हिंदी साहित्य के रीतिकाल में जहाँ एक ओर अधिकांश कवि दरबारी संरक्षण में शृंगार, नायिका‑भेद, नख‑शिख वर्णन और विलासिता की अभिव्यक्ति में संलग्न थे, वहीं दूसरी ओर एक ऐसे कवि का प्रादुर्भाव हुआ जिसने अपनी ओजस्वी वाणी से राष्ट्र, स्वाभिमान और वीरता का सिंहनाद किया। यह कवि थे — महाकवि भूषण। भूषण केवल वीर रस के कवि ही नहीं थे, बल्कि वे भारतीय संस्कृति, स्वाधीनता‑चेतना और राष्ट्रीय गौरव के सच्चे उपासक थे। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से उस युग में राष्ट्रीयता की चेतना को जाग्रत किया, जब साहित्य का अधिकांश भाग राजदरबारों की विलासिता का साधन बन चुका था।
रीतिकालीन पृष्ठभूमि और भूषण का उदय
भूषण का आविर्भाव जिस काल में हुआ, वह हिंदी साहित्य का रीतिकाल कहलाता है। इस काल की प्रमुख विशेषता शृंगार रस की प्रधानता थी। कवि अपने आश्रयदाता राजाओं को प्रसन्न करने के लिए सुरा‑सुंदरी, नायिका‑भेद, अंग‑प्रत्यंग वर्णन और प्रेम‑विलास से संबंधित रचनाएँ कर रहे थे। साहित्य का उद्देश्य जनजीवन को जाग्रत करना न होकर राजदरबारों का मनोरंजन बन गया था।
ऐसे वातावरण में भूषण का प्रकट होना हिंदी साहित्य के लिए एक क्रांतिकारी घटना थी। उन्होंने अपने काव्य को न तो विलासिता का माध्यम बनाया और न ही चाटुकारिता का। इसके विपरीत, उन्होंने अपने काव्य में वीर रस, ओज, राष्ट्रीय चेतना और स्वाधीनता का स्वर भर दिया। उनकी कविता तलवार की धार की तरह तीक्ष्ण और सिंहनाद की तरह गूँजने वाली थी।
महाकवि भूषण : संक्षिप्त जीवन-परिचय (तालिका)
| शीर्षक | विवरण |
|---|---|
| प्रसिद्ध नाम | महाकवि भूषण |
| अन्य नाम (किवदंती अनुसार) | पतिराम, मनिराम |
| उपाधि | भूषण |
| जन्म | विक्रम संवत 1670 (लगभग 1613 ई.) |
| जन्म-भूमि | तिकवांपुर, कानपुर (उत्तर प्रदेश) |
| पिता / अभिभावक | पं. रत्नाकर त्रिपाठी |
| मृत्यु | विक्रम संवत 1772 (लगभग 1714–1715 ई.) |
| काल | रीतिकाल |
| कर्म-भूमि | कानपुर एवं विभिन्न राजदरबार |
| कर्म-क्षेत्र / पेशा | कविता |
| विधा | रीतिग्रंथ |
| काव्य-विषय | वीर रस का काव्य |
| प्रमुख भाषा | ब्रजभाषा |
| अन्य भाषाओं का ज्ञान | अरबी, फारसी, तुर्की |
| मुख्य रचनाएँ | शिवराजभूषण, शिवाबावनी, छत्रसालदशक |
| प्रसिद्धि का कारण | वीर-काव्य एवं ओजस्वी वीर रस |
| विशेष योगदान | रीतिकाल में वीर रस परंपरा को सशक्त रूप प्रदान करना |
महाकवि भूषण जी का जीवन-परिचय
महाकवि भूषण का जन्म कानपुर जिले के तिकवांपुर नामक गाँव में विक्रम संवत 1670 (सन 1613 ई.) में हुआ माना जाता है। यद्यपि कुछ विद्वानों ने उनके जन्मकाल के विषय में भिन्न-भिन्न तिथियाँ प्रस्तुत की हैं, तथापि 1613 ईस्वी को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है। उनके पिता का नाम पं. रत्नाकर त्रिपाठी था, जो संस्कृत और साहित्य के ज्ञाता थे। भूषण का पारिवारिक वातावरण विद्वत्ता और साहित्यिक संस्कारों से परिपूर्ण था।
काल-निर्धारण और ऐतिहासिक मत
महाकवि भूषण हिंदी साहित्य के रीतिकालीन वीर रस के सर्वाधिक प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। उनके जीवनकाल के विषय में विद्वानों में मतभेद मिलता है। मिश्रबंधु तथा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भूषण का समय 1613 ई. से 1715 ई. के मध्य माना है। दूसरी ओर शिवसिंह संगर ने उनका जन्म 1681 ई., जबकि ग्रियर्सन ने 1603 ई. स्वीकार किया है। इन मतभेदों के बावजूद अधिकांश साहित्येतिहासकार यह मानते हैं कि भूषण छत्रपति शिवाजी महाराज के समकालीन थे और उन्हीं के आश्रय में उनका प्रमुख काव्य-सृजन हुआ।
जन्म, वंश और सामाजिक परिचय
भूषण का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान कानपुर जनपद में यमुना नदी के तट पर स्थित तिकवांपुर (त्रिविक्रमपुर) नामक ग्राम में माना जाता है। यह वही क्षेत्र है जिसे साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टि से प्राचीन काल से महत्त्वपूर्ण माना जाता रहा है। स्वयं भूषण ने ‘शिवराजभूषण’ में अपना परिचय देते हुए उल्लेख किया है कि वे—
- कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे।
- उनका गोत्र कश्यप था।
- वे पं. रत्नाकर त्रिपाठी के पुत्र थे।
उनका पारिवारिक वातावरण विद्या, शास्त्र और काव्य-संस्कारों से सम्पन्न था, जिसने उनके व्यक्तित्व को गहराई प्रदान की।
परिवार और साहित्यिक परंपरा
भूषण एक ऐसे परिवार से संबंधित थे, जहाँ काव्य-प्रतिभा वंशानुगत रूप से विद्यमान थी। सामान्यतः उन्हें चार भाइयों में एक माना जाता है—
- चिंतामणि
- मतिराम
- भूषण
- नीलकंठ (जिनका उपनाम जटाशंकर भी बताया जाता है)
इनमें चिंतामणि और मतिराम रीतिकाल के प्रतिष्ठित श्रृंगार रस के कवि थे। नीलकंठ भी साहित्य-साधना से जुड़े माने जाते हैं। यद्यपि कुछ विद्वानों ने भूषण का वास्तविक नाम पतिराम या मनिराम होने की संभावना व्यक्त की है, किंतु इसके ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। साहित्यिक परंपरा में वे अपनी ‘भूषण’ उपाधि से ही सर्वमान्य हैं।
जहाँ उनके भाई दरबारी श्रृंगार-काव्य में रमे रहे, वहीं भूषण ने वीरता, स्वाधीनता और राष्ट्रधर्म को अपनी कविता का मूल स्वर बनाया। यही कारण है कि वे अपने समकालीनों से भिन्न और विशिष्ट प्रतीत होते हैं।
नाम और ‘भूषण’ उपाधि
भूषण को यह नाम जन्म से प्राप्त नहीं था। साहित्यिक मान्यता के अनुसार चित्रकूट के सोलंकी वंशीय राजा रुद्र (हृदयराम के पुत्र) ने उनके ओजस्वी कवित्व से प्रभावित होकर उन्हें ‘कविभूषण’ की उपाधि प्रदान की। आगे चलकर यही उपाधि संक्षेप में ‘भूषण’ बन गई और वे इसी नाम से हिंदी साहित्य में प्रसिद्ध हुए।
आश्रयदाता और दरबारी जीवन
जीवन-यापन के लिए भूषण को विभिन्न राजदरबारों का आश्रय लेना पड़ा। प्रारंभ में वे दिल्ली पहुँचे, जहाँ उस समय मुगल सम्राट औरंगज़ेब का शासन था। कुछ समय तक उनका संबंध मुगल दरबार से भी रहा, परंतु उनकी स्वतंत्र चेतना, निर्भीक स्वभाव और राष्ट्रधर्मी दृष्टि वहाँ के वातावरण से सामंजस्य स्थापित नहीं कर सकी।
इसके पश्चात भूषण को ऐसे आश्रयदाता मिले, जो उनके काव्य-स्वभाव के अनुकूल थे। उनके प्रमुख आश्रयदाता—
- छत्रपति शिवाजी महाराज
- बुंदेलखंड के वीर शासक महाराज छत्रसाल
थे। भूषण के जीवन का सर्वाधिक सृजनात्मक काल शिवाजी के संरक्षण में माना जाता है। कुछ विद्वानों ने उन्हें शिवाजी के पौत्र साहू का दरबारी कवि भी बताया है, किंतु यह मत प्रायः भ्रान्त और असंगत माना गया है, क्योंकि ऐतिहासिक तथ्यों से भूषण का शिवाजी के समकालीन होना ही प्रमाणित होता है।
भूषण के नाम से कुछ ऐसे फुटकर छंद भी मिलते हैं, जिनमें साहूजी, बाजीराव, जयसिंह, रानसिंह, दारा शिकोह, औरंगज़ेब आदि की प्रशंसा है, परंतु इन छंदों के भूषण-रचित होने का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है। अतः इन शासकों को भूषण का आश्रयदाता मानना उचित नहीं माना जाता।
काव्य और आश्रय का संबंध
भूषण का काव्य आश्रयदाता-प्रशंसा मात्र नहीं है। शिवाजी और छत्रसाल के प्रति उनकी प्रशंसा इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि ये दोनों शासक—
- विदेशी सत्ता के विरुद्ध संघर्षरत थे।
- जननायक और राष्ट्ररक्षक थे।
इसी कारण भूषण की कविता में दरबारी चाटुकारिता नहीं, बल्कि वीरता और स्वाधीनता की गर्जना सुनाई देती है।
निधन
महाकवि भूषण का देहावसान विक्रम संवत 1772 (लगभग 1714–1715 ई.) के आसपास माना जाता है। उनके जीवन के अंतिम वर्षों से संबंधित ऐतिहासिक विवरण सीमित हैं, फिर भी यह स्पष्ट है कि उनका सम्पूर्ण जीवन संघर्ष, आत्मसम्मान और वैचारिक दृढ़ता से भरा रहा।
भूषण ने काव्य को केवल जीविका का साधन नहीं बनाया, बल्कि उसे वीरता, राष्ट्रचेतना और स्वाभिमान की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। उनके निधन के पश्चात भी उनकी ओजस्वी वाणी और वीर रस से परिपूर्ण काव्य परंपरा हिंदी साहित्य में अमर बनी रही। आज भी भूषण की रचनाएँ राष्ट्रीय गौरव और साहस की प्रेरक धरोहर के रूप में सम्मानित हैं।
