आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम अत्यंत आदर, श्रद्धा और बौद्धिक गौरव के साथ लिया जाता है। वे केवल एक लेखक नहीं थे, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा, इतिहास और मानव-मूल्यों के मर्मज्ञ व्याख्याता थे। उनका संपूर्ण गद्य उनके विराट व्यक्तित्व का सजीव प्रतिबिंब है। विद्वत्ता, चिन्तन-प्रियता, सांस्कृतिक दृष्टि, मानवतावाद और भाषिक सौष्ठव—ये सभी तत्त्व उनके गद्य में मूर्तिमान हो उठते हैं।
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी गद्य को केवल विषयवस्तु ही नहीं दी, बल्कि उसे वैचारिक गहराई, सांस्कृतिक व्यापकता और दार्शनिक संतुलन भी प्रदान किया। विशेष रूप से सांस्कृतिक निबंधों के क्षेत्र में उनका योगदान अतुलनीय है। इस विधा में न तो उनके समकालीन और न ही उनके उत्तरवर्ती लेखक उनकी समता कर सके। निबंध, आलोचना, उपन्यास, साहित्येतिहास और संपादन—सभी क्षेत्रों में उनका योगदान हिंदी साहित्य को एक नई ऊँचाई पर ले जाता है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी : जीवन-परिचय (संक्षिप्त – तालिका)
| श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| पूरा नाम | हजारी प्रसाद द्विवेदी |
| उपाधि | आचार्य |
| बचपन का नाम | वैद्यनाथ द्विवेदी |
| जन्म तिथि | 19 अगस्त 1907 |
| जन्म स्थान | छपरा गाँव, दुबे का छपरा (ओझवलिया), बलिया, उत्तर प्रदेश, भारत |
| मृत्यु तिथि | 19 मई 1979 |
| आयु | 71 वर्ष 9 महीने |
| मृत्यु स्थान | दिल्ली, भारत |
| माता | ज्योतिष्मती देवी |
| पिता | पंडित अनमोल द्विवेदी |
| पत्नी | भगवती देवी |
| राष्ट्रीयता | भारतीय |
| शिक्षा | बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (Banaras Hindu University) |
| व्यवसाय / पेशा | लेखक, आलोचक, प्राध्यापक |
| साहित्य काल | आधुनिक काल |
| भाषा ज्ञान | हिन्दी, अंग्रेजी, बांग्ला, संस्कृत, अपभ्रंश |
| प्रमुख विधाएँ | निबन्ध, आलोचना, उपन्यास |
| प्रमुख रचनाएँ | आलोक पर्व, हिन्दी साहित्य, अशोक के फूल, कबीर |
| उपन्यास | बाणभट्ट की आत्मकथा, अनामदास का पोथा, पुनर्नवा, चारु चंद्रलेखा |
| निबन्ध-संग्रह | अशोक के फूल, कुटज, विचार-प्रवाह, विचार और वितर्क, कल्पलता, आलोक पर्व |
| अन्य संपादित ग्रंथ | विश्व भारती, अभिनव भारतीय ग्रंथमाला, नाथ संप्रदाय, मध्यकालीन धर्म साधना |
| सम्मान / पुरस्कार | पद्म भूषण (1957), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1973, आलोक पर्व के लिए) |
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का जीवन-परिचय
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म 19 अगस्त, 1907 ई. को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के छपरा नामक ग्राम में एक विद्वान ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम ‘वैद्यनाथ द्विवेदी’ था। उनका पारिवारिक वातावरण अत्यंत विद्वत्तापूर्ण और संस्कारसम्पन्न था।
उनकी माता का नाम श्रीमती ज्योतिष्मती देवी था, जो धार्मिक प्रवृत्ति एवं सुसंस्कृत महिला थीं। उनके पिता पं. अनमोल दुबे संस्कृत और ज्योतिष के प्रकांड पंडित थे। पिता से प्राप्त विद्वत्ता और संस्कारों को द्विवेदी जी ने अपनी असाधारण प्रतिभा के माध्यम से और अधिक उज्ज्वल किया। कहा जा सकता है कि उन्होंने अपनी पारिवारिक बौद्धिक परंपरा को गौरवान्वित किया।
प्रारंभिक शिक्षा और संस्कृत साधना
हजारी प्रसाद द्विवेदी की प्रारंभिक शिक्षा उनके पैतृक ग्राम छपरा में ही हुई। बचपन से ही वे मेधावी, जिज्ञासु और अध्ययनशील थे।
सन् 1920 ई. में उन्होंने बसरिकापुर माध्यमिक विद्यालय से प्रथम श्रेणी में प्री-मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने पराशर ब्रह्मचर्य आश्रम में अध्ययन किया, जहाँ उन्हें वैदिक अनुशासन, आत्मसंयम और आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त हुई।
सन् 1923 ई. में उन्होंने रणवीर संस्कृत पाठशाला, काशी में संस्कृत का विधिवत अध्ययन आरंभ किया। यहीं से उनके भीतर भारतीय दर्शन, साहित्य और संस्कृति के प्रति गहरी अभिरुचि विकसित हुई। संस्कृत भाषा पर उनकी अद्भुत पकड़ का मूल स्रोत यही काल था।
वैवाहिक जीवन और उच्च शिक्षा
सन् 1927 ई. में हजारी प्रसाद द्विवेदी का विवाह भगवती देवी से हुआ। पारिवारिक जीवन में भी वे अत्यंत संतुलित, सौम्य और उत्तरदायित्वपूर्ण रहे।
