मारवाड़ी भाषा : इतिहास, विकास, स्वरूप और साहित्यिक परम्परा

राजस्थान की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण है। इस विविधता के भीतर मारवाड़ी भाषा का स्थान सबसे ऊँचा है, क्योंकि यह न केवल राजस्थानी भाषा-समूह की सर्वाधिक प्रतिष्ठित उपभाषा है बल्कि साहित्य, व्याकरण, लोकपरम्परा तथा सामाजिक उपयोग की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। मारवाड़ी भाषा का इतिहास लगभग एक सहस्राब्दी पुराना माना जाता है, और इसने अपने दीर्घ विकास-क्रम में भारतीय भाषाई परम्परा को महत्वपूर्ण रूप से समृद्ध किया है। आज यह केवल राजस्थान के कुछ जनपदों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के कई हिस्सों तथा विदेशों तक अपनी पहचान को स्थापित कर चुकी है।

इस लेख में हम मारवाड़ी भाषा के ऐतिहासिक उद्गम, उसकी भौगोलिक सीमा, प्रमुख उपबोलियों, व्याकरणिक विशेषताओं, ध्वन्यात्मक सौष्ठव, साहित्यिक योगदान, लोकपरम्परा तथा वर्तमान महत्व पर विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे।

Table of Contents

मारवाड़ी भाषा का ऐतिहासिक उद्गम

मारवाड़ी भाषा राजस्थानी भाषा-परिवार की प्रमुख और परिपक्व शाखा है। इसका प्राचीन नाम ‘मरुभाषा’ या ‘मरुभाषी’ मिलता है। मध्यकालीन ग्रंथों में “मरु देश” या “मरूप्रदेश” के अंतर्गत वर्णित भाषा को ही आधुनिक काल की मारवाड़ी बोली माना गया है।

प्राचीन साहित्यिक उल्लेख

मारवाड़ी का इतिहास केवल आधुनिक भाषाई अध्ययन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उल्लेख आठवीं शताब्दी के प्रसिद्ध जैन ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ में मिलता है। इसमें भारत की अठारह प्रमुख देशभाषाओं का वर्णन है, जिनमें मरुदेश की भाषा का भी उल्लेख है। यह इस बात का प्रमाण है कि तत्कालीन समाज में मारवाड़ी या उससे संबद्ध भाषायी रूपों का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व था।

मुग़ल काल का मान्यता-प्राप्त भाषायी स्वरूप

मुग़ल दरबार के विद्वान अबुल फज़ल ने ‘आइने-अकबरी’ में भारत की महत्वपूर्ण भाषाओं का वर्णन करते हुए मारवाड़ी को उनमें शामिल किया है। यह दर्शाता है कि मध्यकालीन भारत में मारवाड़ी की एक स्वतंत्र भाषायी पहचान थी और यह व्यापक रूप से जन-जीवन एवं साहित्य में प्रचलित थी।

भौगोलिक विस्तार

मारवाड़ी भाषा का भौगोलिक क्षेत्र काफी विस्तृत रहा है। यह केवल आधुनिक राजस्थान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इतिहास के विभिन्न कालों में इसके बोलने वालों का विस्तार कई क्षेत्रों तक हुआ।

मुख्य प्रचलन क्षेत्र

जोधपुर
बीकानेर
जैसलमेर
सिरोही

ये मारवाड़ी भाषा के पारंपरिक और प्रमुख बोल-क्षेत्र माने जाते हैं।

अन्य क्षेत्र जहाँ मारवाड़ी बोली जाती रही

– अजमेर-मेरवाड़ा
– किशनगढ़ के क्षेत्र
– पालनपुर के कुछ भाग
– जयपुर का शेखावाटी इलाका
– सिंधु प्रांत (अब पाकिस्तान) के कुछ हिस्से
– पंजाब के दक्षिणी इलाके

इसके अतिरिक्त, व्यापारिक गतिविधियों के कारण मारवाड़ी समुदाय के लोग देशभर के बड़े शहरों—मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु—तथा विदेशों में बसे। इस कारण मारवाड़ी भारत के बाहर भी बोली और समझी जाती है।

मारवाड़ी की उपबोलियाँ

मारवाड़ी भाषा स्वयं कई उपबोलियों में विभाजित है। सामान्यतः इसके 13–14 उपबोली रूप प्रचलित माने जाते हैं। इनमें—

