भारत विविध भाषाओं और बोलियों का विशाल संगम है। उत्तर भारत के पर्वतीय अंचल में बोली जाने वाली डोगरी भाषा (Dogri Language) इस भाषिक विविधता का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। यह भाषा न केवल जम्मू क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है, बल्कि इसकी साहित्यिक परंपरा, ऐतिहासिक विकास और विशिष्ट लिपि ने इसे भारत की प्रमुख भाषाओं में प्रतिष्ठित किया है।
डोगरी को वर्ष 2003 में भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिया गया, जिससे यह भारत की 22 आधिकारिक भाषाओं में से एक बन गई। लगभग 25 लाख वक्ताओं द्वारा बोली जाने वाली यह भाषा, आज अपने साहित्यिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक योगदान के कारण राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त कर चुकी है।
डोगरी भाषा का परिचय
डोगरी भाषा एक इंडो-आर्यन भाषा (Indo-Aryan Language) है, जो मुख्य रूप से भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर, साथ ही हिमाचल प्रदेश और पंजाब के कुछ हिस्सों में बोली जाती है। यह भाषा भारतीय आर्य भाषा परिवार की सदस्य है, और अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता, व्याकरण और शब्दावली के लिए जानी जाती है।
डोगरी के वक्ताओं को डोगरे (Dogras) कहा जाता है, और जिस क्षेत्र में यह भाषा बोली जाती है, उसे प्रायः “डुग्गर” (Duggar) कहा जाता है। जम्मू, उधमपुर, रियासी और कठुआ जैसे जिलों में यह व्यापक रूप से बोली जाती है, जबकि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा, हमीरपुर और बिलासपुर जिलों के कुछ हिस्सों में तथा पंजाब के गुरदासपुर और होशियारपुर में भी इसके वक्ता पाए जाते हैं।
देश से बाहर, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका, कनाडा और खाड़ी देशों में बसे प्रवासी डोगरा समुदाय के बीच भी यह भाषा आज जीवित और प्रचलित है।
डोगरी भाषा की उत्पत्ति और विकास
डोगरी भाषा की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में विभिन्न मत पाए जाते हैं, किंतु अधिकांश भाषावैज्ञानिक यह मानते हैं कि इसका विकास पश्चिमी पहाड़ी भाषाओं के समूह से हुआ है। यह समूह भारत और नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में बोली जाने वाली इंडो-आर्यन भाषाओं का हिस्सा है।
डोगरी के विकास की प्रक्रिया को तीन प्रमुख चरणों में देखा जा सकता है —
- प्रारंभिक चरण (10वीं से 15वीं शताब्दी):
इस समय टाकरी लिपि का प्रारंभिक विकास हुआ। कुल्लू और चंबा के ताम्रपत्रों में इस लिपि के प्रयोग के प्रमाण मिलते हैं। डोगरी इसी काल में स्थानीय पहाड़ी बोलियों से विकसित होने लगी। - मध्यकालीन चरण (16वीं से 19वीं शताब्दी):
इस काल में डोगरी भाषा पर संस्कृत, फारसी और पंजाबी का गहरा प्रभाव पड़ा। जम्मू रियासत और चंबा राज्य में यह भाषा प्रशासनिक कार्यों में प्रयुक्त होने लगी। यही वह काल था जब डोगरी ने स्वतंत्र भाषाई पहचान बनानी शुरू की। - आधुनिक चरण (20वीं शताब्दी से वर्तमान तक):
आधुनिक काल में डोगरी साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हुआ। 19वीं शताब्दी में पहली बार इस भाषा में लेखन प्रारंभ हुआ, और 20वीं शताब्दी के मध्य से इसमें कविता, कथा, नाटक और लोकगीतों की समृद्ध परंपरा स्थापित हो गई।
डोगरी की विशेषताएँ
डोगरी भाषा को उसकी विशिष्ट भाषाई संरचना, लोकधारा और साहित्यिक जीवंतता के कारण पश्चिमी पहाड़ी भाषाओं में विशेष स्थान प्राप्त है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं —
- विस्तृत बोलने वालों की संख्या:
डोगरी, पश्चिमी पहाड़ी भाषाओं में सर्वाधिक वक्ताओं वाली भाषा है। इसके लगभग 25 लाख से अधिक मातृभाषी हैं। - साहित्यिक समृद्धि:
इस भाषा में कविता, कथा, नाटक, लोकगीत और निबंध जैसे विविध विधाओं में साहित्यिक सृजन हुआ है। - राजकीय उपयोगिता:
ऐतिहासिक रूप से डोगरी, जम्मू-कश्मीर रियासत और चंबा राज्य की राजकीय प्रशासनिक भाषा रही है। - संस्कृत और फारसी का प्रभाव:
डोगरी की शब्दावली में संस्कृत के साथ-साथ फारसी, पंजाबी और उर्दू से भी अनेक शब्द समाहित हैं, जिससे यह एक बहुभाषिक सांस्कृतिक पुल का कार्य करती है। - ध्वन्यात्मक विशेषताएँ:
डोगरी में कुछ ध्वनियाँ ऐसी हैं जो न तो शुद्ध हिंदी में मिलती हैं और न ही पंजाबी में। इसकी स्वर-व्यंजन संरचना में स्थानीय पहाड़ी प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
डोगरी का बोली क्षेत्र
डोगरी का भौगोलिक प्रसार बहुत विस्तृत है।
- जम्मू और कश्मीर: जम्मू, उधमपुर, रियासी, कठुआ, सांबा और राजौरी जिलों में यह प्रमुख भाषा है।
- हिमाचल प्रदेश: कांगड़ा, हमीरपुर, मंडी और बिलासपुर जिलों के कुछ भागों में बोली जाती है।
- पंजाब: गुरदासपुर और होशियारपुर जिलों के कुछ गाँवों में इसका प्रयोग होता है।
- अन्य क्षेत्र: दिल्ली, मुंबई, पंजाब-हरियाणा सीमांत तथा विदेशों में बसे डोगरा समुदाय के बीच भी यह भाषा जीवित है।
इन सभी क्षेत्रों को मिलाकर जो भाषाई-भौगोलिक क्षेत्र बनता है, उसे सामूहिक रूप से “डुग्गर प्रदेश” कहा जाता है।
डोगरी भाषा और उसकी लिपि
1. टाकरी या टक्करी लिपि
डोगरी की अपनी एक प्राचीन लिपि है जिसे “टाकरी” (Takri) या “टक्करी” कहा जाता है। यह लिपि शारदा लिपि की उत्तराधिकारी मानी जाती है।
