भारत की भाषिक विविधता अद्वितीय है। यहाँ विभिन्न क्षेत्रों में अनेक भाषाएँ और उपभाषाएँ प्रचलित हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व है। उत्तर-पूर्व भारत की इसी भाषिक परंपरा में मणिपुरी या मैतेई भाषा एक प्रमुख स्थान रखती है। यह भाषा न केवल मणिपुर राज्य की राजभाषा है, बल्कि भारत के संविधान की 22 अनुसूचित भाषाओं में भी शामिल है।
मणिपुरी भाषा मणिपुर के मैतेई समुदाय की मातृभाषा है, जिसे असम, त्रिपुरा, मेघालय और पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्रों में भी बोला जाता है। भारत के बाहर, म्यान्मार (बर्मा) और बांग्लादेश के कुछ इलाकों में भी इसके वक्ता पाए जाते हैं। यह भाषा चीनी-तिब्बती भाषा परिवार की तिब्बती-बर्मी शाखा से संबंधित है।
मणिपुरी (मेइतेइ) भाषा का परिचय
मणिपुरी या मेइतेइ भाषा पूर्वोत्तर भारत के राज्य मणिपुर की प्रमुख और आधिकारिक भाषा है। यह भाषा तिब्बती-बर्मन शाखा के अंतर्गत आती है और सिनो-तिब्बती भाषा परिवार की सदस्य है। मणिपुरी भाषा न केवल मणिपुर राज्य में, बल्कि असम, त्रिपुरा, मिज़ोरम और बांग्लादेश के कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों में भी बोली जाती है।
इस भाषा की अपनी विशिष्ट लिपि है — मीतै मयेक (Meitei Mayek) — जिसका प्रयोग प्राचीन काल से होता आया है। यद्यपि औपनिवेशिक काल में बांग्ला लिपि का प्रभाव बढ़ा, परंतु 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में मीतै मयेक लिपि का पुनरुत्थान हुआ और आज यह पुनः व्यापक रूप से प्रयुक्त हो रही है।
मणिपुरी भाषा की ध्वन्यात्मक प्रणाली अत्यंत मधुर है तथा इसमें स्वर और व्यंजन ध्वनियों का संतुलित संयोजन मिलता है। इसकी शब्दावली में संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेज़ी के अनेक शब्द समाहित हुए हैं, परंतु इसके मूल व्याकरण और अभिव्यक्ति शैली में अब भी स्थानीय स्वरूप की सजीवता विद्यमान है।
वर्तमान में मणिपुरी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान प्राप्त है, और इसे भारत की शास्त्रीय भाषाओं में से एक के रूप में सांस्कृतिक, शैक्षणिक तथा प्रशासनिक स्तर पर सम्मानजनक दर्जा प्राप्त है। यह भाषा मणिपुर की लोकसंस्कृति, नृत्य, संगीत, तथा धार्मिक परंपराओं की आत्मा को अभिव्यक्त करती है — और इसीलिए इसे “मणिपुर की सांस्कृतिक ध्वनि” कहा जाता है।
मणिपुरी भाषा की मूल पहचान
| तत्व | विवरण |
|---|---|
| भाषा का नाम | मणिपुरी / मैतेई |
| लिपि | मीतै मयेक (मीतै लिपि) |
| भाषा परिवार | चीनी-तिब्बती → तिब्बती-बर्मी |
| बोली क्षेत्र | मणिपुर, असम, त्रिपुरा, बंगाल |
| वक्ताओं की संख्या | लगभग 33 लाख |
| आधिकारिक भाषा | मणिपुर राज्य |
| भाषा दिवस | 20 अगस्त (1992 से) |
मणिपुरी भाषा बोलने वालों की संख्या लगभग 33 लाख है, जिनमें से लगभग 16 लाख लोग मणिपुरी मूल के हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 7 लाख नागा और कुकी जनजातियाँ इसे संपर्क भाषा के रूप में उपयोग करती हैं। भारत के अन्य भागों में तथा म्यान्मार और बांग्लादेश में भी इस भाषा के लाखों वक्ता हैं।