  • जोधपुरी मारवाड़ी
  • शेखावाटी मारवाड़ी
  • बीकानेरी मारवाड़ी
  • थली मारवाड़ी
  • पाली-सीकारी मारवाड़ी
  • जैसलमेरी मारवाड़ी
    आदि सम्मिलित हैं।

इन उपबोलियों में ध्वनि-संरचना, शब्द-चयन, उतार-चढ़ाव और उच्चारण में सूक्ष्म भौगोलिक भिन्नताएँ मिलती हैं।

साहित्यिक मारवाड़ी का केंद्र

साहित्यिक दृष्टि से सर्वाधिक शुद्ध और परिष्कृत मारवाड़ी—

जोधपुर, उसके आस-पास के क्षेत्र, तथा शेखावाटी क्षेत्र में बोली और विकसित हुई।

इसी मारवाड़ी रूप ने लोकगीत, कथाएँ, दूहा, सोरठा, वीणा-काव्य, और राजस्थानी काव्य-परम्परा को अत्यंत समृद्ध किया।

मारवाड़ी भाषा की ध्वन्यात्मक और भाषायी विशेषताएँ

मारवाड़ी भाषा केवल बोलचाल का माध्यम नहीं है, बल्कि इसकी ध्वन्यात्मक संरचना अत्यंत मधुर, ओजस्वी और लयात्मक मानी जाती है। यही कारण है कि छंदों और रागों में इसका प्रभाव अद्वितीय है।

ध्वनियों की मधुरता : मांड और सोरठा

राजस्थान के परंपरागत संगीत में मांड राग सर्वाधिक लोकप्रिय है, और यह माना जाता है कि मांड की सौम्य, गूँजती और प्रवाहमयी ध्वनियाँ मारवाड़ी भाषा में सर्वाधिक स्वाभाविक रूप से व्यक्त होती हैं।
इसी तरह सोरठा छंद में मारवाड़ी की लयात्मकता और ध्वन्यात्मक विशेषताएँ अत्यंत अनुकूल बैठती हैं।

शब्द-संपदा और व्युत्पत्तिगत विशेषताएँ

मारवाड़ी शब्द-संपदा अत्यंत समृद्ध है। इसमें—

  • संस्कृत के शब्द
  • प्राकृत और अपभ्रंश के रूप
  • फारसी और अरबी से आए शब्द
  • स्थानीय लोकभाषाई शब्द

सभी स्वाभाविक रूप से घुल-मिल गए हैं।

उदाहरण के लिए—
घणो, थारो, म्हारो, म्हें, चाकर, घरड़ो, रींबो, म्हैली, झळकणो आदि शब्द प्राकृत/अपभ्रंश मूल के माने जाते हैं।

वहीं फ़ारसी से दुनिया, हुकूम, अदालत, दोस्त आदि शब्द आत्मसात हुए हैं।

व्याकरणिक संरचना

मारवाड़ी भाषा का व्याकरण राजस्थानी परंपरा पर आधारित है परंतु इसमें कुछ निजी विशिष्टताएँ भी मिलती हैं।

(A) कारक-चिह्न और परसर्ग

मारवाड़ी में करण और अपादान कारक परसर्गों में—

  • हूं

  • आदि चिह्न मिलते हैं।

सम्बन्ध कारक-चिह्नों में—

  • मैं
  • माई
  • माय
    का प्रयोग मिलता है।

उदाहरण—

  • राममाय घर (राम का घर)
  • म्हैँ घरों (मेरे घर का/मेरा घर)

(B) सर्वनामों में विविधता

मारवाड़ी सर्वनाम-व्यवस्था अत्यंत रोचक है।
उत्तम पुरुष एकवचन ‘मैं’ के लिए प्रचलित रूप—

  • म्ह
  • मू
  • म्हें

इसी प्रकार ‘यह’ (this) के लिए—

  • यो

  • का प्रयोग होता है।

(C) तुलना-सूचक शब्द

तुलना प्रकट करने के लिए मारवाड़ी में—

  • सँ
  • करताँ

का प्रयोग अधिक होता है।

उदाहरण—

  • मोहताँ सँ घणो ऊँचो (मोहन से बहुत ऊँचा)
  • ओ करताताँ भाग्यशाली (उसके मुकाबले भाग्यशाली)

