भारतेन्दु हरिश्चन्द्र : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली

भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र हिन्दी साहित्य के ऐसे युगप्रवर्तक साहित्यकार हैं, जिनके बिना आधुनिक हिन्दी साहित्य की कल्पना अधूरी प्रतीत होती है। उन्हें केवल हिन्दी गद्य का जनक ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण आधुनिक हिन्दी साहित्य का निर्माता कहा जाता है। जिस समय हिन्दी साहित्य रूढ़ परम्पराओं, सीमित विषय-वस्तु और अविकसित गद्य-रूप से जूझ रहा था, उस समय भारतेन्दु जी ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा, सशक्त दृष्टि और सामाजिक चेतना के माध्यम से हिन्दी साहित्य को नवीन दिशा प्रदान की। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही इतने व्यापक और प्रभावशाली हैं कि हिन्दी साहित्य के इतिहास में ‘भारतेन्दु युग’ एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण युग के रूप में प्रतिष्ठित है।

भारतेन्दु जी का हिन्दी साहित्याकाश में उदय पूर्णचन्द्र के समान हुआ, जिसकी शान्त, शीतल और कान्तिमयी आभा से साहित्य की सभी दिशाएँ आलोकित हो उठीं। उनकी रचनाओं में राष्ट्रप्रेम, समाज-सुधार, मानवता, करुणा, हास्य-व्यंग्य और भाषा-चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। ‘भारतेन्दु’ की उपाधि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के लिए पूर्णतः सार्थक सिद्ध होती है।

Table of Contents

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र : संक्षिप्त परिचयात्मक तथ्य (तालिका)

क्रम संख्याशीर्षकविवरण
1.पूरा नामभारतेन्दु हरिश्चन्द्र
2.जन्म9 सितम्बर, 1850
3.जन्म स्थानवाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत
4.मृत्यु6 जनवरी, 1885
5.मृत्यु स्थानवाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत
6.पेशाकवि, लेखक, रंगकर्मी, देशहितचिन्तक, पत्रकार
7.राष्ट्रीयताभारतीय
8.साहित्यिक कालआधुनिक काल
9.साहित्यिक विधाएँनाटक, काव्यकृतियाँ, अनुवाद, निबन्ध संग्रह
10.मुख्य विषयआधुनिक हिन्दी साहित्य
11.उल्लेखनीय कृतियाँअन्धेर नगरी, भारत दुर्दशा
12.विशेष उपाधिआधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी का जीवन-परिचय

आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र हिन्दी नवजागरण के प्रमुख स्तम्भ माने जाते हैं। उन्होंने उस युग में हिन्दी साहित्य को नई चेतना, नवीन दृष्टि और सामाजिक सरोकार प्रदान किए, जब साहित्य परम्परागत सीमाओं में बँधा हुआ था। कविता, नाटक, निबन्ध और पत्रकारिता—सभी विधाओं में उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया। अल्पायु में ही उन्होंने हिन्दी को जनभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। भारतेंदु जी का जीवन संघर्ष, सेवा और साहित्य-साधना का अद्वितीय उदाहरण है।

जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि

भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितम्बर सन् 1850 ईस्वी को काशी (वर्तमान वाराणसी) में हुआ। उस समय काशी भारतीय संस्कृति, साहित्य और धार्मिक चेतना का एक प्रमुख केन्द्र थी। ऐसे सांस्कृतिक वातावरण में जन्म लेने से उनके व्यक्तित्व का स्वाभाविक विकास साहित्यिक दिशा में हुआ। उनके पिता गोपालचन्द्र एक सुशिक्षित, सम्पन्न तथा साहित्य-प्रेमी व्यक्ति थे। वे ‘गिरधरदास’ उपनाम से ब्रजभाषा में काव्य-रचना करते थे। पिता से प्राप्त साहित्यिक संस्कारों ने भारतेन्दु जी की प्रतिभा को पुष्ट किया।

बाल्यकाल एवं प्रारम्भिक जीवन

भारतेन्दु जी का बाल्यकाल अत्यन्त कष्टमय रहा। मात्र पाँच वर्ष की आयु में उनकी माता का देहान्त हो गया तथा दस वर्ष की अवस्था में पिता का भी स्वर्गवास हो गया। माता-पिता के असमय निधन के कारण उनका प्रारम्भिक जीवन संघर्षों से भर गया और उनकी औपचारिक शिक्षा बाधित हो गई।

