मेवाड़ी भाषा : इतिहास, स्वरूप, साहित्यिक परंपरा और सांस्कृतिक महत्त्व

भारत की भाषाई विविधता में राजस्थान का स्थान अत्यंत समृद्ध और विशिष्ट माना जाता है। यहाँ बोली जाने वाली राजस्थानी भाषा स्वयं अनेक बोलियों और उपबोलियों का विशाल समूह है। इन्हीं में से एक प्रमुख, प्राचीन और सांस्कृतिक दृष्टि से गौरवशाली बोली है — मेवाड़ी। यह मेवाड़ के इतिहास, संस्कृति, लोकपरंपरा, साहित्य और गौरवशाली संघर्षों की साक्षी रही है। मेवाड़ी केवल संचार का माध्यम भर नहीं, बल्कि मेवाड़ की आत्मा, लोक-भावना और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

इस लेख में मेवाड़ी भाषा के क्षेत्रीय विस्तार, ऐतिहासिक विकास, व्याकरणिक स्वरूप, साहित्यिक योगदान, लोककला और आधुनिक चुनौतियों को सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है, ताकि यह शोध, अध्ययन, शिक्षण तथा लेखन — तीनों उद्देश्यों के लिए उपयोगी सिद्ध हो।

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मेवाड़ी का भौगोलिक क्षेत्र

मेवाड़ी, राजस्थानी भाषा की प्रमुख बोलियों में से एक है। इसका बोलने वाला क्षेत्र ऐतिहासिक मेवाड़ राज्य से जुड़ा है, जिसमें आज के राजस्थान के कई ज़िले सम्मिलित हैं। सामान्यतः मेवाड़ी निम्न क्षेत्रों में बोली जाती है—

  • उदयपुर
  • राजसमंद
  • चित्तौड़गढ़ (इसके दक्षिण-पूर्वी भाग को छोड़कर अधिकांश क्षेत्र)
  • भीलवाड़ा के कुछ भाग
  • डूँगरपुर और बांसवाड़ा के कुछ गाँवों में मिश्रित रूप
  • निम्बाहेड़ा–प्रतापगढ़ पट्टी में अंशतः प्रभाव

मेवाड़ी का सर्वाधिक शुद्ध और सहज रूप गाँवों में सुनाई देता है, जहाँ भाषा अपने मूल उच्चारण, लय और रागात्मकता के साथ जीवित है। बड़े शहरों में हिंदी और उर्दू के प्रभाव से इसकी ध्वनियाँ और शब्दावली कुछ बदले रूप में मिलती हैं। शहरीकरण और शिक्षा के हिंदी माध्यम होने से नई पीढ़ी में शुद्ध मेवाड़ी के प्रयोग में कमी अवश्य आई है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र इसे अब भी पूरे गौरव और आत्मीयता से संभाले हुए हैं।

मेवाड़ी भाषा का ऐतिहासिक विकास

मेवाड़ी भाषा का उद्गम प्राचीन भारतीय भाषाओं की उस धारा से जुड़ा है, जिसने आगे चलकर राजस्थानी–गुर्जरी और फिर उसके अंतर्गत विभिन्न बोलियों का रूप लिया। मेवाड़ी का विकास broadly निम्न चरणों में देखा जा सकता है—

(अ) अपभ्रंश से राजस्थानी तक

संस्कृत → शौरसेनी प्राकृत → अपभ्रंश → अर्द्ध–मार्गी → प्रारंभिक राजस्थानी → आधुनिक बोलियाँ (जैसे मारवाड़ी, मेवाड़ी, मेवाती आदि)

मेवाड़ी के कई शब्द आज भी अपभ्रंश रूप को जीवित रखते हैं। उदाहरण के लिए—

  • आण (आना),
  • जाण (जाना),
  • घणो (बहुत),
  • म्हारो (मेरा)

ये सभी शब्द अपभ्रंश की ध्वन्यात्मक विशेषताओं को प्रतिध्वनित करते हैं।

(ब) मध्यकाल में मेवाड़ी का विकास

13वीं से 17वीं शताब्दी वह काल था जब राजस्थानी की विभिन्न बोलियाँ स्वरूप लेने लगीं। इसी वक्त मेवाड़ी बोली मेवाड़ राज्य की प्रशासनिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपरा का अंग बन गई।

चित्तौड़गढ़, उदयपुर और कुम्भलगढ़ जैसे केंद्रों में साहित्य, कला, संगीत और शास्त्र का गहन विकास हुआ, जिसका प्रभाव भाषा पर भी पड़ा।