उसी वर्ष उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1929 ई. में संस्कृत साहित्य में शास्त्री की परीक्षा पास कर इंटरमीडिएट पूर्ण किया।
इसके पश्चात उन्होंने काशी विश्वविद्यालय से सन् 1930 ई. में ज्योतिषाचार्य तथा साहित्याचार्य की परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। यह उनकी बहुआयामी विद्वत्ता का प्रमाण था कि वे साहित्य, दर्शन और ज्योतिष—तीनों क्षेत्रों में समान अधिकार रखते थे।
शांति निकेतन : बौद्धिक निर्माण का केंद्र
सन् 1930 ई. में हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन एक निर्णायक मोड़ पर पहुँचा, जब वे शांति निकेतन पहुँचे। वहाँ उन्हें आचार्य क्षितिमोहन सेन और गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर का सान्निध्य प्राप्त हुआ।
शांति निकेतन में उन्होंने लगभग 20 वर्षों तक हिंदी, भारतीय संस्कृति, दर्शन और इतिहास का गहन अध्ययन किया। यही वह स्थान था जहाँ उनकी दृष्टि संकीर्ण पांडित्य से ऊपर उठकर मानवीय और सांस्कृतिक व्यापकता तक पहुँची।
सन् 1940 से 1950 ई. तक उन्होंने शांति निकेतन में अध्यापन कार्य भी किया। उनके अध्यापन में केवल ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि और सांस्कृतिक चेतना का समावेश था।
विश्वविद्यालयीय जीवन और सम्मान
सन् 1949 ई. में लखनऊ विश्वविद्यालय ने उन्हें उनकी विद्वत्ता के सम्मानस्वरूप डी.लिट्. (Doctor of Letters) की उपाधि प्रदान की।
सन् 1950 ई. में वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष नियुक्त हुए। यहाँ उन्होंने हिंदी अध्ययन को वैज्ञानिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि प्रदान की।
सन् 1957 ई. में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ सम्मान से अलंकृत किया।
इसके बाद सन् 1960 से 1966 ई. तक वे पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में हिंदी विभाग के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर रहे।
सन् 1973 ई. में उनके प्रसिद्ध निबंध-संग्रह ‘आलोक पर्व’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया।
साहित्यिक परिचय और रचनात्मक व्यक्तित्व
डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी आधुनिक हिंदी साहित्य के निबंधकार, उपन्यासकार, आलोचक, इतिहासकार और संपादक थे। उन्होंने हिंदी गद्य की लगभग सभी प्रमुख विधाओं में सृजन किया।
संस्कृत और हिंदी भाषाओं पर उनका असाधारण अधिकार था। इसके अतिरिक्त वे अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य के भी ज्ञाता थे। यही बहुभाषिक विद्वत्ता उनके लेखन को व्यापक दृष्टि प्रदान करती है।
उन्होंने ‘विश्व भारती’ और ‘अभिनव भारतीय ग्रंथ माला’ का संपादन किया। उनका ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ शोधात्मक गंभीरता और सांस्कृतिक संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण है।
निबंधकार के रूप में द्विवेदी जी
हजारी प्रसाद द्विवेदी का गद्य अपने सर्वोत्तम और परिष्कृत रूप में निबंध साहित्य में दिखाई देता है। वे विशेष रूप से सांस्कृतिक निबंधों के अप्रतिम लेखक थे।
उनके निबंधों में इतिहास, दर्शन, लोकजीवन, परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत समन्वय मिलता है। वे संस्कृति को जड़ नहीं, बल्कि जीवंत और गतिशील मानते थे।
उनके प्रमुख निबंध-संग्रह हैं—
- अशोक के फूल
- कल्पलता
- आलोक पर्व
- कुटज
इन निबंधों में उनका व्यक्तित्व संपूर्णता में प्रकट होता है—विद्वत्ता, मानवीय करुणा, हास्य, व्यंग्य और गहन चिंतन के साथ।
आलोचक और साहित्य-चिंतक
रामचंद्र शुक्ल ने जिस हिंदी आलोचना की नींव रखी थी, हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनकी आलोचना संकीर्ण मूल्यांकन न होकर सांस्कृतिक विवेचना पर आधारित है।
वे साहित्य को समाज, इतिहास और संस्कृति से जोड़कर देखते थे। इसी कारण उनकी आलोचना मानवतावादी और समन्वयात्मक बन सकी।
भाषा-शैली की विशेषताएँ
द्विवेदी जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी बोझिल नहीं है। उसमें प्रवाह, सौष्ठव और भावात्मक गहराई है।
उनकी शैली—
- विचारप्रधान
- सांस्कृतिक
- व्याख्यात्मक
- संवादात्मक
उनकी भाषा में विद्वत्ता और सरलता का दुर्लभ संतुलन दिखाई देता है।
सम्मान, व्यक्तित्व और निधन
डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी को अनेक सम्मान प्राप्त हुए—
- डी.लिट्.
