हिंदी साहित्य में व्यंग्य को यदि एक सशक्त, वैचारिक और सामाजिक परिवर्तन का औज़ार माना जाए, तो हरिशंकर परसाई का नाम सर्वप्रथम स्मरण में आता है। वे केवल हँसाने वाले व्यंग्यकार नहीं थे, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाले लेखक थे। उनके व्यंग्य में हास्य के साथ-साथ करुणा, आक्रोश, विवेक और नैतिक चेतना का अनोखा समन्वय दिखाई देता है।
हरिशंकर परसाई ने अपने लेखन के माध्यम से समाज, राजनीति, धर्म, नौकरशाही, शिक्षा-प्रणाली और मध्यवर्गीय मानसिकता की विसंगतियों पर तीखा प्रहार किया। उनका व्यंग्य केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं था, बल्कि उसका उद्देश्य पाठक को सोचने, आत्मविश्लेषण करने और व्यवस्था में सुधार की चेतना जगाने का था। यही कारण है कि परसाई का व्यंग्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने समय में था।
हरिशंकर परसाई : संक्षिप्त जीवन एवं साहित्यिक परिचय (तालिका)
| शीर्षक | विवरण |
|---|---|
| पूरा नाम | हरिशंकर परसाई (Harishankar Parsai) |
| जन्म तिथि | 22 अगस्त, 1924 |
| जन्म स्थान | जमानी ग्राम, होशंगाबाद (नर्मदापुरम), मध्य प्रदेश, भारत |
| मृत्यु तिथि | 10 अगस्त, 1995 |
| आयु | 72 वर्ष |
| मृत्यु स्थान | जबलपुर, मध्य प्रदेश |
| पेशा | व्यंग्यकार, लेखक |
| शिक्षा | एम.ए. (हिंदी) |
| शिक्षण संस्थान | राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय |
| भाषा | हिंदी (आधुनिक हिंदी), उर्दू शब्दावली का प्रभाव |
| साहित्यिक काल | आधुनिक काल |
| प्रमुख विधाएँ | व्यंग्य, निबंध, उपन्यास, कहानी |
| प्रमुख उपन्यास | तट की खोज, रानी नागफनी की कहानी, ज्वाला और जल |
| प्रमुख कहानी-संग्रह | भोलाराम का जीव, हंसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे |
| प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कृतियाँ | विकलांग श्रद्धा का दौर, सदाचार का तावीज, बेईमानी की परत, तब की बात और थी, शिकायत मुझे भी है, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, वैष्णव की फिसलन, पगडण्डियों का जमाना, निठल्ले की कहानी, सुनो भाई साधो, और अन्त में, भूत के पांव पीछे, प्रेमचंद के फटे जूते |
| पत्रिका सम्पादन | वसुधा |
| प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान | साहित्य अकादमी पुरस्कार (1982), शिक्षा सम्मान, शरद जोशी सम्मान (1992) |
हरिशंकर परसाई जी का जीवन-परिचय
हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त, 1924 ई. को मध्यप्रदेश के इटारसी के समीप स्थित जमानी नामक ग्राम में हुआ था। उनका बचपन एक साधारण ग्रामीण परिवेश में बीता, जिसने उन्हें जीवन की वास्तविकताओं से बहुत निकट से परिचित कराया। यही अनुभव आगे चलकर उनके व्यंग्य लेखन की आधारभूमि बने।
परसाई जी ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात स्नातक स्तर तक की पढ़ाई मध्यप्रदेश में ही पूर्ण की। इसके बाद उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त उन्होंने कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया।
