भारत की जैव-विविधता विश्वभर में अपनी अनूठी विशेषताओं के लिए जानी जाती है, परंतु हाल के वर्षों में पूर्वोत्तर भारत जिस तीव्रता से नई प्रजातियों की खोजों के केंद्र में रहा है, वह इसे वैश्विक स्तर पर जैव-विविधता अनुसंधान का प्रमुख क्षेत्र साबित करता है। इसी पृष्ठभूमि में वाइल्डलाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया (WII), देहरादून द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों में 13 नई उभयचर (Amphibian) प्रजातियों की खोज की ताज़ा घोषणा न केवल भारत के लिए बल्कि पूरी विश्व वैज्ञानिक समुदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
यह खोज भारत में एक ही वैज्ञानिक प्रकाशन में वर्णित कशेरुकी प्रजातियों की पिछले एक दशक में सबसे बड़ी खोज है। उल्लेखनीय है कि ये सभी प्रजातियाँ मुख्यतः बश फ्रॉग (Bush Frogs) श्रेणी से संबंधित हैं, जिनकी विविधता और पर्यावरणीय महत्व उभयचरों के संरक्षण के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पूर्वोत्तर भारत: जैव-विविधता का वैश्विक हॉटस्पॉट
पूर्वोत्तर भारत—जिसमें असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नगालैंड, मिजोरम, मणिपुर और त्रिपुरा शामिल हैं—विश्व के इंडो-बर्मा जैव-विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है। यह क्षेत्र अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना, उच्च पर्वतीय ढलानों, घने उप-उष्णकटिबंधीय वनों, प्रचुर वर्षा और अलग-अलग ऊँचाई वाले आवासों के कारण अत्यधिक स्थानिक (Endemic) प्रजातियों का घर है।
पूर्वोत्तर की यह विशिष्ट पर्यावरणीय संरचना “छिपी हुई प्रजातियों” (Hidden Biodiversity) की अवधारणा को भी पुष्ट करती है। कई प्रजातियाँ लंबे समय तक वैज्ञानिक अध्ययनों से दूर रहीं, क्योंकि वे अत्यंत सीमित आवासों में पाई जाती हैं या स्वर (calls) तथा आकृतिक समानता के कारण आसानी से पहचान में नहीं आतीं। आधुनिक टैक्सोनोमी, विशेषकर आनुवंशिकी, ध्वनिक विश्लेषण और आकृतिक अध्ययन के संयोजन ने इस छिपी विविधता को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
नई खोज की प्रमुख विशेषताएँ
WII द्वारा घोषित 13 नई उभयचर प्रजातियाँ निम्नलिखित कारणों से विशेष महत्व रखती हैं—
1. बश फ्रॉग्स (Bush Frogs) की विविधता में बड़ा इजाफा
भारत में पहले से 82 बश फ्रॉग प्रजातियाँ ज्ञात थीं, जिनमें से 15 प्रजातियाँ पूर्वोत्तर भारत से रिपोर्ट की गई थीं।
नई खोज के बाद यह संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ गई है, जो पूर्वोत्तर क्षेत्र को इस समूह की विविधता के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करती है।
2. प्रजातियों का व्यापक भौगोलिक वितरण
इन 13 प्रजातियों में—
- 6 प्रजातियाँ अरुणाचल प्रदेश से मिलीं
- 3 मेघालय से
- 1-1 प्रजाति असम, नगालैंड, मिजोरम और मणिपुर से
इनमें से 7 प्रजातियाँ संरक्षित क्षेत्रों (Protected Areas) से खोजी गईं, जो यह दर्शाती हैं कि संरक्षण क्षेत्रों में भी अभी भी अपर्याप्त रूप से अन्वेषित जैव-विविधता मौजूद है।
3. अरुणाचल प्रदेश: खोज का प्रमुख केंद्र
अरुणाचल प्रदेश में मिली 6 प्रजातियों में—
- नमदाफा टाइगर रिज़र्व से 2
- ईगलनेस्ट वाइल्डलाइफ सेंक्चुरी से 1
- मेहाओ वाइल्डलाइफ सेंक्चुरी से 1 प्रजाति
यह स्पष्ट करता है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का एक प्रमुख ‘Unknown Biodiversity Landscape’ है, जहाँ वैज्ञानिकों को अभी भी अनेक नई प्रजातियाँ मिल सकती हैं।
4. बहु-विषयक वैज्ञानिक विधियों का उपयोग
अध्ययन में तीन प्रमुख वैज्ञानिक विधियों का उपयोग किया गया:
- ध्वनिक विश्लेषण (Acoustics) – मेंढकों की विशिष्ट ध्वनियों के आधार पर वर्गीकरण
- आनुवंशिक अध्ययन (Genetics) – डीएनए अनुक्रमों के माध्यम से प्रजाति विभेदन
- आकृतिक अध्ययन (Morphology) – आकार, संरचना, शरीर-रचना का विश्लेषण
इसके अतिरिक्त, शोध में 81 स्थलों (जिनमें 25 संरक्षित क्षेत्र शामिल थे) से नमूने एकत्र किए गए तथा पुराने संग्रहालय संग्रह (Museum Collections) की भी पुनः समीक्षा की गई।
इस समग्र पद्धति ने न केवल नई प्रजातियों की पुष्टि की बल्कि पुरानी वर्गीकरण त्रुटियों को भी सुधारने में मदद की।
उभयचर प्रजातियाँ क्या होती हैं?