शिक्षा एवं भाषाई ज्ञान

यद्यपि उनकी नियमित शिक्षा सुचारु रूप से आगे नहीं बढ़ सकी, फिर भी उनकी जिज्ञासा और अध्ययनशीलता में कोई कमी नहीं आई। उन्होंने घर पर रहकर हिन्दी, उर्दू, बंगला तथा अंग्रेजी भाषाओं का अध्ययन किया। बाद में उन्होंने बनारस के क्वींस कॉलेज में प्रवेश लिया, किन्तु साहित्य-सृजन के प्रति गहन रुचि के कारण उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई अधूरी छोड़ दी। साहित्य ही उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य बन गया।

वैवाहिक जीवन

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का विवाह मात्र तेरह वर्ष की आयु में ‘मन्नों देवी’ के साथ हुआ। यह विवाह उस समय की सामाजिक परम्पराओं के अनुरूप था। यद्यपि उनका वैवाहिक जीवन साधारण था, परन्तु पारिवारिक उत्तरदायित्वों के साथ उन्होंने साहित्य-साधना को निरन्तर आगे बढ़ाया।

आर्थिक स्थिति एवं दानशीलता

भारतेन्दु जी एक प्रतिष्ठित एवं धनाढ्य परिवार से सम्बन्धित थे। उनके पास पर्याप्त सम्पत्ति थी, किन्तु वे धन-संग्रह में विश्वास नहीं रखते थे। उदारता, दानशीलता और परोपकार उनके जीवन के प्रमुख गुण थे। उन्होंने साहित्यकारों, कलाकारों, निर्धनों तथा समाजसेवियों की मुक्तहस्त से सहायता की। सहायता की अपेक्षा लेकर आने वाला कोई भी व्यक्ति उनके द्वार से निराश नहीं लौटता था।

स्वास्थ्य, आर्थिक संकट एवं निधन

अत्यधिक दानशीलता के कारण वे धीरे-धीरे ऋणग्रस्त हो गए। निरन्तर मानसिक श्रम, सामाजिक सक्रियता तथा आर्थिक चिन्ताओं का उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और वे क्षय रोग (तपेदिक) से ग्रसित हो गए। अन्ततः 6 जनवरी सन् 1885 ईस्वी को मात्र 35 वर्ष की अल्पायु में इस महान साहित्यकार का देहान्त हो गया।

अल्पायु में अमर योगदान

यद्यपि भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवनकाल अत्यन्त छोटा रहा, तथापि हिन्दी साहित्य को उन्होंने जो अमूल्य, युग-प्रवर्तक और कालजयी योगदान दिया, वह उन्हें आधुनिक हिन्दी साहित्य का जनक और मार्गदर्शक सिद्ध करता है।

साहित्यिक योगदान एवं कृतियाँ

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का साहित्यिक योगदान अत्यन्त विस्तृत, बहुआयामी और युगान्तकारी है। उन्होंने ऐसे समय में हिन्दी साहित्य की सेवा की, जब हिन्दी भाषा और साहित्य दोनों ही संक्रमणकाल से गुजर रहे थे। भारतेन्दु जी ने न केवल साहित्य की विविध विधाओं में सृजन किया, बल्कि उन्हें आधुनिक चेतना, सामाजिक यथार्थ और राष्ट्रीय भावना से भी जोड़ा। कविता, नाटक, निबन्ध, कथा-साहित्य, यात्रा-वृत्तान्त, जीवनी और पत्रकारिता—सभी क्षेत्रों में उनका योगदान अविस्मरणीय है। इसी कारण उन्हें आधुनिक हिन्दी साहित्य का प्रवर्तक और मार्गदर्शक माना जाता है।

(क) काव्य-साहित्य

भारतेन्दु जी की काव्य-रचनाओं में भक्ति, श्रृंगार, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक चेतना का सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है। उन्होंने उस समय की काव्य-परम्परा के अनुसार मुख्यतः ब्रजभाषा में काव्य-रचना की। उनकी कविताओं में ब्रजभाषा की माधुर्यपूर्ण लय, भावों की कोमलता और अभिव्यक्ति की सहजता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

उनकी प्रमुख काव्य-कृतियाँ निम्नलिखित हैं—

  1. प्रेम सरोवर
  2. प्रेम तरंग
  3. भक्त-सर्वस्व
  4. भारत-वीणा
  5. सतसई-शृंगार
  6. प्रेम-प्रलाप
  7. प्रेम फुलवारी
  8. वैजयन्ती