- पद्मभूषण
- साहित्य अकादमी पुरस्कार
- मंगलाप्रसाद पारितोषिक
उनका स्वभाव अत्यंत सौम्य, मधुर और विनम्र था।
19 मई, 1979 ई. को हिंदी साहित्य का यह देदीप्यमान नक्षत्र सदा के लिए अस्त हो गया, किंतु उनका साहित्य आज भी जीवित है।
रचनात्मक योगदान : कृतियाँ और साहित्यिक धरोहर
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक अवदान अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। उन्होंने हिंदी गद्य की लगभग सभी प्रमुख विधाओं—उपन्यास, निबंध, आलोचना, साहित्येतिहास, अनुवाद एवं संपादन—में मौलिक और मूल्यवान रचनाएँ प्रस्तुत कीं। उनकी कृतियों में भारतीय संस्कृति, इतिहासबोध, मानवतावाद और गहन वैचारिक चेतना का समन्वित स्वरूप दिखाई देता है। उनके प्रमुख साहित्यिक कार्यों को निम्नलिखित वर्गों में प्रस्तुत किया जा सकता है—
(1) उपन्यास-साहित्य
हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी के उन विशिष्ट उपन्यासकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चेतना को कथा के माध्यम से सशक्त अभिव्यक्ति दी। उनके उपन्यासों में इतिहास केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि का अंग बनकर उपस्थित होता है। उनके प्रमुख उपन्यास हैं—
- बाणभट्ट की आत्मकथा – यह उपन्यास हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है, जिसमें सातवीं शताब्दी के सांस्कृतिक जीवन का जीवंत चित्रण मिलता है।
- अनामदास का पोथा – इसमें साधना, रहस्य और मानवीय जिज्ञासा का गूढ़ समन्वय दिखाई देता है।
- पुनर्नवा – सामाजिक पुनरुत्थान और मानवीय संबंधों की संवेदनशील कथा।
- चारु चंद्रलेखा – ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रचा गया भावनात्मक और वैचारिक उपन्यास।
- सूर साहित्य – सूरदास और भक्ति परंपरा को केंद्र में रखकर लिखा गया विश्लेषणात्मक कृति-रूप उपन्यासात्मक ग्रंथ।
(2) निबंध-संग्रह
द्विवेदी जी का निबंध साहित्य हिंदी गद्य की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिना जाता है। उनके निबंधों में सांस्कृतिक विवेक, दार्शनिक गहराई और ललित शैली का अद्भुत सामंजस्य मिलता है। उनके प्रमुख निबंध-संग्रह निम्नलिखित हैं—
- अशोक के फूल (1950)
- कल्पलता (1951)
- मध्यकालीन धर्मसाधना (1952)
- विचार और वितर्क (1957)
- विचार-प्रवाह (1959)
- कुटज (1964)
- आलोक पर्व (1972)
इन संग्रहों में संकलित निबंधों ने हिंदी निबंध को वैचारिक गरिमा और सांस्कृतिक विस्तार प्रदान किया।
(3) प्रमुख निबंध
निबंधकार के रूप में द्विवेदी जी की विशेषता यह है कि वे सामान्य-से विषय को भी गहन चिंतन का आधार बना देते हैं। उनके चर्चित निबंधों में जीवन, प्रकृति, समाज और संस्कृति के विविध पक्ष उद्घाटित होते हैं। उल्लेखनीय निबंध हैं—
- कल्पतरु
- गतिशील चिंतन
- साहित्य सहचर
- नाखून क्यों बढ़ते हैं
- देवदारु
- बसंत आ गया
- वर्षा : घनपति से घनश्याम तक
- मेरी जन्मभूमि
- घर जोड़ने की माया
इन निबंधों में उनकी विचारशीलता, मानवीय संवेदना और शैलीगत सौंदर्य स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
(4) साहित्येतिहास संबंधी ग्रंथ
हजारी प्रसाद द्विवेदी एक गंभीर साहित्येतिहासकार भी थे। उन्होंने हिंदी साहित्य के विकास को सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों में देखने का प्रयास किया। उनके प्रमुख इतिहासपरक ग्रंथ हैं—
