भोजपुरी भाषा : इतिहास, विकास, लिपि, क्षेत्र, साहित्य और विशेषताएँ

भारत की भाषाई विविधता विश्व में अद्वितीय है। उत्तर भारत के पूर्वी भाग में बोली जाने वाली भोजपुरी इस विविधता का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। यह केवल एक बोली नहीं, बल्कि एक सजीव सांस्कृतिक परंपरा, लोक-साहित्य और सामाजिक चेतना की वाहक भाषा है। भोजपुरी की मिठास, सहजता और भावप्रवणता ने इसे जनमानस की भाषा बना दिया है। भोजपुरी की पहचान केवल उत्तर प्रदेश और बिहार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी गूंज मॉरीशस, सूरीनाम, नेपाल, त्रिनिदाद और टोबैगो जैसे देशों में भी सुनाई देती है।

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भोजपुरी भाषा का परिचय

भोजपुरी उत्तर भारत की एक प्रमुख आर्यभाषा है, जो मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग तथा बिहार के पश्चिमी भाग में बोली जाती है। यह पूर्वी हिन्दी की एक शाखा मानी जाती है, किंतु अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता, शब्दावली, व्याकरणिक संरचना और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के कारण इसे स्वतंत्र भाषा के रूप में भी देखा जाता है।

भोजपुरी भाषा की विशेषता इसकी सहजता, मधुरता और भावाभिव्यक्ति की स्वाभाविक प्रवाहिता में निहित है। यह भाषा लोकजीवन के बहुत निकट है और इसकी जड़ें गाँव-गाँव के लोकगीतों, कहावतों, लोककथाओं और लोकनाट्यों में गहराई तक फैली हुई हैं।

भोजपुरी भाषा का प्रयोग केवल दैनिक जीवन या लोकगीतों तक सीमित नहीं, बल्कि यह साहित्य, रंगमंच, सिनेमा और आधुनिक संचार माध्यमों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। भोजपुरी सिनेमा, जिसे प्रेमपूर्वक भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री कहा जाता है, ने इस भाषा को वैश्विक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई है।

आज भोजपुरी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि यह भारतीय जनजीवन की आत्मा की भाषा बन चुकी है — जो लोकसंस्कृति, परंपरा और आधुनिकता का जीवंत संगम प्रस्तुत करती है।

भोजपुरी का उद्गम

भोजपुरी भाषा का उद्गम संस्कृत भाषा से हुआ है। आचार्य हवलदार त्रिपाठी ‘सह्मदय’ ने अपने दीर्घकालिक अनुसंधान के आधार पर यह निष्कर्ष दिया कि भोजपुरी मूलतः संस्कृत से ही निकली भाषा है। उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ “व्युत्पत्ति मूलक भोजपुरी की धातु और क्रियाएँ” में उन्होंने सात सौ इकसठ (761) धातुओं की खोज की, जिनका वैज्ञानिक निर्माण पाणिनीय व्याकरण के सूत्रों के अनुरूप है। यह तथ्य दर्शाता है कि भोजपुरी एक अत्यंत वैज्ञानिक, व्याकरणिक और व्यवस्थित भाषा है।

भोजपुरी और संस्कृत के बीच समानता केवल धातु और क्रिया के स्तर पर ही नहीं, बल्कि ध्वनि-संरचना, वाक्य-विन्यास और शब्द-व्युत्पत्ति में भी दृष्टिगोचर होती है। इस प्रकार भोजपुरी को संस्कृत की निकटतम उत्तराधिकारिणी भाषा कहा जा सकता है, जो आज भी अपनी मौलिकता को बनाए हुए है।

संस्कृत से उत्पन्न भोजपुरी (Origin of Bhojpuri from Sanskrit)

भोजपुरी भाषा की उत्पत्ति और विकास के अध्ययन में यह तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इसका मूल स्रोत संस्कृत भाषा ही रही है। इस संबंध में आचार्य हवलदार त्रिपाठी “सहृदय” द्वारा किए गए विस्तृत अनुसंधान ने इस मत को और अधिक सशक्त प्रमाणित किया है। उन्होंने अपने महत्वपूर्ण कोश–ग्रन्थ ‘व्युत्पत्ति मूलक भोजपुरी की धातु और क्रियाएँ’ में दीर्घकालीन अन्वेषण के उपरांत यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि भोजपुरी भाषा की संरचना प्रत्यक्ष रूप से संस्कृत धातुओं और व्याकरणिक नियमों से विकसित हुई है।

आचार्य त्रिपाठी के इस शोध-ग्रन्थ में 761 धातुओं की पहचान की गई है, जिनका क्रम “ढ़” वर्ण तक विस्तारित है। इन धातुओं के निर्माण में पाणिनि के व्याकरण सूत्रों का अक्षरशः अनुपालन देखा जाता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि भोजपुरी की शब्दरचना किसी लोकसुलभ या अपभ्रंश परंपरा की उपज मात्र नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित व्याकरणिक परंपरा की उत्तराधिकारी है।

इस ग्रंथ में संस्कृत और भोजपुरी दोनों भाषाओं के धातु-प्रयोगों की तुलनात्मक व्याख्या दी गई है, जिसके माध्यम से इन दोनों भाषाओं के बीच की गहरी समानता सहज रूप से उजागर होती है। उदाहरणस्वरूप, भोजपुरी की क्रियाएँ जैसे “खइलें”, “चललें”, “पियइलें” आदि अपने संस्कृत मूल “खादितुम्”, “चलितुम्”, “पातुम्” से प्रत्यक्ष रूप से संबद्ध हैं।

ग्रंथ की विशेषता यह है कि इसमें भोजपुरी धातुओं और क्रियाओं की व्युत्पत्तिगत व्याख्या संस्कृत व्याकरण के मानक रूपों के अनुरूप प्रस्तुत की गई है, जिससे यह न केवल भोजपुरी की भाषिक प्रामाणिकता का दस्तावेज बनता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि भोजपुरी का भाषिक विकास भारतीय आर्य भाषाओं की उच्चतम परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है।