इन रचनाओं में जहाँ एक ओर भक्तिभाव और श्रृंगार का मधुर स्वर है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्र-प्रेम और देशोद्धार की भावना भी मुखरित होती है। ‘भारत-वीणा’ में देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना का स्वर विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

(ख) कथा-साहित्य

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिन्दी कथा-साहित्य को भी नवीन दिशा प्रदान की। उनकी कथा-रचनाएँ प्राचीन आख्यान-परम्परा और आधुनिक यथार्थ—दोनों का समन्वय प्रस्तुत करती हैं। इन कथाओं में नैतिकता, आदर्शवाद, सामाजिक चेतना और जीवन-दर्शन का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

उनकी प्रमुख कथा-रचनाएँ हैं—

  1. मदालसोपाख्यान
  2. हमीर हठ
  3. सावित्री चरित्र
  4. कुछ आप बीती, कुछ जग बीती

इन कृतियों में पौराणिक एवं ऐतिहासिक कथानकों के माध्यम से जीवन-मूल्यों और सामाजिक आदर्शों को प्रस्तुत किया गया है। ‘कुछ आप बीती, कुछ जग बीती’ में आत्मकथात्मक और सामाजिक अनुभवों का मिश्रण दिखाई देता है।

(ग) निबन्ध-साहित्य

भारतेन्दु जी हिन्दी निबन्ध साहित्य के प्रवर्तकों में अग्रणी माने जाते हैं। उनके निबन्धों में विचार-गम्भीरता, तर्कशीलता, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय भावना का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। उन्होंने निबन्ध को केवल वर्णनात्मक न रखकर विचारात्मक और उद्देश्यपरक बनाया।

उनके प्रमुख निबन्ध-संग्रह हैं—

  1. सुलोचना
  2. परिहास वंचक
  3. लीलावती
  4. दिल्ली दरबार दर्पण
  5. मदालसा

इन निबन्धों में समाज की कुरीतियों, राजनीतिक अव्यवस्था, शिक्षा की दुर्दशा और राष्ट्रीय पतन पर गम्भीर चिन्तन किया गया है। ‘दिल्ली दरबार दर्पण’ ऐतिहासिक और सामाजिक दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है।

(घ) यात्रा-वृत्तान्त

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिन्दी साहित्य में यात्रा-वृत्तान्त लेखन की परम्परा को सुदृढ़ आधार प्रदान किया। उनके यात्रा-वृत्तान्त केवल स्थानों का वर्णन नहीं, बल्कि वहाँ के सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय जीवन का सजीव चित्र प्रस्तुत करते हैं।

उनके प्रमुख यात्रा-वृत्तान्त हैं—

  1. सरयू पार की यात्रा
  2. लखनऊ की यात्रा

इन रचनाओं में स्थानों का सूक्ष्म, यथार्थपरक और जीवन्त वर्णन मिलता है। उनकी निरीक्षण-शक्ति और विवरणात्मक शैली इन रचनाओं को विशेष महत्व प्रदान करती है।

(ङ) जीवनी-साहित्य

भारतेन्दु जी ने महापुरुषों की जीवनियाँ लिखकर हिन्दी जीवनी-साहित्य को भी समृद्ध किया। उनकी जीवनियाँ केवल घटनाओं का विवरण नहीं हैं, बल्कि उन महापुरुषों के व्यक्तित्व, कृतित्व और मानवीय गुणों का भावपूर्ण चित्रण प्रस्तुत करती हैं।

उनकी प्रमुख जीवनियाँ हैं—

  1. सूरदास की जीवनी
  2. जयदेव
  3. महात्मा मुहम्मद

इन जीवनियों में भावात्मकता, श्रद्धा और ऐतिहासिक चेतना का सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है।

(च) नाटक-साहित्य

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को हिन्दी नाटक साहित्य का वास्तविक प्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने हिन्दी नाटकों को सामाजिक यथार्थ, राष्ट्रीय चेतना और व्यंग्य से जोड़ा। उनके नाटकों में संवाद-शैली सरल, प्रभावशाली और उद्देश्यपूर्ण है।

