अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली

हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल में जब भाषा, भाव और विचार की नई चेतना आकार ले रही थी, तब जिन साहित्यकारों ने खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का साहस और सफल प्रयास किया, उनमें अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का नाम अत्यंत आदर और गौरव के साथ लिया जाता है। वे द्विवेदी युग के प्रमुख कवि, समर्थ गद्यकार, संस्कृतनिष्ठ विद्वान तथा साहित्य-साधना के अनन्य उपासक थे। खड़ी बोली हिन्दी में महाकाव्य की परंपरा का श्रीगणेश करने का श्रेय उन्हें ही प्राप्त है। उनका महाकाव्य ‘प्रिय-प्रवास’ आधुनिक हिन्दी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।

हरिऔध जी केवल एक कवि ही नहीं, बल्कि एक ऐसे साहित्य-पुरुष थे जिन्होंने भाषा के परिष्कार, छन्दों के नूतन प्रयोग, राष्ट्रीय चेतना के जागरण और सांस्कृतिक पुनरुत्थान में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके साहित्य में देशप्रेम, धर्मनिष्ठा, भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था, लोकमंगल की भावना और आदर्श जीवन-दृष्टि का अद्भुत समन्वय मिलता है।

Table of Contents

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ : संक्षिप्त जीवन-परिचय

शीर्षकविवरण
पूरा नामअयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
जन्म15 अप्रैल, 1865 ई.
जन्म स्थाननिजामाबाद, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत
पिता का नामपंडित भोलानाथ (भोलासिंह) उपाध्याय
राष्ट्रीयताभारतीय
कालआधुनिक काल
शिक्षाप्रारम्भिक शिक्षा निजामाबाद व आजमगढ़ में; काशी के क्वीन्स कॉलेज में अध्ययन का प्रयास; स्वाध्याय द्वारा हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, फारसी तथा अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त
वैवाहिक जीवनसन् 1884 ई. में निर्मला कुमारी से विवाह
पेशा / कार्यक्षेत्रकानूनगो के पद पर सरकारी सेवा; काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अवैतनिक शिक्षक; साहित्यकार एवं लेखक
भाषाहिन्दी
साहित्यिक विधाकाव्य एवं निबंध
उल्लेखनीय कृतियाँप्रिय प्रवास (खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य)
सम्मानहिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति; ‘विद्यावाचस्पति’ उपाधि; प्रिय प्रवास के लिए मंगलाप्रसाद पारितोषिक
साहित्यिक विशेषताखड़ी बोली हिन्दी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान; बहुभाषिक ज्ञान और भावपूर्ण काव्य शैली
निधन16 मार्च, 1947 ई.
निधन स्थाननिजामाबाद, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ : जीवन-परिचय

जन्म एवं परिवार

हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कवि, निबन्धकार तथा सम्पादक अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का जन्म 15 अप्रैल, 1865 ई. को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद के निजामाबाद कस्बे में हुआ। उनके पिता का नाम पंडित भोलानाथ (भोलासिंह) उपाध्याय था, जो विद्वान, धार्मिक तथा संस्कारवान व्यक्ति थे। पारिवारिक वातावरण में विद्या, धर्म और संस्कारों का विशेष प्रभाव था, जिसके कारण बालक अयोध्या सिंह में बचपन से ही अध्ययन और साहित्य के प्रति गहरी रुचि विकसित हो गई।

प्रारम्भिक शिक्षा एवं अध्ययन

हरिऔध जी की प्रारम्भिक शिक्षा निजामाबाद तथा आजमगढ़ में हुई। मात्र पाँच वर्ष की आयु में उनके चाचा ने उन्हें फारसी भाषा का अध्ययन कराना प्रारम्भ कर दिया था। निजामाबाद से वर्नाक्यूलर मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए काशी के क्वीन्स कॉलेज गए, जहाँ उन्होंने अंग्रेज़ी शिक्षा ग्रहण करने का प्रयास किया।

किन्तु अस्वस्थता के कारण उन्हें नियमित अध्ययन छोड़ना पड़ा। इसके बावजूद उनकी ज्ञान-पिपासा कम नहीं हुई। उन्होंने स्वाध्याय के माध्यम से संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, फारसी तथा अंग्रेज़ी भाषाओं का गहन अध्ययन किया। उनकी यह बहुभाषिक दक्षता उनके साहित्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

वैवाहिक जीवन

सन् 1884 ई. में हरिऔध जी का विवाह निर्मला कुमारी के साथ सम्पन्न हुआ। वैवाहिक जीवन के साथ उन्होंने साहित्य-साधना को निरन्तर जारी रखा।

कार्यक्षेत्र एवं सेवाएँ

जीवन-निर्वाह के लिए सन् 1889 ई. में उन्हें सरकारी नौकरी प्राप्त हुई और वे कानूनगो के पद पर नियुक्त हुए। इस पद पर उन्होंने लगभग बीस वर्षों तक कार्य किया तथा सन् 1932 ई. में इस पद से सेवानिवृत्त हुए।

सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अवैतनिक शिक्षक के रूप में अध्यापन कार्य किया। वे सन् 1941 तक इस पद पर कार्यरत रहे। इसके बाद वे पुनः अपने गृह नगर निजामाबाद लौट आए और जीवन के अंतिम समय तक साहित्य-सेवा तथा लेखन कार्य में संलग्न रहे।

साहित्यिक योगदान एवं सम्मान

हरिऔध जी हिन्दी साहित्य के अत्यंत महत्वपूर्ण रचनाकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना ‘प्रिय प्रवास’ है, जिसे खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है। इस उत्कृष्ट कृति के लिए उन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक से सम्मानित किया गया।

वे हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति भी रहे तथा सम्मेलन द्वारा उन्हें ‘विद्यावाचस्पति’ की उपाधि प्रदान की गई। उनके साहित्य में भाषा की शुद्धता, भावों की गहराई और शैली की सौन्दर्यपूर्ण अभिव्यक्ति देखने को मिलती है।

निधन

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का निधन 16 मार्च, 1947 ई. को निजामाबाद (आजमगढ़) में हुआ। उनके निधन से हिन्दी साहित्य ने एक महान कवि और साहित्यकार को खो दिया, किन्तु उनकी रचनाएँ आज भी साहित्य-जगत को समृद्ध कर रही हैं।

द्विवेदी युग और हरिऔध

हरिऔध जी का साहित्यिक जीवन द्विवेदी युग में विकसित हुआ। यह काल (1900-1920) हिन्दी साहित्य में नवजागरण और राष्ट्रीय चेतना का युग था। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से भाषा-शुद्धि, विचार-प्रधानता और सामाजिक चेतना का प्रसार हुआ।

इस युग की प्रमुख विशेषताएँ थीं—

  • राष्ट्रीयता की भावना
  • सामाजिक सुधार की प्रवृत्ति
  • भाषा का परिष्कार
  • काव्य में नैतिकता और आदर्शवाद

हरिऔध जी ने इन सभी प्रवृत्तियों को अपने काव्य में स्थान दिया। वे द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर समाज-निर्माण का माध्यम समझा।

खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठा

रीतिकाल में ब्रजभाषा काव्य की प्रमुख भाषा थी। खड़ी बोली को गद्य के लिए उपयुक्त माना जाता था, परंतु काव्य के लिए वह परिष्कृत और माधुर्यपूर्ण नहीं समझी जाती थी। हरिऔध जी ने इस धारणा को बदलने का साहसिक कार्य किया।

उन्होंने खड़ी बोली में महाकाव्य की रचना कर यह सिद्ध किया कि यह भाषा गंभीर, भावपूर्ण और छन्दबद्ध काव्य-रचना के लिए पूर्णतः समर्थ है। ‘प्रिय-प्रवास’ इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। उन्होंने संस्कृत के वर्णवृत्तों का प्रयोग खड़ी बोली में करके एक नवीन छन्द-विधान प्रस्तुत किया। इस प्रयोग ने हिन्दी काव्य को एक नई दिशा दी।

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की प्रमुख रचनाएँ

हिन्दी साहित्य में हरिऔध जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार थे। उन्होंने काव्य, नाटक, उपन्यास, आलोचना, अनुवाद तथा बाल साहित्य जैसे विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनकी रचनाओं में भाषा की सहजता, भावों की गहराई तथा सामाजिक दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी प्रमुख कृतियों का संक्षिप्त परिचय निम्न प्रकार है—

1. काव्य-साहित्य

हरिऔध जी मुख्यतः कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी प्रमुख काव्य कृतियाँ निम्नलिखित हैं—

  • प्रिय प्रवास (1914 ई.) – यह हरिऔध जी की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना है, जिसे खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है। इसमें श्रीकृष्ण के बाल्यकाल से लेकर उनके मथुरा गमन तक की घटनाओं का मार्मिक चित्रण 17 सर्गों में किया गया है। यह प्रबंध काव्य हिन्दी साहित्य में एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जाता है तथा इसे मंगलाप्रसाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • वैदेही वनवास (1940 ई.) – यह रामकथा पर आधारित प्रबंध काव्य है, जिसमें श्रीराम द्वारा सीता के वनवास की कथा का करुण रस प्रधान वर्णन किया गया है। यह 18 सर्गों में विभाजित है और इसमें बोलचाल की सरल भाषा का प्रयोग मिलता है।
  • पारिजात (1937 ई.) – यह विविध विषयों पर आधारित गीतों और कविताओं का संग्रह है, जो 15 सर्गों में विभाजित है। इसमें भावात्मकता और काव्य-सौंदर्य का उत्कृष्ट समन्वय देखने को मिलता है।
  • रस-कलश (1940 ई.) – इस कृति में ब्रजभाषा के छंदों का संकलन प्रस्तुत किया गया है, जिससे कवि की छंद-प्रयोग क्षमता का परिचय मिलता है।
  • चोखे चौपदे (1924 ई.) तथा चुभते चौपदे (1932 ई.) – इन रचनाओं में समाज की विसंगतियों पर व्यंग्यपूर्ण और प्रभावशाली शैली में अभिव्यक्ति की गई है।
  • बोलचाल – इसमें सरल, सहज और लोकप्रचलित भाषा में रचित कविताएँ संकलित हैं।