अध्यापन के साथ-साथ उनका साहित्यिक रुझान निरन्तर सक्रिय रहा। बाल्यावस्था से ही उन्हें लेखन में गहरी रुचि थी। वे निरन्तर लिखते रहे, विचार करते रहे और समाज को समझते रहे। किंतु शीघ्र ही उन्हें यह अनुभव हुआ कि अध्यापन और साहित्य-साधना दोनों कार्य एक साथ प्रभावी रूप से नहीं निभाए जा सकते। परिणामस्वरूप उन्होंने अध्यापन का त्याग कर पूर्णकालिक साहित्य-साधना को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
संपादकीय एवं पत्रकारीय जीवन
हरिशंकर परसाई ने साहित्य के साथ-साथ पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी समाज से संवाद स्थापित किया। उन्होंने जबलपुर से ‘वसुधा’ नामक पत्रिका का संपादन एवं प्रकाशन आरंभ किया। यह प्रयास वैचारिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था, किंतु आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह पत्रिका अधिक समय तक नहीं चल सकी।
इसके बावजूद परसाई जी का लेखन निरन्तर जारी रहा। उनके व्यंग्य और निबंध देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे। विशेष रूप से उन्होंने ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के लिए निरन्तर लेखन किया। इन पत्रिकाओं के माध्यम से उनकी व्यंग्य-दृष्टि व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँची।
हरिशंकर परसाई जी का साहित्यिक परिचय
हरिशंकर परसाई हिंदी साहित्य के उन विरल रचनाकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने व्यंग्य को केवल हास्य का साधन न बनाकर उसे समाज-समीक्षा और वैचारिक प्रतिरोध का सशक्त माध्यम बनाया। वे एक ऐसे व्यंग्यकार थे, जिनकी रचनाएँ समकालीन भारतीय समाज की वास्तविकताओं पर तीखी, किंतु विवेकपूर्ण टिप्पणी प्रस्तुत करती हैं। उनकी दृष्टि सतही नहीं थी; वे समाज की जड़ों तक जाकर उसकी विकृतियों और अंतर्विरोधों को उजागर करते थे।
जमानी (मध्य प्रदेश) में जन्मे परसाई जी ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत अध्यापन से की, किंतु शीघ्र ही उन्होंने लेखन को अपना मुख्य कर्म बना लिया। शिक्षक के रूप में प्राप्त अनुभवों ने उन्हें समाज और मनुष्य के व्यवहार को निकट से समझने का अवसर दिया, जिसका प्रभाव उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है। उनकी रचनाएँ राजनीति, नौकरशाही, धर्म, सामाजिक रूढ़ियों और मध्यवर्गीय मानसिकता पर केन्द्रित हैं, जहाँ वे पाखंड, अवसरवाद और नैतिक पतन पर तीखा प्रहार करते हैं।
परसाई जी की लेखन शैली की प्रमुख विशेषता उसकी सरलता, स्पष्टता और संवादधर्मिता है। वे बोलचाल की भाषा में गहन विचार प्रस्तुत करने की कला में सिद्धहस्त थे। हिंदी के साथ-साथ उर्दू और अंग्रेज़ी शब्दों के प्रयोग से उनकी भाषा समकालीन और प्रभावशाली बन जाती है। व्यंग्य में विडंबना, कटाक्ष और प्रतीकात्मकता का उनका प्रयोग पाठक को हँसाते हुए सोचने पर विवश कर देता है।