भोजपुरी का नामकरण

“भोजपुरी” नाम भोजपुर नामक प्राचीन जिले से संबंधित है, जो वर्तमान बिहार में स्थित है। कहा जाता है कि इस क्षेत्र के शासक राजा भोज के नाम पर इस जिले का नाम भोजपुर पड़ा और इसी के आधार पर इस क्षेत्र की भाषा को “भोजपुरी” कहा जाने लगा। इस प्रकार, भोजपुरी का नाम भौगोलिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत सार्थक है।

भाषाई वर्गीकरण

भाषाई परिवार के स्तर पर भोजपुरी आर्य भाषा परिवार की एक प्रमुख सदस्य है। डॉ॰ जॉर्ज ग्रियर्सन के “लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया” (Linguistic Survey of India) के अनुसार, भोजपुरी पूर्वी हिन्दी समूह की एक बोली है। किन्तु आधुनिक भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसके व्यापक भौगोलिक क्षेत्र, बोलने वालों की विशाल संख्या और स्वतंत्र साहित्यिक परंपरा के कारण इसे एक स्वतंत्र भाषा के रूप में भी मान्यता दी जा रही है।

भोजपुरी हिन्दी से सम्बद्ध होते हुए भी अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मक, व्याकरणिक और शब्दावलीगत विशेषताओं के कारण हिन्दी से अलग पहचान रखती है।

भोजपुरी का भौगोलिक क्षेत्र

भोजपुरी भारत के पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में प्रमुख रूप से बोली जाती है। उत्तर प्रदेश के बनारस (वाराणसी), गाजीपुर, गोरखपुर, देवरिया, आजमगढ़ तथा जौनपुर जिले इसके मुख्य केंद्र हैं, जबकि बिहार में चम्पारन, सारण (छपरा), भोजपुर (आरा) और सीवान आदि जिलों में यह प्रमुखता से बोली जाती है।

इसके अतिरिक्त, झारखण्ड के राँची और छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों में भी भोजपुरी प्रभावी रूप से बोली जाती है।

भारत के बाहर भी भोजपुरी का व्यापक प्रसार हुआ है। उन्नीसवीं सदी में गिरमिटिया श्रमिकों के रूप में जब भारतवासी मॉरीशस, सूरीनाम, गुयाना, फिजी, त्रिनिदाद और टोबैगो जैसे देशों में गए, तब उन्होंने अपने साथ भोजपुरी भाषा और संस्कृति को भी वहाँ स्थापित किया। आज इन देशों में भी भोजपुरी लोकगीत, नाट्य और सिनेमा लोकप्रिय हैं। नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी यह एक सशक्त संचार माध्यम के रूप में विद्यमान है।

भोजपुरी बोलने वाले प्रमुख राज्य और जिले

भोजपुरी भाषा का प्रसार भारत के उत्तर–पूर्वी भाग में विस्तृत रूप से देखा जाता है। यह भाषा मुख्यतः पश्चिमी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा उत्तरी झारखण्ड के बड़े हिस्सों में मातृभाषा के रूप में बोली जाती है। इन राज्यों के अलावा भोजपुरी की गूंज नेपाल के तराई क्षेत्र से लेकर विश्व के अनेक देशों तक सुनाई देती है।

भोजपुरी केवल भारत तक सीमित नहीं है — बल्कि यह एक वैश्विक भारतीय भाषा बन चुकी है, जो फिजी और नेपाल की संवैधानिक भाषाओं में भी मान्यता प्राप्त कर चुकी है। मॉरीशस, सूरीनाम, गयाना, त्रिनिदाद, सिंगापुर, उत्तर अमेरिका और लैटिन अमेरिका जैसे देशों में बसे भारतीय मूल के लोगों द्वारा भी इसे आज तक बोला और सहेजा जा रहा है।

बिहार में:
भोजपुरी मुख्य रूप से बक्सर, भोजपुर, रोहतास, भभुआ (कैमूर), सारण, सिवान, गोपालगंज, वैशाली, पूर्वी चम्पारण तथा पश्चिमी चम्पारण जिलों में व्यापक रूप से बोली जाती है।

उत्तर प्रदेश में:
यह भाषा बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, चन्दौली, जौनपुर, मऊ, आजमगढ़, गोरखपुर, महाराजगंज, संत कबीर नगर और सिद्धार्थ नगर जिलों में प्रचलित है।

झारखण्ड में:
पलामू और गढ़वा जिलों में भोजपुरी बोलने वाले समुदायों की पर्याप्त उपस्थिति पाई जाती है।

नेपाल में:
भोजपुरी का प्रभाव रौतहट, बारा, पर्सा, बीरगंज, चितवन, नवलपरासी, रुपनदेही और कपिलवस्तु जिलों तक फैला हुआ है, जहाँ यह तराई क्षेत्र की प्रमुख भाषाओं में सम्मिलित है।

विदेशों में:
भोजपुरी प्रवासी समुदायों के माध्यम से गयाना (जार्जटाउन), फिजी (सुवा), मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद और सिंगापुर जैसे देशों में भी अपनी जीवंत उपस्थिति बनाए हुए है।

भोजपुरी बोलने वालों की संख्या

भोजपुरी भाषा बोलने वालों की संख्या अत्यंत विशाल है। भारत में लगभग 3.3 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं, जबकि विश्व स्तर पर इसके वक्ताओं की संख्या 5.5 करोड़ से अधिक है।
केवल बिहार में लगभग 0.8 करोड़ और उत्तर प्रदेश में 0.7 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं, जबकि शेष वक्ता नेपाल, मॉरीशस, सूरीनाम, गुयाना और त्रिनिदाद जैसे देशों में निवास करते हैं।