इतिहासकारों का मत है कि कुल्लू और चंबा के कुछ प्राचीन ताम्रपत्रों से यह ज्ञात होता है कि टाकरी लिपि का विकास 10वीं-11वीं शताब्दी में हो गया था।
टाकरी लिपि के अंतर्गत कई क्षेत्रीय रूप पाए जाते हैं, जैसे —
- लंडे
- किश्तवाड़ी
- चंबयाली
- मंडयाली
- सिरमौरी
- कुल्लूई
डॉ॰ ग्रियर्सन के अनुसार, “शारदा और टाकरी लिपियाँ सहोदरा हैं”, जबकि विद्वान व्हूलर का मत है कि “टाकरी, शारदा की आत्मजा है”।
2. लिपि सुधार और देवनागरी का प्रचलन
कश्मीर के महाराज रणवीर सिंह ने अपने शासनकाल में डोगरी लिपि में सुधार का प्रयास किया था। उन्होंने मात्रा और चिह्नों के प्रयोग को देवनागरी लिपि के अनुरूप बनाया और डोगरी के मुद्रण हेतु “रणवीर प्रेस” की स्थापना की।
हालांकि यह सुधार जनसामान्य में लोकप्रिय नहीं हो सका। समय के साथ देवनागरी लिपि ने टाकरी का स्थान ले लिया। आज अधिकांश डोगरी साहित्य और प्रकाशन देवनागरी में ही होते हैं।
फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में टाकरी लिपि अब भी बहीखातों और पारंपरिक लेखन में प्रयुक्त होती है।
डोगरी भाषा की भाषाई स्थिति और वर्गीकरण
भाषावैज्ञानिक दृष्टि से डोगरी का वर्गीकरण इंडो-यूरोपीय परिवार की इंडो-ईरानी शाखा की इंडो-आर्यन उपशाखा के अंतर्गत किया जाता है।
कुछ प्रारंभिक विद्वानों, जैसे डॉ. ग्रियर्सन, ने इसे पंजाबी की उपबोली बताया था। परंतु यह धारणा भ्रामक सिद्ध हुई।
- जॉन बीम्ज (John Beames) ने अपनी 1866 ई. में प्रकाशित पुस्तक में स्पष्ट लिखा कि “डोगरी न तो कश्मीरी की और न ही पंजाबी की उपबोली है।”
- उन्होंने इसे भारतीय-जर्मन परिवार की आर्य शाखा की प्रमुख 11 भाषाओं में स्थान दिया।
- डॉ॰ सिद्धेश्वर वर्मा ने भी डोगरी को भारत की प्रमुख सात सीमांत भाषाओं में गिना है।
इस प्रकार, भाषावैज्ञानिक दृष्टि से डोगरी एक स्वतंत्र और पूर्ण विकसित भाषा है।
डोगरी भाषा : लिपि, वर्णमाला और भाषाई स्वरूप
वर्णमाला एवं स्वर-व्यंजन
डोगरी भाषा को वर्तमान में देवनागरी लिपि में लिखा जाता है। इसकी वर्णमाला में लगभग 10 स्वर और 28 व्यंजन माने जाते हैं।
डोगरी एक स्वरात्मक भाषा (Tonal Language) है — अर्थात् शब्दों के उच्चारण में स्वर की ऊँचाई (tone) अथवा ध्वनि का उतार-चढ़ाव अर्थ परिवर्तन कर सकता है।
भाषा में कुछ ऐसे विशेष व्यंजन भी हैं जिनका उपयोग स्वर या टोन में भिन्नता व्यक्त करने के लिए किया जाता है, जैसे — घ, झ, ढ, ध, भ, ढ़।
स्वर: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ
व्यंजन: क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, स, ह
डोगरी में कर्मवाच्य और भाववाचक रूपों का विशेष प्रयोग पाया जाता है। उदाहरणार्थ —
- लिकिआ — ‘लिखा’
- लखोआ — ‘लिख गया’
तकरी लिपि (Dogra Akkhar / Takkari Script)
ऐतिहासिक दृष्टि से, डोगरी भाषा की मूल लेखन प्रणाली तकरी लिपि (Takkari Script) रही है, जिसे स्थानीय रूप से “डोगरा अक्खर” भी कहा जाता था।
यह लिपि ब्राह्मी लिपि की शाखा शारदा लिपि से विकसित हुई थी और महाराजा रणबीर सिंह (1857–1885) के शासनकाल में जम्मू-कश्मीर की राजभाषा के रूप में मान्य थी।
इस काल में सरकारी दस्तावेज, राजाज्ञाएँ और धार्मिक ग्रंथ इसी लिपि में लिखे जाते थे।
समय के साथ, प्रशासनिक एवं शैक्षणिक प्रयोग के लिए देवनागरी लिपि अधिक व्यावहारिक सिद्ध हुई और उसने तकरी लिपि का स्थान ले लिया।
फिर भी, टक्करी लिपि को आज भी डोगरी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया जा रहा है।
जम्मू विश्वविद्यालय और भारतीय पुरालेख विभाग इस लिपि के अभिलेखों के अध्ययन और डिजिटलीकरण पर कार्य कर रहे हैं।
भाषाई प्रभाव और संरचना
डोगरी की शब्दावली पर संस्कृत, फारसी, उर्दू और अंग्रेज़ी — इन सभी भाषाओं का प्रभाव देखा जा सकता है।
इसका व्याकरणिक ढांचा हिंदी और पंजाबी के समान है, परंतु ध्वन्यात्मक स्तर पर इसमें पहाड़ी भाषाओं की झलक मिलती है।
ध्वनि संरचना में नासिक ध्वनियों तथा टोनल उच्चारण की प्रबलता डोगरी को अन्य उत्तर भारतीय भाषाओं से भिन्न बनाती है।
डोगरी भाषी क्षेत्र
डोगरी मुख्यतः पश्चिमोत्तर भारत के पर्वतीय और उपपर्वतीय क्षेत्रों में बोली जाती है।
इसका भाषिक विस्तार निम्न क्षेत्रों में देखा जा सकता है —
- भूखण्ड कांडी — जम्मू प्रान्त के जम्मू, कठुआ और ऊधमपुर ज़िलों के बलुई, शुष्क क्षेत्र।
- पहाड़ी क्षेत्र — हिमाचल प्रदेश के चंबा, कांगड़ा और कठुआ ज़िले।
- मैदानी क्षेत्र — जम्मू का दक्षिणी भाग, पंजाब के गुरदासपुर एवं होशियारपुर के उत्तरी इलाके, तथा पाकिस्तान के सियालकोट और शकरगढ़ क्षेत्र।
इन क्षेत्रों में डोगरी की अनेक स्थानीय उपबोलियाँ जैसे — कियुंथाली, कंडयाली, भटियाली, चंबयाली, कुल्लुई, भदरवाही, गुजरी, रामपुरी और पोगाली प्रचलित हैं।
डोगरी का ऐतिहासिक उल्लेख
डोगरी (या डुग्गर) का सबसे प्राचीन उल्लेख अमीर ख़ुसरो (1317 ई.) की फ़ारसी मसनवी “नूह-ए-सिफ़र” में मिलता है, जहाँ उन्होंने लिखा —
“सिंधी ओ लहोरी ओ कश्मीरी ओ डोग्गर”
इससे सिद्ध होता है कि 14वीं शताब्दी के प्रारंभ तक डोगरी भाषा की पहचान उत्तर भारत की प्रमुख बोलियों में हो चुकी थी।
डोगरी भाषा की वर्तमान स्थिति
वर्तमान में डोगरी देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है, और लगभग सम्पूर्ण आधुनिक साहित्य इसी में रचा गया है।
यह भाषा भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित है तथा जम्मू-कश्मीर के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है।