मणिपुर भाषा: भाषिक और सांस्कृतिक महत्व
मणिपुरी भाषा केवल एक संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि मैतेई समाज की संस्कृति, परंपरा और इतिहास की वाहक है। इसकी अपनी समृद्ध मौखिक परंपरा, लोकगीत, नृत्य, लोककथाएँ और धार्मिक ग्रंथ हैं। प्रसिद्ध मणिपुरी नृत्य, जो संपूर्ण भारत में अपनी लयात्मकता और सौंदर्य के लिए जाना जाता है, इसी भाषा और संस्कृति का अमूल्य अंश है।
यह भाषा मणिपुर की राजकीय भाषा होने के साथ-साथ, प्रशासन, शिक्षा, साहित्य और मीडिया में भी समान रूप से प्रयुक्त होती है।
मणिपुरी भाषा की उत्पत्ति और ऐतिहासिक विकास
मणिपुरी भाषा का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। इसका अस्तित्व 9वीं शताब्दी से माना जाता है, जब वर्तमान मणिपुर में मैतेई साम्राज्य की स्थापना हुई थी। उस काल में इस भाषा का प्रयोग दरबार, प्रशासन और धार्मिक ग्रंथों में भी किया जाता था।
मैतेई लोगों की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध रही है। उनके साहित्य, नाट्यकला और संगीत में मणिपुरी भाषा ने केंद्रीय भूमिका निभाई है। समय के साथ, यह भाषा संस्कृत, बंगाली, असमिया, और अंग्रेज़ी जैसी भाषाओं से संपर्क में आई और उनसे अनेक शब्द, ध्वनियाँ और व्याकरणिक संरचनाएँ अपनाईं।
प्राचीन काल (9वीं–15वीं शताब्दी)
इस काल में मणिपुरी भाषा का रूप अपेक्षाकृत शुद्ध और स्थानीय था। इसमें संस्कृत या बाहरी प्रभाव बहुत कम दिखाई देते हैं। इस युग के धार्मिक ग्रंथों और लोककथाओं में मणिपुरी की मौलिक संरचना स्पष्ट झलकती है।
मध्यकाल (15वीं–19वीं शताब्दी)
इस युग में मणिपुरी भाषा पर बंगाली और संस्कृत का प्रभाव बढ़ा। बंगाल और असम से संपर्क के कारण लिपि और शब्दावली में अनेक परिवर्तन हुए। इसी काल में मीतै मयेक लिपि का प्रयोग सुव्यवस्थित रूप में सामने आया।
आधुनिक काल (19वीं शताब्दी के बाद)
ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजी शिक्षा और प्रशासन के प्रसार के कारण मणिपुरी में अंग्रेज़ी शब्दों का भी समावेश हुआ। 20वीं शताब्दी में यह भाषा साहित्यिक रूप से परिपक्व हुई। कवि, नाटककार और उपन्यासकारों ने इसे आधुनिक विचारों के संप्रेषण का माध्यम बनाया।
भाषा परिवार और वर्गीकरण
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में मुख्य रूप से तीन भाषा-परिवार पाए जाते हैं —
- भारत-ईरानी (Indo-Iranian)
- चीनी-तिब्बती (Sino-Tibetan)
- आस्ट्रिक (Austric)
मणिपुरी या मैतेई भाषा साइनो-तिब्बती परिवार की तिब्बती-बर्मी उपशाखा के अंतर्गत आती है। यह वर्गीकरण इस बात को दर्शाता है कि इस भाषा की ध्वन्यात्मक और व्याकरणिक संरचना तिब्बती और बर्मी भाषाओं से समानता रखती है।
मणिपुरी भाषा का बोली क्षेत्र
मणिपुरी भाषा का भौगोलिक प्रसार अत्यंत व्यापक है।