2. नाटक-साहित्य

हरिऔध जी ने नाट्य-साहित्य में भी योगदान दिया। उनके नाटकों में पौराणिक कथाओं के माध्यम से आदर्श जीवन मूल्यों का प्रस्तुतीकरण मिलता है।

  • प्रद्युम्न विजय
  • रुक्मिणी परिणय

इन नाटकों में भारतीय संस्कृति, नैतिकता और आदर्श चरित्रों का प्रभावशाली चित्रण किया गया है।

3. उपन्यास-साहित्य

हरिऔध जी ने सामाजिक जीवन को आधार बनाकर कई उपन्यासों की रचना की। उनके उपन्यासों में भाषा की स्वाभाविकता तथा यथार्थ चित्रण प्रमुख विशेषता है।

  • प्रेमकान्ता
  • ठेठ हिन्दी का ठाठ – इस उपन्यास में खड़ी बोली हिन्दी की सजीवता और लोकभाषा की शक्ति का प्रभावशाली चित्रण किया गया है।
  • अधखिला फूल – इसमें सामाजिक जीवन और मानवीय भावनाओं का यथार्थ चित्रण मिलता है।

4. आलोचनात्मक एवं अन्य ग्रंथ

हरिऔध जी ने साहित्य और भाषा से संबंधित गंभीर विषयों पर भी लेखन किया। उनकी प्रमुख कृति ‘हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास’ इस क्षेत्र में उल्लेखनीय मानी जाती है।

5. अनुवाद-कार्य

उन्होंने विदेशी साहित्य को हिन्दी पाठकों तक पहुँचाने के उद्देश्य से अनुवाद कार्य भी किया। उनकी अनूदित कृति ‘वेनिस का बाँका’ उल्लेखनीय है।

6. बाल-साहित्य

हरिऔध जी ने बाल पाठकों के लिए भी कई उपयोगी और रोचक कृतियाँ लिखीं, जिनमें प्रमुख हैं—
बाल विभव, बाल विलास, फूल-पत्ते, चन्द्र खिलौना, खेल तमाशा, उपदेश कुसुम, बाल गीतावली, चाँद सितारे तथा पद्य प्रसून।
इन रचनाओं में सरल भाषा और शिक्षाप्रद भावों का सुंदर समन्वय मिलता है।

इस प्रकार हरिऔध जी का साहित्यिक योगदान अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। उन्होंने हिन्दी साहित्य को नई दिशा प्रदान करते हुए भाषा, शैली और विषय-वस्तु के स्तर पर महत्वपूर्ण समृद्धि प्रदान की।

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की प्रमुख रचनाएँ

श्रेणीकृति का नामसंक्षिप्त विवरण
महाकाव्य / प्रबंध काव्यप्रिय प्रवास (1914 ई.)खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य; श्रीकृष्ण के बाल्यकाल से मथुरा गमन तक की कथा; 17 सर्ग; मंगलाप्रसाद पुरस्कार से सम्मानित।
वैदेही वनवास (1940 ई.)रामकथा पर आधारित प्रबंध काव्य; सीता निर्वासन प्रसंग; 18 सर्ग; करुण रस प्रधान रचना।
पारिजात (1937 ई.)विविध विषयों पर आधारित गीत एवं कविताओं का संग्रह; 15 सर्गों में विभाजित।
अन्य काव्य-कृतियाँरस-कलश (1940 ई.)ब्रजभाषा के छंदों का संग्रह; कवि की छंद-कला का परिचायक।
चोखे चौपदे (1924 ई.)व्यंग्यात्मक शैली में रचित चौपदों का संग्रह।
चुभते चौपदे (1932 ई.)सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति।
बोलचालसरल एवं लोकप्रचलित भाषा में लिखी गई कविताएँ।
नाटकप्रद्युम्न विजयपौराणिक कथा पर आधारित नाटक; आदर्श जीवन मूल्यों का चित्रण।
रुक्मिणी परिणयश्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह प्रसंग पर आधारित नाट्य रचना।
उपन्यासप्रेमकान्तासामाजिक जीवन और मानवीय भावनाओं का चित्रण।
ठेठ हिन्दी का ठाठखड़ी बोली हिन्दी और लोकभाषा की सजीवता का प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण।
अधखिला फूलसमाज और मानवीय संबंधों पर आधारित यथार्थवादी उपन्यास।
आलोचनात्मक / गद्य ग्रंथहिन्दी भाषा और साहित्य का विकासहिन्दी भाषा और साहित्य के विकास का विश्लेषणात्मक अध्ययन।
अनुवादवेनिस का बाँकाविदेशी साहित्य का हिन्दी रूपांतरण।
बाल साहित्यबाल विभवबालकों के लिए शिक्षाप्रद एवं रोचक काव्य-संग्रह।
बाल विलासमनोरंजक और शिक्षाप्रद बाल रचनाएँ।
फूल-पत्तेसरल और प्रेरणादायक बाल साहित्य।
चन्द्र खिलौनाबालकों के लिए कल्पनात्मक एवं मनोरंजक रचनाएँ।
खेल तमाशाबाल-मनोरंजन एवं शिक्षात्मक रचनाएँ।
उपदेश कुसुमनैतिक शिक्षा से युक्त बाल काव्य।
बाल गीतावलीबालकों के लिए गीतों का संग्रह।
चाँद सितारेबाल कल्पना और मनोरंजन से संबंधित रचनाएँ।
पद्य प्रसूनबालकों के लिए सरल एवं सुबोध काव्य-संग्रह।