1981 की जनगणना के अनुसार डोगरीभाषी लोगों की संख्या लगभग 15 लाख थी, जबकि आज अनुमानतः 50 लाख से अधिक लोग इस भाषा का प्रयोग करते हैं।
डोगरी भाषा की वर्णमाला (Devanagari Script में)
स्वर (Vowels)
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः
(इनसे बने मात्राएँ: ा, ि, ी, ु, ू, ृ, े, ै, ो, ौ, ं, ः )
व्यंजन (Consonants)
क-वर्ग: क, ख, ग, घ, ङ
च-वर्ग: च, छ, ज, झ, ञ
ट-वर्ग: ट, ठ, ड, ढ, ण
त-वर्ग: त, थ, द, ध, न
प-वर्ग: प, फ, ब, भ, म
अंतस्थ व्यंजन: य, र, ल, व
उष्म व्यंजन: श, ष, स, ह
अन्य चिह्न एवं संयुक्ताक्षर
- संयुक्ताक्षर उदाहरण: क्ष, त्र, ज्ञ
- अन्य चिह्न: ँ (अनुस्वार), ः (विसर्ग), ँ (चंद्रबिंदु), ् (हलंत)
अंकों का प्रयोग (Devanagari Digits):
०, १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९
विशेष टिप्पणी:
डोगरी की ध्वन्यात्मकता (Phonetics) हिंदी से मिलती-जुलती है, किंतु कुछ उच्चारणों में पहाड़ी प्रभाव देखा जाता है, जैसे —
- “ष” और “श” के उच्चारण में भेद
- “र” और “ल” का मिश्र उच्चारण
- नासिक ध्वनियों का अधिक प्रयोग (जैसे — अं, ँ)
डोगरी भाषा के स्वर एवं ध्वनि-विज्ञान की विशेषताएँ
डोगरी भाषा ध्वन्यात्मक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और विशिष्ट है। इसके उच्चारण तथा स्वर-विन्यास में कई ऐसे लक्षण मिलते हैं जो इसे हिंदी और पंजाबी जैसी निकटवर्ती भाषाओं से अलग पहचान देते हैं। नीचे डोगरी की कुछ प्रमुख स्वर-विषयक एवं ध्वन्यात्मक विशेषताएँ प्रस्तुत की जा रही हैं—
1. शब्दों के प्रारंभ में ध्वनि-परिवर्तन
डोगरी में शब्दों के आरंभ में ‘य’ और ‘व’ ध्वनियाँ प्रायः ‘ज’ और ‘व’ में परिवर्तित होकर उच्चरित होती हैं। उदाहरणस्वरूप:
| हिन्दी / पंजाबी | डोगरी |
|---|---|
| वेहड़ा (आँगन) | वेडा |
| यजमान | जजमान |
| यश | जस |
2. ‘ह’ ध्वनि का विशिष्ट उच्चारण
डोगरी में ‘ह’ का उच्चारण हिंदी और पंजाबी से कुछ भिन्न होता है। जब यह शब्द के मध्य आता है, तो इसमें उतरते स्वर (falling tone) का प्रयोग होता है। उदाहरणस्वरूप:
| हिन्दी | डोगरी |
|---|---|
| पहाड़ | प्हाड़ / पाड़ |
| मोहर | म्होर / मोर |
3. वर्गों के चतुर्थ वर्णों का उच्चारण
डोगरी में जब वर्गों के चौथे वर्ण (जैसे घ, झ, ढ, ध, भ, ढ़) बोले जाते हैं, तो उनके साथ तद्वर्गीय प्रथम वर्ण का हल्का चढ़ता स्वर जुड़ जाता है, जिससे इनका उच्चारण अपेक्षाकृत मधुर और स्वरात्मक हो जाता है।
| वर्ण वर्ग | हिन्दी / संस्कृत वर्ण | डोगरी उच्चारण का स्वरूप | उदाहरण (हिन्दी) | उदाहरण (डोगरी) | टिप्पणी |
|---|---|---|---|---|---|
| क-वर्ग | घ | ग + घ (हल्का चढ़ता स्वर) | घर | ग्हर | ‘घ’ का उच्चारण ‘ग’ से आरंभ होकर ऊर्ध्व स्वर में जाता है। |
| च-वर्ग | झ | ज + झ (चढ़ता स्वर) | झाड़ू | झ्हाड़ू | ध्वनि में लयात्मक कंपन अनुभव होता है। |
| ट-वर्ग | ढ | ड + ढ (हल्का ऊर्ध्व स्वर) | ढोल | ड्होल | आरंभिक ‘ड’ का सूक्ष्म स्पर्श रहता है। |
| त-वर्ग | ध | द + ध (चढ़ता स्वर) | धन | ध्हन | ‘ध’ का उच्चारण स्पष्ट रूप से स्वरात्मक बनता है। |
| प-वर्ग | भ | ब + भ (चढ़ता स्वर) | भवन | भ्हवन | इसमें ‘ब’ की झलक के बाद ‘भ’ का उच्चारण होता है। |
| ट-वर्ग (विशेष) | ढ़ | ड + ढ़ (स्वर सहित) | बड़ा | ब्ढ़ा | ‘ढ़’ में डकार का स्वर गूंजित होता है। |
संक्षिप्त टिप्पणी:
डोगरी में इन चतुर्थ वर्णों के उच्चारण में हल्की चढ़ती हुई स्वर लहर (rising tone) पाई जाती है, जिससे भाषा के उच्चारण में मृदुता, लय और संगीतात्मकता का अनुभव होता है। यह विशेषता डोगरी को एक विशिष्ट स्वर-प्रधान पहाड़ी भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करती है।
4. अनुनासिक ध्वनियों (ङ, ञ) का प्रयोग
डोगरी में कुछ शब्दों के प्रारंभ में अनुनासिक ध्वनियाँ (ङ, ञ) का प्रयोग शुद्ध रूप में मिलता है, जो इसे अन्य उत्तर भारतीय भाषाओं से भिन्न बनाता है।
| हिन्दी / पंजाबी | डोगरी |
|---|---|
| अंगार | ङार |
| अंगूर | ङूर |
| अञाणा (पंजाबी) | ञ्याणा |
| ग्यारह | आरां |
5. संस्कृत ‘र’ का संरक्षण
जहाँ हिंदी में संस्कृत का ‘र’ कई बार लुप्त हो जाता है, वहीं डोगरी में यह संरक्षित रहता है।
| संस्कृत | हिन्दी | डोगरी |
|---|---|---|
| ग्राम | गाँव | ग्राँ |
| क्षेत्र | खेत | खेतर |
| पत्र | पात | पत्तर |
| मित्र | मीत | मित्तर |
| स्त्री | तिय / तीमी | त्रीम्त |
कई शब्दों में ‘र’ का अतिरिक्त आगमन भी हुआ है, जैसे—
| संस्कृत / हिन्दी | डोगरी |
|---|---|
| तीक्ष्ण / तीखा | त्रिक्खना |
| दौड़ | द्रौड़ |
| पसीना | परसीना / परसा |
| कोप | करोपी |
| धिक् | घ्रिग / चिक्कार |
6. संक्षेपीकरण और संश्लेषणात्मक प्रवृत्ति
डोगरी एक संश्लेषणात्मक भाषा है, जिसमें संक्षेपीकरण की विशेष प्रवृत्ति देखी जाती है। कई शब्द रूपों में सर्वनाम या कारक चिह्न जुड़कर नए अर्थ उत्पन्न करते हैं।
| संस्कृत | हिन्दी | डोगरी |
|---|---|---|
| अहम् | मैंने | में |
| माम् | मुझको | मिगी / मी |
| अस्माभिः | हमने (हमारे द्वारा) | असें |
| मत् | मुझसे / मेरे | शा |
| मयि | मुझमें | मेरे च |
7. संक्षिप्त क्रियारूप (कर्मवाच्य एवं भाववाच्य)
डोगरी में क्रियाओं का कर्मवाच्य रूप अधिक प्रचलित है, जैसे—
| हिन्दी | डोगरी |
|---|---|
| खाया जाता | खनोंदा |
| पिया जाता | पनोंदा |
| सोया जाता | सनोंदा |
8. वर्ण-विश्र्यय एवं स्वर लोप की प्रवृत्ति