- हिंदी साहित्य का आदिकाल
- हिंदी साहित्य की भूमिका
- हिंदी साहित्य
इन ग्रंथों में साहित्य को केवल रचनाओं का क्रम न मानकर, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति के रूप में विवेचित किया गया है।
(5) अनूदित कृतियाँ
द्विवेदी जी ने संस्कृत और अन्य भाषाओं की महत्वपूर्ण रचनाओं को हिंदी में प्रस्तुत कर हिंदी पाठकों के लिए ज्ञान के द्वार खोले। उनकी प्रमुख अनूदित रचनाएँ हैं—
- प्रबंध चिंतामणि
- पुरातन प्रबंध संग्रह
- प्रबंध कोश
- विश्व परिचय
- लाल कनेर
- रा बचपन
इन अनुवादों में उन्होंने मूल कृति की आत्मा को सुरक्षित रखते हुए सरल और प्रभावशाली हिंदी का प्रयोग किया है।
(6) संपादित ग्रंथ
संपादक के रूप में भी हजारी प्रसाद द्विवेदी का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने अनेक प्राचीन और दुर्लभ ग्रंथों का संपादन कर उन्हें आधुनिक पाठकों के लिए सुलभ बनाया। उनके प्रमुख संपादित ग्रंथ हैं—
- पृथ्वीराज रासो (संक्षिप्त संस्करण)
- नाथसिद्धों की बानियाँ
- संदेश रासक
इन ग्रंथों के माध्यम से उन्होंने हिंदी की प्राचीन साहित्यिक परंपरा को आधुनिक अध्ययन से जोड़ा।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी : रचनाएँ एवं कृतियाँ (सारणीबद्ध प्रस्तुति)
नीचे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की समस्त प्रमुख रचनाओं को विधा-आधारित एक ही तालिका (टेबल) में सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया गया है, जिससे इसे आपके लेख में सीधे जोड़ा जा सके और सामग्री स्पष्ट, शैक्षणिक व परीक्षा-उपयोगी बने—
| विधा / श्रेणी | प्रमुख रचनाएँ / कृतियाँ |
|---|---|
| उपन्यास | बाणभट्ट की आत्मकथा, अनामदास का पोथा, पुनर्नवा, चारु चंद्रलेखा, सूर साहित्य |
| निबंध-संग्रह | अशोक के फूल (1950), कल्पलता (1951), मध्यकालीन धर्मसाधना (1952), विचार और वितर्क (1957), विचार-प्रवाह (1959), कुटज (1964), आलोक पर्व (1972) |
| प्रमुख निबंध | कल्पतरु, गतिशील चिंतन, साहित्य सहचर, नाखून क्यों बढ़ते हैं, अशोक के फूल, देवदारु, बसंत आ गया, वर्षा : घनपति से घनश्याम तक, मेरी जन्मभूमि, घर जोड़ने की माया |
| साहित्येतिहास संबंधी ग्रंथ | हिंदी साहित्य का आदिकाल, हिंदी साहित्य की भूमिका, हिंदी साहित्य |
| अनूदित रचनाएँ | प्रबंध चिंतामणि, पुरातन प्रबंध संग्रह, प्रबंध कोश, विश्व परिचय, लाल कनेर, रा बचपन |
| संपादित ग्रंथ | पृथ्वीराज रासो (संक्षिप्त संस्करण), नाथसिद्धों की बानियाँ, संदेश रासक |
इस प्रकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचनाएँ केवल संख्या की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि वैचारिक गहराई, सांस्कृतिक व्यापकता और साहित्यिक गरिमा की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उनकी कृतियाँ हिंदी साहित्य को एक समृद्ध बौद्धिक विरासत प्रदान करती हैं और उन्हें आधुनिक हिंदी गद्य के श्रेष्ठतम रचनाकारों की पंक्ति में प्रतिष्ठित करती हैं।
भाषागत विशेषताएँ
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की भाषा उनके व्यापक ज्ञान, बहुभाषिक दक्षता और गहन सांस्कृतिक चेतना का सशक्त प्रमाण है। वे विषय, संदर्भ और विधा के अनुरूप भाषा का चयन करने में पूर्णतः सक्षम थे। संस्कृत, अपभ्रंश, हिंदी, बंगला और अंग्रेज़ी भाषाओं पर उनके अधिकार ने उनकी भाषा को बहुआयामी, समृद्ध और प्रभावशाली बनाया। उनकी भाषाशैली न केवल बौद्धिक है, बल्कि संवेदनात्मक और कलात्मक भी है।
