भारत त्योहारों का देश है, और इन त्योहारों में यदि किसी पर्व को सबसे अधिक रंग, उमंग और प्रेम का प्रतीक माना जाता है, तो वह है होली। लेकिन जब होली की बात ब्रजभूमि—वृंदावन, नंदगांव, बरसाना और गोकुल—की हो, तो इसका स्वरूप और भी अलौकिक हो जाता है। यहां होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण और राधा रानी की दिव्य लीलाओं का जीवंत स्मरण है।
ब्रज की होली देश-विदेश में अपनी अनूठी परंपराओं के कारण प्रसिद्ध है। यहां लड्डूमार होली, लठमार होली, छड़ी-मार होली, हुरंगा होली और विशेष रूप से फूलों की होली देखने के लिए हर वर्ष लाखों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। इन उत्सवों की शुरुआत लड्डूमार होली से होती है और रंगों वाली होली के अगले दिन तक उत्सव का सिलसिला चलता रहता है।
साल 2026 में भी ब्रज की होली ने भक्तों को अपार आनंद से सराबोर कर दिया। आइए, विस्तार से जानते हैं ब्रज की होली 2026 की तिथियां, परंपराएं और उनके पीछे छिपे आध्यात्मिक भाव।
ब्रज क्षेत्र में 40 दिनों तक चलता है होली उत्सव
ब्रजभूमि में होली केवल एक या दो दिन का पर्व नहीं है, बल्कि यह लगभग 40 दिनों तक चलने वाला आध्यात्मिक उत्सव है। इसकी शुरुआत बसंत पंचमी से ही हो जाती है। जैसे ही बसंत ऋतु का आगमन होता है, वैसे ही मंदिरों में होली के गीत गूंजने लगते हैं—”फाग खेलन आए हैं नंदलाल…”
बसंत पंचमी से लेकर रंगों की होली तक, ब्रज के मंदिरों, गलियों और कुंजों में फाग, रास और कीर्तन का वातावरण बना रहता है। यह पूरा कालखंड राधा-कृष्ण के प्रेम, माधुर्य और आनंद की अभिव्यक्ति का प्रतीक है।
वृंदावन की फूलों वाली होली 2026
ब्रज की होली में यदि सबसे कोमल और मनोहारी स्वरूप की बात की जाए, तो वह है वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में खेली जाने वाली फूलों की होली।
28 फरवरी 2026 को मनाई जाएगी फूलों की होली
वृंदावन में स्थित बांके बिहारी मंदिर में इस वर्ष फूलों की होली 28 फरवरी 2026, शनिवार को मनाई जाएगी। यह उत्सव ब्रज की होली का सबसे कोमल, सौम्य और भक्तिपूर्ण स्वरूप माना जाता है। इस विशेष अवसर पर मंदिर परिसर में रंगों की बजाय सुगंधित पुष्पों की वर्षा की जाएगी, जिससे पूरा वातावरण दिव्य और आनंदमय हो उठेगा।
फूलों की होली के दिन प्रातः से ही मंदिर में विशेष सजावट की जाती है। ठाकुर जी को आकर्षक वसंत-श्रृंगार से अलंकृत किया जाता है और भजन-कीर्तन के बीच भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। जैसे ही पुजारी आरती और उत्सव की शुरुआत करते हैं, वैसे ही गुलाब, गेंदा और विभिन्न सुगंधित फूलों की पंखुड़ियां भक्तों पर बरसाई जाती हैं। कुछ ही क्षणों में पूरा मंदिर रंग-बिरंगे फूलों से ढक जाता है और वातावरण में केवल भक्ति, प्रेम और उल्लास की अनुभूति रह जाती है।
ब्रज में यह मान्यता प्रचलित है कि श्रीकृष्ण और राधा रानी ने वृंदावन की कुंज-गलियों में प्रेमपूर्वक फूलों से होली खेली थी। फूलों की कोमल पंखुड़ियां प्रेम, सौहार्द और शुद्ध भावनाओं का प्रतीक मानी जाती हैं। इसी परंपरा को जीवित रखने के लिए आज भी बांके बिहारी मंदिर में रंगों के स्थान पर पुष्प-वर्षा की जाती है, ताकि भक्त उस दिव्य प्रेम का अनुभव कर सकें जो राधा-कृष्ण की लीलाओं में समाहित है।
