खींचना महोत्सव: परंपरा, आधुनिकता और बाल अधिकारों के बीच जटिल संघर्ष

भारत विविधताओं का देश है, जहाँ हर क्षेत्र, हर समुदाय और हर जनजाति की अपनी विशिष्ट परंपराएँ, उत्सव और सामाजिक व्यवस्थाएँ हैं। ये परंपराएँ न केवल सांस्कृतिक पहचान का आधार होती हैं, बल्कि सामुदायिक जीवन, रिश्तों और मूल्यों को भी दिशा देती हैं। किंतु जब परंपरा और आधुनिक संवैधानिक मूल्यों—विशेषकर बाल अधिकारों, शिक्षा और स्वास्थ्य—के बीच टकराव उत्पन्न होता है, तब समाज और राज्य दोनों के सामने गंभीर प्रश्न खड़े हो जाते हैं। राजस्थान के दक्षिणी जनजातीय क्षेत्रों में मनाया जाने वाला खींचना महोत्सव इसी प्रकार का एक जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दा बनकर उभरा है, जो आज परंपरा और अधिकारों के द्वंद्व का प्रतीक बन गया है।

खींचना महोत्सव: एक सांस्कृतिक परंपरा

खींचना महोत्सव, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘भगोरिया’ के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान के दक्षिणी जनजातीय जिलों—विशेषकर कोटड़ा, उदयपुर, बांसवाड़ा और डूंगरपुर—में निवास करने वाले भील और गरासिया समुदायों द्वारा परंपरागत रूप से मनाया जाता है। यह महोत्सव सामान्यतः होली के अवसर पर आयोजित किया जाता है और लगभग सात दिनों तक चलता है

पारंपरिक रूप से खींचना महोत्सव का उद्देश्य केवल उत्सव और मनोरंजन नहीं रहा है। यह जनजातीय समाज में साथी चयन की एक सामाजिक प्रक्रिया के रूप में भी कार्य करता रहा है। इस दौरान किशोर और युवा लड़के-लड़कियाँ मेलों, नृत्य, गीत और सामूहिक आयोजनों के माध्यम से एक-दूसरे को पसंद करते हैं। यदि दोनों पक्ष सहमत हों, तो लड़की लड़के के साथ चली जाती है—इसी प्रक्रिया को स्थानीय भाषा में ‘खींचना’ कहा जाता है।

इस परंपरा का मूल भाव व्यक्तिगत पसंद और सहमति रहा है, जो अपने आप में आधुनिक समाज के “choice-based relationships” से मेल खाता प्रतीत होता है। जनजातीय समाज में इसे विवाह से पहले का एक स्वाभाविक सामाजिक चरण माना जाता रहा है, जिसमें परिवार और समुदाय बाद में शामिल होते हैं।

परंपरा से समस्या तक का सफर

जहाँ खींचना महोत्सव पहले वर्ष में एक बार सीमित अवधि के लिए आयोजित होता था, वहीं हालिया वर्षों में इसमें मौलिक परिवर्तन देखने को मिले हैं। तकनीकी हस्तक्षेप, विशेषकर मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और इंटरनेट की पहुँच ने इस परंपरा को पूरी तरह बदल दिया है।

अब यह केवल होली तक सीमित उत्सव न रहकर एक प्रकार की “वर्ष भर चलने वाली सामाजिक परिघटना” बन गया है। किशोर और युवा अब मेलों तक सीमित न रहकर मोबाइल के माध्यम से लगातार संपर्क में रहते हैं, जिससे बिना सामाजिक परिपक्वता और परिणामों की समझ के रिश्ते बनते और बिगड़ते हैं।

Down To Earth जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं की रिपोर्टों में इस बदलाव को “पसंद की कीमत” (Cost of Choice) कहा गया है—जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता तो है, परंतु उसके सामाजिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य संबंधी दुष्परिणामों को समझने की क्षमता नहीं।

शिक्षा पर गहरा प्रभाव: अनुच्छेद 21A की चुनौती

खींचना महोत्सव से जुड़ी सबसे गंभीर चिंता बालिकाओं की शिक्षा में बाधा है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21A प्रत्येक बच्चे को 6 से 14 वर्ष की आयु तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है। किंतु वास्तविकता यह है कि कोटड़ा जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में इस अधिकार का उल्लंघन खुले रूप में हो रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार, खींचना प्रक्रिया के बाद बड़ी संख्या में 14 से 16 वर्ष की लड़कियाँ स्कूल छोड़ देती हैं। एक बार साथी के साथ चले जाने के बाद उनके लिए शिक्षा में लौटना लगभग असंभव हो जाता है। पारिवारिक और सामाजिक दबाव, घरेलू जिम्मेदारियाँ और शीघ्र मातृत्व उनके शैक्षिक भविष्य को समाप्त कर देते हैं।

यह स्थिति न केवल व्यक्तिगत स्तर पर लड़कियों के जीवन को सीमित करती है, बल्कि पूरे समुदाय के मानव संसाधन विकास को भी बाधित करती है।

स्वास्थ्य जोखिम: कम उम्र, अधिक खतरा

खींचना महोत्सव से उत्पन्न रिश्तों का एक और गंभीर पहलू है स्वास्थ्य संबंधी जोखिम। कम उम्र में अनौपचारिक मिलन के कारण लड़कियाँ बहुत जल्दी गर्भवती हो जाती हैं। आदिवासी क्षेत्रों में पहले से ही एनीमिया (खून की कमी) एक व्यापक समस्या है, और किशोरावस्था में गर्भधारण इसे और घातक बना देता है।