- भारत में: यह मुख्य रूप से मणिपुर, असम, त्रिपुरा, और पश्चिम बंगाल में बोली जाती है।
- विदेशों में:
- म्यान्मार (बर्मा) के मंडले, यांगून और कलेम्यो क्षेत्रों में लगभग 4 लाख लोग मणिपुरी बोलते हैं।
- बांग्लादेश के ढाका और सिलहट जिलों में लगभग 1 लाख वक्ता पाए जाते हैं।
इस प्रकार कुल मिलाकर, यह भाषा भारत के बाहर भी दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी भाषिक उपस्थिति बनाए हुए है।
मणिपुरी भाषा की लिपि — मीतै मयेक
लिपि का परिचय
मणिपुरी भाषा को लिखने के लिए जिस लिपि का प्रयोग किया जाता है उसे मीतै मयेक (Meitei Mayek) कहा जाता है। यह मणिपुरी संस्कृति की आत्मा मानी जाती है। मीतै लिपि का विकास 15वीं शताब्दी में हुआ था, और यह आज भी प्रयोग में है।
लंबे समय तक इस भाषा को पूर्वी नागरी (बंगाली) लिपि में भी लिखा जाता रहा। परंतु 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मीतै मयेक को पुनः जीवित किया गया, और आज मणिपुर राज्य में शिक्षा तथा प्रशासन में इसी लिपि को अपनाया गया है।
मीतै मयेक लिपि की संरचना
मीतै लिपि में 15 मूल व्यंजन और 3 स्वतंत्र स्वर चिह्न हैं। इसके अतिरिक्त अन्य भारतीय लिपियों से लिए गए 9 अतिरिक्त चिह्न भी उपलब्ध हैं, जो संस्कृत और अन्य भाषाओं के शब्दों को लिखने के लिए प्रयुक्त होते हैं।
| घटक | संख्या | विवरण |
|---|---|---|
| व्यंजन | 15 | मूल व्यंजन |
| स्वर | 3 + मात्रा रूप | स्वतंत्र एवं मात्रा रूप स्वर |
| अतिरिक्त चिह्न | 9 | अन्य भारतीय भाषाओं के लिए |
| विशेष अक्षर (लोनसुम) | 8 | अक्षरान्त ध्वनियों के लिए |
प्रत्येक अक्षर का नाम शरीर के किसी अंग पर रखा गया है, जैसे —
- पहला अक्षर ‘क’ का नाम कोक (अर्थात ‘सिर’),
- दूसरा साम (अर्थात ‘बाल’),
- तीसरा लाइ (अर्थात ‘माथा’),
जो यह दर्शाता है कि भाषा और मानव जीवन में गहरा संबंध स्थापित किया गया है।
लोनसुम अक्षर (Final Consonants)
मीतै लिपि में ऐसे 8 विशेष अक्षर हैं जिन्हें “लोनसुम” कहा जाता है। ये वे व्यंजन हैं जो किसी शब्द या syllable के अंत में आते हैं, जैसे – प्, त्, क्, म्, न्, ङ्, ल् आदि। इन अक्षरों की उपस्थिति शब्दांश (syllable) की समाप्ति को सूचित करती है, जिससे भाषा का उच्चारण और लयात्मकता दोनों सुस्पष्ट होती हैं।
मीतै लिपि की विशेषताएँ
- स्वर संकेतों की विशिष्टता:
मीतै लिपि में केवल तीन स्वतंत्र स्वर (अ, इ, उ) के लिए अलग संकेत हैं। अन्य स्वरों (ए, ओ, ऐ, औ आदि) को ‘अ’ के ऊपर मात्रा लगाकर लिखा जाता है। - संयुक्ताक्षर प्रणाली का अभाव:
अधिकांश भारतीय लिपियों की भाँति मीतै मयेक में संयुक्ताक्षर नहीं बनते। दो या अधिक व्यंजनों के मिलने पर उनके रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता, जिससे लिखना सरल हो जाता है। - संयुक्त संकेत के लिए रेखा प्रयोग:
यदि स्वरविहीन व्यंजन किसी syllable के मध्य में आता है, तो उसके नीचे एक रेखा लगाई जाती है, जो संयुक्तता का संकेत देती है। - सिलैबलिक ध्वनि पर आधारित लेखन:
प्रत्येक अक्षर एक संपूर्ण syllable को निरूपित करता है। इसलिए मणिपुरी लेखन और उच्चारण के बीच घनिष्ठ समानता है। - संस्कृत वर्णों की अनुपस्थिति:
छ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण जैसे संस्कृत ध्वनियों के लिए मूल रूप से संकेत नहीं हैं, क्योंकि मणिपुरी शब्दों में इन ध्वनियों का प्रयोग नहीं होता। परंतु यूनिकोड-6 में विस्तार के बाद ये वर्ण अब शामिल किए गए हैं ताकि संस्कृत या भारतीय भाषाओं के शब्द लिखे जा सकें।
मीतै मयेक की यूनिकोड पहचान
मीतै मयेक लिपि को Unicode Standard में सम्मिलित किया गया है। इसके लिए Unicode Block “Meetei Mayek” को U+ABC0 – U+ABFF तथा “Meetei Mayek Extensions” को U+AAE0 – U+AAFF के रूप में निर्दिष्ट किया गया है।
इससे इस लिपि में डिजिटल लेखन, टाइपिंग और प्रकाशन संभव हुआ है।
भाषिक संरचना और व्याकरण
मणिपुरी भाषा की व्याकरणिक रचना अग्लूटिनेटिव (Agglutinative) है, अर्थात् इसमें शब्दों को विभिन्न प्रत्ययों के माध्यम से रूपांतरित किया जाता है। प्रत्येक प्रत्यय का एक विशिष्ट अर्थ होता है।
ध्वनि संरचना
इस भाषा में स्वर और व्यंजन का संयोजन अपेक्षाकृत सरल है। व्यंजन समूहों की संख्या सीमित है और उच्चारण में लयात्मकता विद्यमान है।
शब्द निर्माण
शब्द मूलतः एक या दो अक्षरों वाले होते हैं। संयोजन और उपसर्ग–प्रत्यय द्वारा नए शब्द बनाए जाते हैं।
वाक्य रचना
मणिपुरी भाषा का सामान्य वाक्य क्रम कर्ता–कर्म–क्रिया (SOV) होता है, जैसा कि अधिकांश भारतीय भाषाओं में पाया जाता है।
संख्याएँ और सर्वनाम
संख्याओं के लिए विशिष्ट मूल शब्द हैं। सर्वनामों में लिंग का भेद नहीं होता, परंतु संख्या और संबोधन के अनुसार परिवर्तन होता है।
मीतै मयेक वर्णमाला का चार्ट (यूनिकोड उदाहरण सहित)
मीतै मयेक या मीतै लिपि (ꯃꯤꯇꯩ ꯃꯌꯦꯛ / Meetei Mayek) मणिपुरी भाषा की मौलिक लिपि है। इस लिपि के अक्षरों को यूनिकोड मानक में शामिल किया गया है, ताकि इसे डिजिटल रूप में भी प्रयोग किया जा सके। प्रत्येक वर्ण का नाम मानव शरीर के किसी अंग से लिया गया है — जो मणिपुरी संस्कृति के दार्शनिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
स्वर (Vowels / Iyek Ipee)
| क्रम | वर्ण | नाम (शरीर अंग से संबंधित) | यूनिकोड | उच्चारण |
|---|---|---|---|---|
| 1 | ꯑ | A (अ) | U+ABD1 | अ |
| 2 | ꯢ | I (इ) | U+ABE2 | इ |
| 3 | ꯨ | U (उ) | U+ABE8 | उ |
अन्य स्वरों — ए, ओ, ऐ, औ — को ‘अ’ के ऊपर मात्रा रूप लगाकर लिखा जाता है।
व्यंजन (Consonants / Iyek Iyekpa)
| क्रम | वर्ण | नाम | अर्थ / प्रतीकात्मक अर्थ | यूनिकोड | उच्चारण |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | ꯀ | Kok | सिर (Head) | U+ABC0 | क |
| 2 | ꯁ | Sam | बाल (Hair) | U+ABC1 | स |
| 3 | ꯂ | Lai | माथा (Forehead) | U+ABC2 | ल |
| 4 | ꯃ | Mit | आँख (Eye) | U+ABC3 | म |
| 5 | ꯄ | Pa | नाक (Nose) | U+ABC4 | प |
| 6 | ꯅ | Na | जीभ (Tongue) | U+ABC5 | न |