फूलों की होली न केवल एक उत्सव है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि प्रेम का रंग सबसे श्रेष्ठ होता है—जो मन को सुगंधित करता है, किसी को आहत नहीं करता और सभी को एक सूत्र में बांध देता है।
फूलों की होली का आध्यात्मिक महत्व
ब्रज में मान्यता है कि श्रीकृष्ण और राधा रानी ने वृंदावन की कुंज-गलियों में प्रेमपूर्वक फूलों से होली खेली थी। फूलों की कोमल पंखुड़ियां प्रेम, सौहार्द और कोमलता का प्रतीक मानी जाती हैं।
वैष्णव परंपरा में पुष्पों का विशेष महत्व है। देवताओं पर पुष्प-वर्षा करना दिव्य आनंद और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। इसी भाव को जीवित रखने के लिए आज भी मंदिरों में रंगों के स्थान पर फूलों की होली खेली जाती है।
फूलों की होली यह संदेश देती है कि प्रेम का रंग सबसे श्रेष्ठ है—जो किसी को आहत नहीं करता, बल्कि सुगंध और शीतलता फैलाता है।
लड्डूमार होली 2026: मिठास और प्रेम का उत्सव
ब्रज की होली की शुरुआत लड्डूमार होली से होती है।
25 फरवरी 2026 को मनाई गई लड्डूमार होली
साल 2026 में 25 फरवरी, बुधवार को बरसाना स्थित राधा रानी मंदिर में लड्डूमार होली का आयोजन किया गया। इस दिन मंदिर के भीतर भक्त एक-दूसरे पर लड्डू फेंककर उत्सव मनाते हैं।
मंदिर में पुजारी और श्रद्धालु मिलकर लड्डुओं की वर्षा करते हैं। वातावरण में भजन गूंजते हैं और भक्त प्रेमपूर्वक इस अनूठी परंपरा का आनंद लेते हैं।
लड्डूमार होली की परंपरा क्यों?
मान्यता है कि श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ नंदगांव से बरसाना आते थे और राधा रानी व उनकी सखियों के साथ हंसी-मजाक करते थे। सखियां भी उन्हें प्रेमपूर्वक चिढ़ाती थीं। इसी मधुर वातावरण में मिठाइयों का आदान-प्रदान होता था।
इसी परंपरा से लड्डूमार होली का जन्म हुआ। लड्डू यहां मिठास का प्रतीक है—जो राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम की मधुरता को दर्शाता है। यह दर्शाता है कि उनकी लीला में नोक-झोंक भी प्रेम से भरी होती है।
लठमार होली 2026: परंपरा और उत्साह का अनूठा संगम
26 फरवरी 2026 को बरसाना में लठमार होली
लड्डूमार होली के अगले दिन, 26 फरवरी 2026 को बरसाना में लठमार होली खेली गई। यह ब्रज की सबसे प्रसिद्ध और रोमांचक परंपराओं में से एक है।
इस दिन नंदगांव के पुरुष बरसाना आते हैं और राधा रानी के गांव की महिलाएं उन्हें लाठियों से प्रतीकात्मक रूप से मारती हैं। पुरुष ढाल लेकर आते हैं और स्वयं को बचाने का प्रयास करते हैं।
यह पूरा आयोजन अत्यंत आनंद और हास्य के वातावरण में संपन्न होता है। हजारों लोग इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए एकत्रित होते हैं।
लठमार होली का पौराणिक आधार
मान्यता है कि श्रीकृष्ण जब बरसाना आते थे, तो राधा और उनकी सखियों को चिढ़ाते थे। जवाब में सखियां उन्हें लाठियों से खदेड़ती थीं। उसी घटना की स्मृति में आज भी यह परंपरा निभाई जाती है।
छड़ी-मार होली 2026: गोकुल की अनोखी परंपरा