भूषण का जीवन-परिचय यह स्पष्ट करता है कि वे केवल रीतिकाल के कवि नहीं, बल्कि उस युग में राष्ट्रीय चेतना के सशक्त प्रवक्ता थे। उनका जीवन स्वयं उनकी कविता की भाँति ओजस्वी, निर्भीक और स्वाधीनता-प्रेम से अनुप्राणित था।
‘भूषण’ उपाधि और आश्रयदाता
महाकवि भूषण के जीवन से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण तथ्य उनकी ‘भूषण’ उपाधि से जुड़ा है। साहित्यिक परंपरा के अनुसार यह उपाधि उन्हें चित्रकूट के सोलंकी वंशीय राजा रुद्र द्वारा प्रदान की गई थी। इस सम्मान के उपरांत वे ‘कविभूषण’ के नाम से प्रतिष्ठित हुए और आगे चलकर यही नाम संक्षिप्त होकर ‘भूषण’ के रूप में विख्यात हो गया। उनके जन्मनाम के विषय में निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है, अतः साहित्येतिहास में वे इसी उपाधि-नाम से पहचाने जाते हैं।
यह उपाधि उनके जन्मनाम के स्थान पर साहित्येतिहास में उनकी पहचान बन गई। स्वयं भूषण ने अपने ग्रंथ ‘शिवराज भूषण’ में इस तथ्य का उल्लेख किया है कि उन्हें यह सम्मान चित्रकूट के सोलंकी वंशीय राजा हृदयराम के पुत्र रुद्रशाह द्वारा प्रदान किया गया था। इस संदर्भ में भूषण का प्रसिद्ध दोहा उल्लेखनीय है—
कुल सुलंकि चित्रकूट-पति साहस सील-समुद्र।
कवि भूषण पदवी दई, हृदय राम सुत रुद्र॥
इस दोहे से स्पष्ट होता है कि ‘भूषण’ उनका मूल नाम नहीं, बल्कि राजाश्रय से प्राप्त एक सम्मानसूचक उपाधि थी, जो आगे चलकर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का स्थायी परिचायक बन गई। जन्मनाम के विषय में कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध न होने के कारण हिंदी साहित्य में वे इसी उपाधि-नाम से विख्यात हैं।
भूषण अपने जीवनकाल में विभिन्न राजाओं के संपर्क में आए और अनेक दरबारों में रहे, किंतु उनका मन साधारण प्रशस्ति या दरबारी चाटुकारिता में नहीं रमा। अंततः उन्हें ऐसा आश्रयदाता प्राप्त हुआ, जो उनके वीरकाव्य की भावना और राष्ट्रीय दृष्टि के अनुकूल था—छत्रपति शिवाजी महाराज। शिवाजी न केवल भूषण के काव्यनायक बने, बल्कि उनकी कविता को उद्देश्य और दिशा भी प्रदान की।
इसके अतिरिक्त बुंदेलखंड के शासक महाराज छत्रसाल के दरबार में भी भूषण को अत्यंत सम्मान प्राप्त हुआ। जनश्रुति के अनुसार महाराज छत्रसाल ने एक अवसर पर भूषण की पालकी को स्वयं कंधा देकर सम्मानित किया था। इस घटना से प्रभावित होकर भूषण के मुख से यह प्रसिद्ध पंक्ति निकली—
“सिवा को बखानौं कि बखानौं छत्रसाल को।”
यह कथन इस बात का प्रमाण है कि भूषण दोनों ही वीर नायकों को समान श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखते थे।
लोकप्रचलित कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज भूषण की कविताओं से अत्यंत प्रसन्न रहते थे और कहा जाता है कि प्रत्येक छंद पर उन्हें अपार धनराशि प्रदान की जाती थी। यद्यपि इन कथाओं का ऐतिहासिक प्रमाण सीमित है, फिर भी यह निर्विवाद है कि भूषण को अपने युग के वीर शासकों से असाधारण आदर और प्रतिष्ठा प्राप्त थी।
इस प्रकार ‘भूषण’ उपाधि केवल एक सम्मानसूचक नाम नहीं, बल्कि उस कवि-प्रतिभा और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है, जिसने उन्हें रीतिकाल के अन्य दरबारी कवियों से अलग और विशिष्ट बना दिया।
भूषण का काव्य‑स्वभाव
भूषण मूलतः वीर रस के कवि हैं। उनकी कविता में तलवारों की झंकार, रणभूमि का दृश्य, वीरों का उत्साह और स्वाधीनता की चेतना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनके काव्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
- वीर रस की प्रधानता – भूषण की रचनाओं में वीरता, पराक्रम, शौर्य और युद्ध‑कौशल का प्रभावशाली वर्णन मिलता है।
- राष्ट्रीय चेतना – उन्होंने विदेशी शासन और अत्याचार के विरुद्ध स्वाधीनता की भावना को जाग्रत किया।
- ओजस्वी भाषा – उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठता, दृढ़ता और ओज का समन्वय है।
- अलंकारिक सौंदर्य – भूषण अलंकारों के कुशल प्रयोगकर्ता थे, किंतु उनका उद्देश्य सौंदर्य से अधिक प्रभाव उत्पन्न करना था।
महाकवि भूषण की प्रमुख कृतियाँ और साहित्यिक योगदान