डोगरी में कई बार शब्दों के भीतर या प्रारंभ में स्वर या व्यंजन लुप्त हो जाते हैं।
| हिन्दी | डोगरी |
|---|---|
| उजाड़ | जुआड़ |
| उधार | दुआर |
| कीचड़ | चिक्कड़ |
| ताम्र | तरामां |
| अनाज | नाज |
| अख़बार | खबर |
| इजाज़त | जाजत |
| एतराज़ | तराज |
इन समस्त विशेषताओं से यह स्पष्ट होता है कि डोगरी भाषा का ध्वन्यात्मक तंत्र अत्यंत जीवंत और स्वर-संवेदनशील है। इसके उच्चारण में संगीतात्मकता और लय का विशेष स्थान है, जो इसे अन्य पहाड़ी भाषाओं से विशिष्ट बनाता है।
टक्करी लिपि में डोगरी भाषा की वर्णमाला (Dogri in Takkari Script)
ऐतिहासिक परिचय
- टक्करी लिपि ब्राह्मी से विकसित हुई और शारदा लिपि की उत्तरवर्ती शाखा मानी जाती है।
- इसका प्रयोग हिमाचल प्रदेश, जम्मू, चंबा, कांगड़ा और आसपास के डोगरी, चम्बयाली तथा पहाड़ी भाषाभाषियों द्वारा किया जाता था।
- 19वीं शताब्दी के मध्य तक जम्मू दरबार की राजकीय लिपि भी यही थी।
- स्वतंत्रता के बाद, 20वीं शताब्दी में इसे धीरे-धीरे देवनागरी लिपि से प्रतिस्थापित कर दिया गया।
टक्करी लिपि की प्रमुख विशेषताएँ
- यह एक अक्षरात्मक लिपि (alphasyllabary) है — प्रत्येक वर्ण में व्यंजन और स्वर का संयोजन निहित होता है।
- संयुक्ताक्षरों की संख्या सीमित है, जिससे यह लिखने में अपेक्षाकृत सरल है।
- वर्णों के आकार गोलाकार और संकुचित होते हैं, जिनमें देवनागरी की तरह शिरोरखा (ऊपरी रेखा) नहीं होती।
- इसमें स्वरों के लिए स्वतंत्र अक्षर तथा स्वरचिह्न (मात्राएँ) दोनों का प्रयोग होता है।
टक्करी लिपि का यूनिकोड ब्लॉक (Unicode Block of Takri Script)
टक्करी लिपि के वर्ण आधुनिक डिजिटल रूप में यूनिकोड मानक (Unicode Standard) में सम्मिलित किए जा चुके हैं।
इन वर्णों के लिए यूनिकोड ने एक विशेष श्रेणी निर्धारित की है, जिसे “Takri” Block कहा जाता है।
इस ब्लॉक की सीमा (Range) निम्नलिखित है —
U+11680 से U+116CF
यह यूनिकोड ब्लॉक टक्करी लिपि के सभी मूल स्वर, व्यंजन, मात्राएँ, अंक, तथा चिह्नों (signs) को समाहित करता है।
इसके माध्यम से टक्करी लिपि को आज के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, वेबसाइटों, दस्तावेज़ों, और शोध–सामग्रियों में सहज रूप से प्रदर्शित किया जा सकता है।
इस प्रकार, यूनिकोड का समावेश टक्करी लिपि के संरक्षण, पुनर्जीवन और शैक्षणिक प्रयोग की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है।
टक्करी लिपि और देवनागरी लिपि का तुलनात्मक विश्लेषण
डोगरी भाषा का ऐतिहासिक विकास दो प्रमुख लिपियों से जुड़ा हुआ है —
(1) प्राचीन टक्करी लिपि (Takri Script), और
(2) आधुनिक देवनागरी लिपि (Devanagari Script)।
टक्करी लिपि का प्रयोग जम्मू–कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में लंबे समय तक हुआ। इसे “डोगरा अक्खर” भी कहा जाता था।
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में महाराजा रणबीर सिंह के शासनकाल में यह राज्य की आधिकारिक लिपि थी।
बाद में देवनागरी लिपि के प्रसार के साथ-साथ, टक्करी लिपि धीरे-धीरे प्रचलन से बाहर हो गई और आधुनिक डोगरी लेखन पूरी तरह देवनागरी में होने लगा।
टक्करी लिपि और देवनागरी लिपि का तुलनात्मक चार्ट
| क्रम | विशेषता / पहलू | टक्करी लिपि (Takri Script) | देवनागरी लिपि (Devanagari Script) |
|---|---|---|---|
| 1 | लिपि का उद्गम | शारदा लिपि से विकसित (उत्तर भारत की पहाड़ी शाखा) | ब्राह्मी लिपि से विकसित (उत्तर भारतीय मुख्य शाखा) |
| 2 | प्रयोग का क्षेत्र | जम्मू, हिमाचल, कांगड़ा, चंबा, पहाड़ी क्षेत्र | भारत के उत्तरी, मध्य एवं पश्चिमी भाग |
| 3 | डोगरी लेखन काल | 17वीं–19वीं शताब्दी तक | 20वीं शताब्दी से वर्तमान तक |
| 4 | लिपि का स्वरूप | कोणीय (angular), अक्षरों में तीक्ष्ण रेखाएँ | वक्राकार (curvilinear), गोल रेखाएँ और सिरा रेखा |
| 5 | रेखा प्रणाली | शीर्ष रेखा (head-line) सामान्यतः अनुपस्थित | शीर्ष रेखा (शिरोरेखा) स्पष्ट रूप से विद्यमान |
| 6 | स्वर-चिह्नों का प्रयोग | सीमित और प्रायः व्यंजन में अंतर्निहित | विस्तृत स्वर-मात्राएँ स्वतंत्र रूप में प्रयुक्त |
| 7 | संयुक्ताक्षर लेखन | कम प्रचलित, ध्वन्यात्मक रूप सरल | जटिल, संयुक्ताक्षरों की भरपूर विविधता |
| 8 | अंकों की संरचना | अपनी विशिष्ट शैली में विकसित | मानक देवनागरी अंकों (०–९) का उपयोग |
| 9 | वर्तनी का मानकीकरण | असंगत, क्षेत्रीय भिन्नताएँ | पूर्ण रूप से मानकीकृत |
| 10 | वर्तमान स्थिति | ऐतिहासिक व सांस्कृतिक उपयोग तक सीमित | वर्तमान में आधिकारिक और शैक्षणिक प्रयोग में |
सारांशात्मक टिप्पणी:
टक्करी लिपि, डोगरी के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरव का प्रतीक रही है — इसकी संरचना सरल और स्थानीय ध्वनियों के अनुरूप थी।
वहीं देवनागरी लिपि ने डोगरी भाषा को एक मानकीकृत, शिक्षणयोग्य और आधुनिक स्वरूप प्रदान किया, जिससे यह भारतीय भाषाओं की मुख्यधारा में सम्मिलित हो सकी।
दोनों लिपियाँ डोगरी भाषा के ऐतिहासिक विकास और सांस्कृतिक निरंतरता की साक्षी हैं।
डोगरी साहित्य