इस व्यापकता के कारण भोजपुरी को विश्व की प्रमुख भाषाओं में गिना जाता है। Ethnologue और UNESCO के आँकड़ों के अनुसार, भोजपुरी विश्व की भाषाओं की सूची में 35वें स्थान पर आती है।

भोजपुरी की लिपि

ऐतिहासिक रूप से भोजपुरी कैथी लिपि में लिखी जाती थी। कैथी लिपि मध्यकाल में बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक दस्तावेजों में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती थी। यह लिपि देवनागरी से मिलती-जुलती थी, किन्तु इसमें लेखन अधिक सरल और प्रवाहमान था।

बीसवीं सदी के प्रारंभ में देवनागरी लिपि के प्रसार के साथ भोजपुरी ने भी देवनागरी लिपि को अपनाया। आज अधिकांश भोजपुरी साहित्य, समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, फिल्में और डिजिटल सामग्री देवनागरी लिपि में ही प्रकाशित होती हैं।

भोजपुरी की भाषिक विशेषताएँ

भोजपुरी की अपनी ध्वन्यात्मक और व्याकरणिक विशिष्टताएँ हैं जो इसे हिन्दी से अलग पहचान देती हैं।
इनमें प्रमुख हैं —

  1. ‘र’ का लोप — जैसे लरिकालइका, घरवाघउआ
  2. स्त्रीलिंग संज्ञाएँ प्रायः ‘इ’ या ‘ई’ कारान्त होती हैं — जैसे बहिनि, आगि, चोरनी आदि।
  3. अवधी और बंगला का प्रभाव — विशेषतः क्रियाओं और शब्द-रचना में बंगला की छाया देखी जा सकती है।
  4. ध्वनि-लालित्य और भाव-संवेदनशीलता — भोजपुरी में बोलचाल की सहजता के साथ-साथ भावनात्मक अभिव्यक्ति का अद्भुत संतुलन पाया जाता है।
  5. लोकसंगीत की भाषा — भोजपुरी गीतों में शब्द-प्रयोग अत्यंत लयात्मक और श्रुतिमधुर होते हैं, जिससे यह गाने और सुनने दोनों में प्रिय लगती है।

भोजपुरी की प्रमुख प्रकार, बोली या उपभाषाएँ (Dialects of Bhojpuri)

भोजपुरी एक अत्यंत व्यापक भाषा है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों, और नेपाल की तराई तक फैली हुई है।
भाषिक दृष्टि से भोजपुरी के कई क्षेत्रीय रूप या उपभाषाएँ (dialects) हैं — जिन्हें ध्वनि, शब्द, व्याकरण और सांस्कृतिक विविधता के आधार पर विभाजित किया गया है।

डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन (G. A. Grierson) के अनुसार विभाजन

प्रसिद्ध भाषाविद् डॉ. ग्रियर्सन ने अपनी कृति Linguistic Survey of India (1903–1908) में भोजपुरी को तीन प्रमुख उपभाषाओं में बाँटा था —

  1. मुख्य (पूर्वी) भोजपुरी (Central or Standard Bhojpuri)
    • क्षेत्र: आरा, बलिया, छपरा, गोरखपुर, सारन आदि।
    • विशेषताएँ: “रउरा” आदरसूचक सर्वनाम, “लागि” संप्रदान प्रत्यय, आदर्श भोजपुरी रूप।
  2. पश्चिमी भोजपुरी (Western Bhojpuri)
    • क्षेत्र: जौनपुर, गाजीपुर, वाराणसी, मिर्जापुर, आज़मगढ़ आदि।
    • विशेषताएँ: “तुँह/तुहूँ” सर्वनाम, “बदे/वास्ते” संप्रदान प्रत्यय, अवधी प्रभाव।
  3. उत्तरी भोजपुरी (Northern Bhojpuri)
    • क्षेत्र: चंपारण, गोपालगंज, सीवान, देवरिया, नेपाल की तराई।
    • विशेषताएँ: मैथिली प्रभाव, “अहाँ/रउरहुँ” सर्वनाम, “खातिर” संप्रदान रूप।

बाद के भाषावैज्ञानिकों द्वारा किया गया विस्तृत वर्गीकरण

बाद के भारतीय भाषाविदों — जैसे डॉ. सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय, रमेशचंद्र मिश्रा आदि — ने भोजपुरी की विविधता को और अधिक सूक्ष्मता से देखा। उन्होंने इसमें चार या पाँच उपभाषाएँ माननी उचित समझीं —

  1. पूर्वी (मुख्य) भोजपुरी
  2. पश्चिमी भोजपुरी
  3. उत्तरी भोजपुरी
  4. दक्षिणी भोजपुरी — (रोहतास, कैमूर, बक्सर, सासाराम आदि क्षेत्रों में बोली जाने वाली)
  5. नेपाल की तराई भोजपुरी (थारू/लौरिया उपरूप) — कभी-कभी इसे उत्तरी का उपभेद माना जाता है।
क्रमभोजपुरी की उपभाषाप्रमुख क्षेत्रमुख्य विशेषता
1मुख्य (पूर्वी) भोजपुरीआरा, बलिया, सारन“रउरा” सर्वनाम, “लागि” प्रत्यय
2पश्चिमी भोजपुरीजौनपुर, वाराणसी, मिर्जापुर“तुँह” सर्वनाम, लयात्मकता
3उत्तरी भोजपुरीचंपारण, गोपालगंज, देवरियामैथिली प्रभाव, “खातिर” प्रयोग
4दक्षिणी भोजपुरीरोहतास, कैमूर, बक्सरमगही प्रभाव, कठोर उच्चारण
5नेपाल-तराई भोजपुरी (उपभेद)बेतिया, रक्सौल, बिरगंजनेपाली प्रभाव, “छी/भयो” ध्वनि