मारवाड़ी साहित्यिक परंपरा

मारवाड़ी भाषा की साहित्यिक परंपरा बहुत प्राचीन और समृद्ध है। इसमें लोक-साहित्य, वीर-काव्य, कथाएँ, भक्तिकाव्य, संत साहित्य, ऐतिहासिक ग्रंथ, चारण-काव्य आदि विविध रूपों में रचनाएँ मिलती हैं।

(A) चारण और भाट परंपरा

राजस्थान के चारण कवियों ने मारवाड़ी में वीरगाथाएँ लिखीं।
उनकी भाषा में—

  • ओज,
  • वीर-रस,
  • अतिशयोक्ति,
  • युद्ध-वीरता

का सुंदर संयोजन मिलता है।

(B) लोकगीत और लोककथाएँ

राजस्थान की लोक-परंपरा में मारवाड़ी भाषा के—

  • घूमर के गीत
  • मांगणियार और लंगा समुदाय के गीत
  • पलड़ी, मुरली, बारहमासी
  • विरह-गीत

अत्यंत लोकप्रिय रहे हैं।

(C) संत और भक्तिकाव्य

कई संतों और साधुओं ने मारवाड़ी का प्रयोग प्रवचन और भक्तिपरक साहित्य में किया।
इससे भाषा में आध्यात्मिकता, नैतिकता और लोक-जीवन के अनुभव जुड़ते गए।

सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संदर्भ में मारवाड़ी

मारवाड़ी भाषा केवल साहित्य का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार, व्यापारिक संचार, विवाह-परंपरा, लोक-उत्सव, धार्मिक क्रियाओं और रोज़मर्रा के जीवन का अभिन्न अंग है।

व्यापारिक समुदाय की भाषा

राजस्थान के मारवाड़ी व्यापारी भारतभर में प्रसिद्ध हैं।
उन्होंने जहाँ भी व्यापार स्थापित किया, वहाँ अपनी भाषा और संस्कृति को भी स्थापित किया।
इस कारण मारवाड़ी आज—

  • मुंबई,
  • कोलकाता,
  • बैंगलोर,
  • चेन्नई,
  • दिल्ली,
  • सूरत

में भी आसानी से सुनी और समझी जाती है।

भाषाई संरचना एवं अभिव्यक्तिमूलक सौंदर्य

मारवाड़ी भावनाओं को व्यक्त करने में अत्यंत सक्षम है।
इसमें प्रेम, कोमलता, अनुशासन, वीरता, कृतज्ञता—सभी प्रकार की अभिव्यक्तियों के लिए उपयुक्त शब्दावली और ध्वनियाँ मिलती हैं।

दाहरण—

  • घणों प्रेम करूं छूँ
  • थारे बिना मन रीझे नाहीं
  • म्हारो राजस्थान रीं धरती

इनमें लय, माधुर्य और आत्मीयता सभी झलकते हैं।

आधुनिक समय में मारवाड़ी की स्थिति

आज भी मारवाड़ी भाषा अपने बोलने वालों के बीच जीवंत और लोकप्रिय है।
हालाँकि युवाओं में खड़ी हिन्दी और अंग्रेज़ी के प्रभाव के कारण इसमें कुछ परिवर्तन अवश्य आए हैं, परंतु—

  • लोकसंगीत,
  • नाटक,
  • YouTube और सोशल मीडिया,
  • साहित्यिक मंच
  • क्षेत्रीय फिल्में

मिलकर इस भाषा को नए रूप में प्रसारित कर रहे हैं।

मारवाड़ी भाषा संरक्षण के प्रयास

– कई संगठनों द्वारा भाषा-शिविर आयोजित होते हैं।
– मारवाड़ी भाषा में कहानियाँ, कविताएँ और नाटक लिखे जा रहे हैं।
– सोशल मीडिया पर मारवाड़ी सामग्री तेजी से बढ़ रही है।
– शोध संस्थान राजस्थानी-मारवाड़ी भाषा पर नए अध्ययन प्रकाशित कर रहे हैं।

मारवाड़ी भाषा के उदाहरण वाक्य

(अर्थ सहित)

