थ एवं भावार्थ
‘भायप भगति’ का शाब्दिक अर्थ है—भाई के प्रति भक्ति भाव। यह केवल रक्त-संबंध पर आधारित प्रेम नहीं है, बल्कि एक उच्चतर आध्यात्मिक और नैतिक संबंध है, जिसमें अहंकार, स्पर्धा और स्वार्थ का कोई स्थान नहीं।
भरत की राम के प्रति भक्ति और राम का भरत के प्रति स्नेह, दोनों मिलकर ‘भायप भगति’ को पूर्णता प्रदान करते हैं। तुलसीदास स्वयं इस भाव की महिमा का गुणगान करते हुए कहते हैं—
“भायप भगति भरत आचरनू।
कहत सुनत दुःख दूषन हरनू॥”
अर्थात भरत का आचरण भ्रातृ-भक्ति का ऐसा आदर्श है, जिसके विषय में कहना और सुनना मात्र ही मनुष्य के दुख और दोषों का नाश कर देता है।
भरत के चरित्र की उदात्तता
1. राजत्याग और निष्काम भाव
भरत के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उनका निष्काम भाव है। वे उस राज्य को स्वीकार नहीं करते, जो उन्हें नीति-विरुद्ध साधनों से प्राप्त हुआ हो। जबकि सामान्यतः सत्ता और राजसिंहासन मनुष्य के विवेक को भ्रष्ट कर देते हैं, भरत का मन इन सब से अछूता रहता है।
वे स्वयं को उस राज्य का अधिकारी नहीं मानते, जो राम का है। उनके लिए राजपाट से अधिक महत्वपूर्ण है—धर्म, मर्यादा और भ्रातृ-प्रेम।
2. राम का भरत पर अटूट विश्वास
जब लक्ष्मण को यह आशंका होती है कि कहीं भरत राजमद में आकर युद्ध करने न आए हों, तब राम लक्ष्मण की शंका को स्नेहपूर्वक नकारते हैं और भरत के चरित्र की महानता का वर्णन करते हैं—
“भरतहि होइ न राजमद विधि हरि हरपद पाइ।
कबहुँकि काँजी सींकरनि छीर सिंधु बिनसाइ॥”
राम कहते हैं कि चाहे भरत को ब्रह्मा, विष्णु या महेश का पद ही क्यों न मिल जाए, उनमें राजमद नहीं आ सकता। जैसे कुछ बूंद खट्टे द्रव से क्षीरसागर नष्ट नहीं हो सकता, वैसे ही भरत का स्वभाव कभी विकृत नहीं हो सकता।
3. निरभिमानता और विनय
भरत के चरित्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण गुण है—निरभिमानता। वे स्वयं को तुच्छ समझते हैं और राम को सर्वश्रेष्ठ। राम स्वयं लक्ष्मण से कहते हैं कि संसार की असंभव घटनाएँ भी घट सकती हैं, पर भरत में अहंकार नहीं आ सकता—
“गोपद जल बूढहिं घट जोनी।
सहज छमा बस छाड़हि छोनी॥”
अर्थात चाहे अगस्त्य ऋषि गाय के खुर के गड्ढे में डूब जाएँ या पृथ्वी अपना स्वाभाविक गुण ‘क्षमा’ त्याग दे, पर भरत अभिमानी नहीं हो सकते।
राम के प्रति भरत का अगाध स्नेह
भरत के जीवन का एकमात्र लक्ष्य है—राम की सेवा और उनकी आज्ञा का पालन। राम के दर्शन को ही वे अपने जीवन की पूर्णता मानते हैं। मार्ग में जो व्यक्ति राम की कुशलता का समाचार देता है, भरत उसे राम के समान प्रिय मानते हैं—
“जे जन कहहिं कुसल हम देखे।
ते प्रिय राम लखन सम लेखे॥”
यह पंक्ति भरत के मन में बसे राम-प्रेम की गहराई को प्रकट करती है।
शीलवान और सदाचारी भरत
राम स्वयं भरत के शील और सदाचार की बार-बार प्रशंसा करते हैं—
“लखन तुम्हार सपथ पितु आना।
सुचि सुबन्यु नहिं भरत समाना॥”
राम कहते हैं कि भरत जैसा पवित्र, सुशील और सद्गुणी भाई संसार में कोई नहीं है। वे रघुवंश रूपी सरोवर के ऐसे हंस हैं, जिन्होंने गुण और दोष का स्पष्ट विवेक किया है।
आदर्श भाई के रूप में भरत
भरत केवल राम के भाई नहीं हैं, बल्कि आदर्श भ्राता हैं। वे माता कैकेयी के अपराध को अपना अपराध मानते हैं और उसका प्रायश्चित करने के लिए वन जाते हैं। उन्हें यह भी भय है कि कहीं राम उन्हें भी षड्यंत्र में सम्मिलित न समझ लें—
“जौ परिहरहि मलिन मनु जानी।
जौ सनमानहिं सेवकु मानी॥”
