भारतीय बौद्धिक परंपरा में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहते, बल्कि राजनीति, दर्शन, साहित्य, शिक्षा और सामाजिक चेतना—सभी क्षेत्रों में समान अधिकार से अपनी छाप छोड़ते हैं। डॉ. सम्पूर्णानन्द ऐसे ही विलक्षण व्यक्तित्व थे। वे एक कुशल राजनीतिज्ञ, प्रखर विचारक, महान शिक्षाविद् और समर्थ साहित्यकार थे। उनके जीवन और कृतित्व का समग्र अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि वे विचार और कर्म—दोनों स्तरों पर समाज को दिशा देने वाले मनीषी थे।
डॉ. सम्पूर्णानन्द का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे जितने बड़े दार्शनिक थे, उतने ही गंभीर चिंतक भी थे; जितने प्रकांड विद्वान थे, उतने ही सरल हृदय और जनसरोकारों से जुड़े हुए राजनेता भी थे। उन्होंने अपने विवेचनात्मक निबंधों, वैचारिक ग्रंथों और राजनीतिक लेखन के माध्यम से जनता तथा साहित्य-प्रेमियों को नए ढंग से सोचने-विचारने की प्रेरणा दी। उनका संपूर्ण जीवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, नवजागरण, शिक्षा-सुधार और सांस्कृतिक पुनरुत्थान से गहराई से जुड़ा रहा।
डॉ. सम्पूर्णानन्द : संक्षिप्त जीवन-परिचय (तालिका)
| विषय | विवरण |
|---|---|
| पूरा नाम | डॉ. सम्पूर्णानन्द |
| जन्म तिथि | 1 जनवरी, 1891 ई. |
| जन्म स्थान | बनारस (वर्तमान वाराणसी), उत्तर प्रदेश, भारत |
| पिता का नाम | विजयानन्द |
| मृत्यु तिथि | 10 जनवरी, 1969 ई. |
| मृत्यु स्थान | वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत |
| राष्ट्रीयता | भारतीय |
| पेशा / कार्यक्षेत्र | अध्यापक, लेखक, साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ |
| प्रमुख साहित्यिक उपाधि | साहित्य वाचस्पति |
| प्रमुख रचनाएँ | चिद्विलास, पृथ्वी से सप्तर्षि मण्डल, ज्योतिर्विनोद, गणेश, ब्राह्मण सावधान, पुरुषसूक्त, चीन की राज्य क्रान्ति, मिस्र की राज्य क्रान्ति आदि |
| भाषा-शैली | संस्कृत की तत्सम शब्दावली से युक्त परिष्कृत हिन्दी भाषा |
| प्रमुख साहित्यिक शैली | विवेचनात्मक एवं गवेषणात्मक शैली (अन्य शैलियों का भी प्रयोग) |
| साहित्य में स्थान | एक प्रबुद्ध विचारक, शिक्षाविद्, राजनीतिज्ञ एवं समर्थ साहित्यकार |
| संपादन कार्य | ‘मर्यादा’ मासिक पत्र, ‘टुडे’ अंग्रेजी दैनिक |
| पुरस्कार / सम्मान | मंगलाप्रसाद पारितोषिक |
| उल्लेखनीय योगदान | सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका |
डॉ. सम्पूर्णानन्द जी का जीवन परिचय
डॉ. सम्पूर्णानन्द आधुनिक भारत के उन विरल व्यक्तित्वों में से थे, जिनके जीवन में ज्ञान, कर्म और राष्ट्रसेवा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। वे एक कुशल राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ प्रखर विचारक, महान शिक्षाविद् और समर्थ साहित्यकार भी थे। उनका जीवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, शिक्षा-सुधार और सांस्कृतिक चेतना से गहराई से जुड़ा रहा। सादगी, विद्वत्ता और वैचारिक दृढ़ता उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ थीं। उनके जीवन-कार्य का अध्ययन भारतीय बौद्धिक परंपरा को समझने की एक सशक्त कुंजी प्रदान करता है।
जन्म, पारिवारिक पृष्ठभूमि और प्रारम्भिक जीवन
