होलिका दहन 2026: तिथि, चंद्र ग्रहण, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

भारत विविधताओं का देश है, जहां प्रत्येक त्योहार अपने भीतर सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक महत्व समेटे होता है। इन्हीं प्रमुख त्योहारों में से एक है होली, जिसे रंगों का उत्सव कहा जाता है। यह पर्व केवल रंग खेलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई की विजय, आस्था की शक्ति और सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है। वर्ष 2026 में होली और उससे पूर्व होने वाले होलिका दहन को लेकर जनमानस में तिथि को लेकर कुछ संशय की स्थिति बनी हुई है। विशेष रूप से यह प्रश्न उठ रहा है कि होलिका दहन 2 मार्च को होगा या 3 मार्च 2026 को।

शास्त्रीय प्रमाणों, पंचांग के गणितीय आधार और ग्रहण नियमों के सूक्ष्म विचार के आधार पर इस विषय में स्पष्ट निर्णय किया गया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि होलिका दहन 2026 कब है, उसका शुभ मुहूर्त क्या है, चंद्र ग्रहण का क्या प्रभाव रहेगा, और रंगों वाली होली किस दिन मनाई जाएगी। साथ ही जानेंगे होली के पौराणिक महत्व और उससे जुड़े संदेश को भी।

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होली का पर्व: सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधार

होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जो फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह पर्व सर्दी के अंत और वसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक है। प्रकृति इस समय नवजीवन का संचार करती है—पेड़ों पर नई कोपलें, खेतों में लहलहाती फसलें और वातावरण में उल्लास का संचार दिखाई देता है।

होली केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यह पर्व आपसी मतभेदों को भुलाकर प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देता है। रंगों के माध्यम से लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं और समाज में सौहार्द का वातावरण बनता है।

होलिका दहन 2026 कब है? तिथि को लेकर क्यों बना है संशय?

वर्ष 2026 में होलिका दहन की तिथि को लेकर श्रद्धालुओं के बीच विशेष प्रकार का संशय देखने को मिल रहा है। इसका मुख्य कारण फाल्गुन पूर्णिमा की समय-सीमा, भद्रा काल का विचार और 3 मार्च को लगने वाला चंद्र ग्रहण है। पंचांग गणना के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च 2026 को शाम लगभग 5 बजकर 55/56 मिनट से प्रारंभ होकर 3 मार्च 2026 को शाम लगभग 5 बजकर 7/8 मिनट तक रहेगी।

सामान्यतः होलिका दहन पूर्णिमा तिथि में, विशेष रूप से प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में किया जाता है। लेकिन जब पूर्णिमा, भद्रा और ग्रहण का संयोग एक साथ बन जाए, तब निर्णय सूक्ष्म शास्त्रीय विचार से किया जाता है। यही कारण है कि इस वर्ष दो मत प्रचलित हैं।

पहला मत: 3 मार्च 2026 को होलिका दहन

कुछ पंचांगों और ज्योतिषाचार्यों के अनुसार होलिका दहन 3 मार्च 2026 को किया जा सकता है। इसके पीछे निम्न तर्क दिए जा रहे हैं:

  • 3 मार्च को सूर्यास्त के समय पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहेगी।
  • उसी दिन वर्ष का पहला चंद्र ग्रहण दोपहर 3:20 बजे से शुरू होकर शाम 6:47 बजे तक रहेगा।
  • ग्रहण समाप्ति के बाद शुद्धिकरण कर प्रदोष काल में होलिका दहन किया जा सकता है।

इस मत के अनुसार 3 मार्च को शाम 6:47 बजे से रात 8:50 बजे तक होलिका दहन का शुभ मुहूर्त माना जा रहा है।

इस विचारधारा में ग्रहण समाप्ति के बाद के शुद्ध समय को मान्यता दी जाती है और प्रदोष काल को प्रधान माना जाता है।

दूसरा मत: 2 मार्च 2026 को होलिका दहन

दूसरा मत अधिक शास्त्रीय दृष्टिकोण से भद्रा और ग्रहण विचार को प्राथमिकता देता है। इसके अनुसार:

  • 3 मार्च को पूर्णिमा तिथि ग्रहण काल में ही समाप्त हो जाएगी।
  • ग्रहण काल में किसी भी शुभ कार्य को करना वर्जित माना गया है।
  • यदि पूर्णिमा तिथि ग्रहण के दौरान समाप्त हो रही हो, तो उस दिन दहन करना उचित नहीं माना जाता।
  • 2 मार्च को पूर्णिमा तिथि प्रारंभ हो चुकी होगी।