उभयचर (Amphibians) कशेरुकी प्राणियों का ऐसा समूह है जो जल और स्थल दोनों में जीवन व्यतीत करता है।
इनकी द्वि-जीवन प्रकृति के कारण ही इनका नाम “Amphibia” पड़ा है।
उभयचरों के प्रमुख समूह
विश्व में उभयचरों की लगभग 8,000 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें प्रमुख रूप से:
- मेंढक (Frogs)
- टोड (Toads)
- सलामैंडर (Salamanders)
- सीसिलियन (Caecilians) शामिल हैं।
भारत में 430 से अधिक उभयचर प्रजातियों का रिकॉर्ड है, जिनमें बड़ी संख्या एंडेमिक यानी केवल भारत में पाई जाने वाली प्रजातियों की है।
उभयचरों की विशेषताएँ
उभयचर कई ऐसी विशिष्ट जैविक एवं पारिस्थितिक विशेषताओं से युक्त होते हैं, जो इन्हें अन्य कशेरुकियों से अलग बनाती हैं।
1. द्वि-जीवन (Dual Life Cycle)
उभयचर अपने जीवन का प्रारंभ लार्वा अवस्था में जल में करते हैं, जहाँ वे गलफड़ों से श्वसन करते हैं।
वयस्क अवस्था में पहुँचने पर वे स्थल पर आने लगते हैं, जहाँ इनका श्वसन फेफड़ों या त्वचा द्वारा होता है।
यह जीवनचक्र रूपांतरण (Metamorphosis) पर आधारित होता है।
2. त्वचा द्वारा श्वसन (Cutaneous Respiration)
इनकी त्वचा—
- पतली
- नम
- ग्रंथि-युक्त
होती है, जिसके माध्यम से गैसों का आदान-प्रदान होता है।
यह विशेषता इन्हें वायु और जल दोनों में श्वसन करने की क्षमता प्रदान करती है।
3. ठंडे-खून वाले जीव (Cold-Blooded / Ectothermic)
उभयचरों का शरीर तापमान बाहरी वातावरण पर निर्भर करता है।
इस कारण:
- वे तापमान-संवेदनशील होते हैं
- जलवायु परिवर्तन उनके अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा पैदा करता है
4. अंडों पर कठोर खोल नहीं होता (Non-Amniotic Eggs)
उभयचर जेल जैसी संरचना वाले अंडे देते हैं, जिन पर कोई कठोर खोल नहीं होता।
इस कारण वे जल या अत्यधिक नम वातावरण में ही सुरक्षित रह पाते हैं।
5. उच्च स्थानिकता (High Endemism)
भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर हिमालयी क्षेत्र उभयचरों की एंडेमिक विविधता के प्रमुख केंद्र हैं।
यह स्थानिकता किसी क्षेत्र की पारिस्थितिकी के स्वास्थ्य का संकेतक मानी जाती है।
उभयचर प्रजातियों का पारिस्थितिक और वैज्ञानिक महत्व
उभयचर न केवल पर्यावरणीय स्वास्थ्य के प्रमुख संकेतक हैं, बल्कि वे प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों को संतुलित रखने में भी अतुलनीय योगदान देते हैं।
1. पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना
- उभयचर बड़ी संख्या में कीटों का उपभोग करते हैं
- वे कृषि फसलों को कीटों से बचाते हैं
- लार्वा जलीय पारिस्थितिकी की भोजन शृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं
2. जैव-संकेतक (Bio-indicators) के रूप में भूमिका
उभयचर—
- प्रदूषण
- रसायनों
- तापमान परिवर्तन
- रोगों
के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं।
इसलिए इनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति किसी क्षेत्र की पर्यावरणीय गुणवत्ता का सटीक संकेत देती है।
3. चिकित्सा और वैज्ञानिक अनुसंधान में उपयोग