‘प्रिय-प्रवास’ : आधुनिक हिन्दी का प्रथम महाकाव्य

‘प्रिय-प्रवास’ हरिऔध जी की सर्वाधिक प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण कृति है। इसे आधुनिक काल का प्रथम महाकाव्य माना जाता है। इस कृति के लिए उन्हें ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ से सम्मानित किया गया था।

कथावस्तु

इस महाकाव्य की कथा श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित है। इसमें कृष्ण-चरित्र का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। किंतु हरिऔध जी ने इसे केवल पौराणिक आख्यान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसमें आधुनिक जीवन-दृष्टि, नैतिकता और लोकमंगल की भावना का समावेश किया।

प्रमुख विशेषताएँ

  1. रसों की बहुलता – इसमें श्रृंगार, वीर, करुण, शान्त आदि अनेक रसों का समन्वय है।
  2. विश्व-प्रेम की भावना – संकीर्णता से ऊपर उठकर मानवता का संदेश।
  3. शिक्षा और ज्ञान का विकास – नैतिकता और धर्म का प्रतिपादन।
  4. भक्ति और वैराग्य – आध्यात्मिक चेतना का समावेश।
  5. भारतीय संस्कृति का गौरव – स्वधर्म और राष्ट्रीयता का संदेश।

श्री त्रिलोचन पाण्डेय ने इसकी प्रशंसा करते हुए लिखा है कि यह महाकाव्य अनेक रसों का आवास, विश्व-प्रेम, ज्ञान-वैराग्य और भक्ति का प्रकाश है तथा भारतीय वीरता और स्वधर्मोद्धार का पथ-प्रदर्शक है।

राधा का नवीन रूप

‘प्रिय-प्रवास’ की एक विशेषता यह भी है कि इसमें राधा को केवल प्रेमिका के रूप में नहीं, बल्कि लोकसेविका के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह चित्रण अत्यंत मौलिक और युगानुकूल है।

‘वैदेही वनवास’ : करुण रस का अद्भुत चित्रण

हरिऔध जी की दूसरी प्रमुख कृति ‘वैदेही वनवास’ है। इसमें राम के राज्याभिषेक के पश्चात सीता के वनवास की करुण कथा का वर्णन है।

इस काव्य में राम और सीता को देवतुल्य न बनाकर लौकिक मानव के रूप में चित्रित किया गया है। इससे कथा अधिक मानवीय और संवेदनशील बन जाती है। करुण रस का अत्यंत मार्मिक चित्रण इसमें मिलता है।

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की काव्यगत विशेषताएँ

1. विषय-वस्तु की व्यापकता

हरिऔध जी की काव्य-सृष्टि विषय-विविधता के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने भारतीय पौराणिक पात्रों—जैसे कृष्ण-राधा तथा राम-सीता—को अपने काव्य का आधार बनाया, किंतु केवल परंपरागत कथाओं तक सीमित न रहकर उन्होंने समकालीन जीवन, सामाजिक समस्याओं और मानवीय मूल्यों को भी अपनी रचनाओं में स्थान दिया।

उनके काव्य में प्राचीन सांस्कृतिक भावभूमि और आधुनिक चेतना का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ परंपरा और नवीनता दोनों का संतुलित स्वर प्रस्तुत करती हैं।

2. वियोग एवं वात्सल्य का मार्मिक चित्रण

हरिऔध जी के काव्य में वियोग और वात्सल्य रस की अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति मिलती है। विशेष रूप से प्रिय प्रवास में श्रीकृष्ण के मथुरा गमन के पश्चात ब्रज की स्थिति का अत्यंत संवेदनशील वर्णन किया गया है। कृष्ण के वियोग में राधा, नंद, यशोदा और समस्त ब्रज-वासियों की पीड़ा का चित्रण पाठक के हृदय को द्रवित कर देता है।

यशोदा के पुत्र-वियोग की वेदना का भावपूर्ण चित्र निम्न पंक्तियों में देखा जा सकता है—

प्रिय प्रति वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है?
दुःख-जल-निधि डूबी का सहारा कहाँ है?
लख मुख जिसका मैं आजलौं जी सकी हूँ,
वह हृदय हमारा नैन-तारा कहाँ है?

