वैदिक संस्कृत : इतिहास, उत्पत्ति, विकास, व्याकरण और वैदिक साहित्य

(1500 ई.पू. – 800 ई.पू. का महान भाषाई एवं सांस्कृतिक युग)

भारतीय भाषाओं के इतिहास में वैदिक संस्कृत का स्थान अत्यंत प्राचीन, महत्वपूर्ण और आधारभूत माना जाता है। 1500 ई.पू. से लगभग 800 ई.पू. तक प्रचलित यह भाषा मानव सभ्यता में उपलब्ध सबसे पुरानी, शुद्ध और वैज्ञानिक भाषाओं में से एक मानी जाती है। इसका प्राचीनतम रूप हमें वैदिक साहित्य, विशेषकर वेदों और उनसे सम्बद्ध ग्रन्थों में मिलता है। इसलिए इसे ‘वैदिकी’, ‘छन्दस्’, ‘वैदिक’, अथवा ‘छान्दस् भाषा’ भी कहा जाता है।

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वैदिक संस्कृत की परम्परा और महत्ता

भारत की समस्त धार्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक परम्पराओं की जड़ें वेदों में निहित हैं। वेद ही भारतीय धार्मिक चेतना का मूल बीज हैं जो ऋषियों के गहन अनुभवों—प्रेरणाओं—और आध्यात्मिक खोजों का संकलन हैं। वेदों की भाषा ही वैदिक संस्कृत है, अतः इसे भारतीय सभ्यता का मुकुट–मणि कहा जाता है।

वैदिक काल सामान्यतः 1500 ई.पू. से 500 ई.पू. तक माना जाता है। यद्यपि भाषा का सर्वाधिक प्राचीन और शुद्ध रूप 1500–800 ई.पू. के बीच मिलता है, इसलिए यही अवधि वैदिक संस्कृत की मुख्य अवस्था मानी जाती है। इसी युग में ऋग्वेद सहित अन्य वेदों का अधिकांश भाग रचा गया और आगे चलकर ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदों की परम्परा विकसित हुई।

वैदिक साहित्य का स्वरूप और वर्गीकरण

वैदिक साहित्य किसी एक ग्रन्थ का नाम नहीं, बल्कि एक विशाल ज्ञान–परम्परा है जो कई प्रकार के ग्रंथों में विभक्त है। वैदिक भाषा में रचित प्रमुख ग्रन्थ चार श्रेणियों में बाँटे जाते हैं—

  1. संहिता
  2. ब्राह्मण
  3. आरण्यक
  4. उपनिषद

संहिताएँ वेदों के मंत्र भाग हैं; ब्राह्मण उनमें निहित कर्मकाण्ड और विधियों की विस्तृत व्याख्या करते हैं; आरण्यक दार्शनिक चिंतन का आरम्भिक स्वरूप प्रस्तुत करते हैं; और उपनिषद वेदान्त के रूप में ज्ञान–काण्ड की सर्वोच्च अवस्था को प्रकट करते हैं।

इन चारों पर विस्तृत लेख आप अगली सामग्री प्रदान करने पर लिखवा सकते हैं।

वेदों की उत्पत्ति और वैदिक ऋषि

भारतीय परम्परा में वेदों की उत्पत्ति को दिव्य माना गया है। ‘तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये’—अर्थात सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा के हृदय में वेदों का उद्भव हुआ। इन वेदों को सर्वप्रथम जिन ऋषियों ने सुना, वे चार माने गए हैं—

  • अग्नि
  • वायु
  • अंगिरा
  • आदित्य

ये चारों ‘वेदज्ञ ऋषि’ और ‘प्रथम मन्त्र–दृष्टा ऋषि’ कहलाते हैं।

भारतीय धर्म–परम्परा में इसी आधार पर ब्रह्मा और इन ऋषियों को वेद–ज्ञान का पहला स्रोत माना जाता है। वेदों की सत्ता ‘अपौरुषेय’ कही जाती है—अर्थात जिन्हें किसी मनुष्य ने नहीं लिखा; वे शाश्वत ज्ञान हैं, जिन्हें ऋषियों ने ‘श्रुति’ के रूप में सुना।

वेदों का क्रमिक विकास : एक वेद से चार वेद

प्रारम्भिक काल में वेद एक ही था। परम्परा के अनुसार त्रेतायुग में—जो श्रीराम का काल माना जाता है—पुरुरवा ऋषि ने इस एक वेद को तीन भागों में संगठित किया—

  1. ऋग्वेद
  2. यजुर्वेद
  3. सामवेद

इसी कारण पुरुरवा ऋषि को वेदत्रयी का प्रवर्तक कहा जाता है।

बाद में अथर्वा ऋषि ने ज्ञान–संग्रह का एक और विशाल संकलन प्रस्तुत किया जिसे ‘अथर्ववेद’ कहा गया।
इस प्रकार वेदों की संख्या चार मानी गई—

  • ऋग्वेद (सर्वाधिक प्राचीन)
  • यजुर्वेद
  • सामवेद
  • अथर्ववेद

इन चारों वेदों पर आधारित ही पूरा वैदिक साहित्य—ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद—विकसित हुआ।

‘वेद’ शब्द की व्युत्पत्ति और अर्थ

‘वेद’ शब्द संस्कृत की ‘विद्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है—

  • ज्ञान
  • बोध
  • प्रकाश

इसी धातु से ‘विद्या’, ‘विद्वान’, ‘विदित’ जैसे शब्द बने हैं।
वेदों को ‘त्रयी’ भी कहा जाता है—

  • क्योंकि इनके तीन मूल काण्ड हैं (कर्मकाण्ड, उपासना–काण्ड, ज्ञान–काण्ड)
  • या क्योंकि तीन प्राचीन संहिताएँ पहले से प्रसिद्ध थीं—ऋक्, साम, यजुः

वेदों में भाषा के तीन रूप

  1. ऋक् / ऋचा – पद्य रूप में रचित मंत्र
  2. साम – ऋचाओं का गेय रूप
  3. यजुः – गद्य या मिश्रित मंत्र

वेदों को श्रुति इसलिए कहा गया क्योंकि ये गुरु–शिष्य परम्परा में सुनाए और याद कराए जाते थे।

वैदिक संस्कृत की भाषिक विशेषताएँ

वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत की तुलना में अधिक पुरातन, प्राकृतिक और विविध रूपों से युक्त है। विशेषताएँ—

  • धातु–रूपों और शब्द–रूपों की अनेकता
  • ध्वनियों का व्यापक प्रयोग, विशेषकर स्वर–परिवर्तन
  • पद्यात्मक संरचना (विशेषतः ऋग्वेद में)
  • प्राकृतिक सरलता और लयात्मकता
  • विभिन्न उपभाषाओं का मिश्रण

ऋग्वैदिक भाषा अन्य वेदों की तुलना में अधिक पुरानी, कठिन और विविधरूपा है। अन्य वेदों में भाषा क्रमशः सरल और व्यवस्थित होती गई।

गद्य और पद्य की परम्परा

ऋग्वेद पूर्णतः पद्यात्मक है—अर्थात मंत्र छन्दों में रचे गए हैं।
यजुर्वेद में पद्य और गद्य दोनों हैं।
सामवेद मुख्यतः गायन–प्रधान है।
अथर्ववेद में गद्य भी पर्याप्त मात्रा में मिलता है।