मौलिक नाटक—

  1. सत्य हरिश्चन्द्र
  2. नील देवी
  3. श्री चन्द्रावली
  4. भारत दुर्दशा
  5. अन्धेर नगरी
  6. वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति
  7. पण विषमाम्
  8. सती प्रताप
  9. प्रेम योगिनी

इन नाटकों में समाज की कुरीतियों, राजनीतिक अव्यवस्था और राष्ट्रीय दुर्दशा का सशक्त चित्रण मिलता है। विशेष रूप से ‘अन्धेर नगरी’ व्यंग्यात्मक शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है और हिन्दी नाटक साहित्य की एक अमर कृति मानी जाती है।

अनूदित नाटक—

  1. विद्या सुन्दर
  2. धुन्ध
  3. नाव
  4. मुद्राराक्षस
  5. भारत जनः
  6. पाखण्ड विडम्बन
  7. कर्पूर मंजरी
  8. धनंजय विजय

इन अनुवादों के माध्यम से भारतेन्दु जी ने संस्कृत और अन्य भाषाओं के श्रेष्ठ नाटकों को हिन्दी पाठकों तक पहुँचाया।

इस प्रकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का साहित्यिक योगदान हिन्दी साहित्य के प्रत्येक क्षेत्र में मौलिक, प्रेरणादायक और युग-निर्माणकारी रहा है। उन्होंने हिन्दी साहित्य को न केवल विविध विधाओं से समृद्ध किया, बल्कि उसे आधुनिक चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय भावना से भी जोड़ा। उनकी कृतियाँ आज भी हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर मानी जाती हैं।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र : प्रमुख कृतियाँ (सारणी)

क्रमसाहित्यिक विधाप्रमुख कृतियाँ
1.काव्य-साहित्यप्रेम सरोवर, प्रेम तरंग, भक्त-सर्वस्व, भारत-वीणा, सतसई-शृंगार, प्रेम-प्रलाप, प्रेम फुलवारी, वैजयन्ती
2.कथा-साहित्यमदालसोपाख्यान, हमीर हठ, सावित्री चरित्र, कुछ आप बीती, कुछ जग बीती
3.निबन्ध-साहित्यसुलोचना, परिहास वंचक, लीलावती, दिल्ली दरबार दर्पण, मदालसा
4.यात्रा-वृत्तान्तसरयू पार की यात्रा, लखनऊ की यात्रा
5.जीवनी-साहित्यसूरदास की जीवनी, जयदेव, महात्मा मुहम्मद
6.नाटक-साहित्य (मौलिक)सत्य हरिश्चन्द्र, नील देवी, श्री चन्द्रावली, भारत दुर्दशा, अन्धेर नगरी, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, पण विषमाम्, सती प्रताप, प्रेम योगिनी
7.नाटक-साहित्य (अनूदित)विद्या सुन्दर, धुन्ध, नाव, मुद्राराक्षस, भारत जनः, पाखण्ड विडम्बन, कर्पूर मंजरी, धनंजय विजय

भाषागत विशेषताएँ

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की भाषा-शैली उनके सम्पूर्ण साहित्य की सबसे बड़ी और विशिष्ट शक्ति मानी जाती है। उन्होंने ऐसे समय में हिन्दी भाषा को सशक्त रूप प्रदान किया, जब गद्य भाषा न तो पूर्णतः विकसित थी और न ही व्यापक जन-स्वीकृति प्राप्त कर सकी थी। भारतेन्दु जी ने भाषा को कृत्रिमता से मुक्त कर उसे जनसामान्य के जीवन से जोड़ा, जिससे हिन्दी साहित्य को नवीन प्राणशक्ति प्राप्त हुई।

1. काव्य में ब्रजभाषा और गद्य में खड़ी बोली का प्रयोग

भारतेन्दु जी ने काव्य-रचना में मुख्यतः ब्रजभाषा का प्रयोग किया। ब्रजभाषा उस समय काव्य-अभिव्यक्ति की सर्वाधिक समृद्ध और लोकप्रिय भाषा थी। उनकी कविताओं में ब्रजभाषा की माधुर्य, कोमलता और भावात्मकता स्पष्ट दिखाई देती है।

इसके विपरीत, गद्य-रचनाओं में उन्होंने परिष्कृत खड़ी बोली हिन्दी का प्रयोग किया। यह हिन्दी गद्य के विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था। खड़ी बोली को उन्होंने सरल, स्पष्ट और प्रवाहपूर्ण बनाकर गद्य की समर्थ भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। यही कारण है कि उन्हें हिन्दी गद्य का जनक कहा जाता है।

