चंद्रशेखर आज़ाद का 95वां शहीदी दिवस: अदम्य साहस, त्याग और क्रांतिकारी राष्ट्रभक्ति की अमर गाथा

भारत ने 27 फरवरी 2025 को महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद का 95वां शहीदी दिवस श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उनका नाम अदम्य साहस, अटूट संकल्प और राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान के प्रतीक के रूप में अमर है। देशभर में विभिन्न कार्यक्रमों, संगोष्ठियों, श्रद्धांजलि सभाओं और स्मरण समारोहों के माध्यम से उन्हें नमन किया गया। राजनीतिक नेताओं, इतिहासकारों, शिक्षाविदों और युवाओं ने उनके जीवन से प्रेरणा लेने का संकल्प दोहराया।

चंद्रशेखर आज़ाद उन क्रांतिकारियों में अग्रणी थे जिन्होंने न केवल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का मार्ग अपनाया, बल्कि अपने जीवन को राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए पूर्णतः समर्पित कर दिया। उनका प्रसिद्ध वचन—“दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे”—आज भी भारतीय जनमानस में जोश और प्रेरणा का संचार करता है। उन्होंने यह प्रण लिया था कि वे कभी भी अंग्रेजों के हाथ जीवित नहीं पकड़े जाएंगे, और 1931 में अपने अंतिम क्षण तक इस वचन को निभाते हुए उन्होंने अपने जीवन का बलिदान दे दिया।

उनका जीवन केवल एक क्रांतिकारी की कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसे युवा की प्रेरक गाथा है जिसने कम आयु में ही राष्ट्र के लिए संघर्ष का मार्ग चुना और अपने साहस, संगठन क्षमता तथा नेतृत्व कौशल से स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी।

Table of Contents

चंद्रशेखर आज़ाद: एक परिचय

चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा (अब आज़ाद नगर) नामक स्थान पर हुआ था। उनका वास्तविक नाम चंद्रशेखर तिवारी था। उनके पिता का नाम सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी था। साधारण ब्राह्मण परिवार में जन्मे चंद्रशेखर बचपन से ही तेजस्वी, साहसी और स्वाभिमानी स्वभाव के थे।

बाल्यावस्था से ही उनमें देशभक्ति की भावना प्रबल थी। उनकी माता उन्हें वीरता की कहानियाँ सुनाया करती थीं, जिससे उनके मन में राष्ट्रप्रेम और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का बीज अंकुरित हुआ। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने अपने गृह क्षेत्र में प्राप्त की और बाद में वे बनारस (वर्तमान वाराणसी) चले गए, जहाँ उन्होंने संस्कृत की शिक्षा ग्रहण की।

यहीं से उनके जीवन की दिशा बदलने लगी और वे धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ते चले गए।

“आज़ाद” नाम की उत्पत्ति: एक साहसिक घोषणा

चंद्रशेखर तिवारी से “आज़ाद” बनने की कहानी भारतीय इतिहास की सबसे प्रेरक घटनाओं में से एक है। वर्ष 1921 में जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन पूरे देश में जोर पकड़ रहा था, तब मात्र 15 वर्ष की आयु में चंद्रशेखर भी इस आंदोलन में शामिल हो गए।

इस दौरान उन्हें ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। जब उन्हें न्यायालय में प्रस्तुत किया गया और उनसे नाम, पिता का नाम तथा पता पूछा गया, तब उन्होंने निर्भीकता से उत्तर दिया—

  • नाम: आज़ाद
  • पिता का नाम: स्वतंत्र
  • पता: जेल

उनके इस साहसिक उत्तर से अंग्रेज अधिकारी स्तब्ध रह गए। उन्हें दंड स्वरूप कोड़ों की सजा दी गई, लेकिन उन्होंने एक भी कराह नहीं की। इस घटना के बाद वे हमेशा के लिए “चंद्रशेखर आज़ाद” के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

यह घटना उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता, आत्मसम्मान और अटूट राष्ट्रभक्ति का परिचायक थी।

जलियांवाला बाग हत्याकांड और प्रारंभिक प्रेरणा

1919 का जलियांवाला बाग हत्याकांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल देने वाली घटना थी। इस निर्मम नरसंहार ने पूरे देश की तरह युवा चंद्रशेखर के मन को भी गहराई से झकझोर दिया।