महाकवि भूषण का साहित्यिक अवदान मुख्यतः वीर रस प्रधान काव्य के रूप में प्रतिष्ठित है। उनकी रचनाओं का केंद्र बिंदु राष्ट्ररक्षा, स्वदेशानुराग, पराक्रम और जननायकों का यशोगान है। उन्होंने अपनी कविता को श्रृंगार और दरबारी प्रशंसा से हटाकर इतिहास और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा। भूषण द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद है, फिर भी सामान्यतः उनके छः ग्रंथ माने जाते हैं, जिनमें से कुछ आज उपलब्ध हैं और कुछ केवल उल्लेखों में मिलते हैं।
भूषण की उपलब्ध प्रमुख रचनाएँ
भूषण की जो रचनाएँ आज उपलब्ध हैं, वे न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, बल्कि हिंदी साहित्य में वीर रस की उत्कृष्ट परंपरा को भी सुदृढ़ करती हैं।
1. शिवाबावनी
‘शिवाबावनी’ भूषण की अत्यंत प्रसिद्ध कृति है। इसमें कुल 52 कवित्तों के माध्यम से छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य, पराक्रम, नीति और राष्ट्ररक्षा संबंधी कार्यों का प्रभावशाली चित्रण किया गया है। इस रचना में—
- शिवाजी को एक वीर योद्धा के रूप में
- मुगल सत्ता के विरुद्ध संघर्षरत राष्ट्रनायक के रूप में
- हिंदू धर्म और संस्कृति के संरक्षक के रूप में
प्रस्तुत किया गया है। ‘शिवाबावनी’ का प्रत्येक छंद ओज, उत्साह और वीरता से परिपूर्ण है, जिससे पाठक के मन में स्वाभिमान और राष्ट्रीय चेतना जागृत होती है।
2. शिवराजभूषण
‘शिवराजभूषण’ भूषण का सबसे विस्तृत और प्रमुख ग्रंथ माना जाता है। इसकी रचना-तिथि स्वयं कवि ने संवत् 1730 (29 अप्रैल 1673 ई.) अंकित की है, जिससे शिवाजी और भूषण की समकालीनता सिद्ध होती है।
इस ग्रंथ की प्रमुख विशेषताएँ—
- इसमें कुल 384–385 पद्य हैं
- यह एक अलंकार-ग्रंथ है
- दोहों में अलंकारों के लक्षण दिए गए हैं
- कवित्त और सवैया छंदों में उनके उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं
इन उदाहरणों के माध्यम से शिवाजी के युद्ध, विजय, नीति और वीरता का वर्णन किया गया है। यद्यपि रीतिग्रंथ के रूप में ‘शिवराजभूषण’ को तकनीकी दृष्टि से सर्वोत्तम नहीं माना गया है—क्योंकि कुछ स्थानों पर लक्षण अस्पष्ट और उदाहरण असंगत प्रतीत होते हैं—फिर भी भावपक्ष और राष्ट्रीय दृष्टि से इसका महत्त्व अत्यधिक है। यह ग्रंथ रीतिकाल में अलंकार और वीर रस के अद्भुत समन्वय का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
3. छत्रसाल दशक
‘छत्रसाल दशक’ में केवल दस कवित्तों के माध्यम से बुंदेलखंड के वीर शासक महाराज छत्रसाल के शौर्य, दानशीलता और स्वाधीनता-प्रेम का वर्णन किया गया है। आकार में छोटा होने पर भी यह ग्रंथ भाव-प्रबलता और ओजस्वी शैली के कारण अत्यंत प्रभावशाली है।
इस कृति में—
- छत्रसाल को विदेशी सत्ता के विरोधी वीर के रूप में
- जन-रक्षक और धर्म-रक्षक के रूप में
चित्रित किया गया है। ‘छत्रसाल दशक’ यह प्रमाणित करता है कि भूषण किसी एक राजा के दरबारी कवि नहीं थे, बल्कि वे राष्ट्र और स्वतंत्रता के गायक थे।
भूषण की अन्य मानी जाने वाली रचनाएँ
भूषण से संबद्ध कुछ अन्य ग्रंथों का उल्लेख साहित्यिक परंपरा में मिलता है, किंतु वे आज पूर्णतः उपलब्ध नहीं हैं। इनमें प्रमुख हैं—
- भूषण उल्लास
- भूषण हज़ारा
- दूषण उल्लास (या दूषनोल्लासा)
इन ग्रंथों का उल्लेख तो मिलता है, परंतु ये अब तक शोधकर्ताओं को संपूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं हो सके हैं। इसलिए इनके विषय-वस्तु और स्वरूप के बारे में निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है। फिर भी, विद्वानों का अनुमान है कि इन रचनाओं में भी भूषण की वही ओजपूर्ण और आलोचनात्मक दृष्टि रही होगी।
फुटकर पद्य और विविध विषयक कवित्त
भूषण के नाम से कुछ फुटकर पद्य भी प्राप्त हुए हैं, जिनमें—
- विभिन्न ऐतिहासिक व्यक्तियों का उल्लेख
- कहीं-कहीं सीमित रूप में श्रृंगारपरक भाव
भी मिलते हैं। किंतु इन पद्यों में भी भूषण की मूल प्रवृत्ति—वीरता और स्वाभिमान—स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