1. बहुभाषिक शब्द-संपदा का संतुलित प्रयोग
द्विवेदी जी की भाषा की सबसे प्रमुख विशेषता उसकी विविध शब्दावली है। उन्होंने संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ-साथ तद्भव, देशज और प्रचलित विदेशी शब्दों का अत्यंत सजग और सटीक प्रयोग किया है। उनकी रचनाओं में हिंदी की मूल आत्मा सुरक्षित रहते हुए संस्कृत, अंग्रेज़ी और उर्दू के शब्द सहज रूप से घुल-मिल जाते हैं। यह संतुलन उनकी भाषा को न तो कृत्रिम बनाता है और न ही बोझिल।
2. संस्कृतनिष्ठता और विद्वत् गरिमा
द्विवेदी जी की भाषा की मूल प्रवृत्ति संस्कृतनिष्ठ है। यह संस्कृतनिष्ठता उनके गहन पांडित्य और शास्त्रीय अध्ययन का स्वाभाविक परिणाम है। विशेषकर निबंधों और आलोचनात्मक लेखन में उनकी भाषा में संस्कृत शब्दों की प्रचुरता दिखाई देती है। यद्यपि कहीं-कहीं यह प्रवृत्ति भाषा को अपेक्षाकृत क्लिष्ट बना देती है, फिर भी इससे उनके गद्य को एक विशिष्ट विद्वत् गरिमा प्राप्त होती है।
3. प्रवाह, गति और लयात्मकता
द्विवेदी जी की भाषा प्रवाहपूर्ण और गतिशील है। वाक्य-रचना में सहज लय, विचारों की क्रमबद्ध प्रस्तुति और भावों का स्वाभाविक विकास उनकी भाषा को पठनीय और प्रभावशाली बनाता है। मुहावरों और लोकोक्तियों का सटीक प्रयोग उनकी भाषा में जीवंतता और स्वाभाविकता भर देता है।
4. आलंकारिकता और चित्रात्मक अभिव्यक्ति
उनकी भाषा में आलंकारिकता, उपमा, रूपक और बिंबात्मकता के गुण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। वे विचारों को केवल तर्क के माध्यम से ही नहीं, बल्कि चित्रों और प्रतीकों के सहारे भी प्रस्तुत करते हैं। इससे उनकी भाषा सजीव, प्रभावशाली और सौंदर्यपूर्ण बन जाती है।
5. देशज और ग्रामीण शब्दों का प्रयोग
भाषा में माधुर्य और आत्मीयता बनाए रखने के लिए द्विवेदी जी ने देशज और ग्रामीण शब्दों का भी भरपूर प्रयोग किया है। यह विशेषता उनकी भाषा को केवल विद्वानों तक सीमित न रखकर सामान्य पाठक से भी जोड़ती है। लोक-जीवन के शब्द उनकी रचनाओं में सहज रूप से उपस्थित रहते हैं।
6. उद्धरणों और सूक्तियों का प्रयोग
अपनी भाषा को व्यावहारिक, सरस और प्रभावशाली बनाने के लिए द्विवेदी जी संस्कृत, हिंदी और बंगला साहित्य की सूक्तियों तथा उद्धरणों का यथास्थान प्रयोग करते हैं। ये उद्धरण न केवल उनके तर्क को बल प्रदान करते हैं, बल्कि भाषा को बौद्धिक ऊँचाई भी देते हैं।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की भाषा उनके विराट व्यक्तित्व का प्रत्यक्ष प्रतिबिंब है। संस्कृतनिष्ठता, बहुभाषिक शब्द-संपदा, प्रवाह, आलंकारिकता और लोक-संवेदना—इन सभी तत्त्वों के समन्वय से उनकी भाषा हिंदी गद्य को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। यही कारण है कि उनकी भाषा न केवल विचारोत्तेजक है, बल्कि स्थायी साहित्यिक मूल्य भी रखती है।
शैलीगत विविधता
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के गद्य की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में उनकी शैलीगत बहुलता है। वे एक ही प्रकार की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहे, बल्कि विषय, प्रसंग और उद्देश्य के अनुरूप अपनी शैली में निरंतर परिवर्तन करते रहे। यही कारण है कि उनके निबंध, आलोचना और अन्य गद्य रचनाएँ एकरस न होकर वैचारिक, भावात्मक और कलात्मक स्तरों पर समृद्ध दिखाई देती हैं। उनकी प्रमुख शैलियों का विवेचन निम्नलिखित रूप में किया जा सकता है—