साहित्यिक दृष्टि से परसाई जी ने मुख्यतः व्यंग्य लेखन में अपार ख्याति अर्जित की, किंतु उन्होंने कहानी, निबंध और उपन्यास विधा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। ‘व्यंग्य लेख’ और ‘परसाई की कहानियाँ’ जैसे उनके संग्रह हिंदी व्यंग्य साहित्य की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं। उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें व्यापक सम्मान और पाठकीय स्वीकृति प्राप्त हुई।
हरिशंकर परसाई की साहित्यिक विरासत आज भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रेरणास्पद है। उन्होंने हिंदी साहित्य में व्यंग्य को गंभीर वैचारिक आधार प्रदान किया और उसे सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ा। इसी कारण वे आधुनिक हिंदी साहित्य की सबसे प्रभावशाली और स्मरणीय विभूतियों में स्थान रखते हैं।
परसाई जी का साहित्यिक व्यक्तित्व एवं वैचारिक दृष्टि
हरिशंकर परसाई एक ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने साहित्य को समाज से अलग कभी नहीं देखा। उनके लिए लेखन केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व भी था। वे मानते थे कि लेखक का कर्तव्य है कि वह सत्ता, व्यवस्था और सामाजिक पाखंडों पर प्रश्न उठाए।
उनकी रचनाओं में भारतीय समाज की वास्तविक तस्वीर दिखाई देती है—जहाँ नैतिकता का दिखावा है, ईमानदारी भाषणों तक सीमित है और स्वार्थ सर्वोपरि है। परसाई ने राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार, धर्म के नाम पर फैलाए गए अंधविश्वास, नौकरशाही की अकर्मण्यता और मध्यवर्ग की दोहरी मानसिकता को अपने व्यंग्य का प्रमुख विषय बनाया।
परसाई का व्यंग्य-लेखन : स्वरूप और विशेषताएँ
हरिशंकर परसाई हिंदी के श्रेष्ठ व्यंग्य लेखक माने जाते हैं। व्यंग्य लेखन में उन्हें असाधारण प्रवीणता प्राप्त थी। उनके व्यंग्य अत्यन्त चुटीले, धारदार और प्रभावकारी होते हैं।
उनकी व्यंग्य-शैली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
1. सामाजिक यथार्थ का चित्रण
परसाई का व्यंग्य कल्पना नहीं, बल्कि यथार्थ पर आधारित है। वे समाज में घटित घटनाओं, अनुभवों और व्यवहारों को आधार बनाकर व्यंग्य रचते हैं।
2. सरल एवं बोलचाल की भाषा
उनकी भाषा अत्यंत सहज, बोलचाल की और जनसामान्य के निकट है। वे कठिन शब्दावली या अलंकारिक भाषा से बचते हैं।
3. विडंबना और कटाक्ष
परसाई के व्यंग्य में विडंबना और कटाक्ष का विशेष स्थान है। वे बिना उपदेश दिए, तीखे कटाक्ष के माध्यम से पाठक को सोचने पर विवश कर देते हैं।
4. नैतिक चेतना
उनका व्यंग्य केवल नकारात्मक नहीं है। उसमें नैतिक सुधार की भावना निहित है। वे व्यवस्था में सुधार लाने की आकांक्षा रखते हैं।
सामयिकता और प्रासंगिकता
हरिशंकर परसाई की रचनाएँ अपने समय की समस्याओं पर आधारित थीं, किंतु उनकी विषयवस्तु आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। सत्ता का दुरुपयोग, नैतिक पतन, सामाजिक पाखंड और आम आदमी की विवशता—ये सभी समस्याएँ आज भी मौजूद हैं।
इस कारण परसाई का व्यंग्य केवल साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि सामाजिक दस्तावेज बन जाता है।
कृतियाँ एवं रचनात्मक योगदान