इन पंक्तियों में माँ के वात्सल्य और वियोग की करुण अनुभूति अत्यंत प्रभावशाली रूप में व्यक्त हुई है।

3. लोक-सेवा एवं मानवतावादी दृष्टि

हरिऔध जी ने अपने काव्य में कृष्ण को केवल ईश्वर के रूप में नहीं, बल्कि आदर्श मानव और लोक-सेवक के रूप में चित्रित किया है। उन्होंने मानव जीवन के सर्वोच्च आदर्श के रूप में लोककल्याण की भावना को प्रतिष्ठित किया।

कृष्ण के माध्यम से व्यक्त यह विचार उनकी मानवतावादी दृष्टि को स्पष्ट करता है—

विपत्ति से रक्षण सर्वभूत का,
सहाय होना असहाय जीव का।
उबारना संकट से स्वजाति का,
मनुष्य का सर्वप्रधान धर्म है।

इसी प्रकार राधा के चरित्र में भी त्याग, करुणा और लोकमंगल की भावना को प्रमुखता दी गई है। वे व्यक्तिगत विरह का दुःख सहते हुए भी समाज के कल्याण की कामना करती हैं—

प्यारे आवें सु-बयन कहें, प्यार से गोद लेवें,
ठंढे होवें नयन, दुख हों दूर मैं मोद पाऊँ।
ए भी हैं भाव मम उर के और ए भाव भी हैं,
प्यारे जीवें, जग-हित करें, गेह चाहे न आवें॥

सत्कर्मी हैं, परम-शुचि हैं, आप ऊधो सुधी हैं,
अच्छा होगा सनय प्रभु से आप चाहें यही जो।
आज्ञा भूलूँ न प्रियतम की, विश्व के काम आऊँ,
मेरा कौमार-व्रत भव में पूर्णता प्राप्त होवे॥

इन पंक्तियों में राधा का आदर्श और त्यागपूर्ण स्वरूप स्पष्ट रूप से व्यक्त हुआ है।

4. प्रकृति-चित्रण की सजीवता

हरिऔध जी का प्रकृति-वर्णन अत्यंत सजीव, भावानुकूल और प्रभावशाली है। उन्होंने प्रकृति को केवल सौंदर्य-वर्णन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मानवीय भावनाओं से जोड़कर प्रस्तुत किया है। उनके काव्य में प्रकृति पात्रों के सुख-दुःख के साथ सहभागी बनकर दिखाई देती है।

कृष्ण के वियोग में ब्रज की प्रकृति भी शोकाकुल प्रतीत होती है—

फूलों-पत्तों सकल पर हैं वाष्प-बूँदें लखातीं,
रोते हैं या विपट सब यों आँसुओं की दिखा के।

इसी प्रकार संध्या-वर्णन में प्रकृति का मनोहारी चित्र प्रस्तुत करते हुए वे लिखते हैं—

दिवस का अवसान समीप था,
गगन था कुछ लोहित हो चला।
तरु-शिखा पर थी जब राजती,
कमलिनी-कुल-वल्लभ का प्रभा।

हरिऔध जी का प्रकृति-चित्रण सामान्यतः स्वाभाविक, भावपूर्ण और हृदयग्राही है। यद्यपि कहीं-कहीं परंपरागत शैली का प्रभाव दिखाई देता है, फिर भी उनके अधिकांश प्रकृति-वर्णन सहज और प्रभावोत्पादक हैं।

इस प्रकार हरिऔध जी के काव्य में विषय-विविधता, मार्मिक भावाभिव्यक्ति, मानवतावादी दृष्टिकोण तथा सजीव प्रकृति-चित्रण जैसी विशेषताएँ उन्हें हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण कवियों में विशिष्ट स्थान प्रदान करती हैं।

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की भाषा, शैली एवं रस, छन्द तथा अलंकारों का प्रयोग

1. भाषा की विशेषताएँ

हरिऔध जी ने अपने काव्य-सृजन में ब्रजभाषा और खड़ी बोली—दोनों का प्रभावी प्रयोग किया, किन्तु उनकी अधिकांश रचनाएँ खड़ी बोली हिन्दी में रची गई हैं। उनकी भाषा परिपक्व, प्रवाहपूर्ण तथा भावानुकूल है, जिसमें साहित्यिक सौंदर्य के साथ अभिव्यक्ति की शक्ति भी विद्यमान है।

उनकी रचनाओं में संस्कृत के तत्सम शब्दों का व्यापक उपयोग मिलता है, जिससे उनकी भाषा कई स्थानों पर अत्यंत साहित्यिक और संस्कृतनिष्ठ प्रतीत होती है। साथ ही उन्होंने आवश्यकता के अनुसार उर्दू और फारसी के शब्दों का भी प्रयोग किया, जिससे भाषा में विविधता और प्रभावशीलता आई।

हरिऔध जी की भाषागत विशेषता यह भी है कि वे विषय और भाव के अनुरूप भाषा का चयन करते हैं। जहाँ एक ओर उन्होंने उच्च कोटि की संस्कृतनिष्ठ साहित्यिक भाषा में काव्य रचा, वहीं दूसरी ओर उन्होंने सहज, सरल तथा मुहावरेदार जनभाषा का भी सफल प्रयोग किया। विशेष रूप से उनके चौपदों में लोकप्रचलित भाषा का अत्यंत प्रभावशाली रूप देखने को मिलता है।