ब्रिटिश शासन की क्रूरता को देखकर उनके मन में अंग्रेजों के प्रति तीव्र आक्रोश उत्पन्न हुआ। वे यह समझ चुके थे कि केवल याचना और विनती से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती। यही कारण था कि उन्होंने प्रारंभिक दौर में अहिंसात्मक आंदोलनों में भाग लेने के बावजूद बाद में क्रांतिकारी मार्ग को अपनाने का निर्णय लिया।

असहयोग आंदोलन में भागीदारी और वैचारिक परिवर्तन

असहयोग आंदोलन (1920–22) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण चरण था। इस आंदोलन ने लाखों भारतीयों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एकजुट किया। चंद्रशेखर आज़ाद भी इस आंदोलन से गहराई से प्रभावित हुए और उन्होंने सक्रिय रूप से इसमें भाग लिया।

हालाँकि, 1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया, तब अनेक युवाओं की तरह चंद्रशेखर आज़ाद भी निराश हो गए। उन्हें लगा कि अंग्रेजों की दमनकारी नीति का मुकाबला करने के लिए अधिक आक्रामक और सशस्त्र रणनीति की आवश्यकता है।

यहीं से उनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ आया। उन्होंने अहिंसा के मार्ग से हटकर क्रांतिकारी संघर्ष का मार्ग अपनाने का निश्चय किया।

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़ाव

असहयोग आंदोलन के स्थगन के बाद चंद्रशेखर आज़ाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़ गए। इस संगठन का उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना और भारत में एक गणतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना करना था।

इस संगठन में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और अन्य प्रमुख क्रांतिकारी शामिल थे। आज़ाद ने अपनी कुशल रणनीति, साहस और संगठन क्षमता के बल पर शीघ्र ही संगठन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया।

वे अनुशासनप्रिय, गोपनीयता बनाए रखने वाले और अत्यंत चतुर क्रांतिकारी थे। भेष बदलने में उनकी दक्षता के कारण ब्रिटिश पुलिस उन्हें लंबे समय तक पकड़ नहीं सकी। इसी कारण उन्हें “क्विक सिल्वर” की उपाधि भी दी गई।

काकोरी कांड: क्रांतिकारी संघर्ष का महत्वपूर्ण अध्याय

9 अगस्त 1925 को हुआ काकोरी ट्रेन कांड भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की एक ऐतिहासिक घटना थी। इस घटना में HRA के क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन को लूट लिया था, ताकि उस धन का उपयोग स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों में किया जा सके।

इस साहसिक अभियान में चंद्रशेखर आज़ाद की महत्वपूर्ण भूमिका थी। हालांकि इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने व्यापक दमन अभियान चलाया और संगठन के अधिकांश सदस्य गिरफ्तार कर लिए गए, लेकिन आज़ाद पुलिस के हाथ नहीं आए।

काकोरी कांड के बाद आज़ाद लंबे समय तक भूमिगत रहे और गुप्त रूप से संगठन को पुनर्गठित करते रहे। इस दौरान उन्होंने अपने नेतृत्व कौशल और रणनीतिक सोच का परिचय दिया।

HSRA का गठन और क्रांतिकारी आंदोलन का पुनर्गठन

काकोरी कांड के बाद क्रांतिकारी आंदोलन को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता थी। चंद्रशेखर आज़ाद ने इस चुनौती को स्वीकार किया और संगठन को पुनर्गठित करते हुए हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) का निर्माण किया।

इस नए संगठन में समाजवादी विचारधारा को भी स्थान दिया गया और इसका उद्देश्य केवल ब्रिटिश शासन का अंत ही नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण और समानतामूलक समाज की स्थापना भी था।

आज़ाद ने संगठन में अनुशासन, गोपनीयता और रणनीतिक योजना पर विशेष जोर दिया। उनके नेतृत्व में HSRA ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कई महत्वपूर्ण क्रांतिकारी गतिविधियाँ संचालित कीं।