जैसे–जैसे समय बीतता गया, भाषा में नियमितता बढ़ती गई और वैदिक संस्कृत धीरे–धीरे लौकिक संस्कृत में परिवर्तित हो गई।

वैदिक और लौकिक संस्कृत के बीच संक्रमणकाल

अंतिम वेदों—विशेषकर अथर्ववेद—के समय तक भाषा में स्थिरता आने लगी। यह काल संधिकाल कहा जाता है। इसी काल में—

  • रामायण
  • महाभारत

का आरम्भिक स्वरूप रचा गया। ये दोनों ग्रंथ प्राचीन लौकिक साहित्य के आधार माने जाते हैं।

पाणिनि और अष्टाध्यायी

500–400 ई.पू. में महान व्याकरणाचार्य पाणिनि का उद्भव हुआ।
उन्होंने अपने समय की प्रचलित संस्कृत भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन कर अष्टाध्यायी नामक व्याकरण–ग्रंथ रचा।
यह ग्रंथ आज भी भारतीय भाषाविज्ञान का आधार–स्तम्भ है।

वेदों को समझने की दो विधियाँ

वेद दो भागों में समझे जाते हैं—

  1. मंत्र
  2. ब्राह्मण

‘संहिता’ मंत्र–भाग है।
ब्राह्मण—उन मंत्रों का वर्णन, अर्थ और यज्ञ–विधि है।
ब्राह्मणों पर विचार करने वाले ग्रन्थ—

  • आरण्यक
  • उपनिषद

इस प्रकार पूरा वैदिक साहित्य इन चार प्रकार के ग्रन्थों में ही निहित है।

वैदिक साहित्य : एक व्यापक ज्ञान–विश्व

(1) संहिता: वेदों के मंत्र—देवताओं की स्तुतियाँ, प्रार्थनाएँ, दार्शनिक तथा प्राकृतिक अनुभूतियाँ।

(2) ब्राह्मण: यज्ञ–कर्म, अनुष्ठान, सामाजिक व्यवहार और देव–पूजन के विधान।

(3) आरण्यक: वनों में रहने वाले ऋषियों द्वारा रचित आध्यात्मिक चिंतन।

(4) उपनिषद: वेदान्त—ज्ञान, आत्मा, ब्रह्म, मोक्ष—पर आधारित दार्शनिक ग्रंथ।

इन चारों की परम्परा मिलकर भारतीय अध्यात्म, भारत की धर्म–व्यवस्था और भारत के दार्शनिक विचार–विश्व को आकार देती है।

वैदिक साहित्य में संहिताएँ : मंत्रभाग का प्राचीनतम रूप

वैदिक साहित्य के चार प्रमुख आधारों—संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद—में से सर्वप्रथम स्थान संहिताओं को प्राप्त है। संहिता वेदों का वह हिस्सा है जिसमें केवल मंत्रों का संग्रह मिलता है। यह मंत्र वैदिक ऋषियों के ध्यान, यज्ञ, साधना और अनुभवों की वाणी हैं। संहिताओं की भाषा शुद्ध वैदिक संस्कृत है, जो अपने धातु-रूपों, वाक्य-विन्यास और अभिव्यक्ति में बाद की लौकिक संस्कृत से भिन्न दिखाई देती है।

चूँकि वैदिक परंपरा में चार वेद स्वीकृत हैं, इसलिए संहिताओं की भी संख्या चार ही है—ऋक् संहिता, साम संहिता, यजुः संहिता और अथर्व संहिता। नीचे इन्हीं चारों संहिताओं का क्रमवार परिचय दिया जा रहा है।

1. ऋक् संहिता (ऋग्वेद संहिता) : विश्व का सर्वप्राचीन काव्य-ग्रंथ

ऋग्वेद संहिता को संहिताओं में सर्वोपरि माना जाता है, क्योंकि यह सबसे प्राचीन और वैदिक ऋषियों की आरंभिक काव्य-चेतना का दर्पण है। विद्वानों के अनुसार इसका रचनाकाल अत्यंत प्राचीन—6000 ईसा पूर्व या उससे भी पहले का माना जाता है। ऋग्वेद का पाठ करने वाले पुरोहित होता/होतृ कहलाते हैं।

ऋग्वेद संहिता : एक परिचय

वैदिक साहित्य में ऋग्वेद संहिता का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे विश्व का सबसे प्राचीन उपलब्ध ग्रंथ माना जाता है, जिसका काल अनेक विद्वानों द्वारा 6000 ईसा-पूर्व या उससे भी अधिक पुराना माना जाता है। इसमें सम्मिलित सूक्त मुख्यतः देवताओं की स्तुति में रचे गये मंत्र हैं, जिन्हें वैदिक परम्परा में यज्ञों के अवसर पर गाया या पढ़ा जाता था। इस वेद के पाठ करने वाले पुजारी को होता या होतृ कहा गया है।

‘ऋक्’ का अर्थ है—स्तुति या प्रशंसा। वास्तव में ऋक् संहिता देवताओं की स्तुतियों, प्रार्थनाओं और यज्ञीय आह्वानों का काव्य-संग्रह है।

ऋक् शब्द का अर्थ और स्वरूप

‘ऋक्’ शब्द का अर्थ है—स्तुति अथवा प्रशंसा। अपनी सामग्री, प्राचीनता और विषयवस्तु के आधार पर ऋग्वेद, चारों वेदों में सर्वप्रथम और सर्वोच्च माना गया है। इसकी मूल लिपि को अधिकांश विद्वान ब्राह्मी लिपि मानते हैं।

वर्गीकरण एवं संरचना

ऋग्वेद संहिता का विन्यास दो आधारों पर किया जाता है—

1. अष्टक-पद्धति

इस क्रम के अनुसार संपूर्ण ऋक्-संहिता को आठ अष्टकों में विभाजित किया गया है।

  • प्रत्येक अष्टक में 8 अध्याय
  • कुल अध्याय: 64
  • कुल वर्ग: 2006
  • सामान्यतः हर वर्ग में लगभग 5 ऋचाएँ पाई जाती हैं।

2. मण्डल-अनुवाक संरचना

इस पद्धति के अनुसार ऋग्वेद में—

  • 10 मण्डल
  • 85 अनुवाक
  • 1028 सूक्त
  • तथा लगभग 10580 ऋचाएँ सम्मिलित हैं।

ऋषि एवं ऋषिकाएँ (द्रष्टा परम्परा)

ऋग्वेद के सूक्तों के द्रष्टा विभिन्न ऋषि-परिवार हैं। उनमें गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्वाज, वशिष्ठ, भृगु और अंगिरस विशेष रूप से प्रतिष्ठित हैं।
इसके अतिरिक्त, वैदिक साहित्य की विशेषता यह भी है कि इसमें महिला द्रष्टाओं (ऋषिकाओं) का उल्लेख मिलता है। प्रमुख ऋषिकाएँ—

  • वाक् आम्भृणी
  • सूर्या
  • सावित्री
  • यमी
  • लोपामुद्रा
  • घोषा
  • उर्वशी