डोगरी भाषा की साहित्यिक परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। जम्मू क्षेत्र की यह भाषा अपने लोकगीतों, लोककथाओं और लोकनाट्यों के माध्यम से लोगों की भावनाओं, संस्कारों और जीवनदर्शन को अभिव्यक्त करती रही है। डोगरी साहित्य में पहाड़ी जीवन की सरलता, प्राकृतिक सौंदर्य की भव्यता तथा लोकसंस्कृति की सजीव झलक स्पष्ट दिखाई देती है। डोगरी की मौखिक परंपरा ने इस भाषा को न केवल जीवंत बनाए रखा, बल्कि इसे सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना से भी जोड़ा।
डोगरी में साहित्यसर्जन का प्रारंभ मुख्यतः मौखिक रूप में हुआ, जिसमें लोकगीत, विवाहगीत, त्यौहारों पर गाए जाने वाले गीत और लोककथाएँ प्रमुख थीं। इन लोकरचनाओं में डोगरी समाज के जीवन-संघर्ष, रीति-रिवाज, हास्य, करुणा और प्रेम का स्वाभाविक चित्रण मिलता है। यही मौखिक परंपरा आगे चलकर लिखित डोगरी साहित्य की आधारशिला बनी।
डोगरी साहित्य का विकास
डोगरी साहित्य का विकास निम्नलिखित प्रमुख चरणों के माध्यम से समझा जा सकता है —
1. प्रारंभिक लोकसाहित्यिक परंपरा
हर जनभाषा की तरह डोगरी साहित्य की यात्रा भी लोक परंपरा से प्रारंभ हुई। डोगरी की लोकधारा अत्यंत समृद्ध रही है, जिसमें लोकगीत, लोककथाएँ, लोकनृत्य और लोककाव्य अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनाते हैं। विवाह, उत्सव, ऋतु-परिवर्तन और धार्मिक अवसरों पर गाए जाने वाले गीतों ने इस भाषा की मौखिक परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सशक्त बनाए रखा।
डोगरी के लोकगीतों में जीवन के विविध रंगों का अद्भुत समन्वय मिलता है — प्रेम, विरह, हास्य, करुणा, भक्ति और लोकजीवन की सहज अनुभूतियाँ इन गीतों में जीवंत हैं।
डोगरी संस्था के निर्देशन में कार्यरत उत्साही साहित्यकारों ने अब तक 500 से अधिक लोकगीतों का संकलन किया है। इन गीतों की विशेषता यह है कि इनमें भावनात्मक गहराई और संगीतात्मक माधुर्य दोनों का सुंदर संगम है।
संस्था की त्रैमासिक पत्रिका ‘नई चेतना’ में नियमित रूप से लोकगीतों का प्रकाशन होता रहा है, जिससे इन रचनाओं को व्यापक पाठकवर्ग मिला। संस्था द्वारा प्रकाशित विवाह संबंधी गीतों का संग्रह ‘खारे मिट्ठे अत्थरूं’ डोगरी लोकसंस्कृति की भावनात्मक संवेदना का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इसी क्रम में डॉ॰ कर्ण सिंह द्वारा संपादित “शैडो ऐंड सनलाइट” शीर्षक से एक डोगरी लोकगीत संग्रह भी प्रकाशित हुआ, जिसमें गीतों के हिंदी व अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ मौलिक स्वरलिपि को भी सुरक्षित रखा गया है। यह संग्रह एशिया पब्लिशिंग हाउस, मुंबई से प्रकाशित हुआ और इसे डोगरी लोकसाहित्य के दस्तावेज़ के रूप में अत्यंत सराहा गया।
2. लोककथाएँ और लोकसाहित्य के संकलन प्रयास
लोकगीतों के साथ-साथ डोगरी लोककथाएँ भी भाषा की सांस्कृतिक परंपरा का अभिन्न अंग हैं। इन कथाओं में डोगरा समाज के नैतिक मूल्य, लोकआस्थाएँ और ग्रामीण जीवन की झलक सजीव रूप में दिखाई देती है।
डोगरी लोककथाओं के संकलन के लिए भी साहित्यकारों ने विशेष प्रयत्न किए हैं। अब तक डोगरी में लोककथाओं के तीन उल्लेखनीय संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं —
- ‘डोगरी लोककत्था’ – संपादक: श्री बंशीलाल
- ‘इक हा राजा’ – संपादक: रामनाथ शास्त्री
- ‘नमियाँ पौंगरा’ – संपादक: अनंतराम शासी
इन संग्रहों में डोगरी लोकजीवन की विविध कहानियाँ संग्रहीत हैं, जिनमें प्रेम, परिश्रम, वीरता, हास्य और सामाजिक नैतिकता के अनेक आयाम झलकते हैं।
इसके अतिरिक्त जम्मू-कश्मीर राज्य की सांस्कृतिक अकादमी (Cultural Academy) भी लोकगीतों और लोककथाओं के संरक्षण व प्रकाशन में सक्रिय रही है। अकादमी द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों ने डोगरी की मौखिक परंपरा को लिखित स्वरूप प्रदान करने में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
3. आधुनिक साहित्यिक आंदोलन और संगठनात्मक प्रयास
बीसवीं शताब्दी के मध्य में डोगरी साहित्य ने एक संगठित साहित्यिक रूप प्राप्त किया। इसी दौर में ‘डोगरी संस्था’ की स्थापना हुई, जिसने भाषा के विकास, प्रकाशन, अनुवाद और शिक्षण में अग्रणी भूमिका निभाई।
यह संस्था पिछले छह दशकों से अधिक समय से लगातार कार्यरत है। इसके प्रयासों से डोगरी में आधुनिक कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध और नाटक की विधाएँ विकसित हुईं।
जम्मू नगर, जो जम्मू-कश्मीर की शीतकालीन राजधानी है, डोगरी साहित्यिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र बना। यहाँ से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाएँ और साहित्यिक आयोजन इस भाषा की चेतना को निरंतर नई दिशा देते रहे हैं।
4. प्रमुख साहित्यकार और रचनात्मक धारा
डोगरी साहित्य के पुनर्जागरण में अनेक साहित्यकारों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सबसे प्रमुख नाम पद्मा सचदेव का है, जिन्हें आधुनिक डोगरी कविता की जननी कहा जाता है। उनके कवितासंग्रहों ने डोगरी को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई।
इसके अलावा कर्ण सिंह, चंपा शर्मा, केसर सिंह, नीलम शर्मा, और जगतार सैनी जैसे रचनाकारों ने डोगरी गद्य, नाटक और कविता में नवीन प्रयोग किए।
इन लेखकों ने डोगरी में सामाजिक यथार्थ, लोकजीवन की संवेदना, स्त्री चेतना और प्रकृति की निकटता को विषय बनाया। उनके लेखन में पहाड़ी समाज की पीड़ा, संघर्ष और जीवन की सहजता का प्रामाणिक चित्रण मिलता है।
5. विषय-वस्तु और साहित्यिक प्रवृत्तियाँ