निष्कर्षतः

भोजपुरी की चार प्रमुख उपभाषाएँ (पश्चिमी, पूर्वी, उत्तरी, दक्षिणी) मानी जाती हैं,
और कुछ विद्वान पाँचवाँ रूप — नेपाल-तराई भोजपुरी — भी जोड़ते हैं।

(1) मुख्य (पूर्वी) भोजपुरी

मुख्य या पूर्वी भोजपुरी, भोजपुरी भाषा का सबसे शुद्ध और प्रतिष्ठित रूप मानी जाती है। भाषाविज्ञानी डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन ने इसे “स्टैंडर्ड भोजपुरी (Standard Bhojpuri)” की संज्ञा दी है। यह बोली मुख्यतः बिहार राज्य के भोजपुर (आरा) जिले, तथा उत्तर प्रदेश के बलिया, देवरिया, कुशीनगर और गाजीपुर जिलों के पूर्वी भाग में प्रचलित है। इसके अतिरिक्त यह गंडक और घाघरा नदियों के दोआब में भी व्यापक रूप से बोली जाती है।

भाषिक और सांस्कृतिक महत्त्व

मुख्य भोजपुरी को भोजपुरी भाषा का आदर्श रूप माना जाता है, क्योंकि इसमें भाषा की मूल ध्वन्यात्मक और व्याकरणिक विशेषताएँ अपने सर्वाधिक शुद्ध रूप में विद्यमान हैं। यह बोली भोजपुरी साहित्य, लोकगीत, लोककथाओं और लोक-नाट्यों का भी आधार रही है। बलिया और आरा जिलों में बोली जाने वाली भोजपुरी का स्वरूप विशेष रूप से परिष्कृत और मानक माना जाता है।

यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से भोजपुरी संस्कृति का केंद्र रहा है। यहाँ के लोकगीत—जैसे कजरी, चैता, बिरहा, और सोहर—मुख्य भोजपुरी में ही रचे और गाए जाते हैं। इस बोली का उच्चारण संतुलित, लयात्मक और मधुर होता है।

सर्वनाम और व्याकरणिक प्रयोग

मुख्य भोजपुरी की एक प्रमुख विशेषता इसका सर्वनाम प्रयोग है। यहाँ आदर सूचक सर्वनाम के रूप में “रउरा” का प्रयोग किया जाता है, जो हिन्दी के “आप” के समकक्ष है।

उदाहरण:

  • “रउरा कहाँ जाईं?” (आप कहाँ जा रहे हैं?)
  • “रउरा के हम बड़ा मान करेली।” (मैं आपका बहुत सम्मान करता हूँ।)
  • “रउरा हमके चिननीं ना?” (क्या आप मुझे पहचानते नहीं?)

यह प्रयोग वक्ता और श्रोता के बीच सम्मानजनक संबंध को दर्शाता है, जो भोजपुरी समाज की विनम्रता और पारस्परिक आदर की भावना का प्रतीक है।

संप्रदान कारक (जिसके लिए कुछ किया जाता है) का प्रत्यय यहाँ “लागि” होता है।

उदाहरण:

  • “हम तोरा लागि लइका लइनी।” (मैंने तेरे लिए बेटा लाया हूँ।)
  • “हम खाना तोरा लागि बनवनी।” (मैंने खाना तेरे लिए बनाया।)
  • “पुस्तक रउरा लागि लिहनी।” (यह पुस्तक मैंने आपके लिए ली।)

यह व्याकरणिक विशेषता भोजपुरी को अन्य हिन्दी बोलियों से अलग करती है, क्योंकि पश्चिमी भोजपुरी में इसके स्थान पर “बदे” या “वास्ते” का प्रयोग किया जाता है।

स्थानीय उपरूप (Sub-varieties)

मुख्य भोजपुरी के अंतर्गत भी भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार कुछ स्थानीय भेद देखने को मिलते हैं। प्रमुख उपरूप हैं —

(क) गोरखपुरी भोजपुरी

यह बोली गोरखपुर जिले तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में बोली जाती है। इसकी ध्वनि-शैली अत्यंत स्पष्ट और मृदु है।
उदाहरण:

  • “मोहन घर में बाटें।” (मोहन घर में हैं।)
    यहाँ “बाटें” का प्रयोग “बाड़ें” के स्थान पर होता है।
    इसी कारण इसे उत्तरी मुख्य भोजपुरी भी कहा जाता है।

गोरखपुरी बोली में शब्दों का उच्चारण तुलनात्मक रूप से छोटा और सुसंस्कृत होता है। वाक्यों में क्रियाओं के अंत में ‘ता’, ‘ला’, ‘बा’ जैसे छोटे और लयात्मक ध्वनियों का प्रयोग मिलता है।

(ख) सरवरिया भोजपुरी

पश्चिमी गोरखपुर और बस्ती जिलों की भाषा को “सरवरिया” कहा जाता है। “सरवरिया” शब्द “सरयूपार” से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है “सरयू नदी के पार”। यह नाम उस भौगोलिक क्षेत्र के कारण पड़ा जहाँ यह बोली बोली जाती है।

सरवरिया बोली में गोरखपुरी से मिलते-जुलते शब्द तो हैं, परंतु संज्ञा-शब्दों और उच्चारण में स्पष्ट भिन्नता पाई जाती है।

उदाहरण:

  • गोरखपुरी: “मोहन घर में बाटें।”
  • सरवरिया: “मोहन घर में बाड़ें।”

यह भेद केवल ध्वन्यात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान का भी प्रतीक है। “बाड़ें” का प्रयोग अधिक दक्षिणी स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि “बाटें” अपेक्षाकृत उत्तरी प्रयोग है।