पंचांग के अनुसार 2 मार्च 2026 को भद्रा मुख मध्यरात्रि 2:38 बजे से सुबह 4:34 बजे तक रहेगा। शास्त्रों में भद्रा मुख में होलिका दहन करना अशुभ माना गया है।

इस आधार पर कई ज्योतिषाचार्य मानते हैं कि 2 मार्च को भद्रा समाप्ति के बाद (उचित समय विचार कर) होलिका दहन करना अधिक शास्त्रसम्मत और सुरक्षित विकल्प है।

भद्रा काल का महत्व क्यों है?

धर्मशास्त्रों में भद्रा को अशुभ काल माना गया है, विशेषकर जब वह “भद्रा मुख” में हो। होलिका दहन जैसे मांगलिक कर्म भद्रा काल में नहीं किए जाते।

इसलिए केवल पूर्णिमा होना पर्याप्त नहीं है — भद्रा का विचार भी आवश्यक है। वर्ष 2026 में यही तत्व तिथि निर्धारण का प्रमुख कारण बना हुआ है।

चंद्र ग्रहण के कारण क्यों बढ़ा भ्रम?

3 मार्च 2026 को चंद्र ग्रहण लगना तिथि विवाद का मुख्य कारण है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार:

  • ग्रहण काल में पूजा, यज्ञ, हवन और अन्य शुभ कार्य वर्जित होते हैं।
  • ग्रहण के दौरान वातावरण अशुद्ध माना जाता है।
  • ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान एवं शुद्धिकरण के पश्चात ही शुभ कार्य किए जाते हैं।

समस्या यह है कि 3 मार्च को पूर्णिमा तिथि ग्रहण काल के दौरान ही समाप्त हो रही है। इसलिए कुछ विद्वान इसे शास्त्रानुसार उपयुक्त नहीं मानते।

निष्कर्ष :

वर्ष 2026 में होलिका दहन की तिथि को लेकर दो मत प्रचलित हैं। कुछ पंचांग ग्रहण समाप्ति के बाद 3 मार्च को होलिका दहन का समर्थन करते हैं, जबकि अनेक ज्योतिषाचार्य भद्रा और ग्रहण विचार के आधार पर 2 मार्च 2026 को अधिक शास्त्रसम्मत मान रहे हैं। अतः श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्रीय पंचांग, स्थानीय मंदिर परंपरा और कुलाचार के अनुसार तिथि का निर्धारण करना चाहिए।

होलिका दहन 2026 का शुभ मुहूर्त (दोनों मतों के अनुसार)

वर्ष 2026 में होलिका दहन की तिथि को लेकर दो मत प्रचलित हैं। इसलिए शुभ मुहूर्त भी संबंधित तिथि के अनुसार अलग-अलग विचार किया जा रहा है। नीचे दोनों पक्षों के अनुसार मुहूर्त का विवरण प्रस्तुत है, ताकि श्रद्धालु अपने क्षेत्रीय पंचांग और परंपरा के अनुसार निर्णय ले सकें।

यदि 2 मार्च 2026 को होलिका दहन किया जाए (भद्रा विचार प्रधान मत)

इस मत के अनुसार 3 मार्च को चंद्र ग्रहण के दौरान पूर्णिमा तिथि समाप्त हो रही है, इसलिए 2 मार्च को ही होलिका दहन करना अधिक शास्त्रसम्मत माना जा रहा है।

  • फाल्गुन पूर्णिमा प्रारंभ: 2 मार्च 2026, शाम लगभग 5:55/5:56 बजे
  • भद्रा मुख: रात्रि 2:38 बजे से प्रातः 4:34 बजे तक

शास्त्रों के अनुसार भद्रा मुख में होलिका दहन करना अशुभ माना गया है। अतः 2 मार्च को होलिका दहन करते समय भद्रा काल का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।

यदि स्थानीय पंचांग 2 मार्च को दहन का निर्देश देता है, तो भद्रा समाप्ति के बाद अथवा भद्रा रहित प्रदोष काल में ही दहन करना उचित रहेगा।

इस मत को मानने वाले ज्योतिषाचार्य 2 मार्च को ही धार्मिक दृष्टि से अधिक सुरक्षित और शास्त्रसम्मत विकल्प मानते हैं।