उचित चिकित्सा सुविधाओं, नियमित स्वास्थ्य जांच और परामर्श के अभाव में:

  • मातृ मृत्यु दर बढ़ने का खतरा रहता है
  • नवजात शिशुओं का स्वास्थ्य कमजोर होता है
  • कुपोषण का चक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है

इस प्रकार खींचना महोत्सव केवल सांस्कृतिक प्रश्न न रहकर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप लेता जा रहा है।

तकनीक की भूमिका: डिजिटलाइजेशन का दुष्चक्र

मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने खींचना की परंपरा को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्थानांतरित कर दिया है। रील संस्कृति, इंस्टेंट मैसेजिंग और ऑनलाइन संपर्क ने किशोरों को भावनात्मक रूप से जल्दी और गहराई से जोड़ दिया है।

डिजिटल दुनिया में:

  • रिश्ते तेजी से बनते हैं
  • निर्णय बिना मार्गदर्शन के लिए जाते हैं
  • परिणामों की समझ विकसित नहीं हो पाती

डिजिटल साक्षरता के अभाव में तकनीक सशक्तिकरण के बजाय शोषण का माध्यम बनती जा रही है।

कानूनी पेच: बाल विवाह कानून की सीमाएँ

इस पूरे मुद्दे को जटिल बनाने वाला सबसे बड़ा कारण है कानूनी अस्पष्टता। भारत में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA), 2006 बाल विवाह को अपराध घोषित करता है। किंतु यह कानून केवल औपचारिक विवाह पर लागू होता है—जहाँ रस्में, पंजीकरण या सामाजिक मान्यता स्पष्ट रूप से मौजूद हो।

खींचना प्रक्रिया में:

  • कोई औपचारिक विवाह नहीं होता
  • कोई कानूनी पंजीकरण नहीं होता
  • संबंध सामाजिक रूप से अस्पष्ट रहते हैं

इस कारण प्रशासन के पास कानूनी हस्तक्षेप का स्पष्ट आधार नहीं होता। न तो इसे विवाह कहा जा सकता है, न ही सामान्य प्रेम संबंध। यही कारण है कि बाल अधिकारों का उल्लंघन होते हुए भी कानून मौन रहता है।

संवैधानिक विरोधाभास: संस्कृति बनाम अधिकार

यह मुद्दा भारतीय संविधान के भीतर मौजूद एक गहरे संवैधानिक विरोधाभास को उजागर करता है।

  • अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यकों और समुदायों को अपनी संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण का अधिकार देता है।
  • वहीं अनुच्छेद 21, 24 और 21A बच्चों के जीवन, शिक्षा और शोषण से संरक्षण की गारंटी देते हैं।

प्रश्न यह है कि:

  • क्या किसी परंपरा के नाम पर बच्चों के अधिकारों का हनन स्वीकार्य है?
  • या फिर अधिकारों की रक्षा के नाम पर संस्कृति में हस्तक्षेप उचित है?

यह संतुलन साधना राज्य और समाज—दोनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

प्रशासनिक और सरकारी पहल

राज्य सरकार और प्रशासन ने इस समस्या से निपटने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:

1. जागरूकता अभियान

स्कूलों, आंगनवाड़ियों और सामुदायिक बैठकों के माध्यम से:

  • बाल अधिकारों
  • शिक्षा के महत्व
  • स्वास्थ्य जोखिमों
  • कानूनी प्रावधानों

पर जानकारी दी जा रही है।

2. डिजिटल साक्षरता

किशोरों और अभिभावकों को:

  • मोबाइल फोन के सुरक्षित उपयोग
  • सोशल मीडिया के जोखिम
  • ऑनलाइन व्यवहार की समझ

के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।

3. फ्लैगशिप योजनाएँ

राजस्थान सरकार की योजनाएँ जैसे:

  • मुख्यमंत्री राजश्री योजना
  • लाडो प्रोत्साहन योजना

लड़कियों की शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा को प्रोत्साहित करने का प्रयास कर रही हैं।

आगे की राह: समाधान की दिशा

खींचना महोत्सव का समाधान केवल कानून या प्रतिबंध से संभव नहीं है। इसके लिए एक समग्र दृष्टिकोण आवश्यक है:

  • समुदाय की भागीदारी के साथ सुधार
  • परंपरा के मूल सकारात्मक तत्वों को संरक्षित करना
  • बच्चों की उम्र, शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना
  • तकनीक को खतरे के बजाय अवसर के रूप में उपयोग करना

संवाद, संवेदनशीलता और सामाजिक सुधार ही इस द्वंद्व का स्थायी समाधान दे सकते हैं।

निष्कर्ष

खींचना महोत्सव केवल एक जनजातीय उत्सव नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक परिवर्तन की जटिल कहानी है। यह हमें याद दिलाता है कि परंपराएँ स्थिर नहीं होतीं—वे समय, तकनीक और समाज के साथ बदलती हैं। चुनौती यह नहीं है कि परंपरा को समाप्त किया जाए, बल्कि यह है कि उसे मानवीय अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप विकसित किया जाए

जब तक शिक्षा, स्वास्थ्य और बाल अधिकारों को केंद्र में रखकर सांस्कृतिक संवाद नहीं होगा, तब तक यह संघर्ष बना रहेगा। खींचना महोत्सव हमें यही सिखाता है कि संस्कृति और अधिकार विरोधी नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व के मार्ग खोजने की आवश्यकता है


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