ऋग्वेद के मण्डलों के रचनाकार

ऋग्वेद के दस मण्डलों में अनेक प्राचीन ऋषियों का योगदान है। उनमें प्रमुख ऋषि-वंश इस प्रकार माने गए हैं—

ऋग्वेद के द्रष्टा (ऋषि एवं ऋषिका)

मण्डलसूक्त संख्यामहर्षि
प्रथम191मधुच्छन्दा: , मेधातिथि, दीर्घतमा:, अगस्त्य, गौतम, पराशर आदि।
द्वितीय43गृत्समद एवं उनके वंशज
तृतीय62विश्वामित्र एवं उनके वंशज
चतुर्थ58वामदेव एवं उनके वंशज
पंचम87अत्रि एवं उनके वंशज
षष्ठम75भरद्वाज एवं उनके वंशज
सप्तम104वशिष्ठ एवं उनके वंशज
अस्ठम103कण्व, भृगु, अंगिरा एवं उनके वंशज
नवम114ऋषिगण, विषय-पवमान सोम
दसम191त्रित, विमद, इन्द्र, श्रद्धा, कामायनी इन्द्राणी, शची आदि।

गायत्री मंत्र, जो सूर्य के सविता रूप को समर्पित है, ऋग्वेद के तृतीय मण्डल में मिलता है और इसके द्रष्टा महर्षि विश्वामित्र माने जाते हैं। वहीं संपूर्ण नवम मण्डल (114 सूक्त) केवल सोम देवता को समर्पित है।

ऋग्वेद की शाखाएँ और छन्द

ऋग्वेद की प्रमुख पाँच शाखाएँ—शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन और मंडूकायन मानी जाती हैं।

इस संहिता में 20 छन्दों का प्रयोग मिलता है, जिनमें प्रमुख हैं—

  • गायत्री (24 अक्षर)
  • उष्णिक (28 अक्षर)
  • अनुष्टुप (32 अक्षर)
  • बृहती (36 अक्षर)
  • पंकिति (40 अक्षर)
  • त्रिष्टुप (44 अक्षर)
  • जगती (48 अक्षर)

ऋग्वेद के सूक्तों की प्रकृति एवं प्रकार

ऋग्वेद के सूक्त विषयवस्तु और शैली की दृष्टि से विभाजित किए जाते हैं। इनमें प्रमुख श्रेणियाँ हैं—

  • पुरुष सूक्त
  • देव-स्तुति-प्रधान सूक्त
  • दार्शनिक चिंतन सूक्त
  • लौकिक जीवनगत सूक्त
  • संवाद सूक्त
  • आख्यान सूक्त
  • श्री सूक्त

ऋग्वैदिक देवता

ऋग्वेद में देवताओं के स्वरूप को प्राकृतिक शक्तियों के रूप में निरूपित किया गया है। सबसे अधिक सूक्त इन्द्र को समर्पित हैं, उसके बाद अग्नि का स्थान आता है। प्रमुख देवता—

  • इन्द्र
  • अग्नि
  • वरुण
  • मित्र
  • सोम
  • मरुत
  • रुद्र
  • विश्वेदेव

देवियों में उषा और अदिति का विशेष महत्व है। कुछ सूक्तों में देवताओं की संयुक्त उपासना—जैसे इन्द्र-वायु, मित्र-वरुणा, द्यावा-पृथिवी—भी देखने को मिलती है।

इस प्रकार, ऋग्वेद संहिता न केवल धार्मिक-आध्यात्मिक ग्रंथ है, बल्कि यह उस प्राचीन आर्य समाज की संस्कृति, भाषा, दर्शन, प्रकृतिपूजा, सामाजिक व्यवस्था और बौद्धिक चेतना का अमूल्य स्रोत है। इसमें निहित सूक्त आज भी भारतीय परंपरा और वैदिक संस्कृति के आधारस्तंभ माने जाते हैं।

2. साम संहिता (सामवेद संहिता) : संगीत और स्तुति का वेद

सामवेद को वैदिक संगीत का आधार माना गया है। इसमें शामिल मंत्र मुख्य रूप से यज्ञों में गाये जाने वाले गीत हैं। सामवेद का पाठ करने वाले पुरोहित उद्गाता या पंचविश कहलाते हैं।

सामवेद की मुख्य विशेषताएँ

  • कुल मंत्र : 1824
  • मौलिक मंत्र : केवल 75, शेष ऋग्वेद से लिए गए
  • दो प्रमुख भाग—आर्चिक और गान

आर्चिक भाग में मंत्रों का संग्रह है, जबकि गान-भाग में उन्हीं मंत्रों को संगीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है।

सामवेद की प्रमुख शाखाएँ

पुराणों में सामवेद की लगभग 1000 शाखाओं का उल्लेख है, पर वर्तमान में तीन महत्वपूर्ण शाखाएँ ही उपलब्ध हैं—

  1. कौथुमीय
  2. जैमिनीय
  3. राणायनीय

सामवेद की प्रकृति गेय, संगीतमय और रागात्मक है, इसलिए भारतीय शास्त्रीय संगीत के उद्भव का आधार भी इसे माना जाता है।

3. यजुः संहिता (यजुर्वेद संहिता) : यज्ञ की अनुष्ठानिक भाषा

यजुर्वेद वह संहिता है जो यज्ञ-कर्मों के नियम, विधि, मंत्र और उपक्रम का विस्तृत विवरण देती है। यही कारण है कि यजुर्वेद के आचार्य अध्वर्यु कहलाते हैं—यज्ञों के संचालक।

यजुर्वेद के दो मुख्य रूप

  1. कृष्ण (तैत्तिरीय) यजुर्वेद – मंत्र और गद्य-टीका साथ-साथ
  2. शुक्ल (वाजसनेयी) यजुर्वेद – केवल मंत्रभाग

यजुः संहिता की संरचना

  • कुल मंत्र : 1975
  • कुल अध्याय : 40
  • अनेक मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं (लगभग 663 मंत्र)

यजुर्वेद के मुख्य यज्ञ

संहिता में अनेक प्रकार के वैदिक यज्ञों का विवरण मिलता है, जैसे—

  • अग्निहोत्र
  • सोमयाग
  • अश्वमेध
  • वाजपेय
  • राजसूय
  • अग्निचयन आदि

यजुर्वेद की प्रमुख शाखाएँ

यजुर्वेद की पाँच शाखाएँ प्रामाणिक मानी जाती हैं—
काठक, कपिष्ठल, मैत्रायणी, तैत्तिरीय और वाजसनेयी

यजुर्वेद का महत्व केवल कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं है; इसमें दार्शनिक चिन्तन, सामाजिक नियम और विविध अनुष्ठानों का भी आधार मिलता है।

4. अथर्व संहिता (अथर्ववेद संहिता) : लोकजीवन, आरोग्य और अध्यात्म का वेद

अथर्ववेद चौथा और अत्यंत विशिष्ट वेद है, क्योंकि इसमें केवल देवस्तुति ही नहीं, जीवन की सामान्य समस्याओं, स्वास्थ्य, औषधियों, परिवार, समाज और कर्मकाण्ड से जुड़ी अनेक बातें मिलती हैं। इसे ब्रह्मवेद भी कहा जाता है।