1 मार्च 2026 को गोकुल में छड़ी-मार होली
इस वर्ष 1 मार्च 2026, रविवार को गोकुल में छड़ी-मार होली मनाई जाएगी। इस परंपरा में महिलाएं पुरुषों को छड़ी से मारकर उत्सव मनाती हैं।
यह आयोजन भी हंसी-ठिठोली और प्रेम के भाव से परिपूर्ण होता है। छड़ी-मार होली ब्रज की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है।
हुरंगा होली: रंग और उत्साह का चरम
ब्रज क्षेत्र में हुरंगा होली भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यह विशेष रूप से रंगों वाली होली के बाद खेली जाती है। इसमें रंग, गुलाल और पानी का भरपूर प्रयोग होता है।
भक्त और स्थानीय लोग मिलकर रंगों की वर्षा करते हैं। ढोल, नगाड़े और फाग गीत पूरे वातावरण को जीवंत बना देते हैं।
बांके बिहारी मंदिर की विशेषता
वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर में होली का उत्सव अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता है। यहां केवल एक दिन नहीं, बल्कि कई दिनों तक अलग-अलग स्वरूपों में होली खेली जाती है।
मंदिर के भीतर भगवान बांके बिहारी के दर्शन के दौरान भक्तों पर रंग, गुलाल और फूलों की वर्षा की जाती है। मंदिर की परंपरा और भव्यता इस उत्सव को और भी दिव्य बना देती है।
ब्रज की होली का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संदेश
ब्रज की होली केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह प्रेम, भक्ति और सौहार्द का संदेश देती है।
- लड्डूमार होली सिखाती है कि जीवन में मिठास बनी रहनी चाहिए।
- लठमार होली प्रेमपूर्ण नोक-झोंक का प्रतीक है।
- फूलों की होली कोमलता और सौम्यता का संदेश देती है।
- छड़ी-मार और हुरंगा होली उत्साह और ऊर्जा का प्रतीक हैं।
इन सभी परंपराओं में कहीं भी कटुता नहीं, बल्कि प्रेम और आनंद की भावना है।
देश-विदेश से आते हैं श्रद्धालु
ब्रज की होली देखने के लिए केवल भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी पर्यटक आते हैं। कई विदेशी भक्त यहां की सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक वातावरण से अत्यंत प्रभावित होते हैं।
मंदिरों में होने वाले भजन-कीर्तन, रासलीला और फाग गीत लोगों को भक्ति में डुबो देते हैं।
निष्कर्ष
ब्रज की होली वास्तव में अद्भुत, अनोखी और दिव्य है। यह केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के प्रेम की अनुभूति है।
साल 2026 में 25 फरवरी को लड्डूमार होली, 26 फरवरी को लठमार होली, 28 फरवरी को वृंदावन में फूलों की होली और 1 मार्च को गोकुल में छड़ी-मार होली ने भक्तों को आनंद और भक्ति के रंग में रंग दिया।
ब्रज की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा, उत्साह और प्रेम के साथ मनाई जाती है।
जो भी एक बार ब्रज की होली का अनुभव करता है, वह जीवन भर इस अलौकिक आनंद को नहीं भूल पाता। यहां की होली केवल देखी नहीं जाती—उसे महसूस किया जाता है, जिया जाता है और हृदय में संजोया जाता है।
ब्रज की होली सचमुच प्रेम, भक्ति और आनंद का ऐसा उत्सव है, जो संसार को यह संदेश देता है कि जीवन का सबसे सुंदर रंग प्रेम है।
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