डॉ. सम्पूर्णानन्द का जन्म 01 जनवरी सन् 1891 ई. में काशी (बनारस) में एक संभ्रांत कायस्थ परिवार में हुआ। काशी उस समय भारतीय संस्कृति, दर्शन और शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र थी। इस सांस्कृतिक वातावरण का उनके व्यक्तित्व के निर्माण में गहरा प्रभाव पड़ा।
उनके पिता श्री विजयानन्द धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। घर का वातावरण सात्त्विक, अनुशासित और संस्कारप्रधान था। पिता की धार्मिक चेतना और नैतिक दृढ़ता का प्रभाव सम्पूर्णानन्द जी के जीवन पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही कारण है कि वे आधुनिक शिक्षा से दीक्षित होने के बावजूद भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों से कभी विमुख नहीं हुए।
बाल्यकाल से ही वे अध्ययनशील, गंभीर और चिंतनशील स्वभाव के थे। उनमें जिज्ञासा, तर्कशीलता और विषयों को गहराई से समझने की प्रवृत्ति बचपन से ही दिखाई देने लगी थी।
शिक्षा और बौद्धिक निर्माण
डॉ. सम्पूर्णानन्द ने क्वीन्स कॉलेज, बनारस से बी.एस.सी. (B.Sc.) की परीक्षा उत्तीर्ण की। यह तथ्य उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कप्रधान सोच को दर्शाता है। विज्ञान की शिक्षा ने उन्हें वस्तुनिष्ठता, विश्लेषण और तार्किकता प्रदान की, जो आगे चलकर उनके दर्शन, निबंधों और राजनीतिक विचारों में स्पष्ट रूप से झलकती है।
इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद से एल.टी. (Licentiate in Teaching) की परीक्षा उत्तीर्ण की। इस प्रशिक्षण ने उन्हें एक सशक्त शिक्षक और शिक्षाविद् के रूप में विकसित किया। शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं था, बल्कि वे शिक्षा को समाज-निर्माण का सशक्त माध्यम मानते थे।
अध्यापन जीवन और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
शिक्षा पूर्ण करने के उपरान्त डॉ. सम्पूर्णानन्द ने अपने जीवन की शुरुआत अध्यापक के रूप में की। उनकी प्रथम नियुक्ति प्रेम विद्यालय, वृन्दावन में हुई। यहाँ उन्होंने अध्यापन कार्य को केवल नौकरी नहीं, बल्कि एक सामाजिक दायित्व के रूप में निभाया।
कुछ समय बाद उन्हें डूंगरमल कॉलेज, बीकानेर का प्रिंसिपल नियुक्त किया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने प्रशासनिक कुशलता, अनुशासन और शैक्षणिक गुणवत्ता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। विद्यार्थियों और शिक्षकों के साथ उनका व्यवहार सरल, प्रेरणादायक और आदर्शपूर्ण था।
स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी
सन् 1921 ई. में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन ने डॉ. सम्पूर्णानन्द के जीवन की दिशा बदल दी। देश की स्वतंत्रता उनके लिए व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी। उन्होंने प्रिंसिपल जैसे प्रतिष्ठित पद से त्यागपत्र देकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी का निर्णय लिया।
नौकरी छोड़ने के बाद वे काशी लौट आए और ‘ज्ञान मंडल’ में कार्य करने लगे। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार और बौद्धिक जागरण का कार्य किया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल यात्रा भी करनी पड़ी, परंतु उनका संकल्प कभी कमजोर नहीं हुआ।
पत्रकारिता और संपादन कार्य
स्वतंत्रता आंदोलन के समय विचारों के प्रचार-प्रसार में पत्रकारिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। डॉ. सम्पूर्णानन्द ने इस क्षेत्र में भी सक्रिय योगदान दिया।