अथर्ववेद की रचना

  • कुल मंत्र : 5687
  • काण्ड : 8
  • अध्याय : 20

अथर्ववेद के कई सूक्त ऋग्वेद से भी ग्रहण किए गए हैं, परंतु इसके बहुत से मंत्र मौलिक और लोकजीवन से सम्बद्ध हैं।

अथर्ववेद के विषय-वस्तु

  • स्वास्थ्य एवं चिकित्सा
  • रोग-निवारण मंत्र
  • घरेलू अनुष्ठान
  • गृहस्थ जीवन के नियम
  • विवाह-संस्कार
  • तंत्र-मंत्र और प्रचलित लोक-उपचार
  • अध्यात्म, ब्रह्म-विद्या और दार्शनिक मंत्र

अथर्ववेद की मुख्य शाखाएँ

अथर्ववेद की नौ शाखाओं का उल्लेख मिलता है—
पैपल, दान्त, प्रदान्त, स्नात, सौल, ब्रह्मदाबल, शौनक, देवदर्शत, चरणविद्या
परंतु वर्तमान में मुख्य रूप से दो शाखाएँ उपलब्ध हैं—
शौनक तथा पिप्पलाद शाखा।

अथर्ववेद को आयुर्वेद का मूल भी माना गया है, क्योंकि इसमें औषधियों, रोगों और उपचारों के अनेक संदर्भ मौजूद हैं।

संहिताओं का वैदिक परंपरा में स्थान

चारों संहिताएँ मिलकर वैदिक ज्ञान का वह मूल आधार बनाती हैं, जिसे ‘श्रुति’ कहा गया है।

  • ऋग्वेद : ज्ञान और ऋचाओं का संग्रह
  • सामवेद : संगीत और स्तुति का वेद
  • यजुर्वेद : अनुष्ठान और यज्ञ-विधि का ग्रंथ
  • अथर्ववेद : आरोग्य, लोकजीवन और अध्यात्म का वेद

संहिताएँ केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं; वे भारतीय सभ्यता, दर्शन, भाषा-विकास और संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। वैदिक संस्कृत के अध्ययन का आरंभ इन्हीं से होता है।

ब्राह्मण ग्रंथ : परिभाषा, उद्देश्य एवं स्वरूप

वेद साहित्य में संहिताओं के बाद विकसित होने वाला दूसरा महत्त्वपूर्ण चरण ब्राह्मण ग्रंथों का है। ये ग्रंथ मुख्यतः गद्य रूप में रचित हैं तथा वेद-मंत्रों की व्याख्या करने तथा यज्ञ संबंधी सिद्धांतों को स्पष्ट करने के उद्देश्य से लिखे गए हैं। ब्राह्मण साहित्य में देवताओं की अवधारणा, अनुष्ठानों का क्रम, यज्ञ-विधान और मंत्रों के निहितार्थ का विस्तारपूर्वक विवेचन मिलता है।

शाब्दिक अर्थ में ‘ब्राह्मण’ का तात्पर्य सत्-ज्ञान प्रदान करने वाले ग्रंथों से है। ये केवल मंत्रों का अर्थ ही नहीं बताते, बल्कि यज्ञ-प्रक्रिया के पीछे निहित दार्शनिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक भावों की भी व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि ब्राह्मण ग्रंथ वेदों की समझ में एक सेतु की भूमिका निभाते हैं।

ब्राह्मण ग्रंथ की विषयवस्तु एवं विशेषताएँ

इन ग्रंथों में सर्वाधिक महत्त्व कर्मकाण्ड की स्पष्टता को दिया गया है। यहाँ यज्ञ की विधि, प्रयुक्त सामग्री, अनुष्ठान के क्रम, मंत्रों का संदर्भ तथा देवताओं का स्वरूप विस्तृत रूप में वर्णित है। उदाहरणस्वरूप—

  • “विद्वासो हि देवा” (शतपथ ब्राह्मण) का निष्कर्ष यह संकेत करता है कि देवत्व का वास्तविक स्वरूप ज्ञान या विद्वता है।
  • “यज्ञो वै विष्णुः” से स्पष्ट होता है कि यज्ञ केवल कर्म न रहकर दैवीय शक्तियों का प्रतीक बन जाता है।
  • “अश्वं वै वीर्यम्” तथा “राष्ट्रम् अश्वमेधः” जैसे वाक्यों में शब्द प्रतीक रूप में प्रयुक्त हुए हैं—जहाँ अश्व शक्ति का तथा अश्वमेध राष्ट्रीय एकता का प्रतिनिधित्व करता है।
  • गोपथ ब्राह्मण में प्रस्तुत विचार — “अग्निः वाक्, इन्द्रः मनः, बृहस्पतिः चक्षुः” — देवताओं को मनुष्य की अंतर्निहित शक्तियों के रूप में समझने का संकेत देता है।

इन सभी उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि ब्राह्मण ग्रंथ केवल अनुष्ठानिक साहित्य ही नहीं, बल्कि वैदिक दर्शन की गहन व्याख्या भी प्रस्तुत करते हैं।

वेदों के प्रमुख ब्राह्मण ग्रंथ

हर वेद की अपनी निश्चित ब्राह्मण परंपरा है। उपलब्ध प्रमुख ब्राह्मण ग्रंथ इस प्रकार हैं—

ऋग्वेद

  • ऐतरेय ब्राह्मण (शाकल शाखा)
  • कौषीतकि अथवा शांखायन ब्राह्मण (बाष्कल शाखा)

सामवेद

  • पंचविंश (ताण्ड्य) ब्राह्मण
  • षड्विंश ब्राह्मण
  • आर्षेय ब्राह्मण
  • मन्त्र या छान्दोग्य ब्राह्मण
  • जैमिनीय (तलवकार) ब्राह्मण

यजुर्वेद

  • शुक्ल यजुर्वेद : शतपथ ब्राह्मण (माध्यन्दिन एवं काण्व शाखाएँ)
  • कृष्ण यजुर्वेद : तैत्तिरीय ब्राह्मण, मैत्रायणी ब्राह्मण, कठ या कपिष्ठल ब्राह्मण

अथर्ववेद

  • गोपथ ब्राह्मण (पिप्पलाद शाखा)

ब्राह्मण ग्रंथों की संख्या और परंपरा

विद्वानों की मान्यता के अनुसार ब्राह्मण ग्रंथों की कुल संख्या तेरह (13) मानी जाती है—

  • ऋग्वेद के लिए 2,
  • सामवेद के लिए 5,
  • यजुर्वेद के लिए 5,
  • तथा अथर्ववेद के लिए 1

इस प्रकार ब्राह्मण ग्रंथ वेदों के अध्ययन को व्यवहारिक और दार्शनिक दृष्टि से समझने में सहायक हैं। ये न केवल यज्ञ परंपरा के संरक्षक हैं, बल्कि वेदों की अंतर्वस्तु को स्पष्ट करने वाले मौलिक और अनिवार्य स्रोत भी हैं।