हरिशंकर परसाई ने व्यंग्य, निबंध, उपन्यास और कहानी—सभी विधाओं में लेखन किया, किंतु उन्हें सर्वाधिक प्रसिद्धि व्यंग्य रचनाओं से ही प्राप्त हुई।
(क) हास्य-व्यंग्य संकलन
- विकलांग श्रद्धा का दौर
- सदाचार का तावीज
- बेईमानी की परत
- तब की बात और थी
- शिकायत मुझे भी है
- ठिठुरता हुआ गणतंत्र
- वैष्णव की फिसलन
- पगडण्डियों का जमाना
- निठल्ले की कहानी
- सुनो भाई साधो
- और अन्त में
- भूत के पांव पीछे
(ख) निबंध संग्रह
- अपनी-अपनी बीमारी
- आवारा भीड़ के खतरे
- ऐसा भी सोचा जाता है
- काग भगोड़ा
- तुलसीदास चंदन घिसैं
- प्रेमचंद के फटे जूते
- माटी कहे कुम्हार से
- हम एक उम्र से वाकिफ हैं
(ग) उपन्यास
- रानी नागफनी की कहानी
- तट की खोज
- ज्वाला और जल
(घ) कहानी संग्रह
- हंसते हैं रोते हैं
- जैसे उनके दिन फिरे
- भोलाराम का जीव
विशेष रूप से ‘भोलाराम का जीव’ हिंदी की कालजयी व्यंग्य कहानियों में गिनी जाती है।
हरिशंकर परसाई : कृतियाँ एवं रचनाएँ (तालिकात्मक प्रस्तुति)
हरिशंकर परसाई की रचनाओं को विधागत रूप से निम्नलिखित तालिका में व्यवस्थित किया गया है:
| विधा / श्रेणी (Category) | प्रमुख कृतियाँ / रचनाएँ (Works/Compositions) |
|---|---|
| हास्य–व्यंग्य संकलन (Satire Collections) | विकलांग श्रद्धा का दौर, सदाचार का तावीज़, बेईमानी की परत, तब की बात और थी, शिकायत मुझे भी है, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, वैष्णव की फिसलन, पगडण्डियों का जमाना, निठल्ले की कहानी, सुनो भाई साधो, और अन्त में, भूत के पांव पीछे |
| निबंध संग्रह (Essay Collections) | अपनी–अपनी बीमारी, आवारा भीड़ के खतरे, ऐसा भी सोचा जाता है, काग भगोड़ा, तुलसीदास चंदन घिसैं, प्रेमचंद के फटे जूते, माटी कहे कुम्हार से, हम एक उम्र से वाकिफ़ हैं |
| उपन्यास / उपन्यासिका (Novels) | रानी नागफनी की कहानी (व्यंग्यात्मक उपन्यास), तट की खोज (लघु उपन्यास), ज्वाला और जल (उपन्यासिका) |
| कहानी संग्रह (Short Story Collections) | हंसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे, भोलाराम का जीव |
| प्रसिद्ध व्यंग्य रचनाएँ (चयनित) | भोलाराम का जीव, प्रेमचंद के फटे जूते, पवित्रता का दौरा, निंदा रस, लोकतंत्र की नौटंकी, वैष्णव की फिसलन, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, सदाचार का तावीज़, शिकायत मुझे भी है |
| प्रमुख व्यंग्य रचनाएँ (Major Satirical Works) | भोलाराम का जीव, बस की यात्रा, बदचलन, सदाचार का तावीज़, इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर, ईश्वर की सरकार, पगडंडियों का जमाना, माटी कहे कुम्हार से, लघुशंका गृह और क्रांति, हम एक उम्र से वाकिफ हैं, हिंदी कवि सम्मेलन, हिन्दी और हिन्दिंगलिश, सदन के कूप में, आदि। |
| लघुकथाएँ (Short Stories) | अपना–पराया, चंदे का डर, दस फार एंड नो फर्दर, रसोई घर और पाखाना, समझौता, सुधार |
| संस्मरण / आत्मकथ्य (Autobiographical Sketch/Reminiscence) | मुक्तिबोध : एक संस्मरण, गर्दिश के दिन, गर्दिश फिर गर्दिश |
| नाटक (Plays) | सबसे बड़ा सवाल |