2. सरल, सहज और बोधगम्य भाषा

भारतेन्दु जी की भाषा की एक प्रमुख विशेषता उसकी सरलता और सहजता है। उन्होंने जटिल, संस्कृतनिष्ठ और दुरूह भाषा से परहेज किया। उनकी भाषा ऐसी है जिसे साधारण शिक्षित व्यक्ति भी आसानी से समझ सकता है। वाक्य-रचना सामान्यतः छोटी, स्पष्ट और प्रभावपूर्ण है, जिससे विचार सीधे पाठक के मन तक पहुँचते हैं।

उनका उद्देश्य भाषा को विद्वानों तक सीमित न रखकर जनसाधारण की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाना था। इस दृष्टि से उनकी भाषा आधुनिक हिन्दी के विकास की आधारशिला सिद्ध हुई।

3. शब्द-सम्पदा की विविधता

भारतेन्दु जी की भाषा में शब्दों की अद्भुत विविधता देखने को मिलती है। उन्होंने—

  • तत्सम शब्दों का प्रयोग विचारात्मक और गम्भीर विषयों में किया,
  • तद्भव और देशज शब्दों का प्रयोग जनजीवन के यथार्थ चित्रण में किया,
  • उर्दू और फारसी शब्दों का प्रयोग सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भों में किया,
  • तथा अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग आधुनिकता और नवीन अवधारणाओं को व्यक्त करने के लिए किया।

इस बहुस्तरीय शब्द-सम्पदा के कारण उनकी भाषा न तो बोझिल प्रतीत होती है और न ही कृत्रिम, बल्कि स्वाभाविक और जीवन्त बन जाती है।

4. लोक-प्रचलित शब्दों, मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग

भारतेन्दु जी ने भाषा को प्रभावशाली बनाने के लिए लोक-प्रचलित शब्दों, मुहावरों और लोकोक्तियों का भरपूर प्रयोग किया। इससे उनकी भाषा में देशजता और जीवंतता आ गई। मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रयोग से उनके गद्य और नाटकों में संवादात्मकता तथा प्रभावशीलता बढ़ गई।

यह विशेषता उनकी भाषा को जनमानस के अत्यन्त निकट ले आती है और पाठक को आत्मीयता का अनुभव कराती है।

5. अलंकारिकता और भावात्मकता

यद्यपि भारतेन्दु जी की भाषा सरल है, फिर भी उसमें अलंकारिक सौन्दर्य की कमी नहीं है। उन्होंने आवश्यकता के अनुसार उपमा, रूपक, व्यंग्य और अन्य अलंकारों का प्रयोग किया है। इससे भाषा न केवल सुन्दर बनती है, बल्कि भावों की अभिव्यक्ति भी अधिक सशक्त हो जाती है।

विशेष रूप से उनके नाटकों और जीवनी-साहित्य में भावात्मक अभिव्यक्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। करुणा, राष्ट्र-प्रेम, हास्य और व्यंग्य—इन सभी भावों को उन्होंने भाषा के माध्यम से अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।

6. उद्देश्यपरक और प्रभावशाली भाषा

भारतेन्दु जी की भाषा केवल सौन्दर्य-प्रधान नहीं है, बल्कि उद्देश्यपरक भी है। वे भाषा का प्रयोग समाज-सुधार, राष्ट्रीय चेतना और हिन्दी-प्रेम के प्रचार के लिए करते हैं। उनकी भाषा पाठक को सोचने, समझने और जागरूक होने के लिए प्रेरित करती है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की भाषागत विशेषताएँ ही उन्हें हिन्दी साहित्य में विशिष्ट स्थान प्रदान करती हैं। काव्य में ब्रजभाषा और गद्य में खड़ी बोली का संतुलित प्रयोग, सरलता-सहजता, शब्द-सम्पदा की विविधता, लोक-भाषा का प्रभाव और अलंकारिक सौन्दर्य—इन सभी तत्वों के कारण उनकी भाषा आधुनिक हिन्दी की आधारभूत संरचना बन गई। हिन्दी भाषा को जनसाधारण की सशक्त अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने में भारतेन्दु जी का योगदान अविस्मरणीय है।