महाकवि भूषण की रचनाएँ (तालिका)
| क्रम | रचना का नाम | रचना का प्रकार | विषय / वर्ण्य-वस्तु | छंद / पद्य संख्या | वर्तमान स्थिति |
|---|---|---|---|---|---|
| 1. | शिवराजभूषण | रीतिग्रंथ (अलंकार ग्रंथ) | छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य, पराक्रम एवं ऐतिहासिक कृत्य | लगभग 384–385 पद्य (दोहे, कवित्त, सवैया) | उपलब्ध |
| 2. | शिवाबावनी | वीर-काव्य | शिवाजी महाराज की कीर्ति, वीरता और राष्ट्रधर्म | 52 छंद | उपलब्ध |
| 3. | छत्रसालदशक | वीर-काव्य | बुंदेला वीर महाराज छत्रसाल का पराक्रम और दानशीलता | 10 छंद | उपलब्ध |
| 4. | भूषणउल्लास | काव्यग्रंथ | वीरता एवं प्रशस्ति-काव्य | अज्ञात | अनुपलब्ध |
| 5. | भूषणहज़ारा | काव्यग्रंथ | विविध वीरों का यशोगान | अज्ञात | अनुपलब्ध |
| 6. | दूषणउल्लास / दूषणोल्लासा | व्यंग्यात्मक काव्य (संभावित) | सामाजिक-राजनीतिक आलोचना | अज्ञात | अनुपलब्ध |
| 7. | फुटकर पद्य | स्वतंत्र कवित्त / सवैया | विभिन्न वीरों, राजाओं एवं विषयों का वर्णन | विविध | आंशिक रूप से उपलब्ध |
संक्षिप्त टिप्पणी
महाकवि भूषण के नाम से कुल छः प्रमुख ग्रंथों का उल्लेख साहित्येतिहास में मिलता है, जिनमें से तीन ग्रंथ पूर्ण रूप से उपलब्ध हैं। शेष रचनाएँ या तो लुप्त हैं अथवा केवल संदर्भों और उल्लेखों के माध्यम से ज्ञात होती हैं। उपलब्ध रचनाओं में वीर रस, ओजपूर्ण शैली और राष्ट्रधर्म की भावना प्रमुख रूप से दिखाई देती है, जो भूषण को रीतिकाल के अन्य कवियों से विशिष्ट बनाती है।
भूषण का काव्यगत सौन्दर्य
महाकवि भूषण की समस्त रचनाएँ मुक्तक परंपरा में रची गई हैं। उन्होंने अपने काव्य का विषय किसी काल्पनिक नायक या प्रणय-वर्णन को न बनाकर, अपने युग के ऐतिहासिक चरित्र-नायकों के विशिष्ट गुणों, पराक्रम और कार्य-कलापों को बनाया है। उनकी कविता में चरित्र-चित्रण का आधार भावुकता नहीं, बल्कि कर्म, संघर्ष और वीरता है।
भूषण के काव्य में वीर रस की स्पष्ट प्रधानता है। यद्यपि दानवीर और धर्मवीर के भी प्रसंग मिलते हैं, किंतु उनके काव्य का केन्द्रीय नायक युद्धवीर ही है। युद्धवीर के चित्रण में कवि ने—
- चतुरंगिणी सेना की साज-सज्जा
- वीरों की गर्वोक्तियाँ
- रणभूमि में योद्धाओं के पौरुषपूर्ण कार्य
- अस्त्र-शस्त्रों की भयंकरता
का अत्यंत सजीव और प्रभावशाली वर्णन किया है। इन वर्णनों में केवल बाह्य दृश्य ही नहीं, बल्कि योद्धाओं के अंतःकरण में उमड़ते उत्साह और उन्मेष भी अभिव्यक्त हुए हैं।
यद्यपि भूषण के काव्य में रौद्र, भयानक और वीभत्स जैसे अन्य रसों की भी झलक मिलती है, पर वे सभी वीर रस की उदात्तता को और अधिक प्रभावशाली बनाने में सहायक बनते हैं। विशेष रूप से वीर रस के साथ रौद्र और भयानक रस का संयोग उनकी कविता को रणभूमि का सजीव अनुभव प्रदान करता है।
रीतिकार के रूप में भूषण और कवित्व का स्वरूप
रीतिकालीन कवि होने के बावजूद भूषण को शास्त्रीय अर्थों में एक सफल रीतिकार नहीं माना जाता। उनके अलंकार-ग्रंथों में—
- लक्षणों की भाषा कहीं-कहीं अस्पष्ट है
- उदाहरण कुछ स्थलों पर रीतिशास्त्रीय दृष्टि से पूर्णतः संगत नहीं बैठते
फिर भी शुद्ध कवित्व की दृष्टि से भूषण का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उनकी कविता में भावों की सच्चाई और ओजस्विता रीतिशास्त्र की सीमाओं को पीछे छोड़ देती है।
प्रकृति-वर्णन के क्षेत्र में भी भूषण ने परंपरागत उद्दीपन और अलंकार-पद्धति का अनुसरण किया है। ‘शिवराजभूषण’ में रायगढ़ के वर्णन के प्रसंग में—
- राजसी वैभव
- पर्वत, वृक्ष, लताएँ
- पक्षियों और प्राकृतिक दृश्यों की गणना
रीतिकालीन परिपाटी के अनुरूप मिलती है, किंतु इनका उद्देश्य सौंदर्य-विलास नहीं, बल्कि नायक की महानता को उभारना है।
भूषण की काव्य-शैली
भूषण की शैली सामान्यतः विवेचनात्मक और संश्लिष्ट है। वे घटनाओं का केवल बाह्य विवरण देने तक सीमित नहीं रहते। युद्ध के साधनों, अस्त्र-शस्त्रों और सेनाओं के वर्णन के साथ-साथ उनका मुख्य ध्यान—
- मानव-हृदय में उत्साह जगाने