डोगरी साहित्य का विषय-विस्तार अत्यंत व्यापक है। इसमें लोकजीवन की परंपराएँ, सामाजिक परिवर्तन, पर्वतीय जीवन की कठिनाइयाँ, मातृभूमि के प्रति प्रेम, धार्मिक आस्था, स्त्री-सशक्तिकरण और मानवीय मूल्यों की अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
लोकगीतों की मधुरता और आधुनिक कविता की गहराई – दोनों ने मिलकर डोगरी साहित्य को संतुलित रूप से समृद्ध किया है।
डोगरी की कहानियाँ और नाटक समाज में व्याप्त अन्याय, असमानता और ग्रामीण जनजीवन की चुनौतियों को उजागर करते हैं, जबकि कविता में मानवीय भावनाओं का सूक्ष्म और कलात्मक चित्रण मिलता है।
समग्र रूप से देखा जाए तो डोगरी साहित्य ने लोकधारा से लेकर आधुनिक चेतना तक एक लम्बी यात्रा तय की है।
जहाँ इसकी जड़ें लोकगीतों और लोककथाओं में हैं, वहीं इसकी शाखाएँ आधुनिक कविता, कहानी और नाटक में फैल चुकी हैं।
डोगरी संस्था, राज्य की सांस्कृतिक अकादमी और अनेक साहित्यकारों के अथक प्रयासों ने इसे एक सशक्त, जीवंत और परिपक्व साहित्यिक परंपरा में परिवर्तित कर दिया है।
डोगरी साहित्य की विधागत रचनाएँ
डोगरी साहित्य अपने समृद्ध विषय-वस्तु, जीवंत भाषा-शैली और लोकसंवेदनशील अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है। समय के साथ इसमें अनेक साहित्यिक विधाओं का विकास हुआ — जिनमें कथा, उपन्यास, नाटक, निबंध, लोककथा, लोकगीत, अनुवाद, पत्र-पत्रिकाएँ तथा व्याकरण-कोश प्रमुख हैं। इन विधाओं ने न केवल डोगरी भाषा को अभिव्यक्ति का व्यापक माध्यम प्रदान किया, बल्कि डुग्गर क्षेत्र की सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक जीवन और मानवीय मूल्यों को भी सजीव रूप में प्रस्तुत किया।
डोगरी साहित्य का यह विधागत वैविध्य, आधुनिक साहित्यिक परंपरा का आधारस्तंभ है। जहाँ कथा और उपन्यास में समाज की वास्तविकता और परिवर्तन की छवियाँ उभरती हैं, वहीं नाटक और लोकसाहित्य में जनता की संस्कृति, हास्य-व्यंग्य और जीवन-संवेदना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। निबंध, गद्यरूपांतरण और व्याकरणिक कृतियाँ भाषा को वैचारिक और शैक्षणिक आधार देती हैं।
अतः कहा जा सकता है कि डोगरी साहित्य की विभिन्न विधाएँ मिलकर इस भाषा के साहित्यिक आकाश को पूर्णता प्रदान करती हैं। इनके अध्ययन से न केवल डोगरी की अभिव्यक्तिपरक शक्ति का आभास होता है, बल्कि डुग्गर की आत्मा का भी परिचय मिलता है। आगे इन्हीं विधाओं का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया गया है, जिससे डोगरी साहित्य की व्यापकता और गहराई को और स्पष्ट रूप से समझा जा सके।
कथा और उपन्यास
डोगरी साहित्य के आरंभिक काल में कविता की प्रबल परंपरा के साथ-साथ गद्य साहित्य का भी क्रमिक विकास हुआ। प्रारंभ में डोगरी साहित्य काव्य की आभा से आलोकित था, किंतु समय के साथ साहित्य के सशक्त माध्यम के रूप में गद्य की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। इसी दिशा में कुछ लेखकों ने अग्रणी भूमिका निभाई और कथा-साहित्य को एक ठोस स्वरूप प्रदान किया।
पद्य की सृजनधारा जहाँ हरिदत्त जैसे कवियों के प्रयासों से समृद्ध हुई, वहीं गद्य साहित्य के क्षेत्र में भगवत प्रसाद साठे ने कथा-लेखन को दिशा दी। उन्हें डोगरी गद्य साहित्य के आरंभिक और प्रमुख कथाकारों में गिना जाता है। उनके लेखन ने सामाजिक जीवन की सूक्ष्मताओं और मानवीय अनुभवों को सजीव रूप में प्रस्तुत किया।
समय के साथ डोगरी कहानी ने विविध विषयों और शिल्पों को अपनाया। आधुनिक डोगरी कथा-साहित्य में जीवन के यथार्थ, पारिवारिक संबंधों, सामाजिक विसंगतियों और मानवीय संघर्षों का सशक्त चित्रण मिलता है।
प्रमुख कहानी-संग्रह
डोगरी कथा-साहित्य में अनेक उल्लेखनीय कहानी-संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिन्होंने इस विधा को समृद्ध किया। इनमें से प्रमुख हैं —
- ‘कुड़ में दा लाहमा’ (समधियों का उलाहना) — भगवत प्रसाद साठे
- ‘सूई तागा’ — कुमारी ललिता महता
- ‘कीलें दियाँ लीकरां’ (कोयले की रेखाएँ) — नरेंद्र खजूरिया
- ‘खीरला मानु’ (अंतिम मानव) — मदन मोहन शर्मा
- ‘काले हथ’ (काले हाथ) — वेद राही
- ‘चाननी’ (चाँदनी) — मदन मोहन
- ‘पैरें दे नशान’ (पाँव के निशान) — रामकुमार अबरोल
- ‘रोचक कहानियाँ’ (बालसाहित्य) — नरेंद्र खजूरिया
- ‘फुल बनीगे ंोर’ (फूल बन गए अंगूर) — रामकुमार अबरोल
- ‘उच्चियाँ धारां’ (ऊँची पर्वतमालाएँ) — धर्मचंद्र प्रशांत
- ‘इक्की कहानियाँ’ — वेद राही द्वारा रचित, टैगोर की इक्कीस प्रसिद्ध कहानियों का डोगरी रूपांतर।
इन संग्रहों में डोगरी समाज के जीवन-मूल्य, ग्रामीण परिवेश, प्रेम, पीड़ा, विडंबना और लोकचेतना की विविध छवियाँ उभरती हैं।
प्रमुख उपन्यास
डोगरी उपन्यास विधा ने भी समय के साथ परिपक्वता प्राप्त की। आरंभिक उपन्यासकारों ने समाज की वास्तविकताओं, पारिवारिक संबंधों और नैतिक मूल्यों को कथानक का आधार बनाया। इनमें कुछ उल्लेखनीय कृतियाँ हैं —
- ‘शान्ते’ (सामाजिक उपन्यास) — नरेंद्र खजूरिया
- ‘धारां ते धूड़ां’ (पर्वतमालाएँ और धुंध) — मदन मोहन शर्मा
- ‘हाड़ बेड़ी दे पत्तप’ (सामाजिक) — वेद राही
- ‘रूकमणी’ — धर्मचंद्र प्रशांत
- ‘वादियाँ वीराने’ — ठाकुर पुंछी द्वारा रचित मूल उर्दू उपन्यास का डोगरी रूपांतर।
इन उपन्यासों में पर्वतीय जीवन की कठोरता, सामाजिक जटिलता, स्त्री जीवन की संवेदनाएँ और बदलते मूल्यों का सजीव चित्रण किया गया है। डोगरी उपन्यास ने अपनी विषयवस्तु और शिल्प दोनों के माध्यम से क्षेत्रीय यथार्थ को सार्वभौमिक संवेदनाओं से जोड़ने का कार्य किया है।