1. विचारप्रधान (विचारात्मक) शैली
द्विवेदी जी के अधिकांश निबंधों में विचारात्मक शैली का प्रभावी प्रयोग मिलता है। इस शैली में तर्क, विवेचन और चिंतन को प्रधानता दी जाती है। उनके वाक्य न तो अत्यधिक संक्षिप्त होते हैं और न ही अनावश्यक रूप से दीर्घ; बल्कि संतुलित संरचना में विचारों को स्पष्ट और बोधगम्य रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
इस शैली की भाषा प्रायः संस्कृतनिष्ठ होती है, किंतु वह कृत्रिम नहीं लगती। विचारों की क्रमबद्धता और तार्किकता के कारण पाठक सहज रूप से विषय के साथ जुड़ जाता है। हिमालय, प्रकृति और भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों से संबंधित उनके निबंध इस शैली के श्रेष्ठ उदाहरण माने जाते हैं।
उदाहरण:
“सम्पूर्ण हिमालय को देखकर ही किसी के मन में समाधिस्थ महादेव की मूर्ति स्पष्ट हुई होगी। उसी समाधिस्थ महादेव के अलक-जाल के निचले हिस्से का प्रतिनिधित्व यह गिरि-शृंखला कर रही होगी।”
(हजारी प्रसाद द्विवेदी, ‘आलोक पर्व’, पृ. 112)
इस उदाहरण में प्रकृति के माध्यम से सांस्कृतिक और दार्शनिक विचार की अभिव्यक्ति स्पष्ट दिखाई देती है।
2. शोधपरक (गवेषणात्मक) शैली
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विषयों पर लिखे गए निबंधों में द्विवेदी जी की गवेषणात्मक शैली विशेष रूप से दृष्टिगोचर होती है। इस शैली में उनका गहन पांडित्य और अनुसंधान-प्रवृत्ति प्रकट होती है। वे ग्रंथों, पुराणों और इतिहास का सूक्ष्म अध्ययन कर निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं।
इस शैली की भाषा अपेक्षाकृत संस्कृतगर्भित और गंभीर होती है तथा वाक्य-विन्यास में विश्लेषणात्मक प्रवृत्ति दिखाई देती है। यद्यपि विषय जटिल होते हैं, फिर भी लेखक उन्हें सरल और बोधगम्य बनाने का निरंतर प्रयास करता है। आर्य–नाग संघर्ष जैसे विषयों पर किए गए उनके विवेचन इस शैली के उपयुक्त उदाहरण हैं।
उदाहरण:
“महाभारत और पुराणों के अध्ययन से आर्यों और नागों के बीच तीव्र संघर्ष का संकेत मिलता है, किंतु महाकाव्य की काव्यात्मक छाया ने उस संघर्ष को इतिहास की स्मृति से लगभग ओझल कर दिया है।”
(हजारी प्रसाद द्विवेदी, ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’, पृ. 78)
यह उदाहरण ग्रंथाधारित अध्ययन और विवेचनात्मक शैली का प्रतिनिधित्व करता है।
3. आलोचनात्मक शैली
द्विवेदी जी के आलोचनात्मक लेखन में उनकी आलोचनात्मक शैली पूरी स्पष्टता के साथ उभरकर आती है। इस शैली में वे साहित्यिक कृतियों, प्रवृत्तियों और अवधारणाओं का तटस्थ तथा निष्पक्ष मूल्यांकन करते हैं।
भाषा में संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली के बावजूद सरलता और सहजता बनी रहती है। वाक्य अपेक्षाकृत लंबे होते हैं, जिनमें तर्क की निरंतरता स्पष्ट दिखाई देती है। इस शैली में वे कहीं-कहीं उर्दू, अंग्रेज़ी और देशज शब्दों का भी प्रयोग करते हैं, जिससे भाषा में व्यावहारिकता आती है। ‘कुटज’ जैसे निबंधों में यह शैली विशेष रूप से प्रभावशाली रूप में सामने आती है।
उदाहरण:
“कुटज अर्थात् जो कुट से उत्पन्न हुआ हो। ‘कुट’ घड़े को भी कहते हैं और घर को भी। कुट से उत्पन्न होने के कारण अगस्त्य मुनि भी ‘कुटज’ कहलाए। किंतु घड़े से जन्म लेना प्रतीकात्मक है, उसका अर्थ केवल जैविक नहीं हो सकता।”