- स्वाभिमान और संघर्ष की भावना को प्रखर करने
पर केंद्रित रहता है। इसीलिए उनकी कविता पाठक को केवल जानकारी नहीं देती, बल्कि उसे भावनात्मक रूप से आंदोलित भी करती है।
भूषण की शैली का एक महत्त्वपूर्ण गुण शब्द और भाव का सामंजस्य है। उनकी शब्दावली कठोर होते हुए भी भावों के अनुकूल है और वीर रस के अनिवार्य ओज को पूर्णतः वहन करती है।
भूषण की भाषा
भूषण ने अपने युग की प्रचलित साहित्यिक भाषा ब्रजभाषा को अपनाया है। उनकी ब्रजभाषा की विशेषताएँ इस प्रकार हैं—
- ओजपूर्ण और तेजस्वी अभिव्यक्ति
- तत्सम तथा देशज शब्दों का प्रभावी प्रयोग
- प्रसंगानुसार अरबी, फ़ारसी और तुर्की शब्दों का प्रयोग
विदेशी शब्दों का प्रयोग प्रायः मुगल शासकों, दरबारी प्रसंगों या युद्ध-संबंधी स्थितियों में मिलता है, जिससे भाषा में ऐतिहासिक यथार्थ का बोध होता है। कहीं-कहीं दरबारी वातावरण के कारण भाषा का खड़ा रूप भी दिखाई देता है।
इसके अतिरिक्त भूषण की भाषा में—
- बुंदेलखंडी
- बैसवाड़ी
- अंतर्वेदी
शब्दों का भी सीमित प्रयोग मिलता है, जो उनके काव्य को क्षेत्रीय रंग प्रदान करता है।
यद्यपि उनकी भाषा में ओज की प्रचुरता है, फिर भी—
- व्याकरण के नियमों का उल्लंघन
- वाक्य-रचना की असंगति
- शब्द-रूपों का विकृत या गढ़ंत प्रयोग
भी कहीं-कहीं दिखाई देता है। इसके बावजूद, जिन कवित्तों में ये दोष नहीं हैं, वे अत्यंत प्रभावशाली, सशक्त और स्मरणीय बन पड़े हैं।
‘शिवराजभूषण’ के आरंभिक वर्णनों तथा कुछ श्रृंगारपरक छंदों में भाषा में माधुर्य और प्रसाद की भी झलक मिलती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भूषण केवल ओज के ही नहीं, बल्कि भाव-संतुलन के भी कवि थे।
भूषण की भाषा और शैली : समेकित दृष्टि
समग्र रूप से देखा जाए तो भूषण की भाषा और शैली—
- वीर रस के पूर्णतः अनुकूल
- रणभूमि के गर्जन जैसी प्रभावशाली
- भावोत्तेजक और प्रेरणादायक
है। उनकी कविता पढ़ते समय पाठक केवल शब्द नहीं पढ़ता, बल्कि इतिहास के जीवंत क्षणों का अनुभव करता है।
भूषण की रचनाएँ संख्या में सीमित होते हुए भी—
- भाव की दृष्टि से व्यापक
- उद्देश्य की दृष्टि से उदात्त
- प्रभाव की दृष्टि से गहन
हैं। उनकी कविता—
- इतिहास और साहित्य का सजीव संगम है
- वीर रस का उत्कर्ष है
- राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष है
इसी कारण भूषण हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय कवि, वीर रस के ओजस्वी गायक और रीतिकाल के युगान्तरकारी रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
हिंदी साहित्य में भूषण का स्थान
भूषण का हिंदी साहित्य में स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे रीतिकाल के ऐसे कवि हैं जिन्होंने साहित्य को विलासिता से निकालकर राष्ट्र और जनता से जोड़ा। उनके काव्य ने जनमानस में वीरता और स्वाभिमान की भावना को जाग्रत किया।
प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भूषण के विषय में लिखा है—
“प्रेम और विलासिता के साहित्य का ही उन दिनों प्राधान्य था, उसमें उन्होंने वीर रस की रचना की, यही उनकी विशेषता है।”
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भूषण को राष्ट्रीय भावना का प्रतिनिधि कवि मानते हुए कहा—
“शिवाजी और छत्रसाल की वीरता के वर्णनों को कोई कवियों की झूठी खुशामद नहीं कह सकता… इसी से भूषण के वीर रस के उद्गार सारी जनता के हृदय की सम्पत्ति हुए।”
निष्कर्ष
निश्चय ही महाकवि भूषण हिंदी साहित्य के उन विरल कवियों में से हैं जिन्होंने अपने युग की धारा के विपरीत जाकर साहित्य को नई दिशा दी। वे केवल दरबारी कवि नहीं थे, बल्कि जनता की भावनाओं के सच्चे प्रतिनिधि थे। उनकी कविता आज भी राष्ट्रीय चेतना, वीरता और स्वाभिमान की प्रेरणा देती है।
भूषण का योगदान केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय भी है। वे सच्चे अर्थों में वीर रस के महाकवि और भारतीय आत्मा के गायक थे।
- “भूषण की कविता में राष्ट्रीय चेतना और स्वाधीनता का स्वर मुखर रूप में दिखाई देता है।” इस कथन की उदाहरण सहित पुष्टि कीजिए।