मेवाड़ी का ध्वनि–तंत्र और व्याकरण

प्रत्येक बोली अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता, शब्दरचना और व्याकरण के कारण अलग पहचान रखती है। मेवाड़ी भी कुछ विशेषताओं के कारण राजस्थानी समूह के भीतर विशिष्ट स्थान रखती है।

(अ) ध्वन्यात्मक विशेषताएँ

  • मेवाड़ी में लयात्मकता और सुरात्मकता प्रबल है। बोलने की शैली धीमी, मधुर और खिंची हुई लगती है।
  • कई शब्दों में ‘अ’ ध्वनि विशेष रूप से सुनाई देती है —
    जाणो, राणो, म्हारो, ताणे इत्यादि।
  • ‘ह’ ध्वनि का आंशिक लोप भी मिलता है — आस्यो (आया), जस्यो (गया)।

(ब) सर्वनाम

  • मैं → म्हूं / म्हैँ
  • तुम → थूं
  • वह → लो / वो
  • हम → असां

इन रूपों में मूल प्राकृत की झलक स्पष्ट है।

(स) क्रियाएँ

मेवाड़ी में क्रिया के अंत में ‘–यो / –री / –रो’ आदि प्रत्यय लगते हैं, जो इसे अन्य राजस्थानी बोलियों से अलग बनाते हैं।

  • वह गया → वो जस्यो
  • वह आई → वो आवरी

(द) शब्दावली

मेवाड़ी की शब्द–संपदा बहुत समृद्ध है। उसमें लोकजीवन, प्रकृति, पशु–पालन, कृषि, शासन और युद्ध–परंपरा से जुड़ी सैकड़ों विशिष्ट शब्दावली मिलती है।

मेवाड़ी साहित्य : प्राचीन, मध्य और आधुनिक काल

मेवाड़ी के साहित्यिक रूप का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली है। यह केवल लोकगीतों तक सीमित नहीं, बल्कि राजदरबार में नाटक, प्रशस्ति, युद्ध–काव्य, भक्ति–काव्य और वर्णनात्मक रचनाओं में भी प्रयोग हुआ।

(अ) प्राचीन साहित्यिक उल्लेख

चित्तौड़गढ़ के कीर्ति-स्तम्भ पर अंकित लेखों में मेवाड़ी के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। यह प्रमाणित करता है कि 15वीं शताब्दी तक मेवाड़ी एक विकसित साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी थी।

(ब) महाराणा कुम्भा का योगदान

महाराणा कुम्भा (1490–1525) न केवल महान योद्धा और प्रशासक थे, बल्कि साहित्य, संगीत और नाटक–कला के भी संरक्षक थे। कीर्ति-स्तम्भ की प्रशस्ति में यह उल्लेख मिलता है कि उन्होंने चार नाटक रचे, जिनमें से कुछ भाग मेवाड़ी में भी लिखे गए थे।

यह मेवाड़ी में नाटक–लेखन का सबसे प्राचीन, प्रमाणिक और ऐतिहासिक उल्लेख है। यह जानकारी मेवाड़ी की साहित्यिक गरिमा को और पुष्ट करती है।

(स) लोक–साहित्य

मेवाड़ी लोकजीवन अत्यधिक जीवंत और रंगीन है। यहाँ का लोक–साहित्य अत्यंत विकसित है—

  • लोकगीत : पल्ला–गीत, गवरी–गीत, पीढ़ी–गीत, पाबूजी के गीत
  • वीर–काव्य : हल्दीघाटी, महाराणा प्रताप, चामुण्डा माता से जुड़ी कथाएँ
  • गाथाएँ : देवताओं–देवियों, लोक–नायकों और राजपूत वीरांगनाओं की कथाएँ
  • कथा–परंपरा : पिंडदान कथा, भैरव कथा, भवानी कथा

(द) आधुनिक मेवाड़ी साहित्य

19वीं और 20वीं शताब्दी में कई विद्वानों ने मेवाड़ी, राजस्थानी और स्थानीय इतिहास पर व्यापक लेखन किया। आधुनिक समय में मेवाड़ी कहानियाँ, कविताएँ, निबंध, लोककथा–संग्रह और शोधपत्र भी लिखे जा रहे हैं।

मेवाड़ी और मेवाड़ की सांस्कृतिक पहचान

मेवाड़ी केवल भाषा नहीं, बल्कि मेवाड़ की अस्मिता और गौरव का प्रतीक है। मेवाड़ का इतिहास त्याग, वीरता, स्वाभिमान, कला और संस्कृति से भरा हुआ है। इस इतिहास को सबसे अधिक शब्द मेवाड़ी बोली से ही प्राप्त होते हैं।