(हजारी प्रसाद द्विवेदी, ‘आलोक पर्व’, पृ. 45)
यह उदाहरण आलोचनात्मक विवेचन के साथ अर्थ-निर्णय की प्रक्रिया को दर्शाता है।
4. भावात्मक शैली
द्विवेदी जी की भावात्मक शैली उनके व्यक्तित्व का अत्यंत आत्मीय और सजीव पक्ष प्रस्तुत करती है। इस शैली में उनके संस्मरणात्मक, आत्मपरक और भावप्रधान निबंध आते हैं। यहाँ विचारों की अपेक्षा अनुभूति, संवेदना और मानवीय भावनाएँ अधिक मुखर होती हैं।
इस शैली में लिखे गए निबंध पाठक के हृदय को सीधे स्पर्श करते हैं। भावों की तीव्रता, प्रश्नात्मक वाक्य-विन्यास और आत्मसंवाद की प्रवृत्ति इसे विशेष बनाती है। इसमें द्विवेदी जी की विनोद-वृत्ति और करुणा का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
उदाहरण:
“सिर्फ जी ही नहीं रहे हैं, हँस भी रहे हैं—बेहया हैं क्या? या मस्तमौला हैं? कभी-कभी जो लोग ऊपर से लापरवाह दिखते हैं, उनकी जड़ें बहुत गहराई में पैठी होती हैं।”
(हजारी प्रसाद द्विवेदी, ‘आलोक पर्व’, पृ. 130)
यह उदाहरण भाव, विचार और आत्मसंवाद का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है।
5. हास्य–व्यंग्य शैली
द्विवेदी जी की हास्य–व्यंग्य शैली सौम्य, शिष्ट और साहित्यिक गरिमा से युक्त है। उनके व्यंग्य में कटुता नहीं, बल्कि कोमल मुस्कान और विचारोत्तेजक संकेत मिलते हैं।
इस शैली में भाषा का प्रवाह सरस और मधुर रहता है। प्रकृति और जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों के माध्यम से वे मानवीय दुर्बलताओं और विडंबनाओं पर सहज व्यंग्य करते हैं। ‘देवदारु’ जैसे निबंधों में यह शैली अत्यंत प्रभावी ढंग से उभरती है।
उदाहरण:
“ऐसा लगता है कि ऊपर वाले देवदारु के वृक्षों की फुनगियों पर लोटता हुआ कोई आदमी हजारों फीट नीचे तक अनायास जा सकता है। पर यह केवल लगता है—भगवान न करे कोई सचमुच लुढ़का दे।”
(हजारी प्रसाद द्विवेदी, ‘आलोक पर्व’, पृ. 142)
यह उदाहरण सौम्य हास्य के माध्यम से गहन अनुभूति व्यक्त करता है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की शैलीगत विविधताएँ (सारणी)
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य में विभिन्न शैलियों में गहन और प्रभावशाली योगदान दिया। उनके निबंधों और आलोचनात्मक ग्रंथों में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि वे विचार, शोध, आलोचना, भाव और हास्य–व्यंग्य सभी में दक्ष थे। नीचे उनकी प्रमुख शैलीगत विशेषताओं को उदाहरण और स्रोत सहित सारणी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
| शैली | विशेषताएँ | उदाहरण | स्रोत |
|---|---|---|---|
| विचारात्मक (विचारप्रधान) शैली | विचार, तर्क और चिंतन प्रधान; वाक्य संतुलित और बोधगम्य | “सम्पूर्ण हिमालय को देखकर ही किसी के मन में समाधिस्थ महादेव की मूर्ति स्पष्ट हुई होगी। उसी समाधिस्थ महादेव के अलक-जाल के निचले हिस्से का प्रतिनिधित्व यह गिरि-शृंखला कर रही होगी।” | आलोक पर्व, पृ. 112 |
| गवेषणात्मक (शोधपरक) शैली | गहन पांडित्य और अनुसंधान प्रवृत्ति; ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विवेचन; विश्लेषणात्मक | “महाभारत और पुराणों के अध्ययन से आर्यों और नागों के बीच तीव्र संघर्ष का संकेत मिलता है, किंतु महाकाव्य की काव्यात्मक छाया ने उस संघर्ष को इतिहास की स्मृति से लगभग ओझल कर दिया है।” | हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ. 78 |
