सांस्कृतिक धरोहर किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है। मंदिर, मूर्तियाँ, पांडुलिपियाँ और कलाकृतियाँ न केवल अतीत की स्मृतियाँ हैं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की सांस्कृतिक पहचान का आधार भी हैं। औपनिवेशिक काल और उसके बाद के दशकों में भारत की असंख्य बहुमूल्य कलाकृतियाँ अवैध उत्खनन, तस्करी और अंतरराष्ट्रीय कला बाज़ार के माध्यम से देश से बाहर चली गईं। ऐसे परिदृश्य में जब कोई प्रमुख वैश्विक संस्था भारत को उसकी सांस्कृतिक संपदा लौटाने की घोषणा करती है, तो यह केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं बल्कि ऐतिहासिक न्याय और सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का प्रतीक बन जाती है।
इसी संदर्भ में हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिष्ठित स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट द्वारा भारत को तीन अत्यंत मूल्यवान प्राचीन कांस्य मूर्तियाँ लौटाने की घोषणा एक ऐतिहासिक घटना के रूप में सामने आई है। यह निर्णय भारत-अमेरिका संबंधों, अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक कूटनीति तथा अवैध कला तस्करी के विरुद्ध वैश्विक प्रयासों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
स्मिथसोनियन संस्थान और उसका महत्व
स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन अमेरिका का सबसे बड़ा संग्रहालय, शिक्षा और अनुसंधान नेटवर्क है। इसके अंतर्गत आने वाला नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट एशिया की कला, संस्कृति और इतिहास से जुड़ी विश्व की सबसे समृद्ध संग्रहणियों में से एक है। इस संग्रहालय में रखी गई वस्तुएँ केवल सौंदर्य की दृष्टि से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
जब ऐसा संस्थान किसी वस्तु की ‘प्रोवेनेंस’ (उत्पत्ति और स्वामित्व इतिहास) पर पुनर्विचार कर उसे मूल देश को लौटाने का निर्णय लेता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय नैतिकता के उच्च मानकों को भी दर्शाता है।
लौटाई जाने वाली तीनों मूर्तियाँ : दक्षिण भारतीय कला का वैभव
भारत को लौटाई जाने वाली तीनों मूर्तियाँ दक्षिण भारत के महान राजवंशों की कला, आस्था और सामाजिक जीवन का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये मूर्तियाँ केवल धार्मिक प्रतिमाएँ नहीं हैं, बल्कि भारतीय धातु-कला, दर्शन और भक्ति परंपरा की सजीव अभिव्यक्ति हैं।
1. शिव नटराज : चोल काल की कांस्य कला का शिखर
इन मूर्तियों में सबसे प्रसिद्ध और प्रतीकात्मक मूर्ति शिव नटराज (Shiva Nataraja) की है। यह प्रतिमा लगभग 10वीं शताब्दी (990 ईस्वी) की मानी जाती है और चोल राजवंश के काल से संबंधित है।
चोल शासक (9वीं से 13वीं शताब्दी) दक्षिण भारत में कला और स्थापत्य के महान संरक्षक थे। उनकी कांस्य मूर्तियाँ विशेष रूप से ‘लॉस्ट वैक्स तकनीक’ (Cire Perdue / Lost Wax Technique) के लिए प्रसिद्ध हैं। इस तकनीक में मोम से बनी आकृति को मिट्टी से ढककर गर्म किया जाता है, जिससे मोम पिघलकर निकल जाता है और उसकी जगह पिघला हुआ कांसा भर दिया जाता है।
नटराज की यह मूर्ति भगवान शिव को तांडव नृत्य की मुद्रा में दर्शाती है, जो सृष्टि, संरक्षण और संहार के चक्र का दार्शनिक प्रतीक है। अग्नि, डमरू, अपस्मार पुरुष और प्रभामंडल—ये सभी तत्व भारतीय दर्शन की गहराई को मूर्त रूप देते हैं।
2. सोमस्कंद : पारिवारिक सौम्यता और शैव भक्ति
दूसरी मूर्ति सोमस्कंद (Somaskanda) की है, जो 12वीं शताब्दी की चोल कालीन कृति मानी जाती है। इस मूर्ति में भगवान शिव अपनी पत्नी देवी उमा (पार्वती) और पुत्र स्कंद (कार्तिकेय) के साथ सौम्य और शांत मुद्रा में विराजमान हैं।
सोमस्कंद मूर्तियाँ विशेष रूप से दक्षिण भारतीय मंदिरों में पूजा-अर्चना और उत्सवों से जुड़ी रही हैं। यह प्रतिमा शैव धर्म में पारिवारिक आदर्श, करुणा और सामंजस्य का प्रतीक मानी जाती है। चोल काल में इस प्रकार की मूर्तियाँ धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान जुलूसों में भी प्रयोग की जाती थीं।
3. संत सुंदरर और परवई : भक्ति आंदोलन की सजीव छवि
तीसरी मूर्ति अपेक्षाकृत बाद की अवधि की है और 16वीं शताब्दी के विजयनगर साम्राज्य से संबंधित है। इसमें नयनार संत सुंदरर और उनकी पत्नी परवई को दर्शाया गया है।
यह मूर्ति दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन की गहराई को प्रकट करती है। नयनार संतों ने जाति, कर्मकांड और औपचारिकता से ऊपर उठकर व्यक्तिगत भक्ति और ईश्वर के प्रति प्रेम को महत्व दिया। सुंदरर, तमिल शैव भक्ति परंपरा के प्रमुख संतों में से एक थे। यह प्रतिमा दर्शाती है कि कैसे आध्यात्मिकता और सांसारिक जीवन एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।
