भारतीय भाषाओं का इतिहास अत्यंत समृद्ध और बहुआयामी है। आधुनिक हिन्दी, जिसे आज भारत की सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषा होने का गौरव प्राप्त है, अपने विकास क्रम में अनेक भाषिक चरणों, उपभाषाओं और बोलियों से होकर गुज़री है। आधुनिक मानकीकृत हिन्दी की जड़ें व्यापक रूप से पश्चिमी हिन्दी (Western Hindi) के नाम से पहचाने जाने वाले भाषिक समूह में मिलती हैं। पश्चिमी हिन्दी का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से माना जाता है, जो प्राकृत भाषाओं के मध्यकालीन रूप से उद्भवित हुई थी।
इस व्यापक भाषिक समूह के अंतर्गत पाँच प्रमुख बोलियाँ सम्मिलित मानी गई हैं—
इन सभी बोलियों का अपना विशिष्ट इतिहास, भौगोलिक क्षेत्र, ध्वन्यात्मक स्वरूप, व्याकरणिक संरचना, साहित्यिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत है। प्रस्तुत लेख में इन सभी पहलुओं का विस्तारपूर्वक अध्ययन किया गया है।
पश्चिमी हिन्दी का उद्भव और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
हिन्दी भाषा का इतिहास तीन व्यापक चरणों में विभाजित किया जाता है—
- प्राकृत चरण (संस्कृत का अपभ्रम्शित जनभाषिक रूप)
- अपभ्रंश चरण
- नवीन हिन्दी चरण
पश्चिमी हिन्दी का उद्भव शौरसेनी प्राकृत से हुआ, जो उत्तर भारत के पश्चिमी और मध्य भागों में बोली जाती थी। समय के साथ-साथ यह प्राकृत शौरसेनी अपभ्रंश के रूप में विकसित हुई। अपभ्रंश साहित्य, विशेषकर जैन काव्य परंपरा में शौरसेनी अपभ्रंश का अत्यधिक प्रयोग मिलता है।
इसी शौरसेनी अपभ्रंश से मध्यकालीन हिन्दी का विकास क्रम आगे बढ़कर अर्ध-अपभ्रंश, फिर अभ्यस्त बोलचाल और अंततः इनसे आधुनिक पश्चिमी हिन्दी की बोलियाँ बनीं।
पश्चिमी हिन्दी का भौगोलिक विस्तार
पश्चिमी हिन्दी का बोलचाल का क्षेत्र आज भी अत्यंत विस्तृत है। यह मुख्यतः निम्नलिखित प्रदेशों में फैली है—
- पश्चिमी उत्तर प्रदेश (मेरठ, मुरादाबाद, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बागपत, रामपुर, बिजनौर आदि)
- हरियाणा (पूरा प्रदेश, विशेषकर उत्तरी और पश्चिमी भाग)
- दिल्ली और NCR क्षेत्र
- मध्य प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र
- राजस्थान के कुछ सीमावर्ती क्षेत्र
- गंगा-यमुना दोआब का विस्तृत इलाका
यह भाषिक क्षेत्र न केवल भौगोलिक रूप से विस्तृत है, बल्कि सांस्कृतिक रूप से अत्यंत विविध भी है। प्रत्येक बोली में अपने-अपने क्षेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
पश्चिमी हिन्दी की प्रमुख बोलियाँ
अब हम पश्चिमी हिन्दी की सभी पाँच बोलियों का विस्तारपूर्वक अध्ययन करते हैं।
(1) खड़ी बोली (कौरवी): आधुनिक हिन्दी और उर्दू की आधारभूत बोली
खड़ी बोली का क्षेत्र
खड़ी बोली मुख्यतः उत्तर प्रदेश के निम्न जिलों में बोली जाती है—
