प्रकीर्णक (लौकिक) साहित्य: श्रृंगारिकता और लोकसंवेदना का आदिकालीन स्वरूप
हिंदी साहित्य के इतिहास को जब हम उसके आदिकालीन स्वरूप में देखते हैं, तो वहाँ वीर रसप्रधान रासो साहित्य और धर्माश्रित धार्मिक साहित्य के समानांतर एक तीसरी साहित्यिक धारा भी दृष्टिगत होती है – जिसे प्रकीर्णक साहित्य अथवा लौकिक साहित्य कहा जाता है। यह साहित्य न तो राजाश्रय का प्रतिफल था और न ही धर्म … Read more