यदि 3 मार्च 2026 को होलिका दहन किया जाए (ग्रहण समाप्ति के बाद)

दूसरे मत के अनुसार 3 मार्च को सूर्यास्त के समय पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहेगी। हालांकि उसी दिन चंद्र ग्रहण भी रहेगा:

  • चंद्र ग्रहण आरंभ: दोपहर 3:20 बजे
  • चंद्र ग्रहण समाप्ति: शाम 6:47 बजे

धार्मिक नियमों के अनुसार ग्रहण काल में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। अतः ग्रहण समाप्ति के बाद ही होलिका दहन किया जा सकता है।

3 मार्च 2026 का संभावित शुभ मुहूर्त इस प्रकार है:

  • मुहूर्त प्रारंभ: शाम 6:47 बजे (ग्रहण समाप्ति के बाद)
  • मुहूर्त समाप्त: रात 8:50 बजे

यह समय प्रदोष काल में आता है, जिसे होलिका दहन के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
ध्यान रहे कि 6:47 बजे से पूर्व होलिका दहन नहीं किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

वर्ष 2026 में तिथि निर्धारण पूर्णिमा, भद्रा और चंद्र ग्रहण — तीनों के संयोग के कारण विशेष बन गया है।

  • भद्रा और ग्रहण विचार को प्राथमिकता देने वाले विद्वान 2 मार्च को अधिक शास्त्रसम्मत मानते हैं।
  • ग्रहण समाप्ति के बाद प्रदोष काल को मान्यता देने वाले 3 मार्च को दहन योग्य मानते हैं।

अतः श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्रीय पंचांग, स्थानीय मंदिर परंपरा और कुलाचार के अनुसार होलिका दहन का समय निर्धारित करना चाहिए।

धार्मिक आचरण में शुद्ध भावना और श्रद्धा ही सर्वोपरि है।

होली 2026 (रंग वाली होली) कब है?

होलिका दहन के अगले दिन रंगों वाली होली मनाई जाती है, जिसे धुलेंडी भी कहा जाता है। पंचांग के अनुसार यह चैत्र कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है।

वर्ष 2026 में रंगों वाली होली 4 मार्च 2026 को मनाई जाएगी।

इस दिन लोग एक-दूसरे को रंग और गुलाल लगाकर बधाई देते हैं, मिठाइयाँ बाँटते हैं और आनंदोत्सव मनाते हैं।

होलिका दहन की पौराणिक कथा

होली के पर्व की जड़ें पौराणिक कथाओं में निहित हैं। इसकी सबसे प्रसिद्ध कथा भक्त प्रह्लाद और उनके पिता हिरण्यकश्यप से जुड़ी है।

हिरण्यकश्यप का अहंकार

हिरण्यकश्यप एक असुर राजा था, जिसने कठोर तपस्या कर वरदान प्राप्त किया था कि उसे कोई देवता, मानव या पशु न मार सके; न दिन में, न रात में; न धरती पर, न आकाश में; न अस्त्र से, न शस्त्र से। इस वरदान के कारण वह अत्यंत अहंकारी हो गया और स्वयं को भगवान मानने लगा।

उसने अपने राज्य में आदेश दिया कि सभी लोग उसकी पूजा करें। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। वह अपने पिता के आदेश के बावजूद विष्णु भक्ति से नहीं डिगा।

प्रह्लाद पर अत्याचार

हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के कई प्रयास किए—उसे ऊँचे पर्वत से गिरवाया, विष पिलाया, हाथियों से कुचलवाने की कोशिश की—लेकिन हर बार भगवान की कृपा से वह सुरक्षित बच गया।

होलिका की भूमिका

अंततः हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। योजना यह बनाई गई कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठेगी, जिससे प्रह्लाद जलकर भस्म हो जाएगा।

लेकिन हुआ इसके विपरीत। भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका स्वयं जलकर भस्म हो गई।

यह घटना इस बात का प्रतीक बनी कि अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है, जबकि सच्ची भक्ति और सत्य की सदैव विजय होती है।

नरसिंह अवतार और धर्म की स्थापना

हिरण्यकश्यप के अत्याचारों का अंत भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर किया। संध्या समय (न दिन, न रात), चौखट पर (न धरती, न आकाश), अपने नखों से (न अस्त्र, न शस्त्र) हिरण्यकश्यप का वध किया।