(ग) बलियाई और सारनी भोजपुरी

बलिया और सारन (छपरा) जिलों में बोली जाने वाली भोजपुरी को मुख्य भोजपुरी का सबसे परिष्कृत रूप माना गया है। परंतु यहाँ भी कुछ उच्चारण भेद पाए जाते हैं।
सारण जिले के लोग “ड” ध्वनि का उच्चारण “र” के रूप में करते हैं।

उदाहरण:

  • बलिया निवासी कहते हैं — “घोड़ागाड़ी आवत बा।” (घोड़ा-गाड़ी आ रही है।)
  • सारन निवासी बोलते हैं — “घोरा गारी आवत बा।”

यह ध्वनि-परिवर्तन (ड → र) भोजपुरी की क्षेत्रीय विविधता और ध्वन्यात्मक लचीलेपन को दर्शाता है।

मुख्य भोजपुरी का भाषिक स्वरूप

मुख्य (पूर्वी) भोजपुरी में वाक्य-विन्यास अत्यंत सरल और स्पष्ट होता है। क्रिया प्रायः वाक्य के अंत में आती है, और वाक्य संरचना में ‘बा’, ‘ह’ या ‘अ’ जैसे सहायक ध्वनियों का प्रयोग भाव की तीव्रता के अनुसार किया जाता है।

उदाहरण:

  • “हम खेत गइल रहनी।” (मैं खेत गया था।)
  • “ओह दिन बहुत बरखा भइल रहली।” (उस दिन बहुत बारिश हुई थी।)
  • “रउरा का जानल चाहत बानी?” (आप क्या जानना चाहते हैं?)

इन वाक्यों में रहनी, भइल, बानी जैसे रूपों से क्रियाओं के काल और भाव दोनों स्पष्ट होते हैं।

लोकसाहित्य और मुख्य भोजपुरी

मुख्य (पूर्वी) भोजपुरी में असंख्य लोकगीत, लोककथाएँ और मुहावरे प्रचलित हैं। विवाह, जन्म, फसल कटाई, पर्व-त्योहार—हर अवसर के लिए भोजपुरी लोकगीत हैं।

उदाहरण:

  • “सईयाँ मिले परदेसवा में, हम रोई-रोई बिसराइल बानी।”
  • “ओ ठुमुक ठुमुक चलs ललना, ए कन्हइया।”

इन गीतों में भोजपुरी की भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक विविधता झलकती है।

मुख्य भोजपुरी न केवल भाषा का मानक स्वरूप है, बल्कि यह भोजपुरी समाज की आत्मा का प्रतिनिधित्व भी करती है। इसमें भाषा की मिठास, व्याकरण की शुद्धता और लोकसंस्कृति की गहराई तीनों समाहित हैं।

(2) पश्चिमी भोजपुरी

पश्चिमी भोजपुरी का क्षेत्रीय विस्तार मुख्यतः उत्तर प्रदेश के जौनपुर, गाजीपुर, आजमगढ़, मिर्जापुर, वाराणसी (काशी) के पश्चिमी भागों, तथा प्रयागराज (इलाहाबाद) के कुछ अंचलों तक देखा जाता है। यह भोजपुरी की वह उपशाखा है, जो पश्चिम की ओर बढ़ते हुए अवधी और पूर्वी हिन्दी के प्रभाव से कुछ भिन्न रूप ग्रहण करती है।

भाषाविदों के अनुसार पश्चिमी भोजपुरी का स्वरूप अपेक्षाकृत “मृदु” और “लयात्मक” होता है। यहाँ की बोली में संगीतात्मकता, तुकबंदी और शब्दों की ध्वन्यात्मक सजगता अधिक पाई जाती है। लोकगीतों और कजरी-चैती जैसे लोकरूपों में पश्चिमी भोजपुरी की यही लयात्मकता उसकी प्रमुख पहचान बन जाती है।

भाषिक विशेषताएँ

  1. सर्वनाम प्रयोग:
    पश्चिमी भोजपुरी में आदर सूचक सर्वनाम के रूप में “तुँह” या “तुहूँ” का प्रयोग किया जाता है।
    उदाहरण —
    • “तुँह कहाँ जात बानी?” (आप कहाँ जा रहे हैं?)
    • “हम तुहूँ से कहले रहीं।” (मैंने आपसे कहा था।)
      जबकि मुख्य भोजपुरी में इसके स्थान पर “रउरा” का प्रयोग होता है।
  2. संप्रदान कारक (Dative Case):
    यहाँ संप्रदान कारक का प्रत्यय “बदे” या “वास्ते” के रूप में मिलता है।
    उदाहरण —
    • “भेंवल धरल बा दूध में खाजा तोरे बदे।” (भैंस ने तेरे लिए दूध में खाजा रखा है।)
    • “हम किताब खरीदनी बच्चा वास्ते।” (मैंने बच्चे के लिए किताब खरीदी।)
      यह रूप “लागि” वाले मुख्य भोजपुरी से स्पष्ट भिन्नता दर्शाता है।
  3. शब्दावली एवं ध्वनि:
    पश्चिमी भोजपुरी में कुछ शब्द ऐसे हैं जो अवधी या कन्नौजी से मेल खाते हैं।
    उदाहरण — “कइसन” (कैसा), “बाबूजी” (पिता), “हउवे” (है), “जाइबे” (जाना)।
    यहाँ उच्चारण में “र” का प्रयोग अपेक्षाकृत कम तथा “ल” का अधिक पाया जाता है —
    जैसे “घर” की जगह “घल”, “करना” की जगह “कइल”।
  4. वाक्य संरचना और लय:
    पश्चिमी भोजपुरी के वाक्य लयात्मक, तुकान्त और अक्सर गेय शैली में बोले जाते हैं।
    उदाहरण —
    • “घरे घरे गावत बानी हो, सावन में कजरी।”
    • “चढ़ल बा पूरब के सूरज, अब चलS खेत जोते।”
      इससे स्पष्ट होता है कि यह बोली लोकगीतों की भूमि पर विकसित हुई है।
  5. सांस्कृतिक संदर्भ:
    पश्चिमी भोजपुरी बोलने वाले क्षेत्र — विशेषकर वाराणसी और मिर्जापुर — अपने भक्ति, संगीत और साहित्य के लिए प्रसिद्ध हैं। यहाँ की बोली में भक्ति रस, काव्यिकता और दार्शनिक भावों का सहज मिश्रण पाया जाता है।