भरत के लिए राम की शरण ही सब कुछ है—अपमान हो या सम्मान।
‘भरत महिमा’ : तुलसीदास की भक्ति का उत्कर्ष
‘भरत महिमा’ केवल भरत के चरित्र की प्रशंसा नहीं है, बल्कि यह तुलसीदास की भक्ति-दृष्टि का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। तुलसी के लिए भरत केवल एक ऐतिहासिक पात्र नहीं, बल्कि आदर्श मानव हैं, जिनके चरित्र में भक्ति, नीति और प्रेम का अद्भुत समन्वय है।
यह प्रसंग सिद्ध करता है कि सच्ची भक्ति केवल ईश्वर के प्रति नहीं, बल्कि मानव-मानव के संबंधों में भी प्रकट होती है।
समकालीन समाज में भरत की प्रासंगिकता
आज के युग में, जहाँ भाई-भाई में संपत्ति और सत्ता को लेकर संघर्ष दिखाई देता है, वहाँ भरत का चरित्र एक उज्ज्वल आदर्श प्रस्तुत करता है। उनका त्याग, विनय और निष्काम भाव आज के नवयुवकों के लिए प्रेरणास्रोत है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि ‘भायप भगति’ का सर्वोत्तम उदाहरण भरत का चरित्र है। राम और भरत का संबंध केवल पारिवारिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक ऊँचाइयों को छूता है। तुलसीदास ने ‘भरत महिमा’ के माध्यम से यह संदेश दिया है कि सच्चा प्रेम अधिकार से नहीं, त्याग से जन्म लेता है।
भरत का चरित्र आज भी उतना ही प्रासंगिक, प्रेरक और अनुकरणीय है। यही कारण है कि तुलसीदास का यह कथन पूर्णतः सार्थक प्रतीत होता है—
“भायप भगति भरत आचरनू।
कहत सुनत दुःख दूषन हरनू॥”
निश्चय ही भरत का जीवन और आचरण मानवता के लिए एक शाश्वत आदर्श है।
- तुलसीदास के काव्य का लोकमंगलात्मक स्वरूप उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
- रामचरितमानस को लोककल्याण का महाकाव्य सिद्ध करते हुए तुलसीदास की लोकमंगल भावना पर प्रकाश डालिए।
- तुलसीदास की काव्य-दृष्टि समाज-सुधार और लोकहित पर आधारित है—इस कथन की समीक्षा कीजिए।
- “तुलसी की रचनाओं में लोकमंगल का स्वर मुखरित हुआ है” सिद्ध कीजिए।
तुलसीदास के काव्य में लोकमंगल
हिंदी भक्ति काव्य परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास का स्थान अत्यंत विशिष्ट और केंद्रीय है। वे न केवल रामभक्ति के महान कवि हैं, बल्कि एक ऐसे युगद्रष्टा भी हैं जिन्होंने अपने काव्य के माध्यम से समाज, धर्म, राजनीति, नैतिकता और मानवीय मूल्यों का समग्र चित्र प्रस्तुत किया। तुलसीदास का संपूर्ण साहित्य लोकमंगल की भावना से ओतप्रोत है। उनके लिए कविता केवल सौंदर्य-बोध या आत्म-प्रकाश का साधन नहीं, बल्कि जनसाधारण के कल्याण, समाज के नैतिक उत्थान और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा का सशक्त माध्यम है। इसीलिए तुलसी का काव्य आज भी प्रासंगिक, प्रभावशाली और जन-जन के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है।
लोकमंगल का अर्थ है—समाज के व्यापक हित की साधना, लोककल्याण की भावना और मानव मात्र के सुख-दुख से जुड़ा हुआ साहित्य। तुलसीदास का संपूर्ण काव्य इसी लोकमंगल की भावना का सजीव प्रमाण है। प्रस्तुत लेख में यह सिद्ध किया जाएगा कि तुलसी की रचनाओं, विशेषतः रामचरितमानस, में लोकमंगल का स्वर किस प्रकार मुखरित हुआ है।
लोकमंगल की अवधारणा और तुलसीदास
लोकमंगल की अवधारणा भारतीय साहित्य परंपरा में अत्यंत प्राचीन है। साहित्य को केवल मनोरंजन या आत्मरंजन का साधन नहीं माना गया, बल्कि उसे समाज के कल्याण का उपकरण समझा गया। गोस्वामी तुलसीदास इसी परंपरा के संवाहक हैं। वे स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि वही कीर्ति, वही कविता और वही ऐश्वर्य श्रेष्ठ है जो गंगा की भाँति सबका हित करने वाला हो—