2. शैली की विविधता

हरिऔध जी की रचनाओं में शैलीगत विविधता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। उन्होंने समय, विषय और भाव के अनुरूप अलग-अलग काव्य-शैलियों को अपनाया। उनकी प्रमुख शैलियाँ निम्नलिखित हैं—

  • संस्कृत-प्रधान काव्य शैली – इस शैली का उत्कृष्ट उदाहरण प्रिय प्रवास में मिलता है, जहाँ भाषा अत्यंत संस्कृतनिष्ठ और गंभीर है।
  • रीतिकालीन अलंकरण शैलीरस-कलश में रीतिकालीन काव्य परंपरा का प्रभाव दिखाई देता है, जिसमें अलंकारों का सौंदर्यपूर्ण प्रयोग किया गया है।
  • आधुनिक सरल हिन्दी शैलीवैदेही वनवास में उन्होंने सरल, सहज और जनसामान्य के निकट भाषा का प्रयोग किया है।
  • उर्दू प्रभावयुक्त मुहावरेदार शैलीचुभते चौपदे और चोखे चौपदे में व्यंग्यात्मक तथा मुहावरेदार शैली का प्रयोग देखने को मिलता है।

3. रस योजना

हरिऔध जी के काव्य में रसों की व्यापक अभिव्यक्ति मिलती है। उन्होंने विशेष रूप से करुण, वियोग, शृंगार तथा वात्सल्य रस का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया है। उनके काव्य में भावों की संवेदनशीलता और मार्मिकता पाठकों को गहराई से प्रभावित करती है।

4. छंद प्रयोग

हरिऔध जी छंद-विधान के कुशल ज्ञाता थे। उन्होंने अपने काव्य में विभिन्न प्रकार के छंदों का प्रयोग किया। प्रारम्भिक रचनाओं में उन्होंने हिन्दी के पारंपरिक छंद—जैसे कवित्त, सवैया, छप्पय और दोहा—का प्रयोग किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने उर्दू छंदों का भी उपयोग किया।

बाद के समय में उन्होंने संस्कृत छंदों—जैसे इन्द्रवज्रा, शिखरिणी, मालिनी, वसंत तिलका, शार्दूल विक्रीड़ित तथा मंदाक्रान्ता—को अपनाकर अपने काव्य को और अधिक समृद्ध बनाया।

5. अलंकार योजना

हरिऔध जी की रचनाओं पर रीतिकालीन काव्य परंपरा का प्रभाव दिखाई देता है, जिसके कारण उनकी कविता में अलंकारों का सुंदर प्रयोग मिलता है। हालांकि उनकी रचनाएँ अलंकारों के अत्यधिक बोझ से दबती नहीं हैं, बल्कि वे स्वाभाविक रूप से काव्य की शोभा बढ़ाते हैं और भावों की अभिव्यक्ति को प्रभावी बनाते हैं।

उन्होंने शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों का सफल प्रयोग किया है। अनुप्रास, यमक, उपमा, उत्प्रेक्षा और रूपक उनके प्रिय अलंकारों में प्रमुख हैं।

इस प्रकार हरिऔध जी की भाषा, शैली, रस, छंद और अलंकार योजना उनके काव्य को समृद्ध और प्रभावशाली बनाती है तथा उन्हें हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण कवियों में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।

हिन्दी साहित्य में स्थान

आधुनिक हिन्दी साहित्य के विकासक्रम में अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट है। खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले अग्रणी साहित्यकारों में उनका नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। जिस समय ब्रजभाषा काव्य की मुख्य धारा थी, उस समय हरिऔध जी ने खड़ी बोली में गंभीर, परिमार्जित और छन्दोबद्ध काव्य की रचना कर यह प्रमाणित किया कि यह भाषा भी महाकाव्य जैसी व्यापक और गम्भीर काव्य-विधा के लिए पूर्णतः सक्षम है।

उनकी काव्य-साधना ने खड़ी बोली को केवल व्यवहार की भाषा न रहने देकर उसे साहित्यिक गरिमा प्रदान की। उनके महाकाव्य ‘प्रिय-प्रवास’ ने इस दिशा में मील का पत्थर स्थापित किया और हिन्दी महाकाव्य-परंपरा को एक नई दिशा दी। विषय-विस्तार, छन्द-विधान, भाव-समृद्धि और भाषा-वैभव—इन सभी दृष्टियों से यह कृति आधुनिक हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है।

महान कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने भी हरिऔध जी की साहित्यिक प्रतिभा का उच्च मूल्यांकन किया है। उनके अनुसार उस कालखंड के कवियों में हरिऔध की काव्य-साधना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। निराला ने उनकी सहृदयता, काव्य-माधुर्य और अभिव्यक्ति-कौशल को रेखांकित करते हुए उन्हें अग्रगण्य कवि माना। यह प्रशंसा इस बात का प्रमाण है कि हरिऔध जी की काव्य-प्रतिभा समकालीन साहित्यकारों द्वारा भी सम्मानित थी।