आरण्यक ग्रंथ : स्वरूप, उद्देश्य और विशेषताएँ

वेद साहित्य के विकास में संहिता और ब्राह्मण ग्रंथों के पश्चात् जो अगला चरण सामने आता है, वह आरण्यक साहित्य का है। इन ग्रंथों में मुख्य रूप से यज्ञानुष्ठानों के दार्शनिक पक्ष, मंत्रों की गूढ़ व्याख्या तथा अनुष्ठानों के आध्यात्मिक उद्देश्य पर विशेष बल दिया गया है। यद्यपि इनमें कर्मकांड का उल्लेख मिलता है, परंतु यहाँ उसका प्रस्तुतीकरण शुद्ध अनुष्ठानिक न होकर अधिक ध्यानपरक और दार्शनिक रूप में है।

‘आरण्यक’ शब्द का मूल अर्थ है—वन में अध्ययन हेतु रचित ग्रंथ। वानप्रस्थ आश्रम के साधकों द्वारा नगर-जीवन से दूर अरण्य में इनका अध्ययन किया जाता था, इसलिए इन्हें आरण्यक कहा गया। यह साहित्य बाह्य अनुष्ठान से अंतर्मुख साधना की ओर अग्रसर होने की वैदिक यात्रा को दर्शाता है।

अरण्यक ग्रन्थ की विषयवस्तु और दार्शनिक दृष्टि

आरण्यक ग्रंथों में प्राणविद्या, आत्मा, ब्रह्म, तथा चेतना की महिमा का वर्णन विशेष रूप से मिलता है। यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल बाह्य कर्म न रहकर मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक अनुशासन तक विस्तृत हो जाता है।

इन ग्रंथों में ऐतिहासिक संकेत भी विद्यमान हैं। उदाहरणस्वरूप—तैत्तिरीय आरण्यक में कुरु, पंचाल, काशी और विदेह जैसे महाजनपदों का उल्लेख मिलता है, जिससे सामाजिक और राजनीतिक संरचना की झलक मिलती है।

वेदों के साथ आरण्यकों का संबंध

प्रत्येक वेद से कुछ विशिष्ट आरण्यक जुड़े हैं, जो इस प्रकार हैं—

वेदआरण्यक ग्रंथ
ऋग्वेदऐतरेय आरण्यक, कौषीतकि (शांखायन) आरण्यक
यजुर्वेदबृहदारण्यक, मैत्रायणी आरण्यक, तैत्तिरीय आरण्यक
सामवेदजैमिनीय या तवलकार आरण्यक
अथर्ववेद(अथर्ववेद का आरण्यक उपलब्ध नहीं)

उपलब्ध स्रोतों के अनुसार आरण्यक ग्रंथों की कुल संख्या छः (6) मानी जाती है।

आरण्यक वेद साहित्य का वह चरण है, जहाँ कर्म से ज्ञान, और अनुष्ठान से दर्शन की ओर संक्रमण स्पष्ट दिखाई देता है। ये ग्रंथ वेदों की आध्यात्मिक परंपरा को गहराई से समझने के लिए आवश्यक कड़ी हैं और उपनिषदों के उद्भव की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं।

उपनिषद : वैदिक ज्ञान की दार्शनिक उपलब्धि

वेद साहित्य का अंतिम और सर्वाधिक दार्शनिक अंग उपनिषद माने जाते हैं। इनका उद्भव ब्राह्मण ग्रंथों के परिशिष्ट रूप में हुआ, किंतु विषय-वस्तु और चिंतन की दृष्टि से ये वैदिक साहित्य को दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करते हैं। यहाँ वैदिक ऋषियों के आध्यात्मिक अनुभव, आत्मा और ब्रह्म के स्वरूप का चिंतन तथा जीवन-मूल्यों की गहन विवेचना मिलती है। इसलिए उपनिषदों को वेदों का ‘ज्ञानकाण्ड’ तथा ‘वेदों का सारभाग’ कहा गया है।

उपनिषद की संख्या और प्रमुख उपनिषद

कुल उपनिषदों की संख्या परंपरा में 108 मानी जाती है, परंतु इनमें से केवल कुछ उपनिषद ही प्रामाणिक या प्रमुख माने गए हैं। इनमें ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, श्वेताश्वतर और कौशीतकि उपनिषद विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

आदि शंकराचार्य ने इनमें से 10 उपनिषदों पर भाष्य लिखे, जिन्हें परंपरागत रूप से सर्वाधिक प्रमाणिक माना गया।

  • माण्डूक्य उपनिषद – सबसे संक्षिप्त
  • बृहदारण्यक उपनिषद – सबसे विस्तृत

उपनिषदों का महत्व

उपनिषदों को भारतीय आध्यात्मिक दर्शन का आधार माना जाता है। इनमें आत्मा (आत्मन्), ब्रह्म, मोक्ष, कर्म और पुनर्जन्म जैसे विषयों पर गहन चर्चा मिलती है। उपनिषदों से ही आगे चलकर भगवद्गीता ने व्यापक रूप में ज्ञान का रूप लिया, इसलिए गीता को “उपनिषदों का सार” कहा गया है।

भारतीय दार्शनिक परंपरा में ऐसा माना जाता है कि—
वेद मूल, उपनिषद सार और गीता व्यवहारिक मार्गदर्शन का ग्रंथ है।

उपवेद, वेदांग और उपांग

वेदों के साथ ही ज्ञान की संरचना को व्यवस्थित करने के लिए तीन अन्य श्रेणियाँ विकसित हुईं—

  • उपवेद
  • वेदांग
  • उपांग

(1) उपवेद

चार उपवेद प्रत्येक वेद से सम्बद्ध माने जाते हैं:

वेदसंबद्ध उपवेद
ऋग्वेदआयुर्वेद
यजुर्वेदधनुर्वेद
सामवेदगंधर्ववेद
अथर्ववेदशिल्पवेद

(2) वेदांग

वेदों के छः सहायक अंग हैं—
शिक्षा, छंद, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और कल्प।
इनका उद्देश्य वेदों का सटीक उच्चारण, अर्थ-विस्तार और अनुष्ठानिक परंपरा को संरक्षित रखना था।

(3) उपांग

उपांग भी छह माने गए—
प्रतिपदसूत्र, अनुपद, छंदोभाषा (या प्रातिशाख्य), धर्मशास्त्र, न्याय और वैशेषिक।
इन्हीं ग्रंथों से आगे चलकर भारतीय दर्शन की आधारभूमि निर्मित हुई।

उपनिषद केवल दार्शनिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन की आत्मा हैं। वेदों में निहित आध्यात्मिक संदेश इन ग्रंथों में स्वरूप ग्रहण करता है और यहीं से भारतीय ज्ञान परंपरा एक सार्वभौमिक वैचारिक ऊँचाई प्राप्त करती है। वेद → उपनिषद → गीता — यह क्रम भारतीय धर्म, संस्कृति और दर्शन की बौद्धिक यात्रा का सुव्यवस्थित रूप प्रस्तुत करता है।

भारतीय दर्शन और उसका वर्गीकरण

उपनिषदों और वैदिक साहित्य के आधार पर भारतीय ऋषियों ने दार्शनिक विचारों की स्वतंत्र प्रणालियाँ विकसित कीं। इन्हें सामूहिक रूप से षड्दर्शन कहा जाता है—

