कूनो राष्ट्रीय उद्यान में ‘सुपर मॉम’ ज्वाला: प्रोजेक्ट चीता को मिली नई सफलता

भारत में विलुप्त हो चुके चीतों को पुनः बसाने के उद्देश्य से शुरू किए गए प्रोजेक्ट चीता ने एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान (Kuno National Park – KNP) में नामीबिया से लाई गई मादा चीता ‘ज्वाला’ (पूर्व नाम सियाया) ने हाल ही में पांच स्वस्थ शावकों को जन्म दिया है। यह ज्वाला का भारत में तीसरा सफल प्रसव है, जिसके बाद उसे वन्यजीव विशेषज्ञों और अधिकारियों द्वारा ‘सुपर मॉम’ का दर्जा दिया गया है।

यह घटना न केवल प्रोजेक्ट चीता की सफलता का प्रतीक है बल्कि यह भी दर्शाती है कि अफ्रीकी चीते भारतीय पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र के साथ तेजी से अनुकूलन कर रहे हैं। ज्वाला के इस तीसरे प्रसव ने भारत में चीतों की आबादी को और मजबूत किया है और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक सकारात्मक संकेत दिया है।

Table of Contents

ज्वाला: प्रोजेक्ट चीता की ‘सुपर मॉम’

मादा चीता ज्वाला उन चीतों में से एक है जिन्हें नामीबिया से भारत लाया गया था। उसने भारत में आकर लगातार तीन बार सफल प्रसव किया है, जो किसी भी चीता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है।

ज्वाला के मातृत्व का इतिहास इस प्रकार है—

सितंबर 2022: भारत आगमन

ज्वाला को 17 सितंबर 2022 को नामीबिया से भारत लाया गया था। उसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर आठ नामीबियाई चीतों को मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में छोड़ा गया था। यह घटना भारत में चीता पुनर्स्थापना कार्यक्रम की ऐतिहासिक शुरुआत थी।

मार्च 2023: पहला प्रसव

भारत आने के कुछ महीनों बाद मार्च 2023 में ज्वाला ने पहली बार चार शावकों को जन्म दिया। हालांकि उस समय कुछ शावकों की मृत्यु हो गई और केवल एक मादा शावक ‘मुखी’ ही जीवित बच सकी।

जनवरी 2024: दूसरा प्रसव

इसके बाद जनवरी 2024 में ज्वाला ने अपने दूसरे प्रसव में चार शावकों को जन्म दिया। इनमें से तीन शावक जीवित हैं और कूनो राष्ट्रीय उद्यान में सुरक्षित रूप से विकसित हो रहे हैं।

2026: तीसरा प्रसव

अब ज्वाला ने तीसरी बार पांच स्वस्थ शावकों को जन्म दिया है, जिससे यह साबित हुआ है कि वह भारतीय परिस्थितियों में पूरी तरह अनुकूलित हो चुकी है।

ज्वाला की लगातार सफल मातृत्व क्षमता के कारण उसे ‘सुपर मॉम’ कहा जाने लगा है। वन्यजीव वैज्ञानिकों के अनुसार, यह उपलब्धि प्रोजेक्ट चीता की दीर्घकालिक सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत में चीतों की वर्तमान स्थिति

ज्वाला के इस नए प्रसव के बाद भारत में चीतों की कुल संख्या में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है।

प्रमुख आंकड़े

  • भारत में चीतों की कुल संख्या अब 53 हो गई है।
  • इसमें कूनो राष्ट्रीय उद्यान और गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य दोनों शामिल हैं।
  • भारत में जन्मे जीवित शावकों की संख्या 33 तक पहुंच चुकी है।
  • भारतीय भूमि पर अब तक 10 सफल प्रसव (Litter) दर्ज किए जा चुके हैं।

ये आंकड़े यह संकेत देते हैं कि प्रोजेक्ट चीता धीरे-धीरे एक स्थिर और सफल संरक्षण कार्यक्रम बनता जा रहा है।

भारतीय धरती पर चीते का इतिहास

चीता कभी भारतीय उपमहाद्वीप का एक महत्वपूर्ण वन्यजीव था।

प्राचीन काल में चीते भारत के घास के मैदानों और खुले जंगलों में बड़ी संख्या में पाए जाते थे। मुगल काल में चीते को शिकार के लिए प्रशिक्षित भी किया जाता था।

लेकिन समय के साथ कई कारणों से उनकी संख्या तेजी से घटती गई।

विलुप्त होने के प्रमुख कारण

  1. अत्यधिक शिकार
  2. आवास का विनाश
  3. घास के मैदानों का कृषि भूमि में बदलना
  4. मानव-वन्यजीव संघर्ष

इन कारणों के परिणामस्वरूप भारत में अंतिम ज्ञात चीता 1947 के आसपास छत्तीसगढ़ क्षेत्र में देखा गया था। इसके बाद भारत सरकार ने 1952 में चीते को आधिकारिक रूप से विलुप्त घोषित कर दिया।