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने उनके संबंध में लिखा है—

“खड़ी बोली के उस काल के कवियों में पं. अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की काव्य-साधना विशेष महत्व की ठहरती है। सह्रदयता और कवित्व के विचार से भी ये अग्रगण्य हैं। इनके समस्त पद औरों की तुलना में अधिक मधुर हैं, जो इनकी कवित्त शक्ति के परिचायक हैं।”

यह कथन उनकी काव्य-प्रतिभा और साहित्यिक महत्व को प्रमाणित करता है।

साहित्यिक विरासत

हरिऔध जी की साहित्यिक उपलब्धियाँ केवल काव्य-रचना तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने गद्य और पद्य दोनों ही क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे द्विवेदी युग के उन साहित्यकारों में थे जिन्होंने भाषा-परिष्कार, राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्धन में सक्रिय भूमिका निभाई।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे भाषिक विविधता के धनी थे। खड़ी बोली, ब्रजभाषा, उर्दू-प्रभावित शैली—सभी पर उनका समान अधिकार था। वे कठिन और सरल दोनों प्रकार की काव्य-रचना में दक्ष थे। इसी कारण उन्हें एक व्यापक दृष्टि वाला और सर्वगुणसंपन्न कवि माना जाता है।

‘प्रिय-प्रवास’ जैसी कृति ने उन्हें हिन्दी महाकाव्य-परंपरा में स्थायी प्रतिष्ठा दिलाई। यह रचना अपनी संरचना, भाव-गाम्भीर्य और कलात्मकता के कारण हिन्दी साहित्य में एक मानक कृति के रूप में स्वीकार की जाती है।

निराला ने उन्हें “हिन्दी का सार्वभौम कवि” कहकर संबोधित किया, जिससे उनकी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय मिलता है। यह विशेषण केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि उनके व्यापक साहित्यिक कौशल और भाषिक अधिकार का प्रमाण है।

इस प्रकार हरिऔध जी की विरासत हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्थायी और प्रेरणास्पद है। उन्होंने न केवल एक नई काव्य-धारा को जन्म दिया, बल्कि भाषा और साहित्य की संभावनाओं का विस्तार भी किया। उनकी कृतियाँ आज भी हिन्दी साहित्य के विकास और अध्ययन में महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में स्थापित हैं।


निष्कर्ष

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ आधुनिक हिन्दी साहित्य के उन युगनिर्माताओं में से हैं जिन्होंने भाषा, भाव और विचार—तीनों स्तरों पर नवीन प्रयोग किए। उन्होंने खड़ी बोली को महाकाव्यात्मक गरिमा प्रदान की, संस्कृत छन्दों का सफल प्रयोग किया, राष्ट्रीयता और लोकमंगल की भावना को पुष्ट किया तथा साहित्य को समाज-निर्माण का साधन बनाया।

उनकी कृतियाँ आज भी हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय हैं। ‘प्रिय-प्रवास’ और ‘वैदेही वनवास’ जैसे ग्रन्थ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों के संवाहक भी हैं।

इस प्रकार हरिऔध जी हिन्दी साहित्य के आकाश में एक ऐसे दीप्तिमान नक्षत्र हैं जिनकी ज्योति सदैव साहित्य-जगत को आलोकित करती रहेगी।


  • प्रिय प्रवास’ के आधार पर राधा के व्यक्तित्व और आदर्श नारी रूप का विवेचन कीजिए।
  • हरिऔध जी ने ‘प्रिय प्रवास’ में राधा के माध्यम से त्याग और लोकमंगल की भावना को किस प्रकार व्यक्त किया है? स्पष्ट कीजिए।
  • राधा के चरित्र में हरिऔध जी ने अनोखी सूझ-बूझ का परिचय दिया है। इस कथन की सार्थकता पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।
  • ‘पवन दूतिका’ प्रसंग में राधा के विरह-भाव की मार्मिकता पर प्रकाश डालिए।
  • ‘प्रियप्रवास’ के आधार पर राधा की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  • हरिऔध जी के काव्य में राधा के चरित्र की नवीनता और मौलिकता का विश्लेषण कीजिए।
  • ‘पवन दूतिका’ के आधार पर राधा के वियोग वर्णन की विशेषताएं बताइए।
  • ‘प्रिय प्रवास’ में राधा के चरित्र को पारंपरिक राधा से भिन्न रूप में कैसे प्रस्तुत किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
  • ‘पवन दूतिका’ प्रसंग में हरिऔध जी ने राधा को जो नया रूप दिया है, उसका विश्लेषण कीजिए।

हरिऔध कृत ‘प्रियप्रवास’ में राधा का नवोन्मेषी चरित्र-चित्रण

कृष्ण-भक्ति काव्य परंपरा में राधा का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है। सूरदास, नंददास और घनानंद जैसे कवियों ने उन्हें प्रेयसी और नायिका के रूप में चित्रित किया, किंतु उपाध्याय हरिऔध ने ‘प्रियप्रवास’ और ‘पवन दूतिका’ में राधा के चरित्र को एक नवीन वैचारिक आयाम प्रदान किया। उनकी राधा केवल प्रेम-विलास की नायिका नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की प्रतिनिधि, कर्तव्यनिष्ठ और लोक-कल्याण में संलग्न आदर्श नारी के रूप में सामने आती है।