| 7 | ꯆ | Chil | दाँत (Teeth) | U+ABC6 | च |
| 8 | ꯇ | Til | मुँह (Mouth) | U+ABC7 | त |
| 9 | ꯈ | Khom | गला (Throat) | U+ABC8 | ख |
| 10 | ꯉ | Ngou | छाती (Chest) | U+ABC9 | ङ |
| 11 | ꯊ | Thou | हृदय (Heart) | U+ABCA | थ |
| 12 | ꯋ | Wai | पेट (Abdomen) | U+ABCB | व |
| 13 | ꯌ | Yang | हाथ (Hand) | U+ABCC | य |
| 14 | ꯍ | Huk | पैर (Leg) | U+ABCD | ह |
| 15 | ꯎ | Un | शरीर (Body) | U+ABCE | उ / ऊ |
मात्राएँ (Matras / Cheitap Iyek)
| स्वर | मात्रा-चिह्न | उदाहरण | यूनिकोड |
|---|---|---|---|
| अ | — | ꯀ (ka) | — |
| आ | ꯥ | ꯀꯥ (kā) | U+ABE5 |
| इ | ꯤ | ꯀꯤ (ki) | U+ABE4 |
| ई | ꯩ | ꯀꯩ (kī) | U+ABE9 |
| उ | ꯨ | ꯀꯨ (ku) | U+ABE8 |
| ऊ | ꯩꯨ | ꯀꯩꯨ (kū) | संयुक्त |
| ए | ꯦ | ꯀꯦ (ke) | U+ABE6 |
| ओ | ꯧ | ꯀꯧ (ko) | U+ABE7 |
| औ | ꯩꯧ | ꯀꯩꯧ (kau) | संयुक्त |
विशेष अक्षर / लोनसुम (Final Consonant Signs)
ये अक्षर syllable के अंत में प्रयुक्त होते हैं और “स्वरविहीन व्यंजन” कहलाते हैं।
| क्रम | वर्ण | यूनिकोड | ध्वनि |
|---|---|---|---|
| 1 | ꯞ | U+ABD2 | क् |
| 2 | ꯠ | U+ABD3 | त् |
| 3 | ꯡ | U+ABD4 | ङ् |
| 4 | ꯣ | U+ABD5 | न् |
| 5 | ꯤ | U+ABD6 | म् |
| 6 | ꯥ | U+ABD7 | ल् |
| 7 | ꯦ | U+ABD8 | प् |
| 8 | ꯧ | U+ABD9 | ह् |
यूनिकोड ब्लॉक्स
| नाम | यूनिकोड रेंज | विवरण |
|---|---|---|
| Meetei Mayek | U+ABC0 – U+ABFF | मुख्य वर्णमाला |
| Meetei Mayek Extensions | U+AAE0 – U+AAFF | विस्तारित वर्ण |
| Meetei Mayek Digits | U+ABF0 – U+ABF9 | अंकों (0–9) के लिए संकेत |
मीतै मयेक अंकों का चार्ट
| अंक | प्रतीक | यूनिकोड |
|---|---|---|
| 0 | ꯰ | U+ABF0 |
| 1 | ꯱ | U+ABF1 |
| 2 | ꯲ | U+ABF2 |
| 3 | ꯳ | U+ABF3 |
| 4 | ꯴ | U+ABF4 |
| 5 | ꯵ | U+ABF5 |
| 6 | ꯶ | U+ABF6 |
| 7 | ꯷ | U+ABF7 |
| 8 | ꯸ | U+ABF8 |
| 9 | ꯹ | U+ABF9 |
उदाहरण लेखन
हिंदी शब्द: मणिपुर
मीतै मयेक में: ꯃꯅꯤꯄꯨꯔ (Manipur)
अर्थ: यह लिपि syllabic है — प्रत्येक वर्ण एक पूर्ण ध्वनि इकाई (syllable) को दर्शाता है, जिससे उच्चारण सरल और सटीक होता है।
मीतै मयेक लिपि न केवल लेखन का साधन है, बल्कि मणिपुरी पहचान, संस्कृति और परंपरा का प्रतीक भी है। इसकी विशेषताओं — जैसे संयुक्ताक्षरों का अभाव, स्पष्ट स्वर संकेत, और शरीर अंगों से जुड़े अक्षर नाम — इसे भारतीय लिपियों में अद्वितीय बनाते हैं।
Unicode में इसके समावेश ने इसे डिजिटल और वैश्विक स्तर पर पुनर्जीवित किया है।
मणिपुरी भाषा और साहित्य
मणिपुरी (मेइतेइ) भाषा न केवल मणिपुर राज्य की राजभाषा है, बल्कि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख आधार भी है। इस भाषा का साहित्यिक इतिहास अत्यंत प्राचीन एवं समृद्ध है। उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार मणिपुरी साहित्य का लिखित स्वरूप लगभग 8वीं शताब्दी से प्राप्त होता है। प्राचीन काल के ग्रंथों में धार्मिक आख्यान, लोकगीत, वीरगाथाएँ और नृत्यगीत प्रमुखता से मिलते हैं, जो मणिपुर के सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन की झलक प्रस्तुत करते हैं।