उन्होंने ‘मर्यादा’ नामक हिंदी मासिक पत्र और ‘टुडे’ नामक अंग्रेजी दैनिक का संपादन किया। इन पत्रों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर निर्भीक लेखन किया। उनकी भाषा स्पष्ट, तर्कपूर्ण और प्रभावशाली थी। वे पत्रकारिता को भी राष्ट्रसेवा का माध्यम मानते थे।
स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक जीवन
भारत की स्वतंत्रता के बाद डॉ. सम्पूर्णानन्द का राजनीतिक जीवन और भी सक्रिय हो गया। वे उत्तर प्रदेश सरकार में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर आसीन रहे—
- गृह मंत्री
- शिक्षा मंत्री
- मुख्यमंत्री
शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने शिक्षा-व्यवस्था को राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया। मुख्यमंत्री के रूप में वे सादगी, ईमानदारी और प्रशासनिक दृढ़ता के लिए जाने गए।
सन् 1962 ई. में उन्हें राजस्थान का राज्यपाल नियुक्त किया गया। इस संवैधानिक पद पर रहते हुए भी उन्होंने लोकतांत्रिक मर्यादाओं और नैतिक मूल्यों का पालन किया।
काशी विद्यापीठ और अंतिम जीवन
राज्यपाल पद से कार्यमुक्त होने के बाद डॉ. सम्पूर्णानन्द पुनः काशी लौट आए। यहाँ वे काशी विद्यापीठ के कुलपति बने और मृत्यु-पर्यंत इस पद पर बने रहे।
काशी विद्यापीठ उनके लिए केवल एक शैक्षणिक संस्था नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र थी। उन्होंने विद्यापीठ को वैचारिक दृढ़ता और शैक्षणिक गरिमा प्रदान की।
10 जनवरी, 1969 ई. को उनका निधन हुआ और उनका शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया, किंतु उनका विचार-जगत आज भी जीवित है।
डॉ. सम्पूर्णानन्द की साहित्यिक कृतियाँ
(क) निबंध-संग्रह
डॉ. सम्पूर्णानन्द हिंदी के श्रेष्ठ निबंधकारों में गिने जाते हैं। उनके निबंध विवेचनात्मक, विचारप्रधान और बौद्धिक स्तर पर समृद्ध हैं—
- चिद्विलास
- पृथ्वी से सप्तर्षि मंडल
- ज्योतिर्विनोद
- अंतरिक्ष यात्रा
- भाषा की शक्ति
- जीवन और दर्शन
इन निबंधों में विज्ञान, दर्शन, भाषा, संस्कृति और जीवन-दृष्टि का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
(ख) धर्म-संबंधी रचनाएँ
धर्म के क्षेत्र में उनके ग्रंथ भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की वैज्ञानिक और विवेकपूर्ण व्याख्या प्रस्तुत करते हैं—
- गणेश
- ब्राह्मण सावधान
- पुरुषसूक्त
- हिंदू देव-परिवार का विकास
(ग) राजनीति और इतिहास संबंधी ग्रंथ
राजनीति और इतिहास पर उनके ग्रंथ गहन अध्ययन और मौलिक दृष्टि के परिचायक हैं—
- चीन की राज्य क्रांति
- मिस्र की राज्य क्रांति
- समाजवाद
- आर्यों का आदि देश
- सम्राट हर्षवर्धन
- भारत के देशी राज्य
- अधूरी क्रांति
(घ) जीवनी साहित्य
उन्होंने महान राष्ट्रीय नेताओं की जीवनियाँ भी लिखीं—
- देशबंधु चितरंजन दास
- महात्मा गांधी
सम्मान और उपाधियाँ
डॉ. सम्पूर्णानन्द की कृति ‘समाजवाद’ के लिए हिंदी साहित्य सम्मेलन ने उन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्रदान किया। इसके अतिरिक्त उन्हें ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि से सम्मानित किया गया, जो उनके साहित्यिक योगदान की उच्च मान्यता है।
डॉ. सम्पूर्णानन्द जी की भाषागत विशेषताएँ