लाला लाजपत राय की मृत्यु और सांडर्स की हत्या

1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाहौर में हुए लाठीचार्ज में पंजाब केसरी लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने पूरे देश को आक्रोश से भर दिया।

लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए क्रांतिकारियों ने योजना बनाई। इस योजना में चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और शिवराम राजगुरु प्रमुख रूप से शामिल थे।

17 दिसंबर 1928 को ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या की गई। इस अभियान में आज़ाद ने सुरक्षा कवच की भूमिका निभाई और अपने साथियों को सुरक्षित निकलने में मदद की। यह घटना ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी प्रतिरोध का एक प्रतीक बन गई।

अन्य क्रांतिकारी गतिविधियाँ और साहसिक अभियान

चंद्रशेखर आज़ाद केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक कुशल रणनीतिकार भी थे। उन्होंने अनेक गुप्त अभियानों का संचालन किया और क्रांतिकारी आंदोलन को जीवित बनाए रखा।

1929 में वायसराय लॉर्ड इरविन की ट्रेन पर बम हमले के प्रयास में भी उनकी भूमिका मानी जाती है। हालांकि यह प्रयास पूर्णतः सफल नहीं हुआ, लेकिन इससे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी गतिविधियों का संदेश स्पष्ट रूप से प्रसारित हुआ।

आज़ाद अपने साथियों को प्रशिक्षण देते थे, हथियारों की व्यवस्था करते थे और संगठन की रणनीति तैयार करते थे। उनका लक्ष्य केवल संघर्ष करना नहीं, बल्कि एक संगठित क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा करना था।

भूमिगत जीवन और संगठनात्मक कौशल

काकोरी कांड के बाद चंद्रशेखर आज़ाद का जीवन लगातार भूमिगत संघर्ष का पर्याय बन गया। वे भेष बदलकर विभिन्न स्थानों पर रहते थे और ब्रिटिश पुलिस को चकमा देते रहते थे।

वे कभी साधु का रूप धारण करते, तो कभी शिक्षक या मजदूर के रूप में रहते थे। उनकी यही चतुराई उन्हें अंग्रेजों की गिरफ्त से दूर रखती थी।

भूमिगत रहते हुए भी उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन जारी रखा और युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ते रहे। उनकी नेतृत्व क्षमता के कारण संगठन निरंतर सक्रिय बना रहा।

अल्फ्रेड पार्क (अब आज़ाद पार्क) में अंतिम संघर्ष

27 फरवरी 1931 का दिन भारतीय इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा। उस दिन चंद्रशेखर आज़ाद इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में एक साथी क्रांतिकारी से मिलने पहुँचे थे।

किसी विश्वासघात के कारण ब्रिटिश पुलिस को उनकी सूचना मिल गई और उन्होंने पार्क को चारों ओर से घेर लिया। इसके बाद एक भीषण मुठभेड़ शुरू हुई।

आज़ाद ने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए लंबे समय तक अकेले ही पुलिस का सामना किया। उन्होंने अपने साथी को सुरक्षित भागने का अवसर दिया और स्वयं अंत तक संघर्ष करते रहे।

जब उनकी पिस्तौल में अंतिम गोली बची, तब उन्होंने अपने संकल्प को निभाते हुए स्वयं को गोली मार ली, ताकि वे अंग्रेजों के हाथ जीवित न पकड़े जाएँ। उस समय उनकी आयु मात्र 24 वर्ष थी।

उनके बलिदान के बाद अल्फ्रेड पार्क का नाम बदलकर आज़ाद पार्क रखा गया, जो आज भी उनके साहस और बलिदान का साक्षी है।

चंद्रशेखर आज़ाद का व्यक्तित्व और विचारधारा

चंद्रशेखर आज़ाद का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे साहसी, अनुशासित, राष्ट्रभक्त और दूरदर्शी नेता थे।

उनकी विचारधारा में राष्ट्र की स्वतंत्रता सर्वोच्च थी। वे मानते थे कि गुलामी किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है और उससे मुक्ति के लिए हर संभव प्रयास आवश्यक है।

वे युवाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनने के लिए प्रेरित करते थे। उनका जीवन सादगी, अनुशासन और त्याग का उदाहरण था।