शैलीगत विशेषताएँ

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह विषय, उद्देश्य और भाव के अनुरूप निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। वे किसी एक निश्चित शैली तक सीमित नहीं रहे, बल्कि जिस रचना में जिस प्रकार की अभिव्यक्ति की आवश्यकता हुई, उसी के अनुसार उन्होंने अपनी शैली को ढाल लिया। इसी कारण उनकी रचनाओं में शैली-वैविध्य स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। उनके साहित्य में वर्णनात्मक, विवरणात्मक, विचारात्मक, भावात्मक, व्यंग्यात्मक तथा हास्यपूर्ण—सभी प्रकार की शैलियाँ उपलब्ध हैं। इन शैलियों का संक्षिप्त नहीं, बल्कि प्रभावपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण प्रयोग भारतेन्दु जी की साहित्यिक प्रतिभा को उजागर करता है।

1. वर्णनात्मक शैली

वर्णनात्मक शैली का प्रयोग भारतेन्दु जी ने मुख्यतः इतिहास, समाज और समकालीन घटनाओं के वर्णन के लिए किया है। इस शैली में लेखक किसी घटना, वस्तु अथवा परिस्थिति का सजीव, क्रमबद्ध और स्पष्ट चित्रण करता है। भारतेन्दु जी के वर्णन में तथ्यपरकता के साथ-साथ भाषा की सरलता और प्रवाह भी दिखाई देता है।

उनकी प्रसिद्ध रचना ‘दिल्ली-दरबार दर्पण’ में वर्णनात्मक शैली का उत्कृष्ट उदाहरण मिलता है। इस कृति में उन्होंने दिल्ली दरबार की भव्यता, वहाँ की व्यवस्था, शासकीय तंत्र और सामाजिक वातावरण का यथार्थ एवं प्रभावपूर्ण वर्णन किया है। इस शैली के माध्यम से वे पाठक के मन में उस समय की परिस्थितियों का सजीव चित्र उपस्थित कर देते हैं।

2. विवरणात्मक शैली

विवरणात्मक शैली में वस्तु, स्थान अथवा घटना का सूक्ष्म, बारीक और तथ्यात्मक विवरण प्रस्तुत किया जाता है। भारतेन्दु जी ने इस शैली का प्रयोग विशेष रूप से अपने यात्रा-वृत्तान्तों में किया है।

उनकी रचनाएँ ‘सरयू पार की यात्रा’ तथा ‘लखनऊ की यात्रा’ इस शैली के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। इन यात्रा-वृत्तान्तों में उन्होंने मार्ग, नगर, जनजीवन, रहन-सहन, सामाजिक व्यवहार तथा सांस्कृतिक विशेषताओं का विस्तारपूर्वक और सटीक विवरण प्रस्तुत किया है। इस शैली के कारण पाठक को ऐसा अनुभव होता है मानो वह स्वयं उस यात्रा का सहभागी हो। विवरणात्मक शैली में उनकी निरीक्षण-शक्ति और वर्णन-कौशल स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

3. विचारात्मक शैली

विचारात्मक शैली भारतेन्दु जी की बौद्धिक क्षमता, तर्कशक्ति और राष्ट्रीय चेतना को प्रकट करती है। इस शैली में लेखक किसी विषय पर गम्भीरता से विचार करता है, समस्याओं का विश्लेषण करता है और समाधान प्रस्तुत करता है।

उनका प्रसिद्ध निबन्ध ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ विचारात्मक शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस निबन्ध में उन्होंने भारत की दुर्दशा के कारणों पर गहन चिन्तन किया है और देश की उन्नति के लिए शिक्षा, उद्योग, स्वदेशी, सामाजिक सुधार और भाषा-प्रेम पर बल दिया है। इस शैली में उनके वाक्य सुगठित, तार्किक और विचार-प्रधान हैं। विचारों की स्पष्टता और विश्लेषणात्मक दृष्टि इस शैली की प्रमुख विशेषता है।

4. भावात्मक शैली

भावात्मक शैली में लेखक के हृदय-पक्ष की प्रधानता होती है। इस शैली में करुणा, प्रेम, दुःख, वेदना, राष्ट्र-प्रेम और मानवीय संवेदनाएँ सहज रूप से व्यक्त होती हैं। भारतेन्दु जी ने इस शैली का प्रयोग विशेष रूप से जीवनी-साहित्य और नाटकों में किया है।