कीरति भनिति भूति भल सोई।
सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥
इस दोहे में तुलसीदास ने साहित्य के उद्देश्य को अत्यंत स्पष्ट शब्दों में परिभाषित किया है। जिस प्रकार गंगा अपने प्रवाह से सबका कल्याण करती है, उसी प्रकार कविता भी तभी सार्थक है जब वह समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए मंगलकारी हो। जो कविता लोकहित का विधान नहीं कर सकती, वह तुलसी की दृष्टि में किसी उपयोग की नहीं है।
राम और रामनाम : लोकमंगल के प्रतीक
तुलसीदास के काव्य में राम केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक पात्र नहीं हैं, बल्कि लोकमंगल के सजीव प्रतीक हैं। उनके राम अमंगल का नाश करने वाले और मंगल का विधान करने वाले हैं—
मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवह सो दसरथ अजिर बिहारी॥
राम के व्यक्तित्व और उनके नाम—दोनों में ही कल्याण की शक्ति निहित है। राम का स्मरण मात्र दुख, भय और अमंगल को दूर कर देता है। इस प्रकार राम तुलसी के काव्य में सामाजिक और नैतिक चेतना के केंद्र हैं। उनके जीवन के प्रत्येक प्रसंग में लोकहित की भावना निहित है—चाहे वह पिता की आज्ञा का पालन हो, पत्नी के प्रति आदर्श आचरण हो, भाई के प्रति प्रेम हो या प्रजा के प्रति कर्तव्यबोध।
रामचरितमानस : व्यवहार का दर्पण
रामचरितमानस को केवल धार्मिक ग्रंथ कहना उसके व्यापक सामाजिक महत्व को सीमित कर देना होगा। वास्तव में यह ग्रंथ मानव व्यवहार का दर्पण है। इसमें जीवन के प्रत्येक पक्ष—व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक—का आदर्श स्वरूप प्रस्तुत किया गया है। तुलसीदास के राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, अर्थात् वे मर्यादा के भीतर रहकर आदर्श जीवन जीते हैं।
वे एक आदर्श पुत्र हैं जो पिता की आज्ञा के लिए राज्य त्याग देते हैं; एक आदर्श पति हैं जो पत्नी के सम्मान और मर्यादा की रक्षा करते हैं; एक आदर्श भाई हैं जो भ्रातृप्रेम की अनुपम मिसाल प्रस्तुत करते हैं; और एक आदर्श शासक हैं जो प्रजा के सुख को अपना सुख मानते हैं। यह आदर्श चरित्र लोकमंगल की भावना को व्यवहारिक रूप प्रदान करता है।
परोपकार और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा
तुलसीदास के काव्य में परोपकार को सर्वोच्च धर्म माना गया है। उनके अनुसार परहित से बढ़कर कोई धर्म नहीं और परपीड़ा से बढ़कर कोई अधर्म नहीं—
परहित सरिस धरम नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
यह दोहा केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का आधार है। तुलसी का समाज ऐसा समाज है जहाँ व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के हित की चिंता करता है। यह भावना लोकमंगल का मूल तत्व है। इसी के कारण तुलसी का काव्य संकीर्ण धार्मिक या व्यक्तिगत सीमाओं से ऊपर उठकर सार्वभौमिक मानव मूल्यों की स्थापना करता है।
राजधर्म और राज्यव्यवस्था का आदर्श
रामचरितमानस में तुलसीदास ने राजधर्म का अत्यंत सशक्त और स्पष्ट चित्र प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार राजा का कर्तव्य है कि वह अपनी प्रजा को सुखी रखे। जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी रहती है, वह नरक का अधिकारी होता है—