मारवाड़ी वाक्यहिन्दी अर्थ
म्हारो नाम रामू छे।मेरा नाम रामू है।
थूं कूं हैलां जाय रो है?तुम कहाँ जा रहे हो?
ओ घर में कोई नाँहै।उस घर में कोई नहीं है।
थारो घणो आभार।आपका बहुत धन्यवाद।
म्हें थाने घणी याद करूँ छूँ।मैं तुम्हें बहुत याद करता हूँ।
अरै, घणी जळदी करजो!अरे, जल्दी कीजिए!
यो काम कठिण छे।यह काम कठिन है।
भूख घणी लाग री छे।बहुत भूख लग रही है।
पाणी गीलो छे, ध्यान राखजो।पानी गिरा है, सावधान रहो।
म्हारो देश राजस्थान, घणो प्यаро।मेरा प्रदेश राजस्थान बहुत प्यारा है।

मारवाड़ी उपबोलियों की तालिका

(संक्षिप्त जानकारी सहित)

उपबोलीप्रमुख क्षेत्रविशेषताएँ
जोधपुरी मारवाड़ीजोधपुर, पालीसाहित्यिक मारवाड़ी का आधार, परिष्कृत रूप
शेखावाटी मारवाड़ीझुंझुनू, सीकर, चूरूउच्चारण में विशिष्टता, ध्वनियों में कोमलता
बीकानेरी मारवाड़ीबीकानेर‘ट’, ‘ठ’ की ध्वनियों का तीखा प्रयोग
जैसलमेरी मारवाड़ीजैसलमेरथार क्षेत्र की विशिष्ट शब्दावली, सरलीकृत रूप
मालाणीबाड़मेरसिंधी से प्रभावित, रेगिस्तानी शब्दावली
थलीउत्तरी राजस्थान (पाक सीमा क्षेत्र)पंजाबी-सिंधी मिश्रित स्वरूप
मारवाड़ी (पाली-सीकारी)पाली-सिरोहीकई प्राकृत ध्वनियों का प्रयोग

मारवाड़ी लोकगीतों के प्रसिद्ध उदाहरण

मारवाड़ी लोकसंगीत राजस्थान की आत्मा है। यहाँ कुछ प्रसिद्ध लोकगीतों के अंश दिए जा रहे हैं।

1. “पधारो म्हारे देश”

राजस्थान का सबसे लोकप्रिय स्वागत-गीत।

पधारो म्हारे देश, पधारो म्हारे देश
म्हारो देश मावळो, रीझे बाजरे रा केस।

(अर्थ: हमारे देश पधारिए — यहाँ का वातावरण, भोजन और संस्कृति सब मोहक हैं।)

2. “घूमर नाच” के लोकगीत

घूमर रमतो आई, रे मारवाड़णी नाचणी
म्हारै अंगणै आवो तो, थाळ बजावूँ ल्याणी।

3. मांड शैली का गीत

केसरिया बालमा, आवो नी पधारो म्हारे देस
तुम्है बिन लागे, नहीं मोरी सजनी रै रेस।

4. वीर-लोकगीत (पाबूजी/मूमल/ढोला-मारू)

ढोला-मारू रा दूहा गाया, रेत री लहर लहराई
प्रेम कहानी अमर रहेली, मरुधरा में मिठास समाई।

5. मांगणियार-लंगा समुदाय के गीत

हुलेला, हुलेला… मारा लालरा रो हुलेला
ढोलक-सरंगी री सुरधुन पर, थारै घर में खुशबू फैला।

मारवाड़ी साहित्य का विस्तृत इतिहास

(संक्षिप्त लेकिन शोधपरक, आर्टिकल में जोड़ने योग्य)

1. प्राकृत–अपभ्रंश से उद्भव

मारवाड़ी का मूल शौरसेनी अपभ्रंश माना गया है। प्राकृत से विकसित होकर यह 7वीं–10वीं शताब्दी में स्वतंत्र स्वरूप लेने लगी। कुवलयमाला (8वीं सदी) के भाषाई संदर्भों में “मरुदेशी भाषा” का उल्लेख मिलता है।

2. मध्यकालीन चारण–भाट परंपरा (10वीं–15वीं शताब्दी)

राजस्थानी राज्यों में चारणों व भाटों ने राजाओं, युद्धों और वंशों के इतिहास को छंदबद्ध रूप में सुरक्षित किया। इस काल की मुख्य विशेषताएँ—