  • न्याय
  • वैशेषिक
  • सांख्य
  • योग
  • मीमांसा
  • वेदांत

ये सभी दर्शन वेदों को प्रमाण मानते हैं, इसलिए इन्हें आस्तिक दर्शन कहा गया।

इसके विपरीत जो दर्शन वेदों को प्रमाण नहीं मानते, वे नास्तिक दर्शन कहलाते हैं—

  • चार्वाक
  • बौद्ध
  • जैन

वैदिक संस्कृत की ध्वनियाँ : स्वर और व्यंजन

भारतीय भाषाशास्त्रियों—जैसे डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. उदय नारायण तिवारी तथा डॉ. कपिल देव द्विवेदी—ने वैदिक संस्कृत में कुल 52 ध्वनियों का उल्लेख किया है। इनमें 13 स्वर और 39 व्यंजन सम्मिलित हैं। वहीं विद्वान डॉ. हरदेव बाहरी के अनुसार वैदिक ध्वनियों में स्वरों की संख्या 14 मानी जानी चाहिए।

1. वैदिक स्वर (13)

वैदिक संस्कृत में प्रयुक्त स्वरों को दो वर्गों में बाँटा जाता है—
(क) मूल स्वर:
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, लृ

(ख) संयुक्त स्वर:
ए, ओ, ऐ, औ

2. वैदिक व्यंजन (39)

मूल स्वरों के अतिरिक्त शेष सभी ध्वनियाँ व्यंजन वर्ग में आती हैं, जिनकी कुल संख्या 39 मानी जाती है।

वैदिक संस्कृत के 39 व्यंजन : सारणी (Table)

1. वर्गीय व्यंजन (25)

ये पाँच वर्गों में विभक्त हैं — कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य, ओष्ठ्य — और प्रत्येक वर्ग में पाँच ध्वनियाँ होती हैं।

वर्गीय व्यंजन — उच्चारण-स्थान, घोष-अघोष, प्राण (अल्प/महाप्राण)

वर्ग / स्थानव्यंजनअघोष-अल्पप्राणअघोष-महाप्राणसघोष-अल्पप्राणसघोष-महाप्राणनासिक (अनुनासिक)
कण्ठ्य (Velar)क, ख, ग, घ, ङ
तालव्य (Palatal)च, छ, ज, झ, ञ
मूर्धन्य (Retroflex)ट, ठ, ड, ढ, ण
दन्त्य (Dental)त, थ, द, ध, न
ओष्ठ्य (Labial)प, फ, ब, भ, म

2. अन्तस्थ (Semi-vowels / अर्धस्वर) — 4 व्यंजन

ये स्वर और व्यंजन के मध्य की ध्वनियाँ होती हैं।

ध्वनिवर्गघोषउच्चारण-स्थान
अन्तस्थसघोषतालव्य
अन्तस्थसघोषमूर्धन्य
अन्तस्थसघोषदन्त्य
अन्तस्थ (ओष्ठ-तालव्य)सघोषओष्ठ्य + तालव्य

3. उष्म (Fricatives) — 4 व्यंजन

ध्वनिप्रकारघोष/अघोषउच्चारण-स्थान
उष्मअघोषतालव्य
उष्मअघोषमूर्धन्य
उष्मअघोषदन्त्य
उष्मसघोषकण्ठ्य

4. अन्य / विशेष ध्वनियाँ (6)

(वैदिक में मान्य अतिरिक्त ध्वनियाँ)

ध्वनिप्रकार
अनुनासिक — चन्द्रबिंदु
अनुस्वार
विसर्ग
ᳵ (जिह्वामूलीय)विशेष विसर्ग — क/ख के पूर्व
ᳶ (उपध्मानीय)विशेष विसर्ग — प/फ के पूर्व
ऺ / ऻ(वैदिक स्वर-चिह्न, प्रायः उन्मूलित परंतु वैदिक परंपरा में संदर्भित)

विशेष चार वैदिक ध्वनियाँ (जो लौकिक संस्कृत में लुप्त हो गईं)

वैदिक संस्कृत में कुल 4 अतिरिक्त व्यंजन मिलते थे, जी लौलिक संस्कृत में लुप्त हो गए जिससे लौकिक संस्कृत में 48 ध्वनियाँ ही शेष बचीं—

ध्वनिप्रकारटिप्पणी
मूर्धन्यबाद में प्रचलन कम हुआ
ळ्हसंयुक्त ध्वनिविशेष वैदिक प्रयोग
जिह्वामूलीयविशेष अघोष ध्वनि‘क’ और ‘ख’ से पूर्व प्रयुक्त
उपध्मानीयविशेष अघोष ध्वनि‘प’ और ‘फ’ से पूर्व प्रयुक्त

कुल 39 वैदिक व्यंजन की सूची (संक्षेप में)

वैदिक ध्वनियों में “39 व्यंजन” की गणना कैसे बनती है?

वैदिक ध्वनि-व्यवस्था में व्यंजनों की कुल संख्या 39 मानी जाती है। यह संख्या इस प्रकार बनती है—

(1) 25 वर्गीय (स्पर्श) व्यंजन

क, ख, ग, घ, ङ
च, छ, ज, झ, ञ
ट, ठ, ड, ढ, ण
त, थ, द, ध, न
प, फ, ब, भ, म
➡ ये कुल: 25

(2) 4 अन्तस्थ (अर्धस्वर)

य, र, ल, व
➡ कुल: 4

(3) 4 उष्म

श, ष, स, ह
➡ कुल: 4

अभी तक हुआ:
25 + 4 + 4 = 33

अब “39” कैसे पूरा होता है?

परंपरागत वैदिक व्यंजन-गणना में 6 ध्वनियाँ अतिरिक्त मानी जाती हैं—
(ये 6 सभी सूची में गिनाई जाती हैं, पर सभी को व्यंजन नहीं माना जाता।)

ये 6 हैं—

  1. अनुस्वार – ं
  2. विसर्ग – ः
  3. अनुनासिक (चन्द्रबिंदु) – ँ
  4. जिह्वामूलीय (विशेष विसर्ग) – ᳵ
  5. उपध्मानीय (विशेष विसर्ग) – ᳶ
  6. नस्वर / प्लुत-चिह्न जैसे वैदिक विशेष चिह्न (कभी-कभी इस स्थान पर “ऺ/ऻ” अथवा “ऽ” इत्यादि को रखा जाता है)

➡ इन 6 का योगदान कुल गणना में जोड़ा जाता है।

इस प्रकार:
33 + 6 = 39

39 व्यंजन = 25 वर्गीय + 4 अन्तस्थ + 4 उष्म + (अनुस्वार + विसर्ग + अन्य 4 विशेष चिह्न)

👉 अर्थात् अनुस्वार और विसर्ग को जोड़कर ही “39” पूरी होती है।

डॉ. धीरेन्द्र वर्मा आदि के अनुसार

वैदिक में कुल ध्वनियाँ = 52

  • स्वर = 13
  • व्यंजन = 39
    • अनुस्वार, विसर्ग, अनुनासिक, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय आदि शामिल हैं।

👉 ध्यान दें—

अनुस्वार और विसर्ग
→ स्वतंत्र व्यंजन नहीं माने जाते
→ ये “अतिरिक्त अनुनासिक/उष्म ध्वनियाँ” हैं
→ ध्वनियों की कुल संख्या बढ़ा देते हैं (52 ध्वनियाँ)