- रीतिकालीन कवियों में भूषण का स्थान विशिष्ट क्यों है? उनकी काव्यगत विशेषताओं के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
- “भूषण की कविता वीर रस की सशक्त अभिव्यक्ति है।” इस कथन को उदाहरण सहित सिद्ध कीजिए।
- भूषण को वीर रस का प्रधान कवि क्यों कहा जाता है? उनके काव्य के आलोक में विवेचन कीजिए।
- सिद्ध कीजिए कि भूषण एक राष्ट्रीय कवि हैं।
- “भूषण की कविता की प्रमुख विशेषता उसका ओज एवं वीर रस है” सोदाहरण सिद्ध कीजिए।
- “भूषण रीतिकाल के युगान्तरकारी कवि हैं” क्यों? इसे स्पष्ट करते हुए भूषण की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
भूषण : वीर रस के ओजस्वी राष्ट्रीय कवि
हिंदी साहित्य के रीतिकाल में जहाँ अधिकांश कवि श्रृंगार, नायिका-भेद, नख-शिख वर्णन और दरबारी चाटुकारिता में रत दिखाई देते हैं, वहीं कवि भूषण एक ऐसे युगान्तरकारी कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं जिन्होंने इस परंपरा से हटकर वीर रस, ओज, राष्ट्रीय चेतना और स्वदेशानुराग को अपनी कविता का प्राणतत्त्व बनाया। यही कारण है कि उन्हें केवल रीतिकाल का कवि कहना पर्याप्त नहीं, बल्कि वे राष्ट्रीय चेतना के उद्घोषक और लोकनायक कवि माने जाते हैं।
भूषण की कविता तलवार की झंकार है, रणभूमि का उद्घोष है और दासता के विरुद्ध उठी हुई स्वाभिमानपूर्ण आवाज़ है। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से मुगल अत्याचारों के विरुद्ध हिंदू समाज को जागृत किया और शिवाजी तथा छत्रसाल जैसे जननायकों को राष्ट्ररक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया। इस प्रकार यह सिद्ध किया जा सकता है कि भूषण एक राष्ट्रीय कवि हैं, उनकी कविता की प्रमुख विशेषता वीर रस और ओज है तथा वे रीतिकाल के युगान्तरकारी कवि हैं।
रीतिकाल और भूषण का काव्य-संदर्भ
रीतिकाल (लगभग 1650–1850 ई.) हिंदी साहित्य का वह कालखंड है जिसमें कविता का केंद्र श्रृंगार रस बन गया था। कवि दरबारों में आश्रय पाकर राजा-महाराजाओं की प्रशंसा में काव्य रचना करते थे। इस युग में काव्य का उद्देश्य जन-जागरण न होकर दरबारी संतोष बन गया था।
किन्तु इसी रीतिकाल में भूषण ऐसे कवि के रूप में सामने आए जिन्होंने—
- श्रृंगार की अपेक्षा वीर रस को अपनाया
- नायिका-भेद की जगह रणवीरों का चित्रण किया
- दरबारी चाटुकारिता की बजाय राष्ट्रीय भावना को स्वर दिया
इस दृष्टि से भूषण रीतिकाल की मुख्यधारा से अलग खड़े दिखाई देते हैं।
भूषण की राष्ट्रीय चेतना
भूषण की कविता का मूल स्वर राष्ट्र-प्रेम है। उन्होंने अपनी कविता में ऐसे नायकों का चयन किया जो—
- विदेशी सत्ता के विरुद्ध संघर्षरत थे
- धर्म, संस्कृति और स्वदेश की रक्षा कर रहे थे
- जनता के सच्चे प्रतिनिधि थे
इसी कारण भूषण ने केवल महाराज शिवाजी और बुंदेला वीर महाराज छत्रसाल की प्रशंसा की। अन्य राजाओं की प्रशंसा उन्होंने जानबूझकर नहीं की, क्योंकि उनका उद्देश्य धनार्जन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का प्रसार था।
उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ—
और राव राजा एक मन में न ल्याऊँ अब,
साहू को सराहौं के सराहौं छत्रसाल कौं।
स्पष्ट करती हैं कि भूषण स्वार्थ या आश्रय की लालसा से प्रेरित कवि नहीं थे।
वीर रस की प्रधानता
भूषण के काव्य में वीर रस का पूर्ण परिपाक हुआ है। उनके यहाँ वीर रस केवल युद्ध का वर्णन नहीं, बल्कि उत्साह, पराक्रम, स्वाभिमान और राष्ट्ररक्षा की भावना से युक्त है।
उनकी रचना ‘शिवाबावनी’ में शिवाजी के रणप्रयाण का जो चित्र है, वह वीर रस का उत्कृष्ट उदाहरण है—
साजि चतुरंग सेन अंग में उमंग भरि,
सरजा शिवाजी जंग जीतन चलत हैं।
भूषण भनत नाद विहद नागरन के,
नदी नद मद गब्बरन के रलत हैं।।
इन पंक्तियों में—
- चतुरंगिणी सेना की साज-सज्जा
- युद्ध के प्रति उमंग
- रणभेरी की गूँज
- प्रकृति का भी थर्राना
वीर रस की उत्कट अभिव्यक्ति करता है। पाठक के हृदय में स्वतः उत्साह भाव जागृत हो उठता है।
राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति
भूषण ने शिवाजी को केवल एक वीर योद्धा नहीं, बल्कि राष्ट्र और धर्म के रक्षक के रूप में चित्रित किया है। उनके अनुसार शिवाजी—
- वेद और पुराणों की रक्षा करते हैं
- रामनाम का स्मरण करते हैं
- हिंदू संस्कृति के प्रतीक जनेऊ और माला को धारण करते हैं
- हिंदुओं की अस्मिता की रक्षा करते हैं
उनकी पंक्तियाँ—
बेद राखे विदित पुरान परसिद्ध राखे,
राम नाम राख्यो अति रसना सुघर में।
हिन्दुन की चोटी रोटी राखी है सिपाहिन की,
कांधे में जनेऊ राख्यो माला राखी गर में।।
भूषण की राष्ट्रीय चेतना को अत्यंत सशक्त रूप में व्यक्त करती हैं।
देश-प्रेम और विदेशी सत्ता का विरोध
भूषण की कविता मुगल शासकों के धार्मिक अत्याचारों का खुला विरोध करती है। वे निर्भीक होकर बताते हैं कि किस प्रकार मंदिर गिराए गए और हिंदू संस्कृति को कुचलने का प्रयास किया गया—
देवल गिरावते फिरावते निसान अली,
ऐसे समै राव राने सबै गए लबकी।।
वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यदि शिवाजी जैसे वीर न होते तो—
“शिवाजी न होतो तौ सुनति होती सबकी।”
अर्थात् संपूर्ण हिंदू समाज का जबरन धर्मांतरण हो जाता। यह कथन भूषण की कविता को राष्ट्रीय संघर्ष का दस्तावेज़ बना देता है।
जननायकों के प्रति श्रद्धा
भूषण ने जिन नायकों की प्रशंसा की, वे दरबारी राजा नहीं, बल्कि जननायक थे। इसी संदर्भ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का प्रसिद्ध कथन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है—
“शिवाजी और छत्रसाल की वीरता के वर्णनों को कोई कवियों की झूठी खुशामद नहीं कह सकता।”
यह कथन सिद्ध करता है कि भूषण की कविता में जन-भावना की सच्ची अभिव्यक्ति है।
कला पक्ष और शिल्प सौंदर्य
यद्यपि भूषण भावपक्ष के कवि हैं, फिर भी उनका कला पक्ष अत्यंत सशक्त है। उन्होंने—
- अलंकारों का प्रभावशाली प्रयोग
- ओजपूर्ण शब्दावली
- संस्कृतनिष्ठ ब्रजभाषा
- अनुप्रास, यमक, अतिशयोक्ति
का सुंदर समन्वय किया है।
यमक अलंकार का उदाहरण—
ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहनि वारी,
ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहाती है।
इन पंक्तियों में शब्द-सौंदर्य और अर्थ-सौंदर्य दोनों का समन्वय दिखाई देता है।
भूषण : रीतिकाल के युगान्तरकारी कवि
भूषण को युगान्तरकारी इसलिए कहा जाता है क्योंकि—
- उन्होंने श्रृंगार प्रधान युग में वीर रस को प्रतिष्ठा दी
- कविता को दरबार से निकालकर राष्ट्र से जोड़ा
- लोकमंगल को काव्य का उद्देश्य बनाया
- राष्ट्रीय चेतना को साहित्य में स्थान दिया
इस प्रकार वे रीतिकाल में भक्तिकालीन चेतना के उत्तराधिकारी और आधुनिक राष्ट्रीय काव्य के पूर्वगामी प्रतीत होते हैं।
उपसंहार
उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि महाकवि भूषण एक सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय कवि हैं। उनकी कविता—
- वीर रस से ओत-प्रोत
- ओजस्वी भाषा से युक्त
- देश-प्रेम और स्वाभिमान से प्रेरित
- जनभावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति
है। उन्होंने रीतिकाल की सीमाओं को तोड़कर हिंदी कविता को राष्ट्रीय चेतना का स्वर प्रदान किया। उनकी कविता केवल काव्य नहीं, बल्कि राष्ट्ररक्षा का शंखनाद है।
इस प्रकार भूषण की काव्य-परंपरा हिंदी साहित्य में सदैव प्रेरणास्रोत और गौरव का विषय बनी रहेगी।
इन्हें भी देखें –
- जीवनी और जीवन-परिचय : स्वरूप, समानताएँ एवं अंतर का समेकित अध्ययन
- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली
- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली
- देवनागरी लिपि : जन्म, विकास, स्वरूप, विशेषताएँ, गुण–दोष और महत्व
- मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा | 500 ई.पू. – 1000 ईस्वी | उत्पत्ति, विकास और भाषिक संरचना
- भारत और विश्व के भाषा परिवार: उत्पत्ति, विकास और विस्तार
- क्रिया-विशेषण (Adverb): परिभाषा, प्रकार और 100+ उदाहरण
- समुच्चय बोधक अव्यय : स्वरूप, प्रकार और प्रयोग
- संबंधबोधक अव्यय : परिभाषा, प्रकार, प्रयोग और उदाहरण