- मेरठ
- सहारनपुर
- मुजफ्फरनगर
- मुरादाबाद
- बिजनौर
- बागपत
- रामपुर
- आसपास के ग्रामीण क्षेत्र
इन क्षेत्रों में बोली जाने वाली स्थानीय कौरवी बोली को ही खड़ी बोली का मूल स्वरूप माना जाता है।
खड़ी बोली का ऐतिहासिक विकास
खड़ी बोली ने मध्यकाल में उर्दू और आधुनिक हिन्दी दोनों के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुगल दरबार, विशेषकर दिल्ली और आगरा के आसपास, फ़ारसी-अरबी मिश्रित जिस भाषा का विकास हुआ, वह आगे चलकर उर्दू के रूप में जानी गई।
भारतीय पुनर्जागरण (19वीं शताब्दी) में भारतेन्दु हरिश्चंद्र एवं अन्य साहित्यकारों ने खड़ी बोली आधारित नागरी हिन्दी को मानकीकृत किया। परिणामस्वरूप यह भाषा प्रशासन, शिक्षा, साहित्य और मीडिया की भाषा बन गई।
खड़ी बोली की विशेषताएँ
- वाक्य रचना सरल और तर्कसंगत
- शब्दावली में तद्भव और तत्सम शब्दों का संतुलित प्रयोग
- ध्वनियों में स्पष्टता
- क्रियापद क्रम अपेक्षाकृत नियमित
- मानकीकरण में अत्यंत सहज
इस बोली के आधार पर ही आज की आधुनिक मानक हिन्दी एवं उर्दू की नींव रखी गई है।
(2) हरियाणवी (बांगरू): पंजाबी और राजस्थानी प्रभाव से समृद्ध बोली
हरियाणा की प्रमुख जनभाषा हरियाणवी या बांगरू है। इसे कुछ स्थानों पर जाटू भी कहा जाता है। हरियाणवी का क्षेत्र केवल हरियाणा तक सीमित नहीं, बल्कि—
- दिल्ली का ग्रामीण इलाका
- राजस्थान की उत्तर-पूर्वी सीमा
- पंजाब का दक्षिण-पूर्वी भाग
तक फैला हुआ है।
हरियाणवी की भाषिक विशेषताएँ
हरियाणवी में पंजाबी, राजस्थानी और ब्रजभाषा—तीनों का मिलाजुला प्रभाव मिलता है।
- ध्वनियों में टन-टन जैसी उच्चारण शैली
- ‘सा’, ‘से’ की जगह ‘ते’, ‘के’
- ‘मैं बोलूँ’ → ‘मैं बोलूँ सूँ’
- ‘तू जाएगा?’ → ‘तूं जैगा?’
यह बोली अत्यंत सरल, स्पष्ट, ग्रामीण और स्वाभाविक मानी जाती है।
हरियाणवी और खड़ी बोली का संबंध
कुछ विद्वान मानते हैं कि बांगरू वास्तव में खड़ी बोली का एक प्रांतीय रूप है, जिसमें पंजाबी और राजस्थानी प्रभावों के कारण उच्चारण और व्याकरण में परिवर्तन दिखाई देता है।
(3) ब्रजभाषा: हिंदी साहित्य की अप्रतिम काव्यभाषा
ब्रजभाषा पश्चिमी हिन्दी की वह बोली है जिसने हिंदी साहित्य को सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्रदान की। यह मुख्यतः ब्रजमंडल में बोली जाती है—
- मथुरा
- वृंदावन
- आगरा के कुछ क्षेत्र
- हाथरस
- एटा
- अलीगढ़
- भरतपुर (राजस्थान)
ब्रजभाषा का हृदयस्थल मथुरा-वृंदावन माना जाता है, इसलिए इसे कृष्णभक्ति की मुख्य भाषा भी कहा गया।
मध्यकाल में ब्रजभाषा की साहित्यिक श्रेष्ठता
हिंदी साहित्य के ‘भक्ति काल’ और ‘रीति काल’ में ब्रजभाषा सर्वोच्च स्थान पर रही।
सूरदास, कृष्णदास, कविप्रिया, केशव, घनानंद, भूषण, लल्लू जी, कविभूषण आदि कवियों ने ब्रजभाषा को हिंदी साहित्य की उच्चतम शिखर तक पहुँचाया।