| भूमिकाएँ / वैचारिक लेख (Introductions / Conceptual Articles) | व्यंग्य क्यों? कैसे? किस लिए?, साहित्यकार का साहस, ढलवाँ साहित्य, साहित्य के अमृत-घट में राजनीति का घासलेट |
| राजनीतिक–सामाजिक व्यंग्य (चयनित) (Political-Social Satire) | भारतीय राजनीति का बुलडोजर, लोकतंत्र की नौटंकी, हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं, सदन के कूप में, बैरंग शुभकामना और जनतंत्र |
| व्यक्तिगत निबंध/अन्य पुस्तकें (Individual Essays/Other Books) | पनी-अपनी बीमारी (पुस्तक), वैष्णव की फिसलन (पुस्तक), सदाचार का तावीज़ (पुस्तक), प्रेमचन्द के फटे जूते (पुस्तक) |
| प्रमुख व्यंग्य रचनाएँ (Major Satirical Works) | यह एक संकलनात्मक सूची है, कई रचनाएँ उपरोक्त संग्रहों में संकलित हैं। प्रेमचंद के फटे जूते, वैष्णव की फिसलन, तुलसीदास चंदन घिसैं, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, शिकायत मुझे भी है, भूत के पांव पीछे, भोलाराम का जीव, बस की यात्रा, बदचलन, सदाचार का तावीज़, इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर, ईश्वर की सरकार, पगडंडियों का जमाना, माटी कहे कुम्हार से, लघुशंका गृह और क्रांति, हम एक उम्र से वाकिफ हैं, हिंदी कवि सम्मेलन, हिन्दी और हिन्दिंगलिश, सदन के कूप में, आदि। |
निधन एवं साहित्यिक विरासत
हिंदी के इस यशस्वी व्यंग्यकार का निधन 10 अगस्त, 1995 ई. को हुआ। उनके निधन से हिंदी साहित्य, विशेषकर व्यंग्य विधा को अपूरणीय क्षति पहुँची।
आज भी हरिशंकर परसाई की रचनाएँ पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जाती हैं, शोध का विषय बनती हैं और समाज को आत्मविश्लेषण की प्रेरणा देती हैं।
हरिशंकर परसाई की भाषागत विशेषताएँ
हरिशंकर परसाई की भाषा उनके व्यंग्य की आत्मा है। वे भाषा को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि व्यंग्य को धार देने वाला औज़ार मानते थे। उनकी रचनाओं में ऐसी भाषा का प्रयोग मिलता है जो पाठक से सीधा संवाद करती है और उसे हँसाते हुए भीतर तक प्रभावित करती है।
परसाई जी की भाषा मूलतः सरल, सहज और बोलचाल की है। उन्होंने जानबूझकर आडंबरपूर्ण और क्लिष्ट शब्दावली से दूरी बनाए रखी। उनकी रचनाओं में तत्सम, तद्भव, उर्दू और अंग्रेज़ी—सभी प्रकार के शब्दों का संतुलित और सार्थक प्रयोग मिलता है। विदेशी शब्दों का प्रयोग वे दिखावे के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ को अधिक प्रभावी ढंग से उभारने के लिए करते हैं।
उनकी भाषा की एक प्रमुख विशेषता लक्षणा और व्यंजना शक्ति का कुशल उपयोग है। वे सीधी बात को भी इस प्रकार कहते हैं कि उसके भीतर गहरा व्यंग्य छिपा रहता है। कहीं-कहीं मुहावरों और कहावतों का प्रयोग भाषा को प्रवाहमय और जीवंत बना देता है।
वाक्य-विन्यास की दृष्टि से परसाई जी छोटे, तीखे और व्यंग्य-प्रधान वाक्यों के पक्षधर थे। यही कारण है कि उनके वाक्य पाठक के मन में तुरंत प्रभाव छोड़ते हैं। संस्कृतनिष्ठ शब्दों के साथ-साथ उर्दू और अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग उनकी भाषा को समकालीन और बहुआयामी बनाता है। शब्दों की शक्ति से उनका गहरा परिचय उनकी प्रत्येक रचना में स्पष्ट रूप से झलकता है।