नाटक
डोगरी साहित्य के विकास में नाट्यकला का योगदान भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है। प्रारंभिक काल में डुग्गर क्षेत्र के रंगमंच की परंपरा सीमित रूप से धार्मिक प्रस्तुतियों, विशेषतः रामायण के वार्षिक मंचन तक ही सीमित थी। यह परंपरा लंबे समय तक सामाजिक और धार्मिक उत्सवों का अंग रही। किंतु जब आधुनिक चेतना का प्रसार हुआ और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के नये माध्यम विकसित हुए, तब डोगरी नाट्य साहित्य ने भी एक नयी दिशा ग्रहण की।
इस नये सांस्कृतिक वातावरण में रंगमंच को सामाजिक संवाद का प्रभावी साधन बनाया गया। नयी परिस्थितियों और जनजीवन की जटिलताओं को अभिव्यक्त करने के लिए आधुनिक विषयवस्तु पर आधारित अनेक डोगरी नाटक रचे गए। इन नाटकों ने लोकजीवन, सामाजिक असमानताओं, ग्रामीण परिवेश और मानवीय संबंधों की सजीव झलक प्रस्तुत की।
प्रमुख नाटककार और नाट्य कृतियाँ
डोगरी नाट्य साहित्य की प्रमुख कृतियों में निम्नलिखित नाटक विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं —
- ‘नयाँ ग्राँ’ (नया गाँव) — रामनाथ शास्त्री, दीनू भाई और रामकुमार अबरोल द्वारा सह-लेखित; यह नाटक लगभग 50 बार मंचित हुआ और ग्रामीण जीवन की सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों को दर्शाता है।
- ‘सरपंच’ — दीनू भाई पंत द्वारा रचित एक ऐतिहासिक नाटक, जिसमें सत्ता, समाज और नेतृत्व के द्वंद्व को रूपायित किया गया है।
- ‘अस भाग जगाने आले आं’ — नरेंद्र खजूरिया की एक संवेदनशील रचना जो मानव-जीवन की नियति और संघर्षों को रेखांकित करती है।
- ‘देव का जन्म’ — धर्मचंद्र प्रशांत का पौराणिक नाटक, जिसमें धार्मिक आस्था और मानवीय मूल्यों का संयोजन देखने को मिलता है।
- ‘देहरी’ — रामकुमार अबरोल द्वारा रचित सामाजिक नाटक, जो पारिवारिक मूल्यों और नैतिक संघर्षों को अभिव्यक्त करता है।
- ‘धारें दे अत्थरूं’ — वेद राही का नाटक, जो समाज के आंतरिक भावों और संघर्षों की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
इन सभी नाटकों ने डोगरी रंगमंच को नई पहचान दी और यह प्रमाणित किया कि यह भाषा केवल गीतों और कविताओं तक सीमित नहीं, बल्कि विचार, विमर्श और सामाजिक चेतना की प्रभावी वाहक भी है।
निबंध और गद्य-रूपांतर
डोगरी साहित्य में निबंध-लेखन और गद्यात्मक अनुवाद का क्षेत्र अपेक्षाकृत बाद में विकसित हुआ, किंतु इसका साहित्यिक और बौद्धिक महत्त्व अत्यंत व्यापक है। इन रचनाओं के माध्यम से न केवल डोगरी भाषा की अभिव्यक्तिपूर्ण क्षमता का विस्तार हुआ, बल्कि भारतीय संस्कृति, दर्शन और साहित्य के विविध पक्षों का स्थानीय भाषिक संदर्भ में पुनर्पाठ भी हुआ।
प्रमुख निबंध-संग्रह और अनुवाद
- ‘त्रिवेणी’ — श्रीमती शक्ति शर्मा, एम.ए. तथा श्री श्यामलाल, बी.ए. द्वारा रचित एक साहित्यिक निबंध-संग्रह, जिसमें भाषा, संस्कृति और समाज से संबंधित विविध विषयों पर विचारोत्तेजक लेख संकलित हैं।
- ‘बाल भागवत’ — श्रीमती शक्ति शर्मा और श्री श्यामलाल का संयुक्त अनुवाद, जो धार्मिक शिक्षाओं को बालपाठकों के स्तर पर सरल भाषा में प्रस्तुत करता है।
- ‘पंचतंत्र’ — श्री अनंतराम शास्त्री द्वारा संक्षिप्त अनुवादित, जिसमें नीति-कथाओं की रोचक शैली बरकरार रखी गई है।
- ‘गीता’ — श्री गौरीशंकर द्वारा डोगरी में अनूदित, जो आध्यात्मिकता और कर्मयोग के संदेश को स्थानीय अभिव्यक्ति प्रदान करता है।
- ‘दुर्गा सप्तशती’ — स्वर्गीय श्री कृपाराम शास्त्री का मूल सहित डोगरी अनुवाद, जो धार्मिक ग्रंथों के स्थानीय भाषायी रूपांतरण का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इन कृतियों के माध्यम से डोगरी न केवल साहित्यिक भाषा के रूप में विकसित हुई, बल्कि उसने दार्शनिक और धार्मिक विमर्श के लिए भी स्वयं को सक्षम सिद्ध किया।
व्याकरण और कोश निर्माण
किसी भी भाषा के सुदृढ़ विकास के लिए व्याकरण और शब्दकोश की रचना अत्यावश्यक मानी जाती है। डोगरी भाषा में भी इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास हुए हैं, जिन्होंने इसे एक संगठित भाषाई स्वरूप प्रदान किया।
प्रमुख व्याकरण और कोश-रचनाएँ
- ‘डोगरी कहावत कोश’ — श्री तारा स्मैलपुरी द्वारा संकलित, जिसमें डोगरी लोकजीवन में प्रचलित कहावतों का संग्रह है; यह ग्रंथ डोगरी समाज की बुद्धि, व्यंग्य और लोक-प्रज्ञा को अभिव्यक्त करता है।
- ‘डोगरी भाषा और व्याकरण’ — श्री बंसीलाल गुप्त की अप्रकाशित रचना, जो डोगरी व्याकरणिक संरचना, वाक्यविन्यास और शब्द-रचना की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
इन व्याकरणिक और कोशीय प्रयासों ने डोगरी को भाषिक दृष्टि से समृद्ध बनाया और इसके शुद्ध लेखन तथा शिक्षण के लिए आधार प्रदान किया।
लोकसाहित्य (Folk Literature)
डोगरी लोक साहित्य में जीवन की सादगी, लोक परंपराओं की गहराई और जनमानस की भावनाओं का अद्भुत संगम दिखाई देता है। लोककथाएँ, लोकगीत, धार्मिक आख्यान और लोकगाथाएँ — सभी ने डोगरी संस्कृति को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस परंपरा को संगठित रूप में प्रस्तुत करने के लिए अनेक संकलन और संपादित ग्रंथ प्रकाशित हुए, जिनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित कृतियाँ उल्लेखनीय हैं —
लोककथाएँ एवं लोककाव्य:
- डोगरी लोक कत्थां — (तबी प्रकाशन, नई दिल्ली) संपादक: श्री बंसीलाल गुप्त एम.ए.