ब्रजभाषा की विशेषताएँ
- ध्वनियाँ मधुर और कोमल
- भावनात्मक अभिव्यक्ति में अत्यंत सक्षम
- संस्कृत, अवधी, अपभ्रंश और स्थानीय शब्दों का सुंदर मिश्रण
- कृष्णभक्ति के प्रमुख ग्रंथ इसी भाषा में
ब्रजभाषा को केवल बोली न मानकर ‘काव्यभाषा’ के रूप में सम्मानित किया गया।
(4) कन्नौजी: ब्रजभाषा से अत्यधिक साम्य रखने वाली बोली
कन्नौजी बोली मुख्यतः गंगा नदी के मध्य दोआब में बोली जाती है—
- कन्नौज
- फर्रुखाबाद
- उन्नाव
- कन्नौज के आसपास का पूरा इलाका
कन्नौजी का भौगोलिक स्थान दो प्रमुख भाषिक क्षेत्रों के बीच आता है—
- पश्चिम में ब्रजमंडल
- पूर्व में अवधी क्षेत्र
इसलिए कन्नौजी पर दोनों भाषाओं का प्रभाव दिखाई देता है।
कन्नौजी और ब्रजभाषा का घनिष्ठ संबंध
कन्नौजी बोली इतनी अधिक ब्रजभाषा से मिलती-जुलती है कि इसमें लिखी गई अधिकांश रचनाओं को ब्रजभाषा साहित्य का ही अंग माना जाता रहा है।
कन्नौजी की ध्वनियों में कोमलता और तान, ब्रजभाषा के समान है।
- ‘तुम कहाँ जा रहे हो?’ → ‘तुम का जा रओ हो?’
- ‘मैंने कहा था’ → ‘मोँ कहो थो’
कन्नौजी बोलचाल में अत्यंत सरल और सघन मानी जाती है।
(5) बुंदेली: बुंदेलखंड की सशक्त उपभाषा
बुंदेली मुख्यतः बुंदेलखंड क्षेत्र में बोली जाती है—
- मध्य प्रदेश: छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, दमोह, सागर, विदिशा
- उत्तर प्रदेश: झाँसी, बांदा, महोबा, हमीरपुर
बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचान—बीर रस, वीरांगनाएँ, झाँसी की रानी, आल्हा-ऊदल की परंपरा, लोकगीत और लोकनृत्य—इसी भाषा में अभिव्यक्त हुई है।
बुंदेली की भाषिक विशेषताएँ
- स्वर-व्यंजन ध्वनियों में कठोरता और ताकत
- वीर रस की अभिव्यक्ति में सक्षम
- राजस्थान और अवधी—दोनों से भाषिक समानताएँ
- अनेक स्थानीय शब्द और विशिष्ट उच्चारण शैली
- ‘अस’ और ‘इस’ की ध्वनियों का प्रचुर प्रयोग
बुंदेलखंड में अनेक ब्रजभाषा कवि हुए हैं जिनकी भाषा पर बुंदेली का स्पष्ट प्रभाव देखा जाता है।
4. पश्चिमी हिन्दी की ध्वन्यात्मक और व्याकरणिक विशेषताएँ
पश्चिमी हिन्दी की सभी बोलियों में कुछ समान संरचनात्मक विशेषताएँ भी दिखाई देती हैं—
(1) ध्वन्यात्मक विशेषताएँ
- ख और घ का स्पष्ट उच्चारण
- बोलचाल में स, श, ष के स्थान पर केवल स का प्रयोग
- र ध्वनि को विशेष महत्त्व
(2) व्याकरणिक विशेषताएँ
- क्रिया रूपों में समानता: “जा रहा हूँ”, “कहूँगा” आदि
- अनेक बोलियों में ‘है’ और ‘हैं’ का प्रादेशिक रूप
- सर्वनामों में विविधता: ‘तू’, ‘तुम’, ‘थारे’, ‘तेरे’, ‘तोरे’
(3) शब्दावली की विशेषताएँ
- स्थानीय तद्भव शब्दों का प्रचुर प्रयोग
- कृषिप्रधान और ग्रामीण जीवन से जुड़े शब्दों की बहुतायत
- प्राकृत और अपभ्रंश के अनेक शब्द आज भी जीवित
साहित्य में पश्चिमी हिन्दी का योगदान