उनकी रचनाएँ ‘भारत दुर्दशा’, ‘जयदेव की जीवनी’ और ‘सूरदास की जीवनी’ भावात्मक शैली के सशक्त उदाहरण हैं। ‘भारत दुर्दशा’ में उन्होंने देश की दयनीय स्थिति पर करुण भाव प्रकट किया है, जिससे पाठक का हृदय द्रवित हो उठता है। इस शैली में भाषा सरल, मार्मिक और भाव-प्रवण है, जिससे लेखक और पाठक के बीच भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।

5. व्यंग्यात्मक शैली

व्यंग्यात्मक शैली भारतेन्दु जी की सबसे प्रभावशाली शैलियों में से एक है। उनके व्यंग्य में केवल हास्य नहीं, बल्कि समाज-सुधार की तीव्र भावना निहित है। वे समाज की कुरीतियों, राजनीतिक अव्यवस्था, नैतिक पतन और राष्ट्रीय निष्क्रियता पर करारा प्रहार करते हैं।

उनका प्रसिद्ध कथन—
“हमारे हिन्दुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी हैं।”
व्यंग्यात्मक शैली का श्रेष्ठ उदाहरण है। इस कथन के माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज की निष्क्रियता और कुशल नेतृत्व के अभाव पर तीखा व्यंग्य किया है। जिस प्रकार इंजन के बिना रेलगाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती, उसी प्रकार उचित नेतृत्व के अभाव में समाज भी प्रगति नहीं कर सकता—यह भाव व्यंग्य के माध्यम से अत्यन्त प्रभावी ढंग से व्यक्त हुआ है।

6. हास्यपूर्ण शैली

हास्यपूर्ण शैली में भारतेन्दु जी ने समाज की रूढ़ियों, अन्धविश्वासों और कुरीतियों को हँसी के माध्यम से उजागर किया है। उनका हास्य केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पाठक को सोचने पर विवश करता है।

उनके नाटकों ‘अन्धेर नगरी’ और ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ में हास्य-व्यंग्य की प्रधानता है। ‘अन्धेर नगरी’ में शासन-व्यवस्था, न्याय-प्रणाली और सामाजिक मूर्खताओं पर किया गया हास्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है। निबन्धों में भी यत्र-तत्र हास्यपूर्ण शैली के दर्शन होते हैं। उनके हास्य में कटाक्ष, चुटीलापन और सुधार की भावना स्पष्ट दिखाई देती है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की शैली बहुरूपी, उद्देश्यपूर्ण और प्रभावशाली है। उनकी शैली न केवल साहित्यिक सौन्दर्य प्रदान करती है, बल्कि समाज को दिशा देने का कार्य भी करती है। शैलीगत विविधता के कारण ही उनकी रचनाएँ आज भी पाठकों को आकर्षित करती हैं और हिन्दी साहित्य में उन्हें युग-प्रवर्तक लेखक का गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है।

हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का स्थान

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी साहित्य के इतिहास में युग-निर्माता साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वे उस संक्रमणकाल के प्रतिनिधि लेखक हैं, जब हिन्दी साहित्य प्राचीन परम्पराओं से निकलकर आधुनिक चेतना की ओर अग्रसर हो रहा था। उनके आगमन से पूर्व हिन्दी साहित्य मुख्यतः कविता-प्रधान था और गद्य का स्वरूप न तो विकसित था, न ही सुव्यवस्थित। ऐसे समय में भारतेन्दु जी ने न केवल हिन्दी गद्य को सुदृढ़ आधार प्रदान किया, बल्कि साहित्य को आधुनिक दृष्टि, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय भावना से भी सम्पन्न किया। इसी कारण उन्हें आधुनिक हिन्दी साहित्य तथा हिन्दी गद्य का जनक कहा जाता है।

हिन्दी गद्य के जनक के रूप में योगदान

भारतेन्दु जी का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान हिन्दी गद्य के क्षेत्र में माना जाता है। उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी को गद्य की सशक्त, सुगठित और परिष्कृत भाषा के रूप में स्थापित किया। उनके पूर्व गद्य भाषा में न तो स्थिरता थी और न ही व्यापक अभिव्यक्ति की क्षमता। भारतेन्दु जी ने सरल, प्रवाहपूर्ण और जनसाधारण की समझ में आने वाली भाषा का प्रयोग कर गद्य को लोकप्रिय बनाया। उनके निबन्ध, नाटक, यात्रा-वृत्तान्त और जीवनियाँ हिन्दी गद्य के विकास में मील का पत्थर सिद्ध हुईं।