डॉ. सम्पूर्णानन्द की भाषा उनके विषय-वस्तु के पूर्णतः अनुकूल दिखाई देती है। वे विषय की प्रकृति के अनुसार भाषा-रूप का चयन करने वाले सजग लेखक थे। दार्शनिक और विवेचनात्मक निबंधों में उन्होंने संस्कृत-निष्ठ, तत्सम शब्दावली से युक्त गंभीर भाषा का प्रयोग किया है, परंतु यह गंभीरता कहीं भी बोझिल या दुरूह नहीं बनती। उनकी भाषा में वैचारिक गहनता होते हुए भी सहज प्रवाह बना रहता है।
सामान्य विषयों पर लिखे गए निबंधों में उनकी भाषा सरल, स्वाभाविक और पाठक-सुलभ है। ऐसे निबंधों में प्रचलित अंग्रेज़ी और उर्दू के शब्द भी स्वाभाविक रूप से प्रयुक्त हुए हैं, जिससे भाषा अधिक जीवंत और व्यवहारिक बन गई है। डॉ. सम्पूर्णानन्द भाषा के मर्मज्ञ थे; उन्हें शब्दों के सूक्ष्म अर्थ-बोध का गहरा ज्ञान था। इसी कारण उनकी रचनाओं में शब्द-चयन अत्यंत सटीक, सार्थक और विचारों को स्पष्ट करने वाला है।
उनकी भाषा में मुहावरों का प्रयोग बहुत सीमित मात्रा में मिलता है। जहाँ कहीं मुहावरों का प्रयोग हुआ भी है, वहाँ वे अत्यंत सामान्य और प्रचलित हैं, जैसे— ‘धर्म संकट में पड़ना’ अथवा ‘गम गलत करना’। कुल मिलाकर उनकी भाषा का प्रमुख गुण स्पष्टता, सुबोधता और वैचारिक पारदर्शिता है। यहाँ तक कि गूढ़ दार्शनिक विषयों पर लिखे गए निबंधों में भी जटिलता या अस्पष्टता नहीं आने पाती।
डॉ. सम्पूर्णानन्द जी की निबंध-शैली : विविध रूप
डॉ. सम्पूर्णानन्द के निबंधों की एक प्रमुख विशेषता यह है कि उनकी शैली विषय के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। वे किसी एक शैली तक सीमित नहीं रहे, बल्कि विचारों की प्रकृति के अनुसार विविध शैलियों का सफल प्रयोग किया। उनकी प्रमुख शैलियाँ निम्नलिखित हैं—
1. विवेचनात्मक शैली
डॉ. सम्पूर्णानन्द की मौलिक निबंध-रचनाओं में विवेचनात्मक शैली का व्यापक प्रयोग मिलता है। इस शैली में वे किसी विषय का तार्किक विश्लेषण करते हुए अपने विचार क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करते हैं। वाक्य प्रायः दीर्घ होते हैं, किंतु उनमें विचारों की स्पष्ट श्रृंखला बनी रहती है। इस शैली में गम्भीरता के साथ-साथ उनके स्वतंत्र चिंतन और दार्शनिक दृष्टि की स्पष्ट झलक मिलती है।
उदाहरणतः—
“जब तक आत्म-साक्षात्कार नहीं होता, तब तक अपूर्णता की अनुभूति बनी रहती है और आनन्द की खोज निरंतर चलती रहती है।”
2. गवेषणात्मक (अनुसंधानात्मक) शैली
जहाँ विषय शोधपरक, दार्शनिक या आलोचनात्मक होता है, वहाँ डॉ. सम्पूर्णानन्द गवेषणात्मक शैली को अपनाते हैं। धर्म, दर्शन और वैचारिक समीक्षा से संबंधित अधिकांश निबंधों में यह शैली प्रमुख रूप से दिखाई देती है। इस शैली में तर्क, प्रमाण और चिंतन का संतुलित समावेश होता है।
उदाहरण के रूप में—
“आत्मा अजर और अमर है। उसमें अनंत ज्ञान, शक्ति और आनन्द निहित है। जहाँ ज्ञान है, वहाँ शक्ति स्वतः उपस्थित होती है और जहाँ ज्ञान तथा शक्ति का समन्वय होता है, वहाँ आनन्द का अनुभव अनिवार्य है।”
3. सूत्रात्मक शैली
डॉ. सम्पूर्णानन्द ने अपने कुछ निबंधों में सूत्रात्मक शैली का भी प्रयोग किया है। इस शैली में वे अपने गहन विचारों को संक्षिप्त, प्रभावशाली और सूक्ति-रूप में प्रस्तुत करते हैं। ऐसे वाक्य पाठक के मन पर गहरी छाप छोड़ते हैं और दीर्घ विचार को अल्प शब्दों में व्यक्त कर देते हैं।
जैसे—
- आत्मा अजर-अमर है।
- आत्म-साक्षात्कार का प्रमुख साधन योगाभ्यास है।
- एकाग्रता ही आत्मबोध की मूल कुंजी है।
4. व्याख्यात्मक शैली