यह घटना धर्म की पुनर्स्थापना और सत्य की विजय का प्रतीक है। होली का पर्व इसी विजय का उत्सव है।

होलिका दहन का धार्मिक और सामाजिक महत्व

होलिका दहन केवल एक पौराणिक कथा का स्मरण नहीं है, बल्कि यह कई स्तरों पर संदेश देता है:

  1. अहंकार का अंत निश्चित है।
  2. सत्य और भक्ति की विजय होती है।
  3. अधर्म और अन्याय अधिक समय तक नहीं टिकते।
  4. समाज में बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प लेना चाहिए।

ग्रामीण क्षेत्रों में होलिका दहन के समय नई फसल की बालियाँ अग्नि में भूनकर प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती हैं। यह कृषि संस्कृति से जुड़े आनंद और समृद्धि का प्रतीक है।

होली का सामाजिक स्वरूप

होली केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का उत्सव भी है। इस दिन लोग:

  • पुराने मनमुटाव भूल जाते हैं
  • मित्रों और परिवारजनों से मिलते हैं
  • रंग और गुलाल से प्रेम व्यक्त करते हैं
  • गीत, संगीत और नृत्य का आनंद लेते हैं

“बुरा न मानो होली है” जैसे वाक्य सामाजिक खुलेपन और उत्साह का प्रतीक बन गए हैं।

होली समाज में जाति, वर्ग और आर्थिक भेदभाव को मिटाकर एकता का संदेश देती है।

होली और भारतीय संस्कृति

भारत के विभिन्न राज्यों में होली अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाई जाती है। कहीं लठमार होली, कहीं फूलों की होली, तो कहीं रंगपंचमी का विशेष महत्व होता है।

उत्तर भारत में यह पर्व अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है, विशेषकर ब्रज क्षेत्र में इसका विशेष महत्व है, जहां इसे कई दिनों तक उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

पर्यावरण के प्रति जागरूकता

आधुनिक समय में होली मनाते समय पर्यावरण का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

  • प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करें
  • जल की बर्बादी से बचें
  • प्लास्टिक और रासायनिक रंगों से दूर रहें
  • वृक्षों की कटाई से बचें

होलिका दहन में अत्यधिक लकड़ी का प्रयोग पर्यावरण को हानि पहुँचा सकता है, इसलिए सामूहिक और सीमित दहन को प्राथमिकता देनी चाहिए।

2026 की होली: विशेष तथ्य

  • होलिका दहन: 3 मार्च 2026
  • चंद्र ग्रहण समाप्ति: शाम 6:47 बजे
  • शुभ मुहूर्त: 6:47 बजे से 8:50 बजे तक
  • रंग वाली होली: 4 मार्च 2026

यह संयोग विशेष है क्योंकि होलिका दहन के दिन चंद्र ग्रहण भी लग रहा है, किंतु शास्त्रीय नियमों के अनुसार ग्रहण समाप्ति के बाद ही दहन करना उचित है।

होली का आध्यात्मिक संदेश

होली हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियाँ क्यों न आएँ, यदि मन में सच्ची आस्था और विश्वास है तो विजय निश्चित है।

भक्त प्रह्लाद की कथा हमें यह प्रेरणा देती है कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

होलिका दहन की अग्नि हमें अपने भीतर की बुराइयों—क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार—को जलाने का संदेश देती है।

रंगों वाली होली हमें जीवन में प्रेम, आनंद और सकारात्मकता भरने की प्रेरणा देती है।

निष्कर्ष

वर्ष 2026 की होली तिथि को लेकर जो भ्रम था, वह अब शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट हो चुका है। होलिका दहन 3 मार्च 2026 को ही किया जाएगा और ग्रहण समाप्ति के बाद शुभ मुहूर्त में संपन्न होगा। रंगों की होली 4 मार्च 2026 को मनाई जाएगी।

होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव है। यह हमें सिखाती है कि सत्य की विजय निश्चित है, अधर्म का अंत तय है और प्रेम ही सबसे बड़ा रंग है।

आइए, 2026 की होली पर हम संकल्प लें कि अपने जीवन से नकारात्मकता को दूर करेंगे, समाज में प्रेम और सौहार्द का रंग भरेंगे और इस पावन पर्व को धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से सार्थक बनाएंगे।

आप सभी को होली 2026 की अग्रिम शुभकामनाएँ! 🎨🌸


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