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।
सो नर अवसि नरक अधिकारी॥
यह कथन शासक वर्ग को सीधे तौर पर नैतिक जिम्मेदारी का बोध कराता है। तुलसी का रामराज्य आदर्श राज्य का प्रतीक है, जहाँ न कोई दुखी है, न कोई शोषित। सभी लोग अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं और समाज में प्रेम, शांति और न्याय का वातावरण है—
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि व्यापा।
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहि स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
यह रामराज्य वस्तुतः लोकमंगल की पराकाष्ठा है, जहाँ व्यक्ति, समाज और राज्य—तीनों में सामंजस्य है।
समन्वय की विराट दृष्टि
तुलसीदास का काव्य समन्वय की विराट चेष्टा का अनुपम उदाहरण है। वे किसी एक मत, संप्रदाय या दर्शन के पक्षधर नहीं हैं, बल्कि विभिन्न धाराओं में समन्वय स्थापित करते हैं। उनके काव्य में शैव और वैष्णव का समन्वय है, ज्ञान और भक्ति का समन्वय है, निर्गुण और सगुण का समन्वय है तथा राजा और प्रजा के संबंधों में भी सामंजस्य है।
यह समन्वयवादी दृष्टि लोकमंगल की भावना से ही प्रेरित है, क्योंकि समाज का कल्याण तभी संभव है जब विभिन्न मतों और विचारों में टकराव के स्थान पर सामंजस्य हो। तुलसी का काव्य इस दृष्टि से सामाजिक सौहार्द और सहिष्णुता का संदेश देता है।
धर्म की रक्षा और अधर्म का विनाश
तुलसीदास के राम धर्म के रक्षक हैं। वे अधर्म, अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। राम का अवतार लोकमंगल के लिए होता है—
जब-जब होइ धरम की हानी।
बाढ़हि असुर अधम अभिमानी॥
तब-तब प्रभु धरि विविध सरीरा।
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥
यह अवधारणा समाज को यह विश्वास देती है कि अंततः सत्य और न्याय की विजय होती है। राम सदाचार और सत्य के प्रतीक हैं, जबकि रावण असत्य और दुराचार का प्रतीक। इस संघर्ष के माध्यम से तुलसी समाज को यह संदेश देते हैं कि लोकमंगल तभी संभव है जब सत्य, न्याय और धर्म की प्रतिष्ठा हो।
सत्य और न्याय की विजय : लोकमंगल की कामना
रामचरितमानस में असत्य और अन्याय पर सत्य और न्याय की विजय का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली है। तुलसी की कामना है कि समाज में सत्पथ के अनुयायी विजयी हों और कुपथगामी पराजित। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक नैतिकता की स्थापना का प्रयास है।
तुलसी का काव्य व्यक्ति को आत्मिक रूप से शुद्ध करने के साथ-साथ समाज को नैतिक दिशा प्रदान करता है। यही लोकमंगल का वास्तविक स्वरूप है—व्यक्ति और समाज दोनों का कल्याण।
उपसंहार
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि गोस्वामी तुलसीदास का संपूर्ण काव्य लोकमंगल की भावना से अनुप्राणित है। रामचरितमानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि सामाजिक, नैतिक और मानवीय मूल्यों का महाकाव्य है। तुलसीदास ने अपने काव्य के माध्यम से ऐसे आदर्शों की स्थापना की है जो आज भी समाज के लिए मार्गदर्शक हैं।
उनकी कविता गंगा की तरह सबका हित करने वाली है—वह व्यक्ति को सदाचारी बनाती है, समाज में प्रेम और समरसता स्थापित करती है तथा राज्य को न्यायपूर्ण और लोककल्याणकारी बनने की प्रेरणा देती है। निस्संदेह, तुलसी के काव्य का मूल स्वर लोकमंगलकारी है और यही उनकी साहित्यिक महत्ता का स्थायी आधार है।
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