मध्यकालीन मणिपुरी साहित्य में वैष्णव भक्ति आंदोलन का प्रभाव गहराई से देखा जा सकता है। इस युग में कविता, नाटक और इतिहास–आधारित ग्रंथों की सृजनधारा फली–फूली। प्रसिद्ध प्राचीन ग्रंथ जैसे ‘चैथारोल कुम्बा’, ‘पुइया’ और ‘लैम्बु तांगखा’ न केवल साहित्यिक दृष्टि से मूल्यवान हैं, बल्कि मणिपुर के इतिहास और सामाजिक संरचना के अध्ययन में भी महत्त्वपूर्ण हैं।
मणिपुरी साहित्य का विकास एवं प्रमुख रचनाएँ
आधुनिक मणिपुरी साहित्य की यात्रा का आरंभ 1924 में फाल्गुनी सिंह द्वारा प्रकाशित द्बिभाषिक सामयिकी “जागरन” से माना जाता है। इसके पश्चात् मेखली (1933), मणिपुरी (1938) तथा क्षत्रियज्योति (1944) जैसी पत्रिकाओं ने साहित्यिक अभिव्यक्ति के नए द्वार खोले। आधुनिक काल में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, प्रवास-वर्णन और जीवनचरित जैसी विविध विधाओं में मणिपुरी साहित्य ने उल्लेखनीय प्रगति की है।
मणिपुरी साहित्य की विशेषता यह है कि इसमें वैष्णव भक्ति, लोकसंस्कृति, तथा मणिपुर के पारंपरिक नृत्य और संगीत की आत्मा झलकती है। 1973 से अब तक 31 मणिपुरी साहित्यकारों को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है, जो इस भाषा की सृजनात्मक समृद्धि का प्रमाण है।
कुछ प्रसिद्ध लेखक और उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं —
- अध्यापक रनजित सिंह — कनाक केथक (शौर कविता), चिकारी बागेय (कविता), थाम्पाल (कविता), निङसिङ निरले (जीवनचरित), नियति (कविता), बाहानार परान (शौर कविता), भानुबिल कृषकप्रजा आन्दोलन बारोह बिष्णुप्रिया मनिपुरी समाज (गवेषणा)
- अंजन सिंह — कुमपागा (यारि)
- शुभाशिस समीर — छेयाठइगिर यादु (कविता), नुया करे चिनुरि मेयेक (कविता), सेनातम्बीर आमुनिगत्त सेम्पाकहान पड़िल अदिन (कविता)
- राधाकान्त सिंह — ज्बीर मेरिक (कविता), रसमानजुरी (एला)
इसके अतिरिक्त, मखोनमनी मोंड्साबा, जोड़ छी सनसम, क्षेत्री वीर, एम. एन. किशोर सिंह जैसे लेखक भी मणिपुरी साहित्य जगत के सम्मानित नाम हैं, जिनकी रचनाओं ने भाषा के साहित्यिक परिदृश्य को सशक्त बनाया।
मणिपुरी भाषा और साहित्य, दोनों ही इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के अभिन्न अंग हैं। इसकी रचनाएँ न केवल धार्मिक और सामाजिक चेतना को प्रतिबिंबित करती हैं, बल्कि मणिपुर की कलात्मक आत्मा का भी दर्पण हैं। वर्तमान समय में, यद्यपि यह भाषा कुछ चुनौतियों का सामना कर रही है, फिर भी इसे संरक्षित और प्रोत्साहित करने के निरंतर प्रयास जारी हैं। इस प्रकार मणिपुरी भाषा आने वाली पीढ़ियों के लिए मणिपुर की पहचान, इतिहास और संस्कृति की जीवंत कड़ी बनी रहेगी।
मणिपुरी भाषा दिवस
