भारतीय वायुसेना की पेचोरा मिसाइल प्रणाली का स्वदेशी डिजिटल उन्नयन

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में वायु रक्षा क्षेत्र की ऐतिहासिक उपलब्धि

भारत की सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा में भारतीय वायुसेना (Indian Air Force – IAF) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य, आधुनिक युद्ध तकनीकों और उभरते हवाई खतरों—जैसे ड्रोन, क्रूज़ मिसाइल और स्टील्थ लड़ाकू विमानों—ने वायु रक्षा प्रणालियों के आधुनिकीकरण को अनिवार्य बना दिया है। इसी क्रम में जनवरी 2026 में भारतीय वायुसेना ने एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की, जब उसने अपनी पुरानी किंतु विश्वसनीय पेचोरा सतह-से-आकाश मिसाइल (SAM) प्रणाली को स्वदेशी रूप से पूर्ण डिजिटल अपग्रेड कर लिया।

यह उपलब्धि न केवल भारत की विरासत रक्षा प्रणालियों को आधुनिक बनाने की क्षमता को दर्शाती है, बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के अंतर्गत रक्षा स्वदेशीकरण की दिशा में एक निर्णायक कदम भी है। इस उन्नयन से पेचोरा प्रणाली की परिचालन क्षमता, सटीकता, नेटवर्किंग और सेवा अवधि में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे भारत की बहु-स्तरीय वायु रक्षा संरचना और अधिक सुदृढ़ हुई है।

Table of Contents

पेचोरा मिसाइल प्रणाली : परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

पेचोरा मिसाइल प्रणाली, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर S-125 नेवा/पेचोरा के नाम से जाना जाता है, मूल रूप से सोवियत संघ द्वारा विकसित एक मध्यम दूरी की सतह-से-आकाश वायु रक्षा प्रणाली है। भारत ने इस प्रणाली को 1970 के दशक में भारतीय वायुसेना में शामिल किया था।

प्रमुख विशेषताएँ (मूल स्वरूप में)

  • निम्न से मध्यम ऊँचाई पर उड़ने वाले शत्रु विमानों को नष्ट करने की क्षमता
  • स्थिर एवं अर्ध-स्थिर तैनाती के लिए उपयुक्त
  • उच्च विश्वसनीयता और मजबूती
  • दशकों तक भारत के रणनीतिक और संवेदनशील ठिकानों की सुरक्षा

लगभग पाँच दशकों तक पेचोरा प्रणाली ने भारतीय वायु क्षेत्र की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1971 के युद्ध के बाद भारत की वायु रक्षा क्षमता को सुदृढ़ करने में यह प्रणाली एक मजबूत स्तंभ सिद्ध हुई।

आधुनिकीकरण की आवश्यकता क्यों पड़ी?

यद्यपि पेचोरा प्रणाली ने लंबे समय तक प्रभावी सेवा दी, किंतु समय के साथ इसमें प्रयुक्त एनालॉग तकनीक आधुनिक युद्ध आवश्यकताओं के अनुरूप अपर्याप्त होती चली गई।

प्रमुख चुनौतियाँ

  1. पुरानी एनालॉग प्रणाली
    • वैक्यूम ट्यूब और प्रारंभिक ट्रांजिस्टर आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स
    • उच्च रखरखाव लागत और घटकों की अनुपलब्धता
  2. धीमी प्रतिक्रिया समय
    • आधुनिक तेज़ गति वाले लक्ष्यों के विरुद्ध सीमित प्रभावशीलता
  3. नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध क्षमता की कमी
    • डिजिटल कमांड और कंट्रोल नेटवर्क से सीमित एकीकरण
  4. नए प्रकार के हवाई खतरे
    • ड्रोन स्वार्म
    • लो-ऑब्ज़र्वेबल क्रूज़ मिसाइल
    • इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर से लैस लड़ाकू विमान