विचारशील एवं आदर्श प्रेमिका के रूप में राधा

हरिऔध जी की राधा प्रेम को केवल भावुकता तक सीमित नहीं रखती। वह गहन प्रेम के साथ विवेक और गंभीरता को भी साधे हुए है। रीतिकालीन काव्य में जहाँ राधा चंचल और सौंदर्यप्रधान नायिका है, वहीं प्रियप्रवास की राधा में प्रौढ़ता, संयम और आत्मसंयोजन के गुण स्पष्ट दिखाई देते हैं।
यह राधा प्रेम में डूबी हुई अवश्य है, किंतु आत्मसम्मान और मर्यादा से कभी विचलित नहीं होती।

मर्यादा और शिष्टाचार की सजग संरक्षिका

हरिऔध जी ने राधा को सामाजिक मर्यादाओं के प्रति अत्यंत सजग दिखाया है। वह न केवल स्वयं मर्यादित आचरण करती है, बल्कि कृष्ण के व्यक्तित्व को भी शिष्ट और संयमी रूप में देखना चाहती है। पवन से संवाद करते हुए वह कृष्ण की गरिमा का उल्लेख करती है—

“बैठे होंगे निकट जितने, शान्त औ शिष्ट होंगे।
मर्यादा का सकल जन को ध्यान होगा बड़ा ही॥”

यह दृष्टि राधा को केवल प्रेमिका नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना से युक्त स्त्री सिद्ध करती है।

समाज-सेवा में रत लोकमंगलकारी नारी

हरिऔध जी की राधा का एक सर्वथा नवीन रूप उनका समाज-सेविका स्वरूप है। वह व्यक्तिगत सुख-दुःख से ऊपर उठकर दीन-दुखियों, वृद्धों और रोगियों की सेवा को जीवन का लक्ष्य मानती है—

“वे सेवा थीं सतत करती वृद्ध रोगीजनों की।
दीनों-हीनों, निबल विधवा आदि को मानती थीं॥”

यह राधा भारतीय समाज में नारी की सामाजिक भूमिका को एक गरिमामय स्वरूप प्रदान करती है।

कर्तव्यनिष्ठा और आत्मसंयम का आदर्श

राधा के हृदय में कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम है, किंतु वह कर्तव्य-पथ से कभी विचलित नहीं होती। वह अपने व्यक्तिगत प्रेम को भी विश्व-कल्याण के अधीन मानती है—

“आज्ञा भूलूँ प्रियतम की, विश्व के काम आऊँ।
मेरा कौमार-व्रत भव में पूर्णता प्राप्त होवे॥”

यह कर्तव्यनिष्ठा राधा को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करती है और उसे साधारण नायिका से विशिष्ट बनाती है।

नारी-सुलभ संवेदनशीलता से युक्त व्यक्तित्व

यद्यपि राधा विवेकशील, संयमी और कर्तव्यपरायण है, फिर भी उसमें नारी-सुलभ कोमल भावनाएँ पूरी तीव्रता से विद्यमान हैं। कृष्ण-वियोग में वह स्वयं को रोक नहीं पाती—

“निर्लिप्ता हूँ, अधिकतर मैं नित्यशः संयता हूँ।
तो भी होती अति व्यथित हूँ, श्याम की याद आते॥”

यह द्वंद्व—संयम और संवेदना का—राधा के चरित्र को अत्यंत मानवीय बनाता है।

‘पवन दूतिका’ में विरह-वेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति

‘पवन दूतिका’ प्रसंग में राधा का विरह अत्यंत करुण और हृदयस्पर्शी रूप में व्यक्त हुआ है। वह पवन को दूत बनाकर कृष्ण के पास भेजती है और अपनी व्यथा व्यक्त करती है—

“मैं रो-रो के प्रिय-विरह से बावली हो रही हूँ।
जा के मेरी सब दुख-कथा श्याम को तू सुना दे॥”

यह विरह केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि एक समर्पित प्रेमिका की आत्मिक तड़प है।

परदुःखकातर और करुणाशील भारतीय नारी

राधा की संवेदना केवल अपने दुःख तक सीमित नहीं रहती। वह पवन को मार्ग में मिलने वाले श्रांत यात्रियों की सेवा करने का भी निर्देश देती है—

“जाते-जाते अगर पथ में क्लान्त कोई दिखावे।
तो जा के सन्निकट उसकी क्लान्तियों को मिटाना॥”

यह गुण उसे एक आदर्श भारतीय नारी के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

उपसंहार

उपाध्याय हरिऔध ने राधा के परंपरागत स्वरूप में मौलिक परिवर्तन कर उसे आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला है। उनकी राधा प्रेमिका होने के साथ-साथ समाज-सेविका, कर्तव्यनिष्ठ नारी और सांस्कृतिक मूल्यों की संवाहिका है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि हरिऔध जी की राधा भक्ति-काव्य की परंपरा में एक नवीन, गरिमामय और प्रेरणादायक अध्याय जोड़ती है।


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