विविध साहित्यिक विधाओं के प्रवर्तक

भारतेन्दु जी का स्थान इसलिए भी विशिष्ट है कि उन्होंने हिन्दी साहित्य में विविध गद्य विधाओं का सूत्रपात किया। निबन्ध, नाटक, आलोचना, यात्रा-वृत्तान्त, जीवनी और पत्रकारिता—इन सभी क्षेत्रों में उन्होंने सृजन कर हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया। विशेष रूप से हिन्दी नाटक साहित्य को उन्होंने सामाजिक यथार्थ, व्यंग्य और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा। ‘अन्धेर नगरी’ और ‘भारत दुर्दशा’ जैसे नाटक आज भी प्रासंगिक माने जाते हैं।

हिन्दी भाषा के प्रबल समर्थक

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र केवल साहित्यकार ही नहीं, बल्कि हिन्दी भाषा के सशक्त प्रवक्ता भी थे। वे मानते थे कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति उसकी भाषा की उन्नति से जुड़ी होती है। उनका प्रसिद्ध दोहा—

“निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।
बिनु निजभाषा ज्ञान के मिटे न हिय को सूल।”

उनकी भाषा-चेतना और राष्ट्रप्रेम का स्पष्ट प्रमाण है। वे हिन्दी को केवल साहित्य की भाषा नहीं, बल्कि जन-जीवन, शिक्षा और प्रशासन की भाषा बनाना चाहते थे। उन्होंने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए अनेक प्रयास किए और जनसाधारण में भाषा के प्रति आत्मगौरव की भावना जाग्रत की।

सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना के संवाहक

भारतेन्दु जी के साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना है। उन्होंने समाज की रूढ़ियों, अन्धविश्वासों, कुरीतियों और राजनीतिक अव्यवस्थाओं पर तीखा प्रहार किया। उनका साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज-सुधार और राष्ट्रीय जागरण का माध्यम भी था। इस दृष्टि से वे आधुनिक हिन्दी साहित्य के पहले सशक्त राष्ट्रवादी लेखक माने जाते हैं।

समकालीन और परवर्ती साहित्य पर प्रभाव

भारतेन्दु जी ने जिस साहित्यिक परम्परा की नींव रखी, उसी से आगे चलकर द्विवेदी युग और छायावाद जैसे साहित्यिक आन्दोलन विकसित हुए। उनके द्वारा निर्मित साहित्यिक वातावरण ने अनेक लेखकों और कवियों को प्रेरणा दी। उनकी बहुमुखी प्रतिभा, साहित्यिक सक्रियता और संगठनात्मक क्षमता ने हिन्दी साहित्य को एक सुदृढ़ मंच प्रदान किया।

प्रसिद्ध छायावादी कवि सुमित्रानन्दन पन्त ने भारतेन्दु जी के योगदान को इन पंक्तियों में अत्यन्त सारगर्भित रूप में व्यक्त किया है—

“भारतेन्दु कर गए भारती की बीणा निर्माण।
किया अमर स्पर्शों ने जिसका बहु विधि स्वर संधान।”

इन पंक्तियों में यह भाव निहित है कि भारतेन्दु जी ने हिन्दी साहित्य रूपी वीणा का निर्माण किया, जिसे आगे चलकर अनेक कवियों और लेखकों ने अपने-अपने स्वर देकर समृद्ध किया।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी साहित्य के ऐसे स्तम्भ हैं, जिनके बिना आधुनिक हिन्दी साहित्य की संरचना की कल्पना ही नहीं की जा सकती। वे न केवल हिन्दी गद्य के जनक हैं, बल्कि आधुनिक हिन्दी साहित्य के वास्तविक प्रवर्तक भी हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा, भाषा-प्रेम और राष्ट्रीय चेतना ने हिन्दी साहित्य को नवीन दिशा और स्थायित्व प्रदान किया। उन्होंने हिन्दी साहित्य की जो मजबूत आधारशिला रखी, उसी पर आज हिन्दी का भव्य और सुदृढ़ साहित्यिक भवन खड़ा है। अल्पायु में देहान्त होने के बावजूद उन्होंने हिन्दी साहित्य को जो दिशा और आधार प्रदान किया, वह सदा स्मरणीय रहेगा।


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