| आलोचनात्मक शैली | तटस्थ, स्पष्ट और तार्किक; बिना कटुता के आलोचना; अर्थ-निर्णय प्रमुख | “कुटज अर्थात् जो कुट से उत्पन्न हुआ हो। ‘कुट’ घड़े को भी कहते हैं और घर को भी। कुट से उत्पन्न होने के कारण अगस्त्य मुनि भी ‘कुटज’ कहलाए। किंतु घड़े से जन्म लेना प्रतीकात्मक है, उसका अर्थ केवल जैविक नहीं हो सकता।” | आलोक पर्व, पृ. 45 |
| भावात्मक शैली | संवेदनशील, मानवीय, आत्मीय; संस्मरण और आत्मसंवाद प्रमुख; प्रश्नात्मक वाक्य-विन्यास | “सिर्फ जी ही नहीं रहे हैं, हँस भी रहे हैं—बेहया हैं क्या? या मस्तमौला हैं? कभी-कभी जो लोग ऊपर से लापरवाह दिखते हैं, उनकी जड़ें बहुत गहराई में पैठी होती हैं।” | आलोक पर्व, पृ. 130 |
| हास्य–व्यंग्य शैली | शिष्ट, सौम्य और साहित्यिक; कोमल हास्य और संकेतात्मक व्यंग्य; भाषा प्रवाहपूर्ण | “ऐसा लगता है कि ऊपर वाले देवदारु के वृक्षों की फुनगियों पर लोटता हुआ कोई आदमी हजारों फीट नीचे तक अनायास जा सकता है। पर यह केवल लगता है—भगवान न करे कोई सचमुच लुढ़का दे।” |
इस प्रकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की शैलीगत विविधता उनके गद्य को विशिष्ट और बहुआयामी बनाती है। विचारात्मक गंभीरता, शोधपरक विवेचन, संतुलित आलोचना, भावात्मक आत्मीयता और शिष्ट हास्य–व्यंग्य—इन सभी शैलियों का समन्वय उनके साहित्य को स्थायी मूल्य प्रदान करता है। यही शैलीगत वैविध्य उन्हें आधुनिक हिंदी गद्य के महान रचनाकारों की पंक्ति में प्रतिष्ठित करता है।
हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का साहित्य में स्थान और योगदान
हजारी प्रसाद द्विवेदी का हिंदी साहित्य में स्थान अत्यंत विशिष्ट और उच्च कोटि का है। वे आधुनिक हिंदी गद्य के सबसे महत्वपूर्ण रचनाकारों में गिने जाते हैं और ललित निबंधों की परंपरा को नवीन दृष्टि और जीवन्तता प्रदान करने में अद्वितीय भूमिका निभाई है।
द्विवेदी जी की लेखनी में तार्किक स्पष्टता, मधुरता और गंभीरता का संतुलन मिलता है, जो उनके निबंधों, आलोचना और सांस्कृतिक विवेचन में विशेष रूप से दिखाई देता है। उनके योगदान ने आधुनिक हिंदी साहित्य की आलोचनात्मक पद्धति को नया आयाम दिया और इसे और अधिक सुसंगठित एवं बोधगम्य बनाया।
वे केवल निबंधकार या आलोचक नहीं थे, बल्कि आधुनिक हिंदी गद्य की एक अतुलनीय विभूति के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा प्रारंभ की गई आलोचनात्मक परंपरा को उन्होंने पूर्णता और नवीनता के साथ आगे बढ़ाया। द्विवेदी जी का साहित्यिक व्यक्तित्व और उनकी विधा-संपन्न रचनाएँ आज भी हिंदी साहित्य के अध्ययन और शोध के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बनी हुई हैं।
निष्कर्ष
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी आधुनिक हिंदी साहित्य के ऐसे स्तंभ हैं, जिनके बिना उसका इतिहास अधूरा है। उन्होंने हिंदी गद्य को विचार, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की गरिमा प्रदान की।
उनका साहित्य हमें अपनी परंपरा से जोड़ते हुए आधुनिकता की ओर अग्रसर करता है। वे न केवल एक महान लेखक थे, बल्कि एक महान सांस्कृतिक चेतना भी थे।
निस्संदेह, हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के अमिट हस्ताक्षर हैं।
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