वैदिक संस्कृत की प्रमुख भाषिक विशेषताएँ

वैदिक संस्कृत भारतीय आर्य-भाषा की सबसे प्राचीन और समृद्ध अवस्था मानी जाती है। इसकी कुछ प्रमुख भाषिक विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं—

1. स्वराघात एवं संरचना

  • वैदिक संस्कृत का स्वर-प्रयोग दो रूपों—संगीतात्मक और बलात्मक—में प्राप्त होता है, जो इसे अत्यंत लयात्मक भाषा बनाते हैं।
  • यह भाषा श्लिष्ट एवं योगात्मक होती है, जिसमें शब्द-रचनाएँ आपस में सुगठित रूप से जुड़ती हैं।

2. लिंग, वचन और वाच्य

  • वैदिक संस्कृत में तीन लिंग—पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग—प्रचलित थे।
  • एकवचन, द्विवचन और बहुवचन—तीनों प्रकार के वचन व्यवस्थित रूप से प्रयुक्त होते थे।
  • भाषा में तीन प्रकार के वाच्य मिलते हैं—कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य।

3. विभक्तियाँ और पद-रूप

  • वैदिक काल में आठ विभक्तियाँ—कर्ता, सम्बोधन, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध और अधिकरण—सुस्पष्ट रूप से प्रयोग में थीं।
  • धातुओं के रूप परस्मैपदी और आत्मनेपदी दोनों रूपों में चलते थे, जबकि कुछ धातुएँ उभयपदी थीं।

4. समासों की स्थिति

भाषाविद् डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार वैदिक काल में चार प्रकार के समासों का प्रयोग प्रमुखता से मिलता है—
तत्पुरुष, कर्मधारय, बहुब्रीहि और द्वन्द्व

5. लकारों का प्रयोग : काल और भाव

वैदिक संस्कृत की क्रिया-व्यवस्था अत्यंत विस्तृत थी। इसमें क्रिया रूपों को चार कालों और छः भावों में विभाजित किया गया था, जिन्हें मिलाकर लकार कहा जाता है।

चार काल

  1. लोट् – आज्ञार्थ
  2. लिट् – परोक्ष/सम्पन्न
  3. लङ् – अनद्यतन भूत
  4. लुङ् – सामान्य भूत

छः भाव

  1. लोट् – आज्ञा
  2. विधिलिङ् – सम्भावना
  3. आशीलिङ् – इच्छा
  4. लुङ् – हेतु-हेतु संबंध
  5. लेट् – अभिप्राय
  6. लेङ् – निर्बन्ध

6. धातुगण

विकरण-भेद के आधार पर वैदिक धातुओं को दस गणों में रखा गया है—
भ्वादि, अदादि, जुहोत्यादि (ह्वादि), दिवादि, स्वादि, तुदादि, तनादि, रूधादि, क्रयादि और चुरादि।

लौकिक संस्कृत : वैदिक से विकसित रूप

पाणिनि द्वारा रचित ‘अष्टाध्यायी’ जिस भाषा का निरूपण करती है, उसे लौकिक संस्कृत कहा जाता है। यह वैदिक संस्कृत से विकसित होकर अधिक सरल और नियमानुगत रूप में स्थापित हुई।

  • वैदिक ध्वनि-संरचना की अपेक्षा लौकिक संस्कृत में केवल 48 ध्वनियाँ बची रह गईं।
  • वैदिक काल में प्रयोग होने वाली चार ध्वनियाँ—ळ, ळ्ह, जिह्वमूलीय और उपध्मानीय—समय के साथ लुप्त हो गईं।

वैदिक और लौकिक संस्कृत : एक तुलनात्मक दृष्टि

भारतीय आर्य भाषाओं के विकासक्रम में संस्कृत के दो स्वरूप—वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत—विशेष महत्त्व रखते हैं। वैदिक भाषा वेदकालीन साहित्य की आधारभूमि है, जबकि लौकिक संस्कृत पाणिनीय परंपरा के बाद विकसित उस भाषा का रूप है, जो महाकाव्यों, नाट्य, काव्य, नीति, आयुर्वेद और वैज्ञानिक साहित्य में प्रयुक्त हुई। दोनों के स्वरूप, प्रयोग, व्याकरण और शब्द-संपदा में स्पष्ट भेद मिलते हैं।

1. साहित्यिक आधार में अंतर

  • वैदिक संस्कृत का प्रयोग संहिताओं, ब्राह्मण-ग्रंथों, आरण्यकों और उपनिषदों जैसे धार्मिक एवं दार्शनिक साहित्य में हुआ।
  • लौकिक संस्कृत का उपयोग वेदांगों, रामायण–महाभारत, शास्त्रीय काव्य, नाटकों, नीति–कथाओं, आयुर्वेद और वैज्ञानिक रचनाओं में देखने को मिलता है।

2. भाषा की प्रकृति और विषय-वस्तु

वैदिक संस्कृत का स्वर धार्मिक, आध्यात्मिक और यज्ञ-केंद्रित है, जबकि लौकिक संस्कृत में जीवन, समाज, राजनीति, नीतिशास्त्र और जगत के लौकिक पक्ष अधिक उभरकर आते हैं।

3. शब्द-संपदा एवं रूप-परिवर्तन

  • वैदिक रूपों में शब्द अधिक विस्तृत और बहुविकल्पी थे, जैसे—देवासः, जनामः
  • लौकिक संस्कृत में इन रूपों का संक्षिप्तीकरण हुआ, जैसे—देवः, जनः
  • कुछ प्राचीन शब्द और ध्वनियाँ बाद में प्रचलन से बाहर हो गईं।

4. स्वरों की संख्या और ध्वनि-प्रयोग

  • वैदिक संस्कृत में स्वर-प्रणाली अधिक समृद्ध थी; लृ जैसे स्वर भी प्रयुक्त होते थे।
  • लौकिक संस्कृत में स्वर-संख्या घटती है और कई ध्वनियाँ बाद में लुप्त हो जाती हैं।
  • वैदिक भाषा में स्वराघात संगीतात्मक था, जबकि लौकिक संस्कृत बलाघात प्रधान हो जाती है।

5. उपसर्ग और धातु-व्यवस्था

  • वैदिक संस्कृत में उपसर्ग स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त हो सकते थे और धातुओं से एक हद तक पृथक रहते थे।
  • लौकिक संस्कृत में उपसर्ग धातुओं से अधिक दृढ़ता से जुड़ गए और उनके स्वतंत्र प्रयोग पर नियंत्रण हो गया।

6. विभक्ति और रूप-प्रयोग का भेद

  • वैदिक संस्कृत में कुछ स्थानों पर सप्तमी एकवचन का प्रयोग अप्रकट या लुप्त मिलता है।
  • लौकिक संस्कृत में यह रूप व्यवस्थित रहता है, और व्याकरणिक व्यवस्थाएँ अधिक कठोरता से पालन की जाती हैं।