इन चुनौतियों के बावजूद, पूरी प्रणाली को हटाकर नई प्रणाली खरीदना अत्यधिक महंगा और समय-साध्य होता। इसलिए भारतीय वायुसेना ने एक लागत-प्रभावी और रणनीतिक विकल्प चुना—पेचोरा प्रणाली का स्वदेशी डिजिटल उन्नयन

स्वदेशी उन्नयन : आत्मनिर्भर भारत की सशक्त अभिव्यक्ति

परियोजना का दायित्व

पेचोरा मिसाइल प्रणाली के इस व्यापक आधुनिकीकरण की जिम्मेदारी बेंगलुरु स्थित निजी रक्षा कंपनी
अल्फा डिज़ाइन टेक्नोलॉजीज़ लिमिटेड (Alpha Design Technologies Limited – ADTL) को सौंपी गई।

  • अनुबंध तिथि: 25 सितंबर 2020
  • अनुबंध मूल्य: ₹591.3 करोड़

यह परियोजना इस दृष्टि से ऐतिहासिक रही कि यह उन शुरुआती उदाहरणों में से एक है, जहाँ किसी भारतीय निजी रक्षा कंपनी ने रूसी मूल की विरासत हथियार प्रणाली का सफलतापूर्वक आधुनिकीकरण किया।

इससे पहले ऐसे कार्य मुख्यतः सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों (जैसे BEL) तक सीमित थे। अतः यह परियोजना भारत के निजी रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र की बढ़ती क्षमता को भी दर्शाती है।

डिजिटाइज़्ड पेचोरा प्रणाली : प्रमुख तकनीकी सुधार

स्वदेशी उन्नयन के अंतर्गत पेचोरा प्रणाली का पूर्ण डिजिटलीकरण किया गया, जिससे यह आधुनिक वायु रक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप बन सकी।

1. डिजिटल रडार प्रणाली

  • पुराने वैक्यूम ट्यूब एवं ट्रांजिस्टर आधारित रिसीवर चेन को हटाया गया
  • आधुनिक सेमीकंडक्टर चिप्स और डिजिटल रडार ट्रांसमीटर लगाए गए
  • परिणाम:
    • बेहतर लक्ष्य पहचान
    • अधिक सटीक ट्रैकिंग
    • इलेक्ट्रॉनिक जामिंग के विरुद्ध अधिक प्रतिरोध

2. आधुनिक ऑपरेटर केबिन

  • अत्याधुनिक मल्टी-फंक्शन डिस्प्ले
  • डेटा संग्रह एवं विश्लेषण प्रणाली
  • हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम
  • क्रू सदस्यों की संख्या में कमी, जिससे:
    • मानव त्रुटि में कमी
    • परिचालन दक्षता में वृद्धि

3. स्वदेशी उप-प्रणालियाँ

डिजिटलीकरण के दौरान कई महत्वपूर्ण स्वदेशी प्रणालियाँ विकसित और एकीकृत की गईं:

  • थर्मल इमेजिंग फायर कंट्रोल यूनिट
  • सॉफ़्टवेयर-डिफाइंड रेडियो (SDR)
  • मिसाइल लॉन्च डिटेक्शन सिस्टम
  • हैंडहेल्ड लेज़र टार्गेट डिज़ाइनेटर

इन उप-प्रणालियों ने प्रणाली की ऑल-वेदर और नाइट ऑपरेशन क्षमता को अत्यधिक बढ़ा दिया है।

परिचालन क्षमता में सुधार

डिजिटल उन्नयन के बाद पेचोरा प्रणाली की परिचालन क्षमताओं में गुणात्मक छलांग देखी गई है।

मारने की सटीकता (Kill Probability)

  • पहले की तुलना में उल्लेखनीय सुधार
  • अब लगभग 92% तक की सटीकता

रेंज और ऊँचाई

  • रेंज: 30 से 35.4 किलोमीटर
  • ऊँचाई:
    • न्यूनतम: 100 मीटर
    • अधिकतम: 18–20 किलोमीटर

बहु-खतरा प्रतिरोध क्षमता

अब यह प्रणाली प्रभावी रूप से मुकाबला कर सकती है:

  • ड्रोन
  • क्रूज़ मिसाइल
  • उच्च गति वाले लड़ाकू विमान

पोखरण रेंज में सफल परीक्षण

पूरी तरह उन्नत की गई पहली पेचोरा प्रणाली का यूज़र ट्रायल राजस्थान के प्रसिद्ध पोखरण परीक्षण रेंज में आयोजित किया गया।

  • परीक्षण अवधि:
    6 नवंबर से 26 दिसंबर 2025
  • प्रकृति:
    • वास्तविक युद्ध-सदृश परिस्थितियों में फायरिंग ट्रायल
  • परिणाम:
    • सफल मिसाइल प्रक्षेपण
    • परिचालन तत्परता की पुष्टि
    • स्वदेशी घटकों की विश्वसनीयता प्रमाणित

पोखरण रेंज एक बार फिर भारत की उन्नत हथियार प्रणालियों के परीक्षण और सत्यापन में अपनी केंद्रीय भूमिका सिद्ध करती है।

सामरिक और रणनीतिक महत्व

1. मिशन ‘सुदर्शन चक्र’

अपग्रेड की गई पेचोरा प्रणाली भारत के महत्वाकांक्षी
“मिशन सुदर्शन चक्र” का हिस्सा बनेगी।

  • उद्देश्य:
    • एक एकीकृत, नेटवर्क्ड और बहु-स्तरीय वायु रक्षा कवच तैयार करना
  • यह प्रणाली:
    • लंबी दूरी की प्रणालियों (जैसे S-400)
    • और छोटी दूरी की प्रणालियों के बीच
    • एक महत्वपूर्ण मध्य-स्तर की भूमिका निभाएगी

2. IACCS के साथ एकीकरण

  • पेचोरा अब भारतीय वायुसेना की
    IACCS (Integrated Air Command and Control System)
    से पूर्णतः जुड़ सकती है।
  • लाभ:
    • रीयल-टाइम डेटा साझा
    • बेहतर स्थिति जागरूकता
    • तेज़ निर्णय-निर्माण

3. लागत-प्रभावी समाधान

  • नई प्रणालियाँ खरीदने की तुलना में:
    • कहीं अधिक किफायती
    • विदेशी मुद्रा की बचत
  • मौजूदा परिसंपत्तियों का जीवनकाल बढ़ा

4. निजी क्षेत्र की भागीदारी

  • भारतीय निजी कंपनियों की तकनीकी क्षमता का प्रमाण
  • रक्षा निर्माण में प्रतिस्पर्धा और नवाचार को बढ़ावा

निष्कर्ष

भारतीय वायुसेना की पेचोरा मिसाइल प्रणाली का स्वदेशी डिजिटल उन्नयन भारत के रक्षा आधुनिकीकरण यात्रा में एक मील का पत्थर है। यह परियोजना यह सिद्ध करती है कि भारत न केवल नई अत्याधुनिक प्रणालियाँ विकसित कर सकता है, बल्कि अपनी विरासत रक्षा प्रणालियों को भी आधुनिक तकनीक से सुसज्जित कर उन्हें प्रासंगिक बनाए रख सकता है।

यह उपलब्धि आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, और रणनीतिक स्वायत्तता के लक्ष्यों को मजबूती प्रदान करती है। साथ ही, यह भारत की बहु-स्तरीय वायु रक्षा संरचना को आधुनिक हवाई खतरों के विरुद्ध और अधिक सक्षम बनाती है।

निस्संदेह, पेचोरा प्रणाली का यह डिजिटल पुनर्जन्म भारतीय रक्षा क्षेत्र में आत्मविश्वास, तकनीकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक दूरदर्शिता का सशक्त प्रतीक है।


इन्हें भी देखें –

Leave a Comment

Table of Contents

Contents
सर्वनाम (Pronoun) किसे कहते है? परिभाषा, भेद एवं उदाहरण भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग | नाम, स्थान एवं स्तुति मंत्र प्रथम विश्व युद्ध: विनाशकारी महासंग्राम | 1914 – 1918 ई.