  • वीर-रस प्रधानता
  • सोरठा, दोहा, रासो, छप्पय आदि छंद
  • देवता-वंशावलियों व युद्धों का वर्णन

प्रमुख कृतियाँ—

  • ढोला-मारू रा दूहा
  • पाबूजी रा पड़
  • वीरबल्लभ रासो

3. भक्ति साहित्य का उत्कर्ष (15वीं–17वीं सदी)

इस काल में संत-परंपरा प्रभावी हुई। स्थानीय बोलियों में भक्ति-रस, वैराग्य और ज्ञान-वाणी की रचना हुई।

प्रमुख संत—

  • दयालदास
  • रत्नाकर द्रव्य
  • रामदेवपीर के भक्त कवि

4. राजवंशीय संरक्षण और साहित्य (16वीं–18वीं सदी)

मेवाड़, मारवाड़, बीकानेर व जोधपुर के राजाओं ने साहित्य को संरक्षण दिया।
प्रमुख रचनाएँ—

  • कुम्भल रासो
  • जैतसिंह रासो
  • खुमाण रासो
  • देवल-चारण काव्य

5. आधुनिक काल (19वीं–20वीं सदी)

मुद्रणयंत्र आने से साहित्य विस्तार हुआ।
कहानी, नाटक, जीवनी, इतिहास, और शोध-ग्रंथों की धारा शुरू हुई।

प्रमुख आधुनिक लेखक—

  • करणीदान के. जोशी
  • मुरलीधर व्यास
  • हुकमराज हुकम
  • कन्हैयालाल सेठिया (हालाँकि वे राजस्थानी लेखक हैं, पर मारवाड़ी शब्दावली भी प्रमुख)

6. समकालीन साहित्य (21वीं सदी)

मारवाड़ी में—

  • कहानी, कविता, उपन्यास
  • लोककथाओं का संकलन
  • डिजिटल माध्यमों पर सामग्री
  • नाट्य मंचन, वेब-साहित्य

मारवाड़ी साहित्य के प्रमुख रचनाकार एवं उनका योगदान

यह सूची संक्षिप्त है; आवश्यकता हो तो मैं विस्तृत परिचय व कृतियों की सूची भी जोड़ सकता हूँ।

रचनाकार / कविप्रमुख योगदान
कुम्भा राणा‘कुंभलगढ़ का साहित्य’ और मारवाड़ी वीर-परंपरा को नई दिशा दी।
करणीदान के. जोशीआधुनिक मारवाड़ी साहित्य के आधार-स्तंभ; कहानियाँ, नाटक, उपन्यास।
हुकमराज ‘हुकमाराम’मारवाड़ी लोककविता के सिद्धहस्त रचनाकार।
भवानीदासचारण काव्य परंपरा के प्रमुख कवि; वीर-रस के लिए प्रसिद्ध।
दयालदास ‘दयाल’मारवाड़ी भक्ति-साहित्य के प्रमुख स्तंभ।
रत्नाकर द्रव्यसंत-काव्य परंपरा में उल्लेखनीय योगदान।
निजामुद्दीनसूफी प्रभाव और मारवाड़ी मिश्रित काव्य।
मुरलीधर व्यासइतिहास, संस्कृति और समाजशास्त्र पर मारवाड़ी रचनाएँ।
गंगाराम जी ‘सोढ़ा’राजस्थानी-मारवाड़ी वंशावली और लोककथाओं का संकलन।

प्रमुख मारवाड़ी लोक-नृत्य, वाद्य और वेशभूषा

1. प्रमुख लोक-नृत्य

  • घूमर — स्त्रियों का समूह नृत्य; गोल घाघरा की सुंदर घूमन।
  • तेरह ताली — खाँ-भाट महिलाओं का नृत्य, घुँघरुओं की तेरह तालियाँ।
  • कालबेलिया — कालबेलिया जनजाति का सर्प-नृत्य।
  • भवई — सिर पर घड़ों को संतुलित करते हुए नृत्य।
  • मांड — राजस्थानी शाही दरबारों में प्रचलित नृत्य-शैली।