मणिपुरी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 20 अगस्त 1992 को सम्मिलित किया गया था। इसी उपलक्ष्य में 20 अगस्त को ‘मणिपुरी भाषा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। यह दिन मणिपुरी समुदाय की भाषिक अस्मिता और गौरव का प्रतीक है।
लिपि और भाषा के पुनरुत्थान का आंदोलन
1950 के दशक में मणिपुर के बुद्धिजीवियों ने मीतै मयेक लिपि के पुनर्जीवन का आंदोलन आरंभ किया। स्कूलों, विश्वविद्यालयों और प्रशासनिक संस्थानों में इस लिपि को पुनः अपनाने की माँग की गई।
1970 के दशक में सरकार ने इस लिपि को शिक्षा प्रणाली में पुनः लागू करने का निर्णय लिया, और आज यह राज्य के अधिकांश विद्यालयों में पढ़ाई जाती है।
मणिपुरी भाषा का आधुनिक स्वरूप
आज मणिपुरी भाषा तकनीकी और डिजिटल युग के अनुरूप ढल चुकी है। Unicode और कंप्यूटर फॉन्ट्स के माध्यम से यह इंटरनेट, समाचार माध्यमों, फिल्मों और शैक्षणिक कार्यों में प्रयोग की जा रही है।
मणिपुरी में प्रकाशित समाचार पत्र, पत्रिकाएँ, तथा रेडियो–टीवी प्रसारण भाषा के प्रसार में सहायक हैं।
मणिपुरी भाषा की विशिष्टताएँ
- यह भारत की 22 अनुसूचित भाषाओं में से एक है।
- यह मणिपुर राज्य की राजभाषा है।
- इसमें स्वर और व्यंजन के स्पष्ट और स्थिर उच्चारण हैं।
- संयुक्ताक्षर रहित लिपि इसे अत्यंत सुगम और सीखने योग्य बनाती है।
- प्रत्येक अक्षर का नाम मानव शरीर के अंग से संबंधित है — जो भाषिक दर्शन का अनोखा उदाहरण है।
- यह भाषा साहित्य, नृत्य, संगीत और धार्मिक परंपराओं में गहराई से जुड़ी हुई है।
निष्कर्ष
मणिपुरी या मैतेई भाषा केवल उत्तर-पूर्व भारत की एक भाषा नहीं, बल्कि एक संस्कृति, पहचान और परंपरा का प्रतीक है। इसकी अपनी लिपि, व्याकरण, ध्वनि-संरचना और समृद्ध साहित्य इसे भारतीय भाषाओं की विशिष्ट श्रृंखला में स्थापित करते हैं।
मीतै मयेक लिपि के पुनरुत्थान ने इस भाषा को पुनः गौरव प्रदान किया है। आज जब वैश्वीकरण के युग में अनेक स्थानीय भाषाएँ लुप्त हो रही हैं, मणिपुरी भाषा अपनी जीवंतता, सांस्कृतिक गहराई और भाषिक सौंदर्य के कारण स्थायित्व की ओर अग्रसर है।
मणिपुरी भाषा भारतीय भाषिक एकता का एक जीवंत उदाहरण है, जो यह दर्शाती है कि विविधता में ही भारत की वास्तविक शक्ति निहित है।
इन्हें भी देखें –
- डोगरी भाषा : इतिहास, विकास, लिपि, वर्णमाला, बोलियाँ और साहित्यिक परंपरा
- संस्कृत भाषा : इतिहास, उत्पत्ति, विकास, व्याकरण, लिपि और महत्व
- नेपाली भाषा : उत्पत्ति, विकास, लिपि, वर्णमाला, दिवस और साहित्य
- तमिल भाषा : तमिलनाडु की भाषा, उत्पत्ति, विकास, लिपि, वर्णमाला, इतिहास और वैश्विक महत्व
- उर्दू भाषा : इतिहास, लिपि, वर्णमाला, शब्द, वाक्य, विकास और वैश्विक महत्व
- काव्य के सौन्दर्य तत्व: प्रयोजन, उल्लास और आधुनिक संदर्भों में उनकी प्रासंगिकता
- महाकाव्य : स्वरूप, परिभाषा, लक्षण, तत्व, विकास एवं उदाहरण
- खंडकाव्य : परिभाषा, स्वरूप, प्रेरणा, तत्व, गुण, विशेषताएँ, उदाहरण और महाकाव्य से भिन्नता
- गीति काव्य, प्रगीत, गेय मुक्तक और आख्यानक गीतियाँ
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