इस प्रकार पश्चिमी भोजपुरी अपनी लयात्मक संरचना, विशिष्ट सर्वनामों, और सांस्कृतिक गहराई के कारण भोजपुरी भाषा परिवार में एक अलग पहचान रखती है। यह न केवल बोली जाने वाली भाषा है, बल्कि एक लोक-संस्कृति का जीवंत प्रतीक भी है।

(3) उत्तरी भोजपुरी

उत्तरी भोजपुरी का क्षेत्रीय प्रसार मुख्यतः बिहार के सारन, शिवहर, सीवान, पश्चिमी चंपारण, गोपालगंज तथा उत्तर प्रदेश के देवरिया और कुशीनगर जिलों के उत्तरी भागों में देखा जाता है। यह बोली उत्तर की ओर बढ़ते हुए मैथिली और अवधी भाषाओं के संपर्क में आती है, जिसके कारण इसमें इन दोनों भाषाओं की कुछ ध्वन्यात्मक और व्याकरणिक विशेषताओं का प्रभाव स्पष्ट झलकता है।

भाषाविदों के अनुसार, उत्तरी भोजपुरी भोजपुरी की “मृदु” तथा “संवेदनशील” उपशाखा है। इसमें उच्चारण की कोमलता, स्वर विस्तार और शब्दों की संगीतात्मकता प्रमुख रूप से देखी जाती है।

भाषिक विशेषताएँ

  1. सर्वनाम प्रयोग:
    उत्तरी भोजपुरी में आदर सूचक सर्वनाम के लिए “अहाँ”, “रउरा” या “रउरहुँ” का प्रयोग होता है, जो कभी-कभी मैथिली की तरह विनम्र और सुसंस्कृत प्रतीत होता है।
    उदाहरण —
    • “अहाँ कहाँ जइब?” (आप कहाँ जाएंगे?)
    • “हम रउरहुँ से कुछ कहे के चाहत बानी।” (मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ।)
      यह प्रयोग इसकी शालीनता और सामाजिक मर्यादा को दर्शाता है।
  2. संप्रदान कारक:
    यहाँ संप्रदान कारक का रूप “ले” या “खातिर” के रूप में आता है।
    उदाहरण —
    • “हम लइका ले किताब खरीदनी।” (मैंने बच्चे के लिए किताब खरीदी।)
    • “हम तोहरा खातिर गाना गाइब।” (मैं तेरे लिए गाना गाऊँगा।)
      यह प्रयोग “लागि” (मुख्य भोजपुरी) और “बदे/वास्ते” (पश्चिमी भोजपुरी) से भिन्न है।
  3. शब्दावली और उच्चारण:
    उत्तरी भोजपुरी की शब्दावली में मैथिली और नेपाली प्रभाव भी देखा जाता है, क्योंकि यह नेपाल की सीमा के समीप बोली जाती है।
    उदाहरण —
    • “हमरो मन छी।” (मुझे भी मन है।) — यहाँ “छी” मैथिली के प्रभाव से आया है।
    • “तोरा लग मन बा।” (तुम्हारे पास मन है / इच्छा है।)
    • “ओकर घरे अबहिन जइब।” (मैं उसके घर अभी जाऊँगा।)
    उच्चारण में ‘स’ का स्थान कभी-कभी ‘ह’ ध्वनि से बदल जाता है — जैसे “संसार” → “हंसार”, “सगर” → “हगर”।
  4. वाक्य संरचना:
    उत्तरी भोजपुरी की वाक्य संरचना अपेक्षाकृत सरल, मधुर और भावप्रधान होती है।
    उदाहरण —
    • “अरे भइया, अब तुहूँ चलअ न खेतवा में।”
    • “पगला रे मनवा, केहू के बात मत मान।”
      यहाँ लोकभाषा का सहज आत्मीय भाव झलकता है।
  5. सांस्कृतिक प्रभाव:
    यह बोली लोककथाओं, पचरा, झूमर, और भजन-कीर्तन जैसे जन-सांस्कृतिक रूपों से गहराई से जुड़ी हुई है। इसमें पारिवारिक और भावनात्मक विषयों की प्रधानता मिलती है।

उत्तरी भोजपुरी अपनी कोमल ध्वनि, मैथिली-संलिप्त शब्दावली और आत्मीय अभिव्यक्ति के कारण भोजपुरी भाषिक परिवार की सबसे सौम्य बोली कही जा सकती है। यह भोजपुरी का वह रूप है जो सीमांत संस्कृति, लोककाव्य और सामाजिक संवेदनाओं की झलक प्रस्तुत करता है।

(4) दक्षिणी भोजपुरी

दक्षिणी भोजपुरी, भोजपुरी भाषा की एक विशिष्ट और प्राचीन उपभाषा है, जो मुख्यतः बिहार के दक्षिण–पश्चिमी भागों — विशेषकर रोहतास, कैमूर (भभुआ), बक्सर, सासाराम, और आंशिक रूप से औरंगाबाद जिलों में बोली जाती है। यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से “शेरशाही पट्टी” या “सोनांचल” कहलाता है, जो सोन नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। इसी कारण इसे “दक्षिणी भोजपुरी” कहा गया।

दक्षिणी भोजपुरी का क्षेत्र मगही (मगध क्षेत्र की भाषा) के समीप होने के कारण इस पर मगही का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही कारण है कि इसकी ध्वन्यात्मकता, उच्चारण-पद्धति, तथा कुछ व्याकरणिक रूप “मगही” से साम्यता रखते हैं।