2. प्रमुख लोक-वाध्य

  • कमायचा — मांगणियारों का प्रमुख तार वाद्य।
  • सरंगी — लोकगीतो का आधार।
  • ढोलक, ढोल, नगाड़ा
  • एकतारा, भपंग, खड़ताल
  • सिंदूरा, शहनाई

3. वेशभूषा

पुरुष — धोती-कुर्ता, अंगरखा, पगड़ी (साफा), जूती।
महिला — घाघरा–ओढ़णी–कांचली, चूड़ियाँ, बाजूबंद, बोरला।

मारवाड़ी लिपि और लेखन परंपरा

मारवाड़ी भाषा मूलतः देवनागरी में लिखी जाती है, लेकिन इतिहास में कई लिपियों का उपयोग हुआ—

1. देवनागरी लिपि

आज की मानक मारवाड़ी इसी में लिखी जाती है।

2. महाजनी लिपि

पुराने व्यापारियों की लेखा-जोखा लिपि।
सरल और संक्षिप्त प्रतीकों वाली।

3. मोडी लिपि (सीमित प्रयोग)

कुछ क्षेत्रों में प्रशासनिक उपयोग, पर मारवाड़ी के साथ दर्ज नहीं।

4. नागरी का विकास

19वीं–20वीं सदी में देवनागरी को ही आधिकारिक रूप से स्वीकृति मिली।
सभी आधुनिक साहित्य, शिक्षा, परीक्षा, समाचार-पत्र इसी लिपि में छपते हैं।

मारवाड़ी–हिन्दी शब्दकोष (संक्षिप्त नमूना)

मारवाड़ी शब्दहिन्दी अर्थटिप्पणी
घणीबहुतमात्रा सूचक
थारोतुम्हारा / आपकासर्वनाम रूप
म्हारोमेरासर्वनाम रूप
कांईक्याप्रश्नवाचक
केसू / केसरोकेसरपुष्प/मसाला
रोकोमत (रोकना)आज्ञार्थक
रैका/के/कीसंबंधबोधक
जावैजाता हैक्रिया रूप
आईज्योआइएसम्मान सूचक
घोड़ो / घोड़ीघोड़ा / घोड़ीपालय पशु
पगलोमूर्खनिंदा सूचक
धणीमालिकआदरसूचक
मंदसौर / मंदरघर का आंगनघरेलू शब्द
घामधूपप्रकृति शब्द
छांयोछायाप्रकृति शब्द

मारवाड़ी मुहावरे और कहावतें

मारवाड़ी कहावतअर्थव्याख्या
ऊँट रा मुण्डा सूँ घांसी खावैबड़ी चीज से डरनाऊँट का सिर देखकर घास खाने से डरना
ढोला-मारू री जोड़ीआदर्श दंपतीप्रसिद्ध प्रेम कहानी का संकेत
नणी नणी आगरी, मोटी मोटी धलगरीछोटी समस्या बड़ी बन सकती हैचेतावनी
जितो भागो, तितो लागोजैसा कर्म, वैसा फलकर्म फल नियम
घणो बोलै, कम करैअधिक बोलने वाला कम काम करता हैव्यक्तित्व पर कटाक्ष
थारी अकल घास चरैगी?क्या तुमने होश गँवा दिया है?फटकार
चोटी बड़ी, अकल घणी छोटीदिखावा बड़ा, समझ कमव्यंग्य

निष्कर्ष

मारवाड़ी भाषा केवल एक बोली नहीं, बल्कि एक पूर्ण और समृद्ध भाषायी-सांस्कृतिक परम्परा है।
इसने राजस्थान और भारत के इतिहास, संगीत, साहित्य, लोकजीवन और व्यापार को अद्भुत रूप से प्रभावित किया है।

इसके—

  • ध्वन्यात्मक सौंदर्य,
  • साहित्यिक शक्ति,
  • व्यापक शब्द-संपदा,
  • अनूठी व्याकरणिक संरचना,
  • और जीवंत लोकपरंपरा

ने इसे राजस्थानी भाषा-परिवार की सर्वाधिक प्रतिष्ठित उपभाषा बना दिया है।

मारवाड़ी भाषा का संवर्धन और संरक्षण न केवल भाषाई उत्तराधिकार को सुरक्षित रखने का कार्य है, बल्कि यह राजस्थान की आत्मा, इतिहास और संस्कृति को सुरक्षित रखने का भी प्रयास है।


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