स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान

चंद्रशेखर आज़ाद का योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुआयामी रहा। उनके प्रमुख योगदान निम्नलिखित हैं—

  • हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का पुनर्गठन
  • काकोरी कांड में सक्रिय भागीदारी
  • लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध
  • क्रांतिकारी आंदोलन को संगठित और सक्रिय बनाए रखना
  • युवाओं में राष्ट्रभक्ति और क्रांतिकारी चेतना का प्रसार
  • ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध का नेतृत्व

उनकी संगठन क्षमता और नेतृत्व ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की।

लोकप्रिय संस्कृति और फिल्मों में आज़ाद की छवि

चंद्रशेखर आज़ाद की वीरता और बलिदान ने भारतीय सिनेमा और साहित्य को भी गहराई से प्रभावित किया है। उन्हें कई फिल्मों और नाटकों में चित्रित किया गया है, जिनमें उनकी साहसिक छवि को जीवंत रूप से प्रस्तुत किया गया है।

उन पर आधारित या उनसे प्रेरित प्रमुख फिल्मों में “शहीद”, “भगत सिंह की कहानी” और रंग दे बसंती जैसी फिल्मों का उल्लेख किया जा सकता है। इन फिल्मों ने नई पीढ़ी को उनके जीवन और संघर्ष से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

साहित्य, नाटक, कविताएँ और जीवनी साहित्य में भी आज़ाद की गाथा को व्यापक रूप से स्थान मिला है।

युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत

चंद्रशेखर आज़ाद का जीवन आज के युवाओं के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है। उन्होंने कम आयु में ही राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।

उनका साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ निश्चय यह संदेश देता है कि यदि लक्ष्य महान हो तो उम्र और परिस्थितियाँ बाधा नहीं बनतीं। वे आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के सच्चे प्रतीक थे।

आज भी विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय कार्यक्रमों में उनके जीवन से जुड़े प्रसंग सुनाए जाते हैं, ताकि युवा पीढ़ी राष्ट्रप्रेम और कर्तव्यनिष्ठा के मार्ग पर अग्रसर हो सके।

चंद्रशेखर आज़ाद की विरासत और समकालीन प्रासंगिकता

चंद्रशेखर आज़ाद की विरासत केवल ऐतिहासिक महत्व तक सीमित नहीं है, बल्कि आज के भारत में भी उनकी विचारधारा अत्यंत प्रासंगिक है।

उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि—

  • स्वतंत्रता और स्वाभिमान सर्वोपरि हैं
  • अन्याय के विरुद्ध संघर्ष आवश्यक है
  • संगठन और अनुशासन सफलता की कुंजी हैं
  • राष्ट्रहित व्यक्तिगत हित से ऊपर होना चाहिए

उनकी स्मृति आज भी राष्ट्रीय चेतना को प्रेरित करती है और स्वतंत्रता संग्राम की गौरवशाली परंपरा को जीवित रखती है।

निष्कर्ष

चंद्रशेखर आज़ाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अमर सेनानियों में से एक हैं जिनका जीवन साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति की अनुपम मिसाल है। उन्होंने अपने संकल्प, वीरता और अदम्य इच्छाशक्ति से यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा देशभक्त कभी भी अन्याय के सामने झुकता नहीं है।

उनका बलिदान केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की स्वतंत्रता की पुकार का प्रतीक है। 95वें शहीदी दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए पूरा राष्ट्र उनके अमूल्य योगदान को स्मरण करता है और उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लेता है।

चंद्रशेखर आज़ाद का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि देश के प्रति समर्पण, साहस और दृढ़ निश्चय के बल पर असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। वे सदैव भारत के स्वतंत्रता संग्राम की अमर गाथा के उज्ज्वल नायक के रूप में याद किए जाते रहेंगे और आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रप्रेम, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्रेरित करते रहेंगे।


इन्हें भी देखें –

Leave a Comment

Table of Contents

Contents
सर्वनाम (Pronoun) किसे कहते है? परिभाषा, भेद एवं उदाहरण भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग | नाम, स्थान एवं स्तुति मंत्र प्रथम विश्व युद्ध: विनाशकारी महासंग्राम | 1914 – 1918 ई.