हरिशंकर परसाई की शैलीगत विशेषताएँ
हरिशंकर परसाई की रचनाओं में शैली की दृष्टि से उल्लेखनीय विविधता देखने को मिलती है। वे विषय और प्रसंग के अनुरूप शैली का चयन करते थे। उनकी व्यंग्य रचनाओं में निम्नलिखित प्रमुख शैलियाँ दिखाई देती हैं—
(1) व्यंग्यात्मक शैली
परसाई जी की रचनाओं में व्यंग्यात्मक शैली सर्वाधिक प्रभावशाली और प्रमुख है। इस शैली के माध्यम से उन्होंने समाज, राजनीति, धर्म और प्रशासन में व्याप्त असंगतियों पर तीखा प्रहार किया है। उनकी व्यंग्यात्मक शैली में कटाक्ष इतना सूक्ष्म होता है कि पाठक हँसते-हँसते गम्भीर सत्य से टकरा जाता है।
इस शैली में भाषा प्रसंगानुकूल सरल, व्यावहारिक और धारदार होती है। वाक्य छोटे होते हैं, किंतु अर्थ की दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली। लाक्षणिक शब्दावली और व्यंजना शक्ति इस शैली को विशेष तीखापन प्रदान करती है।
उदाहरणस्वरूप—
वे साधारण घटना को भी ऐसे बिंबों से जोड़ देते हैं कि उसका व्यंग्यात्मक प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
(2) प्रश्नात्मक शैली
प्रश्नात्मक शैली परसाई जी की एक सशक्त और प्रभावकारी शैली है। इसमें वे लगातार प्रश्न खड़े करते हैं और फिर उन्हीं प्रश्नों के माध्यम से व्यवस्था की खोखली सच्चाइयों को उजागर कर देते हैं। ये प्रश्न पाठक से उत्तर नहीं माँगते, बल्कि उसे आत्मचिंतन के लिए विवश करते हैं।
इस शैली की विशेषता यह है कि प्रश्नों की श्रृंखला पाठक के मन को झकझोर देती है। कभी-कभी परसाई स्वयं ही प्रश्नों के उत्तर देकर सामाजिक विडंबनाओं पर तीखा व्यंग्य कर देते हैं। यह शैली उनके लेखन को संवादात्मक और बौद्धिक बनाती है।
(3) विवेचनात्मक शैली
जहाँ विषय की गम्भीरता अधिक होती है, वहाँ परसाई जी विवेचनात्मक शैली अपनाते हैं। इस शैली में उनका व्यंग्य अपेक्षाकृत संयमित हो जाता है और तर्क तथा विश्लेषण का पक्ष अधिक प्रबल दिखाई देता है।
ऐसे स्थलों पर भाषा में गंभीरता और विचारात्मकता का समावेश मिलता है। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग बढ़ जाता है और वाक्य छोटे, सधे हुए तथा तर्कपूर्ण होते हैं। इस शैली में वे मानवीय प्रवृत्तियों, मानसिक दुर्बलताओं और सामाजिक व्यवहारों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।
(4) सूत्रात्मक शैली
सूत्रात्मक शैली परसाई जी की वैचारिक क्षमता को प्रकट करने वाली शैली है। इस शैली में वे संक्षिप्त वाक्यों में गहरी और व्यापक बात कह देते हैं। उनके ये सूत्र-वाक्य पाठक को तुरंत प्रभावित करते हैं और आगे सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।
विशेष रूप से उनके निबंधों में ऐसे अनेक सूत्रात्मक कथन मिलते हैं, जिनमें सामाजिक यथार्थ का सार निहित होता है। इन सूत्रों के माध्यम से वे पहले बात को संक्षेप में रखते हैं और फिर उसका विस्तार करते हैं, जिससे विचार अधिक स्पष्ट और प्रभावी हो जाता है।
(5) भावात्मक शैली