(अ) लोक–नृत्य

  • गवरी
  • घूमर
  • तेरहताली

इन नृत्यों में प्रयुक्त गीत मेवाड़ी की मधुरता और रागात्मकता को दर्शाते हैं।

(ब) लोक–संगीत

मेवाड़ के गीतों में सरंगी, रावणहट्टा, ढोल, मुरली और ढप की धुनों पर मेवाड़ी शब्दों का विशेष प्रयोग होता है, जो इसे अत्यंत आकर्षक बनाता है।

(स) वेशभूषा और भाषा

मेवाड़ी पगड़ी (साफ़ा), ओढ़णी, घाघरा, अंगरखी, बोरला आदि पहनावे के साथ बोली की शैली मिलकर एक विशिष्ट सांस्कृतिक छवि निर्माण करते हैं।

आधुनिक दौर में मेवाड़ी की स्थिति

वैश्वीकरण, शिक्षा में हिंदी–अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव और शहरीकरण के कारण मेवाड़ी के उपयोग में कमी आई है। विशेषकर नई पीढ़ी में शुद्ध मेवाड़ी कम सुनाई देती है।
इसके कुछ प्रमुख कारण—

  1. हिंदी–उर्दू और अंग्रेज़ी का सामाजिक–आर्थिक प्रभाव
  2. शहरी क्षेत्रों में मेवाड़ी बोलने की प्रवृत्ति का घट जाना
  3. मीडिया और संचार में मानक हिंदी का वर्चस्व
  4. विद्यालयों में मातृभाषा–आधारित शिक्षा का अभाव

इसके बावजूद गाँवों, बुज़ुर्गों और लोककलाकारों के बीच मेवाड़ी आज भी उतनी ही शुद्ध, मधुर और जीवंत है।

मेवाड़ी संरक्षण के प्रयास

मेवाड़ी को संरक्षित और प्रोत्साहित करने हेतु कुछ क्षेत्रीय और शैक्षणिक प्रयास किए जा रहे हैं—

  • लोक–कला अकादमियों द्वारा गीत–संग्रह और नाटक
  • मेवाड़ विश्वविद्यालय और राजस्थानी भाषा अकादमी में शोध–कार्य
  • लोक–साहित्य और राजस्थानी बोलियों को पाठ्यक्रमों में शामिल करने के प्रयास
  • सोशल मीडिया पर मेवाड़ी कंटेंट (कविताएँ, वीडियो, संगीत) का बढ़ता प्रयोग
  • स्थानीय त्योहारों और उत्सवों में भाषा का सम्मान

बावजूद इसके, और अधिक गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस समृद्ध भाषा से दूर न हो जाएँ।

मेवाड़ी शब्द–रूप और कुछ उदाहरण

मेवाड़ी के कुछ आम दैनिक प्रयोग के वाक्य—

  • थु नै क्या कर्यो? — तुमने क्या किया?
  • म्हारो घर उदपुर में है। — मेरा घर उदयपुर में है।
  • घणो रमणीय दृष्य है। — बहुत सुंदर दृश्य है।
  • कित बागड़ो जस्यो? — कहाँ घूम आए?

इन वाक्यों की लय, ध्वनि और शैली से मेवाड़ी की मधुरता स्पष्ट झलकती है।

मेवाड़ी की विशेषताएँ : संक्षिप्त सूची

  1. प्राचीन साहित्यिक परंपरा
  2. अत्यंत मधुर ध्वनि–शैली
  3. वीर–इतिहास और लोक–कथाओं की समृद्ध विरासत
  4. गीत, नृत्य और लोक–संगीत पर आधारित सजीव संस्कृति
  5. गाँवों में आज भी प्रयुक्त शुद्ध रूप
  6. प्रशासनिक एवं ऐतिहासिक महत्व
  7. शब्दावली की मौलिकता और विविधता

निष्कर्ष

मेवाड़ी भाषा केवल संचार का साधन नहीं, बल्कि मेवाड़ की सांस्कृतिक धरोहर, इतिहास, लोक–कला और सामूहिक चेतना का आधार है। सदियों से यह बोली राजपूत वीरता, संघर्ष, संगीत, काव्य और सामाजिक सामंजस्य का वाहक रही है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि मेवाड़ी को केवल बोलचाल तक सीमित न करके

  • शिक्षा
  • साहित्य
  • मीडिया
  • अनुसंधान
  • और सांस्कृतिक कार्यक्रमों

में भी स्थान दिया जाए। इससे न केवल यह भाषा जीवित और प्रबल रहेगी, बल्कि मेवाड़ की गौरवशाली पहचान भी आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँच सकेगी।


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