मूर्तियों की अवैध निकासी और प्रोवेनेंस रिसर्च
इन मूर्तियों की वापसी का सबसे महत्वपूर्ण आधार ‘प्रोवेनेंस रिसर्च’ रहा है। प्रोवेनेंस रिसर्च का अर्थ है—किसी वस्तु की उत्पत्ति, स्वामित्व और स्थानांतरण के पूरे इतिहास का वैज्ञानिक और अभिलेखीय अध्ययन।
स्मिथसोनियन संग्रहालय की टीम ने विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेजों, बिक्री रिकॉर्ड और विशेष रूप से फ्रांसीसी संस्थान, पांडिचेरी के फोटो अभिलेखागार की सहायता से यह सिद्ध किया कि ये मूर्तियाँ 1950 के दशक में तमिलनाडु के मंदिरों से अवैध रूप से हटाई गई थीं।
इन प्रमाणों की पुष्टि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा की गई। ASI ने यह स्पष्ट किया कि इन मूर्तियों का निर्यात भारत के प्राचीन संपदा संरक्षण कानूनों का उल्लंघन था।
भारतीय कानून और अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढाँचा
भारत में सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा के लिए ‘पुरावशेष और कला निधि अधिनियम, 1972’ (Antiquities and Art Treasures Act, 1972) लागू है। यह कानून 100 वर्ष से अधिक प्राचीन वस्तुओं के पंजीकरण, संरक्षण और निर्यात को नियंत्रित करता है। इसके तहत बिना अनुमति किसी भी पुरावशेष को देश से बाहर ले जाना अपराध है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 1970 का यूनेस्को कन्वेंशन अवैध रूप से निर्यात की गई सांस्कृतिक संपदा की वापसी के लिए एक मजबूत कानूनी ढाँचा प्रदान करता है। भारत और अमेरिका दोनों इस कन्वेंशन के पक्षकार हैं, जिससे सहयोग की प्रक्रिया और अधिक सुगम हो जाती है।
दीर्घकालिक ऋण पर नटराज की मूर्ति
इस पूरे घटनाक्रम में एक अनूठा पहलू यह है कि भारत सरकार और स्मिथसोनियन के बीच हुए समझौते के तहत नटराज की मूर्ति को दीर्घकालिक ऋण (Long-term Loan) पर अमेरिका में ही प्रदर्शित किया जाएगा।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि मूर्ति की वैश्विक दर्शकों तक पहुँच बनी रहे, साथ ही भारत के स्वामित्व और सांस्कृतिक अधिकार को भी मान्यता मिले। यह मॉडल भविष्य में अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय सहयोग का एक नया उदाहरण प्रस्तुत करता है।
सांस्कृतिक कूटनीति और भारत-अमेरिका सहयोग
हाल के वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच सांस्कृतिक संपदा की सुरक्षा को लेकर सहयोग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जुलाई 2024 में दोनों देशों ने एक सांस्कृतिक संपत्ति समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसका उद्देश्य कला तस्करी को रोकना, सूचना साझा करना और चोरी हुई वस्तुओं की वापसी को सरल बनाना है।
यह पहल दर्शाती है कि आधुनिक कूटनीति केवल रक्षा, व्यापार या प्रौद्योगिकी तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्कृति भी ‘सॉफ्ट पावर’ का एक सशक्त माध्यम बन चुकी है।
तस्करी नेटवर्क और ‘ऑपरेशन हिडन आइडल’
इन मूर्तियों की चोरी का संबंध कुख्यात कला तस्कर सुभाष कपूर के नेटवर्क से जोड़ा गया है। सुभाष कपूर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय एक बड़ा कला तस्कर था, जिसके नेटवर्क ने दशकों तक दक्षिण एशिया की सांस्कृतिक संपदा को अवैध रूप से विदेशों में पहुँचाया।
भारत और अमेरिका के सहयोग से चलाए गए ‘ऑपरेशन हिडन आइडल’ के अंतर्गत अब तक सैकड़ों चोरी की गई मूर्तियों की पहचान और वापसी संभव हो पाई है। अमेरिका अब तक 642 से अधिक पुरावशेष भारत को लौटा चुका है, जिनमें से 297 वस्तुएँ 2024 में प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा के दौरान सौंपी गई थीं।
व्यापक महत्व और निष्कर्ष
अमेरिका द्वारा भारत को तीन प्राचीन मूर्तियों की वापसी केवल एक प्रतीकात्मक कदम नहीं है, बल्कि इसके अनेक व्यापक निहितार्थ हैं। यह घटना दर्शाती है कि—
- सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा वैश्विक नैतिक दायित्व है
- प्रोवेनेंस रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ऐतिहासिक अन्याय सुधारा जा सकता है
- कानून और कूटनीति मिलकर सांस्कृतिक पुनर्स्थापन को संभव बना सकते हैं
- भारत अपनी खोई हुई विरासत को पुनः प्राप्त करने की दिशा में निर्णायक रूप से आगे बढ़ रहा है
अंततः, यह पहल न केवल भारत की सांस्कृतिक आत्मा को पुनः सशक्त करती है, बल्कि वैश्विक स्तर पर यह संदेश भी देती है कि इतिहास को सही हाथों में लौटाना ही सच्ची सभ्यतागत प्रगति है।
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