यद्यपि परसाई जी मूलतः व्यंग्यकार थे, फिर भी जहाँ जीवन की कटु सच्चाइयाँ अत्यंत गहरी हो जाती हैं, वहाँ उनकी रचनाओं में भावात्मक शैली उभर आती है। ऐसे स्थलों पर व्यंग्य की धार थोड़ी मंद हो जाती है और संवेदना प्रबल हो उठती है।
इस शैली में भाषा अत्यंत सरल, सहज और आत्मीय होती है। वाक्य छोटे होते हैं और भावों की अभिव्यक्ति सीधे हृदय तक पहुँचती है। यहाँ चिंतन की अपेक्षा अनुभूति अधिक प्रभावी दिखाई देती है, जिससे पाठक लेखक के भावों से तादात्म्य स्थापित कर लेता है।
समग्र मूल्यांकन
भाषा और शैली—दोनों ही दृष्टियों से हरिशंकर परसाई का लेखन अत्यंत सशक्त, मौलिक और प्रभावपूर्ण है। उनकी भाषागत सरलता और शैलीगत विविधता उनके व्यंग्य को केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान बनाती है। यही कारण है कि उनका व्यंग्य आज भी पाठकों को उतनी ही तीव्रता से प्रभावित करता है जितना अपने समय में करता था।
हिन्दी साहित्य में हरिशंकर परसाई का स्थान
हरिशंकर परसाई ने हिंदी साहित्य में व्यंग्य को केवल एक साहित्यिक विधा के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और वैचारिक प्रतिरोध के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित किया। उन्होंने अपने समय की सामाजिक जड़ताओं, राजनीतिक विसंगतियों और नैतिक पतन को गहराई से देखा, समझा और फिर उन पर निर्भीक व्यंग्य किया। यही कारण है कि उनका लेखन मनोरंजन तक सीमित न रहकर समाज के अंतःकरण को झकझोरने वाला बन गया।
परसाई जी की विशेषता यह थी कि वे मानवीय पीड़ा और आम आदमी के दुःख को केवल बाहरी दृष्टि से नहीं देखते थे, बल्कि उसे स्वयं अनुभव करते हुए अभिव्यक्त करते थे। उनकी संवेदनशीलता और बौद्धिक सजगता ने उनके व्यंग्य को मानवीय करुणा से जोड़ा। वे समाज में व्याप्त पाखंड, अन्याय और विसंगतियों के प्रति केवल दर्शक नहीं रहे, बल्कि साहित्य के माध्यम से उनके विरुद्ध सक्रिय हस्तक्षेप करते रहे।
एक व्यंग्यकार के रूप में हरिशंकर परसाई को हिंदी जगत में अत्यंत सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त है। उनकी व्यंग्य रचनाएँ आज भी पाठकों, अध्येताओं और शोधकर्ताओं के लिए विचारोत्तेजक सामग्री हैं। उन्होंने हिंदी व्यंग्य को वैचारिक गहराई, नैतिक आग्रह और सामाजिक उत्तरदायित्व प्रदान किया, जिससे यह विधा साहित्य की मुख्यधारा में सशक्त रूप से स्थापित हुई।
निस्संदेह, हरिशंकर परसाई का योगदान हिंदी साहित्य के लिए अविस्मरणीय है। उनकी रचनाओं ने हिंदी भाषा और साहित्य को गौरव प्रदान किया है और वे सदैव एक ऐसे व्यंग्यकार के रूप में स्मरण किए जाएंगे, जिन्होंने हास्य के आवरण में गहरे सामाजिक सत्य उद्घाटित किए।
निष्कर्ष
हरिशंकर परसाई केवल एक लेखक नहीं थे, बल्कि एक सजग सामाजिक चेतना थे। उन्होंने अपने व्यंग्य के माध्यम से समाज को हँसाया भी और झकझोरा भी। उनका साहित्य हमें यह सिखाता है कि व्यंग्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि परिवर्तन का माध्यम भी हो सकता है।
निस्संदेह, हरिशंकर परसाई हिंदी साहित्य के ऐसे व्यंग्यकार हैं, जिनकी प्रासंगिकता समय के साथ और भी बढ़ती जा रही है।
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