भाषिक विशेषताएँ

  1. ध्वनि और उच्चारण
    • दक्षिणी भोजपुरी की ध्वनि संरचना अपेक्षाकृत कठोर और गम्भीर है।
    • यहाँ “श” और “ष” का उच्चारण प्रायः “स” की तरह किया जाता है।
      उदाहरण — “शेर” → “सेर”, “षट्कोण” → “सटकोन”
    • ‘र’ ध्वनि का लोप भी प्रायः होता है, जैसे “लरिका” → “लइका”, “घर” → “घउ”।
  2. व्याकरणिक रूप
    • आदर सूचक सर्वनाम के लिए “अहाँ” या “रउर” का प्रयोग मिलता है।
      उदाहरण — “अहाँ कहाँ जइब?” या “रउर का हाल बा?”
    • संप्रदान कारक के लिए “खातिर” या “लेके” का प्रयोग किया जाता है।
      उदाहरण — “हम तोरा खातिर भात पकवनी।” (मैंने तुम्हारे लिए खाना बनाया।)
    • क्रियाओं का रूपांतरण मगही जैसा है —
      जैसे “खइले हईं”, “गइले हईं”, “आइले हईं” इत्यादि।
  3. शब्द भंडार (Vocabulary)
    • मगही और अवधी दोनों के शब्द दक्षिणी भोजपुरी में प्रवेश पाए जाते हैं।
      उदाहरण —
      • “अइसन”, “तइसन” (अवधी प्रभाव)
      • “कइसन”, “कउनो”, “कबो” (मगही प्रभाव)
    • संस्कृतजन्य शब्दों का प्रयोग भी अपेक्षाकृत अधिक है, जैसे “अन्न”, “गृह”, “देह”, “मनुष्य” आदि।
  4. वाक्य संरचना
    • दक्षिणी भोजपुरी के वाक्य अपेक्षाकृत छोटे और सघन होते हैं।
      उदाहरण —
      • “हम जइब बजार।” (मैं बाज़ार जाऊँगा।)
      • “तू खइले ह?” (क्या तुमने खाया?)
    • कभी-कभी वाक्य के अंत में ‘ना’ प्रश्नवाचक सूचक रूप में प्रयुक्त होता है —
      जैसे — “रउरु आइब ना?” (आप आएँगे न?)

सांस्कृतिक और क्षेत्रीय प्रभाव

दक्षिणी भोजपुरी क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से सोन नदी के दक्षिणी तट पर फैला है, जहाँ मगही और भोजपुरी के संपर्क ने एक अनूठा भाषिक मिश्रण उत्पन्न किया है। इस उपभाषा के लोकगीतों, विवाह-गीतों, होरी और चैती जैसे लोकसंगीतों में मगही-भोजपुरी का संयुक्त रूप झलकता है।

यहाँ के लोग अपनी बोली में “देहातीपन” और “मृदुलता” दोनों का समन्वय रखते हैं। दक्षिणी भोजपुरी के लोककथाओं में “वीरता”, “ग्राम्य हास्य”, और “लोक-दार्शनिक” भाव प्रमुख हैं।

उदाहरण वाक्य

दक्षिणी भोजपुरी वाक्यहिन्दी अर्थ
रउरु कहाँ जइब?आप कहाँ जाएँगे?
हम तोरा खातिर लइका बोलवनी।मैंने तुम्हारे लिए बच्चे को बुलाया।
ई काम अब ना होई।यह काम अब नहीं होगा।
तू खइले ह?क्या तुमने खाया है?
ओही दिन ऊ शहर गइल रहल।उसी दिन वह शहर गया था।

साहित्यिक परंपरा और पहचान

हालाँकि दक्षिणी भोजपुरी में साहित्यिक लेखन अपेक्षाकृत कम हुआ है, फिर भी इसकी लोककाव्य परंपरा अत्यंत समृद्ध है। लोकगीत, चैती, कजरी, सोहर और नौटंकी संवादों में इस उपभाषा की मधुरता और प्रामाणिकता झलकती है।

आजकल डिजिटल युग में दक्षिणी भोजपुरी के स्वरूप को यूट्यूब, लोकगायन मंचों और क्षेत्रीय नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से पुनर्जीवित किया जा रहा है।

दक्षिणी भोजपुरी, भोजपुरी भाषा की वह कड़ी है जो मगही और भोजपुरी के मध्य सेतु का कार्य करती है। यह भोजपुरी को उसकी सांस्कृतिक गहराई और क्षेत्रीय विविधता प्रदान करती है।
अपनी सहज, लोकाभिमुख और प्रांतीय मिठास के कारण यह उपभाषा भोजपुरी के विकास-क्रम में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।

(5) नेपाल-तराई भोजपुरी

क्षेत्रीय विस्तार:
नेपाल की तराई पट्टी के बेतिया, रक्सौल, वीरगंज (बिरगंज), परसा, बारा, रौतहट आदि सीमावर्ती इलाकों में यह भोजपुरी बोली जाती है। यह वह क्षेत्र है जहाँ भारतीय बिहार की सीमाएँ नेपाल से मिलती हैं — इसलिए यहाँ की भोजपुरी में भारत और नेपाल दोनों के भाषाई प्रभाव देखे जा सकते हैं।

भाषाई विशेषताएँ:
नेपाल-तराई भोजपुरी में नेपाली भाषा का उल्लेखनीय प्रभाव मिलता है। विशेष रूप से ध्वन्यात्मक (phonetic) स्तर पर इसमें “छी” और “भयो” जैसी नेपाली ध्वनियाँ व रूप प्रयुक्त होते हैं। उदाहरण के लिए —

  • “मैं गया छी” (मैं गया हूँ)
  • “का भयो?” (क्या हुआ?)