- इक हा राजा — (लोककथाएँ) डोगरी संस्था, जम्मू; संपादक: रामनाथ शास्त्री
- अमर बलिदान — (लोक काव्यात्मक गाथा का गद्यरूप)
लोकगीत एवं लोकधर्म:
- खारे मिट्ठे अत्थरूं — (लोकगीत संग्रह) संपादक: सुशीला सलाथिया
- Sunshine and Shadow — (लोकगीतों का अंग्रेज़ी संकलन) लेखक: डॉ. कर्ण सिंह
- नमियाँ पौंगराँ — (धर्मस्थानों की लोककथाएँ) डोगरी मंउल, जम्मू
इन लोकग्रंथों में डोगरी जनजीवन, प्रेम, करुणा, वीरता, आस्था, और हास्य जैसे विविध भावों की सजीव अभिव्यक्ति मिलती है।
पत्र-पत्रिकाएँ (Magazines & Journals)
डोगरी साहित्य के प्रचार-प्रसार में समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं ने भी अहम भूमिका निभाई —
- नई चेतना (त्रैमासिक): केवल चार अंक प्रकाशित हुए।
- रेखा (द्विमासिक): चार अंक प्रकाशित हो चुके हैं।
इन पत्रिकाओं ने डोगरी भाषा के नवोदित लेखकों और कवियों को अपनी अभिव्यक्ति का मंच प्रदान किया।
फुटकल रचनाएँ (Miscellaneous Works):
डोगरी साहित्य के विविध आयामों को और भी गहराई से समझाने के लिए अनेक छोटी पुस्तिकाएँ और परिचयात्मक ग्रंथ भी रचे गए —
- जगदियाँ जोताँ — (उर्दू): डोगरी कवियों का परिचय
- डोगरी भाषा — (16 पृष्ठों की पुस्तिका) लेखक: ठा॰ रघुनाथ सिंह
- ई॰ 1857 — (प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित कविताएँ)
- अलमस्त की चार काव्य पुस्तिकाएँ
- सपोलिया की चार काव्य पुस्तिकाएँ
इसके अतिरिक्त —
- जम्मू प्रांत के तीन कॉलेजों की पत्रिकाएँ — तवी, त्रिकुरा तथा द्विगर्त के डोगरी विभागों द्वारा प्रकाशित हुईं।
- शिक्षा विभाग ने प्राइमरी कक्षाओं के लिए चार डोगरी रीडर प्रकाशित किए — संपादक: श्री रामनाथ शास्त्री।
कुल मिलाकर, डोगरी भाषा और उसका लोकसाहित्य — दोनों ही जम्मू-डुग्गर क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा के प्रतीक हैं। इसमें जनजीवन की मधुरता, लोकविश्वासों की गहराई और हिमालयी पर्वतीय संस्कृति की आत्मीयता समाहित है। डोगरी की अपनी विशिष्ट लिपि, समृद्ध व्याकरण और ध्वन्यात्मक सौंदर्य है। संस्कृत, फ़ारसी और पंजाबी जैसी भाषाओं के प्रभाव के बावजूद इसने अपनी मौलिकता और जीवंत परंपरा को सुरक्षित रखा है — यही इसकी सबसे बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धि है।
डोगरी की सांस्कृतिक और सामाजिक भूमिका
डोगरी भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि डोगरा संस्कृति का संवाहक है। डोगरा लोकगीत, नृत्य, और लोककला इस भाषा के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी संचारित हुए हैं।
जम्मू के धार्मिक मेले, विवाह गीत, लोककथाएँ और रीति-रिवाज डोगरी के बिना अधूरे हैं। यह भाषा क्षेत्रीय एकता और सांस्कृतिक पहचान को सशक्त करती है।
डोगरी भाषा की वर्तमान स्थिति
आज डोगरी भाषा भारतीय संविधान की मान्यता प्राप्त एक प्रमुख भाषा है। यह विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षण माध्यम के रूप में भी शामिल की जा चुकी है।
जम्मू विश्वविद्यालय, डोगरी अनुसंधान केंद्र, और डोगरी अकादमी जैसे संस्थान इसके अध्ययन और संरक्षण में कार्यरत हैं।
साथ ही, आधुनिक समय में डोगरी भाषा ने रेडियो, टेलीविजन, थिएटर और सिनेमा के माध्यम से भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
भविष्य की संभावनाएँ
डोगरी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए निम्न प्रयास आवश्यक हैं —
- विद्यालय स्तर पर अनिवार्य शिक्षण
- साहित्यिक कृतियों का अनुवाद और प्रकाशन
- डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रचार
- डोगरी में फिल्म, संगीत और थिएटर को प्रोत्साहन
यदि इन दिशा-निर्देशों पर कार्य किया जाए, तो डोगरी न केवल अपने क्षेत्रीय स्वरूप में बल्कि राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर भी एक जीवंत और समृद्ध भाषा के रूप में स्थापित हो सकती है।
निष्कर्ष
डोगरी भाषा केवल जम्मू-कश्मीर की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत की भाषाई विरासत का गौरवशाली हिस्सा है। यह भाषा संस्कृत की परंपरा, फारसी की मधुरता और पंजाबी की जीवंतता का अद्भुत संगम है।
टाकरी लिपि की प्राचीनता, देवनागरी में उसकी आधुनिकता, और साहित्यिक चेतना की समृद्ध परंपरा — ये सब मिलकर डोगरी को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं।
आज आवश्यकता है कि हम इस भाषा के संरक्षण, शिक्षण और प्रचार में सक्रिय भागीदारी करें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी डोगरी की इस अनमोल सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ी रहें।
इन्हें भी देखें –
- मराठी भाषा : उत्पत्ति, लिपि, बोली, विकास, दिवस और सांस्कृतिक महत्त्व
- असमिया भाषा : असम की भाषा, इतिहास, विकास, लिपि, वर्णमाला और साहित्यिक परंपरा
- कन्नड़ भाषा : उत्पत्ति, इतिहास, लिपि, वर्णमाला, शब्द, वाक्य और साहित्य
- कोंकणी भाषा : इतिहास, विकास, लिपि, वर्णमाला, शब्द-संरचना, वाक्य-रचना और साहित्यिक विरासत
- संस्कृत भाषा : इतिहास, उत्पत्ति, विकास, व्याकरण, लिपि और महत्व
- नेपाली भाषा : उत्पत्ति, विकास, लिपि, वर्णमाला, दिवस और साहित्य
- संथाली भाषा : इतिहास, विकास, लिपि, वर्णमाला, साहित्य एवं सांस्कृतिक महत्व
- भारत की शास्त्रीय भाषाएँ : भाषाई विरासत, मानदंड, विकास और महत्व