प्रोजेक्ट चीता: विलुप्त प्रजाति की वापसी

भारत में चीतों को फिर से बसाने के लिए प्रोजेक्ट चीता शुरू किया गया। यह परियोजना वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक अनूठा प्रयास माना जाता है।

परिचय

प्रोजेक्ट चीता दुनिया की पहली अंतरमहाद्वीपीय बड़े जंगली मांसाहारी जीव के स्थानांतरण की परियोजना है। इसका उद्देश्य अफ्रीका से चीतों को भारत लाकर उन्हें यहाँ पुनः बसाना है।

लॉन्च

इस परियोजना की शुरुआत 17 सितंबर 2022 को मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में की गई। उस दिन आठ चीतों को नामीबिया से भारत लाकर कूनो में छोड़ा गया था।

प्रमुख उद्देश्य

प्रोजेक्ट चीता के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं—

  1. भारत में चीतों की आत्मनिर्भर आबादी स्थापित करना
  2. घास के मैदानों के पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्जीवन
  3. जैव विविधता को बढ़ावा देना
  4. वन्यजीव पर्यटन को प्रोत्साहित करना
  5. स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाना

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह परियोजना सफल होती है तो आने वाले दशकों में भारत में चीतों की स्थायी आबादी विकसित हो सकती है।

परियोजना का संचालन और संस्थाएं

प्रोजेक्ट चीता को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से संचालित किया जा रहा है।

प्रमुख संस्थाएं

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA)
यह संस्था परियोजना के संचालन और निगरानी की मुख्य जिम्मेदारी निभाती है।

भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII)
यह संस्था वैज्ञानिक और तकनीकी सहायता प्रदान करती है। इसके विशेषज्ञ चीतों के व्यवहार, स्वास्थ्य और अनुकूलन का अध्ययन करते हैं।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग

प्रोजेक्ट चीता अंतरराष्ट्रीय सहयोग का भी एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

अब तक भारत ने तीन अफ्रीकी देशों के साथ सहयोग समझौते किए हैं—

  1. नामीबिया
  2. दक्षिण अफ्रीका
  3. बोत्सवाना

हालिया विकास

28 फरवरी 2026 को बोत्सवाना से 9 नए चीते भारत लाए गए। इससे परियोजना को और मजबूती मिली है।

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि विभिन्न देशों से चीतों को लाने से जीन विविधता (Genetic Diversity) बनी रहती है, जो किसी भी प्रजाति के दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए आवश्यक होती है।

प्रोजेक्ट चीता का विस्तार

कूनो राष्ट्रीय उद्यान इस परियोजना का पहला घर है, लेकिन भविष्य में इसे कई अन्य स्थानों तक विस्तारित करने की योजना है।

गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य

मध्य प्रदेश में स्थित गांधी सागर अभयारण्य को चीतों के लिए दूसरा आवास बनाया जा रहा है। यहां पहले से ही कुछ चीतों को स्थानांतरित किया गया है।

भविष्य की संभावित साइटें

  1. गुजरात का बन्नी घास का मैदान
  2. मध्य प्रदेश का नौरादेही अभयारण्य

इन क्षेत्रों में व्यापक सर्वेक्षण और पारिस्थितिकी अध्ययन के बाद चीतों को बसाने की योजना बनाई जा रही है।

चीता: एक अम्ब्रेला स्पीशीज

वन्यजीव संरक्षण में चीते को ‘अम्ब्रेला स्पीशीज’ (Umbrella Species) माना जाता है।

इसका अर्थ यह है कि यदि चीते का संरक्षण किया जाता है तो उसके साथ-साथ उसी पारिस्थितिकी तंत्र में रहने वाली अन्य प्रजातियों का भी संरक्षण हो जाता है।

घास के मैदानों की भूमिका

भारत में घास के मैदानों को अक्सर कम महत्व दिया जाता है, जबकि ये पारिस्थितिकी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

इनमें कई दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं जैसे—

  • चिंकारा
  • चौसिंगा
  • भारतीय भेड़िया
  • ग्रेट इंडियन बस्टर्ड

चीते के संरक्षण से इन सभी प्रजातियों के लिए सुरक्षित आवास तैयार होता है।

स्थानीय समुदायों की भागीदारी

प्रोजेक्ट चीता की सफलता में स्थानीय समुदायों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

‘चीता मित्र’ पहल

स्थानीय लोगों को इस परियोजना से जोड़ने के लिए 450 से अधिक ‘चीता मित्र’ नियुक्त किए गए हैं।

इनकी जिम्मेदारियां हैं—

  • स्थानीय लोगों को जागरूक करना
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना
  • वन विभाग की सहायता करना
  • चीतों की गतिविधियों की जानकारी देना

इस पहल से स्थानीय समुदायों में संरक्षण के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित हुआ है।