7. लकारों में अंतर

  • वैदिक संस्कृत में लोट् लकार का प्रयोग मिलता है।
  • लौकिक संस्कृत की सामान्य प्रक्रिया में यह लकार प्रायः अनुपस्थित हो जाता है।

8. शब्दार्थ-भेद

कई शब्द वैदिक और लौकिक संस्कृत में भिन्न अर्थ व्यक्त करते हैं।
उदाहरण—

वैदिक अर्थलौकिक अर्थ
पत् – उड़नापत् – गिरना
सह – जीतनासह – सहना
असुर – शक्तिशालीअसुर – दैत्य
अराति – कृपणअराति – शत्रु
वध – हथियार / प्रहारवध – हत्या
क्षिति – घरक्षिति – पृथ्वी

9. व्याकरणिक व्यवस्था

  • वैदिक संस्कृत में कुछ धातु-रूप, विभक्ति-प्रयोग तथा वाक्य-रचनाएँ अपेक्षाकृत स्वतंत्र और अव्यवस्थित मालूम होती हैं।
  • लौकिक संस्कृत पाणिनीय व्याकरण के अनुशासन में बँधकर अत्यंत सुव्यवस्थित रूप ग्रहण कर लेती है।

10. उच्चारण और संगीतत्व

  • वैदिक संस्कृत में मंत्रोच्चार के कारण भाषा अत्यंत संगीतात्मक थी।
  • लौकिक संस्कृत में उच्चारण अपेक्षाकृत बलात्मक और औपचारिक स्वरूप ग्रहण कर लेता है।

वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत में अंतर : तुलनात्मक सारणी

क्रमविषयवैदिक संस्कृतलौकिक संस्कृत
1साहित्यिक आधारसंहिताएँ, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषदवेदांग, रामायण, महाभारत, काव्य, नाटक, नीति, आयुर्वेद, विज्ञान
2विषय-वस्तुप्रमुखतः धार्मिक, यज्ञकेंद्रित एवं आध्यात्मिकजीवन, समाज, राजनीति, विज्ञान आदि लौकिक विषयों का प्रतिनिधित्व
3शब्द-संपदाविस्तृत एवं प्राचीन शब्दरूप—जैसे देवासः, जनामःरूप संक्षिप्त और मानकीकृत—जैसे देवः, जनः
4स्वर-प्रणालीस्वरों की संख्या अधिक; लृ जैसे स्वर प्रचलितकई स्वर लुप्त; स्वर-प्रणाली संकुचित
5ध्वनि-स्वरूपस्वराघात संगीतात्मक तथा बलसहितमुख्यतः बलात्मक उच्चारण
6उपसर्ग-धातु संबंधउपसर्ग स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त हो सकते थेउपसर्ग धातु से दृढ़ता से जुड़े; स्वतंत्र प्रयोग सीमित
7विभक्ति-प्रयोगकुछ स्थानों पर सप्तमी एकवचन लुप्त मिलता हैसप्तमी एकवचन एवं अन्य विभक्तियाँ व्यवस्थित बनी रहती हैं
8व्याकरणिक व्यवस्थारूप-प्रयोग में कुछ अव्यवस्था, लचीलापनपाणिनीय व्याकरण के कठोर नियमों का पालन
9लकारलोट् लकार उपलब्धसामान्यतः लोट् लकार का प्रयोग नहीं
10शब्दार्थ“पत्–उड़ना”, “सह–जीतना”, “असुर–शक्तिशाली”, “अराति–कृपण”, “वध–हथियार”, “क्षिति–गृह”“पत्–गिरना”, “सह–सहना”, “असुर–दैत्य”, “अराति–शत्रु”, “वध–हत्या”, “क्षिति–पृथ्वी”
11उच्चारणस्वर और संगीतात्मकता अधिकबलात्मकता प्रमुख
12ध्वनि-प्रयोगस्वर और उच्चारण में विविधतास्वर-प्रयोग अपेक्षाकृत सीमित

वैदिक संस्कृति और समाज

वैदिक संस्कृत केवल भाषा नहीं थी—यह एक ऐसी जीवित परम्परा थी जिसने—

  • सामाजिक व्यवस्था
  • धार्मिक संस्कार
  • यज्ञ–कर्मकाण्ड
  • संगीत
  • काव्य
  • दर्शन

सभी को प्रभावित किया।

वैदिक समाज में भाषा का प्रयोग अत्यंत शुद्ध, कंठस्थ और सस्वर उच्चारण के साथ होता था। छन्दों की विविधता—गायत्री, त्रिष्टुप, अनुष्टुप, जगती, पङ्क्ति—भाषा को लयात्मकता प्रदान करती थी।

वैदिक संस्कृत की स्थायी उपलब्धियाँ

  1. विवेकी भाषिक प्रणाली – धातु, प्रत्यय, उपसर्ग, विभक्ति, उपपद और संयोजन–पद्धति।
  2. अद्वितीय ध्वनि–विज्ञान – स्वर-उच्चारण की विशेषता, उदात्त–अनुदात्त–स्वरित परम्परा।
  3. वेदान्त का बीज – उपनिषदों के माध्यम से अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत जैसी दार्शनिक धाराएँ।
  4. साहित्यिक परम्परा की नींव – रामायण, महाभारत, पुराण, काव्य—सबका मूल स्रोत वैदिक संस्कृत।
  5. भाषा–विज्ञान की वैज्ञानिक परम्परा – पाणिनि, कात्यायन, पतंजलि की व्याकरण–परम्परा।
  6. भारतीय भाषाओं की जड़ – आज की अधिकांश भारतीय आर्य–भाषाएँ इसी परम्परा से विकसित हुई हैं।

वैदिक संस्कृत का प्रभाव : भारत से विश्व तक

वैदिक संस्कृत के प्रभाव केवल भारतीय भूमि तक सीमित नहीं रहे।

  • इंडो–यूरोपीय भाषाओं के अध्ययन में यह आधारभूत भाषा है।
  • यूनानी, लैटिन, पारसी, जर्मैनिक, स्लाव आदि भाषाओं में संस्कृत के अनेक रूपों की छाप मिलती है।
  • दर्शन, गणित, खगोलशास्त्र, भाषाविज्ञान—इन सभी क्षेत्रों में वैदिक भाषा की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।

निष्कर्ष : वैदिक संस्कृत का अनन्त महत्व

वैदिक संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं—बल्कि भारत की आत्मा का स्वरूप है।

इसमें—

  • भारतीय संस्कृति का आरम्भ,
  • भारतीय दर्शन का आधार,
  • भारतीय धार्मिक परम्पराओं की जड़ें,
  • और भारतीय साहित्य का मूल बीज—

सब कुछ निहित है।

वेदों की ऋचाएँ, सामों का गायन, यजुर्वेद के मंत्र, अथर्ववेद की प्रार्थनाएँ—ये सब केवल भाषाई रचनाएँ नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों पुरानी मानवीय चेतना के प्रतिनिधि हैं।

वैदिक संस्कृत ने सदियों का लंबा यात्रा–पथ तय करते हुए लौकिक संस्कृत का रूप लिया, और वहीं से आधुनिक भारतीय भाषाओं का जन्म हुआ।
इस प्रकार यह भाषा भारतीय जीवन–परम्परा की जड़, तना और शाखाओं का आधार है।


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