जहाँ किसी विषय की विस्तार से व्याख्या करना आवश्यक होता है, वहाँ डॉ. सम्पूर्णानन्द व्याख्यात्मक शैली का सहारा लेते हैं। चूँकि वे मूलतः एक शिक्षक थे, इसलिए जटिल विषयों को सरल, क्रमबद्ध और उदाहरणों के माध्यम से समझाने में उन्हें विशेष दक्षता प्राप्त थी। उनकी यह शैली पाठक को विषय से जोड़ने में अत्यंत सहायक सिद्ध होती है।
उदाहरणस्वरूप—
“अध्यापक का यह कर्तव्य है कि वह छात्र के भीतर सौन्दर्य-बोध के प्रति प्रेम जाग्रत करे। यह स्मरणीय है कि सौन्दर्य के प्रति प्रेम भी निष्काम भावना से जुड़ा होता है।”
इस प्रकार कहा जा सकता है कि डॉ. सम्पूर्णानन्द की भाषा और शैली—दोनों ही उनकी बौद्धिक परिपक्वता और विषयगत गंभीरता की सशक्त अभिव्यक्ति हैं। उनकी भाषा जहाँ एक ओर विचारों की स्पष्ट वाहक है, वहीं शैली पाठक को वैचारिक यात्रा पर सहजता से आगे बढ़ाती है। यही कारण है कि उनके निबंध आज भी बौद्धिक साहित्य में विशेष महत्व रखते हैं।
हिन्दी साहित्य में डॉ. सम्पूर्णानन्द जी का स्थान
डॉ. सम्पूर्णानन्द हिन्दी साहित्य के उन विरल व्यक्तित्वों में से हैं, जिन्होंने साहित्य को केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे वैचारिक चेतना और बौद्धिक विमर्श का सशक्त साधन बनाया। उनकी पहचान एक ऐसे मनीषी के रूप में स्थापित होती है, जिसमें विचारक, शिक्षाविद्, राजनीतिज्ञ और साहित्यकार—चारों रूपों का संतुलित समन्वय दिखाई देता है। यही बहुआयामी व्यक्तित्व उनके साहित्य को विशिष्ट और प्रभावशाली बनाता है।
डॉ. सम्पूर्णानन्द की कृतियाँ उनके गहन अध्ययन, तार्किक विवेक और मौलिक चिंतन की सशक्त साक्षी हैं। उन्होंने हिन्दी निबंध को वैचारिक गंभीरता और बौद्धिक गरिमा प्रदान की। उनके निबंधों में दर्शन, संस्कृति, समाज, राजनीति और जीवन-दृष्टि का ऐसा समन्वय मिलता है, जो हिन्दी गद्य को नई दिशा देने वाला सिद्ध हुआ। वे उन लेखकों में थे, जिन्होंने हिन्दी को गूढ़ और जटिल विषयों की अभिव्यक्ति के योग्य सिद्ध किया।
उनकी कुछ कृतियाँ अपने-अपने विषयों पर हिन्दी की प्रतिनिधि रचनाओं के रूप में मानी जाती हैं। विशेष रूप से ‘चिद्विलास’ और ‘समाजवाद’ जैसी रचनाएँ न केवल उनकी वैचारिक क्षमता को रेखांकित करती हैं, बल्कि हिन्दी साहित्य में विचारप्रधान निबंध परंपरा को भी सुदृढ़ करती हैं। इन ग्रंथों में प्रस्तुत तर्क, विश्लेषण और निष्कर्ष आज भी प्रासंगिक माने जाते हैं।
इस प्रकार हिन्दी साहित्य में डॉ. सम्पूर्णानन्द का स्थान केवल एक लेखक का नहीं, बल्कि एक प्रबुद्ध मार्गदर्शक का है। उन्होंने साहित्य को समाज, राजनीति और दर्शन से जोड़कर उसे व्यापक संदर्भ प्रदान किया। एक मनीषी साहित्यकार के रूप में उनकी सेवाएँ हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्थायी और चिरस्मरणीय मानी जाती हैं।
निष्कर्ष
डॉ. सम्पूर्णानन्द भारतीय बौद्धिक परंपरा के ऐसे प्रतिनिधि थे, जिनमें विचार और कर्म का अद्भुत सामंजस्य देखने को मिलता है। वे एक साथ शिक्षाविद्, दार्शनिक, साहित्यकार, पत्रकार और राजनीतिज्ञ थे। उनका जीवन राष्ट्रसेवा, बौद्धिक ईमानदारी और सांस्कृतिक चेतना का आदर्श उदाहरण है।
आज के समय में, जब राजनीति और शिक्षा के बीच दूरी बढ़ती जा रही है, डॉ. सम्पूर्णानन्द जैसे व्यक्तित्व हमें यह सिखाते हैं कि सच्चा नेतृत्व वही है जो ज्ञान, नैतिकता और जनहित—तीनों से प्रेरित हो। उनका जीवन और साहित्य आने वाली पीढ़ियों के लिए निरंतर प्रेरणा-स्रोत बना रहेगा।
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