कूनो राष्ट्रीय उद्यान: चीतों का नया घर

प्रोजेक्ट चीता के लिए चुना गया कूनो राष्ट्रीय उद्यान भारत के सबसे महत्वपूर्ण वन्यजीव क्षेत्रों में से एक है।

भौगोलिक स्थिति

कूनो राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित है। यह क्षेत्र विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के उत्तरी भाग में आता है।

नामकरण

इस उद्यान का नाम इसके बीच से बहने वाली कूनो नदी के नाम पर रखा गया है, जो चंबल नदी की सहायक नदी है।

स्थापना

  • 1981 में इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया
  • दिसंबर 2018 में इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया

क्षेत्रफल

  • मुख्य क्षेत्र (Core Area): लगभग 748 वर्ग किलोमीटर
  • बफर क्षेत्र सहित कुल क्षेत्रफल: लगभग 1,235 वर्ग किलोमीटर

यह विशाल क्षेत्र चीतों के लिए आदर्श आवास प्रदान करता है।

वनस्पति और पारिस्थितिकी

कूनो राष्ट्रीय उद्यान में मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं।

प्रमुख वृक्ष प्रजातियां

  • करधई
  • सलाई
  • खैर

ये वनस्पतियां चीतों के लिए उपयुक्त शिकार प्रजातियों को समर्थन देती हैं।

पारिस्थितिकी क्षेत्र

कूनो का क्षेत्र मालवा पठार और बुंदेलखंड की उच्च भूमि के बीच स्थित एक संक्रमण क्षेत्र (Transitional Zone) है।

इस कारण यहां विभिन्न प्रकार की वनस्पति और जीव विविधता देखने को मिलती है।

कूनो राष्ट्रीय उद्यान की वन्यजीव विविधता

कूनो राष्ट्रीय उद्यान जैव विविधता के दृष्टिकोण से अत्यंत समृद्ध है।

प्रमुख स्तनधारी

  • तेंदुआ
  • भेड़िया
  • लकड़बग्घा
  • चिंकारा
  • चौसिंगा
  • नीलगाय

पक्षी विविधता

यहां 200 से अधिक पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं, जो इसे पक्षी प्रेमियों के लिए भी आकर्षक बनाती हैं।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व

कूनो क्षेत्र केवल प्राकृतिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

यहां कई प्राचीन किले मौजूद हैं, जैसे—

  • पालपुर किला
  • आमेट किला
  • मैटोनी किला

ये किले पूर्व रियासतों के अवशेष हैं और इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को दर्शाते हैं।

ज्वाला का प्रसव क्यों है महत्वपूर्ण?

ज्वाला का तीसरी बार सफल प्रसव कई कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

1. अनुकूलन का प्रमाण

यह साबित करता है कि अफ्रीकी चीते भारतीय जलवायु और पर्यावरण में सफलतापूर्वक अनुकूलित हो चुके हैं।

2. जनसंख्या वृद्धि

नए शावकों से भारत में चीतों की आबादी तेजी से बढ़ रही है।

3. परियोजना की विश्वसनीयता

यह सफलता प्रोजेक्ट चीता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रभावी संरक्षण मॉडल के रूप में स्थापित करती है।

भविष्य की चुनौतियां

हालांकि प्रोजेक्ट चीता को कई सफलताएं मिली हैं, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियां भी हैं।

प्रमुख चुनौतियां

  • मानव-वन्यजीव संघर्ष
  • पर्याप्त शिकार प्रजातियों की उपलब्धता
  • आनुवंशिक विविधता बनाए रखना
  • आवास संरक्षण

इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार और वैज्ञानिक लगातार प्रयास कर रहे हैं।

निष्कर्ष

कूनो राष्ट्रीय उद्यान में मादा चीता ज्वाला द्वारा पांच शावकों को जन्म देना प्रोजेक्ट चीता के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। यह घटना न केवल भारत में चीतों की आबादी को मजबूत करती है बल्कि यह भी साबित करती है कि सही संरक्षण प्रयासों से विलुप्त प्रजातियों को पुनः स्थापित किया जा सकता है।

ज्वाला का ‘सुपर मॉम’ बनना इस परियोजना की सफलता का प्रतीक है और यह आने वाले वर्षों में भारत के घास के मैदानों और जैव विविधता के संरक्षण के लिए एक आशाजनक संकेत देता है।

यदि इसी प्रकार वैज्ञानिक प्रबंधन, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जारी रहती है, तो निकट भविष्य में भारत एक बार फिर चीतों की स्थायी आबादी वाला देश बन सकता है।


इन्हें भी देखें –

Leave a Comment

Table of Contents

Contents
सर्वनाम (Pronoun) किसे कहते है? परिभाषा, भेद एवं उदाहरण भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग | नाम, स्थान एवं स्तुति मंत्र प्रथम विश्व युद्ध: विनाशकारी महासंग्राम | 1914 – 1918 ई.