पश्चिमी हिन्दी की बोलियों ने सदियों से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है।
खड़ी बोली साहित्य
- आधुनिक काल का संपूर्ण साहित्य
- नाटक, कविता, पत्रकारिता, उपन्यास
ब्रजभाषा साहित्य
- मध्यकाल की सर्वोच्च काव्यधारा (विशेषकर भक्ति और रीतिकाल)
- समस्त हिंदी प्रदेश की साहित्यिक भाषा
बुंदेली साहित्य
- आल्हा-ऊदल की परंपरा
- वीर रस के प्रसिद्ध काव्य
- लोकगीत, लोककथाएँ
कन्नौजी और हरियाणवी
- क्षेत्रीय साहित्य और लोकगीत
- हास्य-व्यंग्य की अद्भुत परंपरा
आधुनिक समय में पश्चिमी हिन्दी की स्थिति
आधुनिक संचार साधनों, शिक्षा, मीडिया और इंटरनेट के प्रसार से—
- खड़ी बोली आधारित मानक हिन्दी पूरे भारत में प्रमुख भाषा बन गई है।
- हरियाणवी, ब्रजभाषा, बुंदेली जैसी बोलियों का फिल्म, वेब-सीरीज़ और सोशल मीडिया के माध्यम से पुनर्जागरण हुआ है।
- लोकगीत—हरियाणवी रागिनी, ब्रज की होली, बुंदेलखंडी फाग—आज भी लोकप्रिय हैं।
- भाषाई पहचान और सांस्कृतिक विरासत का भाव पहले की तुलना में और अधिक मज़बूत हुआ है।
निष्कर्ष
पश्चिमी हिन्दी न केवल भाषिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और साहित्यिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध परंपरा का वाहक है। इसकी पाँच प्रमुख बोलियाँ—खड़ी बोली, हरियाणवी, ब्रजभाषा, कन्नौजी और बुंदेली—उत्तर भारत की सांस्कृतिक आत्मा को प्रकट करती हैं।
खड़ी बोली ने आधुनिक हिन्दी और उर्दू को जनमी, ब्रजभाषा ने हिंदी साहित्य को अपूर्व उन्नति दी, बुंदेली ने वीर रस और लोकपरंपरा को सँभाला, कन्नौजी ने मध्य दोआब के सांस्कृतिक जीवन को अभिव्यक्त किया और हरियाणवी ने उत्तर भारत के ग्रामीण हृदय की सहजता को भाषा दी।
इस प्रकार पश्चिमी हिन्दी का इतिहास केवल भाषाओं का इतिहास नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत की सांस्कृतिक यात्रा का इतिहास है।
इन्हें भी देखें –
- राजस्थानी भाषा : इतिहास, विकास, बोलियाँ और साहित्यिक परंपरा
- पहाड़ी हिन्दी : उत्पत्ति, विकास, बोलियाँ और भाषाई विशेषताएँ
- मालवी भाषा : उद्भव, स्वरूप, विशेषताएँ और साहित्यिक परंपरा
- वागड़ी भाषा : इतिहास, स्वरूप, विशेषताएँ और सांस्कृतिक महत्ता
- मेवाती भाषा : इतिहास, बोली क्षेत्र, भाषाई संरचना, साहित्य और आधुनिक स्वरूप
- हाड़ौती भाषा: राजस्थान की एक समृद्ध उपभाषा का भाषिक और सांस्कृतिक अध्ययन
- हिन्दी एकांकी: इतिहास, कालक्रम, विकास, स्वरुप और प्रमुख एकांकीकार
- हिन्दी निबंध साहित्य: परिभाषा, स्वरूप, विकास, विशेषताएं, भेद और उदाहरण
- हिन्दी के यात्रा-वृत्त और यात्रा-वृत्तान्तकार – लेखक और रचनाएँ
- कौरवी बोली और नगरी (नागरी) बोली : उद्भव, क्षेत्र, विशेषताएँ और आधुनिक हिन्दी पर प्रभाव
- हिन्दी की बोलियाँ : विकास, स्वरूप, उपभाषा, वर्गीकरण और साहित्यिक योगदान