कुछ उभयचरों की त्वचा से स्रावित विषों में:
- एंटीबैक्टीरियल
- एंटीवायरल
- एंटी-कैंसर
जैसे अनेक उपयोगी पेप्टाइड्स पाए जाते हैं।
जीवविज्ञान में भ्रूण विकास (Embryonic Development) का अध्ययन मेंढकों पर ही आधारित है।
4. खाद्य-श्रृंखला में महत्वपूर्ण कड़ी
उभयचर—
- साँप
- पक्षी
- स्तनधारियों
का भोजन होते हैं।
इनकी कमी खाद्य-श्रृंखला के टूटने का खतरा पैदा करती है।
5. जलवायु परिवर्तन निगरानी का प्रमुख साधन
IPBES और IUCN की रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि उभयचरों की लगातार घटती जनसंख्या जलवायु परिवर्तन, आवास विनाश और प्रदूषण के बढ़ते प्रभावों का वैश्विक संकेत है।
पूर्वोत्तर भारत की नई खोजें: संरक्षण और नीति के लिए क्या संकेत देती हैं?
13 नई प्रजातियों की खोज कई महत्वपूर्ण नीतिगत और वैज्ञानिक संदेश देती है—
1. भारत में अब भी व्यापक ‘Hidden Biodiversity’ मौजूद है
पूर्वोत्तर क्षेत्रों की कठिन भौगोलिक स्थिति और सीमित वैज्ञानिक अध्ययन के कारण कई प्रजातियाँ अब भी अनदेखी हैं।
2. संरक्षित क्षेत्र भी पूरी तरह अन्वेषित नहीं हैं
7 प्रजातियों का संरक्षित क्षेत्रों से मिलना इस बात का प्रतीक है कि:
- हमें अधिक विस्तृत सर्वेक्षण की आवश्यकता है
- संरक्षण प्रबंधन को अनुसंधान-आधारित बनाना होगा
3. आधुनिक टैक्सोनोमी का महत्व
यदि ध्वनिक और आनुवंशिक विश्लेषण का उपयोग न होता तो संभवतः अधिकांश प्रजातियाँ अलग-अलग प्रजातियों के रूप में पहचानी ही नहीं जा सकती थीं।
4. जलवायु परिवर्तन और विकास परियोजनाओं से खतरा
पूर्वोत्तर क्षेत्र में:
- सड़क निर्माण
- जलविद्युत परियोजनाएँ
- वनों की कटाई
उभयचरों के आवास को तेजी से प्रभावित कर रही हैं।
5. समुदाय आधारित संरक्षण मॉडल आवश्यक
स्थानीय जनजातियाँ (जैसे अपातानी, गारो, मिश्मी) पारंपरिक ज्ञान के माध्यम से संरक्षण में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।
निष्कर्ष: भारत के जैव-विविधता मानचित्र में नई उम्मीद
पूर्वोत्तर भारत में 13 नई उभयचर प्रजातियों की खोज देश की वैज्ञानिक क्षमताओं, आधुनिक अनुसंधान तकनीकों और प्राकृतिक धरोहर की अपार संभावनाओं को दर्शाती है।
यह उपलब्धि न केवल भारत के जैव-विविधता मानचित्र में एक नए अध्याय को जोड़ती है, बल्कि यह भी बताती है कि हमारे वनों में आज भी अनगिनत अनदेखी प्रजातियाँ जीवित हैं।
उभयचर प्रजातियाँ पर्यावरणीय स्वास्थ्य के सबसे सटीक संकेतक हैं। इसलिए इनकी खोज हमें यह समझने में मदद करती है कि प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र अब भी आश्चर्यजनक रूप से संपन्न हैं, परंतु संवेदनशील भी।
भविष्य में—
- वैज्ञानिक अनुसंधान
- संरक्षण नीतियाँ
- समुदाय आधारित पहलकदमियाँ
- जलवायु परिवर्तन नियंत्रण प्रयास
इन सबको मिलाकर ही हम इन अनमोल प्रजातियों को सुरक्षित रख सकते हैं।
इस प्रकार यह खोज केवल वैज्ञानिक उत्साह का विषय नहीं है, बल्कि भारत की प्राकृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए एक नई चेतावनी और प्रेरणा भी है।
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