इस प्रकार यह भोजपुरी, नेपाली तथा स्थानीय मैथिली के मिश्रण जैसी प्रतीत होती है।

सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भ:
नेपाल-तराई भोजपुरी केवल भाषाई नहीं बल्कि सांस्कृतिक संपर्क का भी उदाहरण है। यह भाषा वहाँ के दो देशों के लोगों के बीच दैनिक संवाद, व्यापार, पारिवारिक संबंधों और सांस्कृतिक मेलजोल की आधारभूत कड़ी के रूप में कार्य करती है।

संक्षेप में:
नेपाल-तराई भोजपुरी, भोजपुरी की एक सीमांत उपभाषा है जो भाषिक संक्रमण क्षेत्र (linguistic transition zone) का प्रतिनिधित्व करती है — जहाँ भोजपुरी अपनी मूल संरचना बनाए रखते हुए नेपाली और मैथिली के प्रभावों से एक विशिष्ट रूप धारण करती है।

भोजपुरी बोली है या भाषा?

भोजपुरी को लंबे समय तक हिन्दी की बोली के रूप में वर्गीकृत किया गया। परंतु समय के साथ भोजपुरी ने अपनी स्वतंत्र पहचान बना ली है।
इसके विशाल भौगोलिक क्षेत्र, व्यापक जनसंख्या, स्वतंत्र साहित्यिक परंपरा, सिनेमा, नाट्य और डिजिटल माध्यमों में उपस्थिति को देखते हुए भोजपुरी को स्वतंत्र भाषा कहा जाना अधिक समीचीन है।

वर्तमान में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या 5.5 करोड़ से अधिक है — यह आँकड़ा कई देशों की राष्ट्रीय भाषाओं से भी बड़ा है। अतः भाषावैज्ञानिक दृष्टि से भी भोजपुरी का भाषा के रूप में स्वीकार किया जाना उचित है।

भोजपुरी साहित्य और प्रमुख कवि

भोजपुरी का साहित्यिक इतिहास अत्यंत समृद्ध और प्राचीन है। लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें, लोकनाट्य (जैसे भोजपुरी नौटंकी और बिदेसिया) इस भाषा के सांस्कृतिक वैभव को दर्शाते हैं।

भोजपुरी के आरंभिक कवियों में कबीर, धरणीदास, और धरमदास का विशेष स्थान है। कबीर की भाषा में भोजपुरी के तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। उनके दोहों और साखियों में भोजपुरी की सहजता और लोकबोध झलकता है।

आधुनिक युग में भी भोजपुरी साहित्य ने नई ऊँचाइयाँ प्राप्त की हैं। भिखारी ठाकुर को “भोजपुरी के शेक्सपीयर” कहा जाता है। उनके नाटक बिदेसिया, गबरघिचोर, भाई विरोध, ननद-भाउज आदि भोजपुरी समाज की गहरी व्यथा और जीवन-दर्शन को चित्रित करते हैं।

आज भोजपुरी साहित्य में कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, आलोचना और पत्रकारिता जैसे सभी विधाएँ सक्रिय हैं। साथ ही भोजपुरी सिनेमा और संगीत ने इसे विश्वव्यापी पहचान दिलाई है।

भोजपुरी का वैश्विक स्वरूप

भोजपुरी भाषा भारत की सीमाओं को लाँघ चुकी है। उन्नीसवीं सदी में जब भारतीय श्रमिकों को ब्रिटिश उपनिवेशों — मॉरीशस, सूरीनाम, गुयाना, फिजी, त्रिनिदाद और टोबैगो — में ले जाया गया, तब उन्होंने भोजपुरी को अपने साथ वहाँ पहुँचाया।

आज मॉरीशस में भोजपुरी “राष्ट्रीय सांस्कृतिक भाषा” के रूप में मान्यता प्राप्त है। वहाँ के रेडियो, टेलीविजन और विद्यालयों में भोजपुरी का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार त्रिनिदाद, फिजी और गुयाना में भी भोजपुरी संस्कृति, संगीत और नाट्य परंपराएँ जीवंत हैं।

यह वैश्विक विस्तार इस बात का प्रमाण है कि भोजपुरी केवल भारत की नहीं, बल्कि भारतीय प्रवासी समाज की भी पहचान है।

भोजपुरी की वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ

यद्यपि भोजपुरी विश्व की प्रमुख भाषाओं में से एक है, फिर भी इसे भारत की संविधान की आठवीं अनुसूची में अभी तक स्थान नहीं मिला है। यह इसकी सबसे बड़ी चुनौती है।

भोजपुरी को संविधानिक मान्यता मिलने से इसके विकास, शिक्षण, साहित्यिक सृजन और सांस्कृतिक संरक्षण को और बल मिलेगा।

डिजिटल युग में भोजपुरी सामग्री तेजी से बढ़ रही है — यूट्यूब, ओटीटी और सोशल मीडिया पर भोजपुरी गानों और फिल्मों की लोकप्रियता अभूतपूर्व है। यह इस भाषा के जीवंत और गतिशील स्वरूप का प्रमाण है।

निष्कर्ष

भोजपुरी भाषा भारतीय भाषाई परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसका उद्गम संस्कृत से हुआ, विकास प्राकृत और अपभ्रंशों के माध्यम से हुआ, और आज यह एक सशक्त जनभाषा के रूप में हमारे सामने है।

भोजपुरी न केवल भाषिक माध्यम है, बल्कि यह भारतीय लोकसंस्कृति, संवेदना और जीवनदर्शन की सजीव अभिव्यक्ति है। इसकी मिठास, लय, व्याकरणिक सौष्ठव और लोक-भावना इसे विशिष्ट बनाते हैं।

अब आवश्यकता इस बात की है कि भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता देकर इसे भारत की भाषाई विरासत का सम्मानित अंग बनाया जाए। भोजपुरी केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत धड़कन है — भारतीय जनमानस की आत्मा की भाषा।


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