तेज़ी से शहरीकरण, बढ़ती आबादी और उपभोक्तावादी जीवनशैली ने भारत के शहरों के सामने अनेक चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। इन चुनौतियों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) आज सबसे गंभीर और जटिल समस्या बन चुका है। प्रतिदिन निकलने वाला हजारों मीट्रिक टन कचरा यदि वैज्ञानिक ढंग से प्रबंधित न किया जाए, तो वह न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, जल-स्रोतों और भूमि की गुणवत्ता पर भी गंभीर प्रभाव डालता है।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ इस चुनौती का सामना करते हुए अब एक समाधान-आधारित मॉडल शहर के रूप में उभर रहा है। लगभग 40 लाख की आबादी, करीब 7.5 लाख दुकानें, कार्यालय और व्यावसायिक प्रतिष्ठान, तथा तेज़ी से फैलता नगरीय विस्तार—इन सबके कारण लखनऊ में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले कचरे का प्रबंधन किसी भी नगर निकाय के लिए आसान कार्य नहीं था।
इसके बावजूद, लखनऊ नगर निगम (LMC) ने वैज्ञानिक सोच, निजी भागीदारी और आधुनिक तकनीक के सहारे एक ऐसा अपशिष्ट प्रबंधन तंत्र विकसित किया है, जिसने न केवल शहर की तस्वीर बदली है, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश और देश के अन्य शहरों के लिए एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया है।
लखनऊ में अपशिष्ट प्रबंधन की पृष्ठभूमि
पिछले कुछ दशकों में लखनऊ का शहरी स्वरूप तेज़ी से बदला है। आईटी पार्क, शैक्षणिक संस्थान, रिहायशी कॉलोनियाँ, मॉल और व्यावसायिक केंद्रों के विस्तार के साथ-साथ कचरे की मात्रा में भी लगातार वृद्धि हुई।
एक समय ऐसा भी था जब शहर के बाहरी इलाकों में खुले डंपिंग ग्राउंड, दुर्गंध, लीचेट (कचरे से निकलने वाला विषैला द्रव) और वायु प्रदूषण आम समस्या बन चुके थे। पुराने कचरे (लीगेसी वेस्ट) के विशाल ढेर न केवल भूमि को अनुपयोगी बना रहे थे, बल्कि आस-पास रहने वाले नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन गए थे।
इसी पृष्ठभूमि में लखनऊ नगर निगम ने यह निर्णय लिया कि अब डंपिंग-आधारित व्यवस्था से आगे बढ़कर प्रसंस्करण-आधारित अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली को अपनाना समय की माँग है।
शिवरी में तीसरे ताज़ा कचरा प्रसंस्करण संयंत्र का उद्घाटन
इस दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में शिवरी साइट पर तीसरे ताज़ा कचरा प्रसंस्करण संयंत्र की हाल ही में शुरुआत की गई।
इस संयंत्र के चालू होने के साथ ही लखनऊ यह उपलब्धि हासिल करने वाला उत्तर प्रदेश का पहला शहर बन गया, जहाँ 100 प्रतिशत ताज़े नगर निगम कचरे का वैज्ञानिक ढंग से प्रसंस्करण किया जा रहा है।
इस उपलब्धि के कारण लखनऊ को ‘ज़ीरो फ्रेश वेस्ट डंप’ शहर का दर्जा प्राप्त हुआ है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब शहर में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाला नया कचरा खुले में कहीं भी नहीं डाला जाता, बल्कि सीधे प्रसंस्करण संयंत्रों तक पहुँचाया जाता है।
कचरा प्रसंस्करण क्षमता में ऐतिहासिक वृद्धि
शिवरी में स्थापित नया संयंत्र प्रतिदिन 700 मीट्रिक टन ताज़ा कचरा प्रसंस्करित करने में सक्षम है।
इससे पहले लखनऊ में दो अन्य आधुनिक कचरा प्रसंस्करण संयंत्र पहले से कार्यरत थे।
तीनों संयंत्रों को मिलाकर अब लखनऊ की कुल अपशिष्ट प्रसंस्करण क्षमता 2,100 मीट्रिक टन प्रतिदिन हो गई है।
यह क्षमता शहर में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले कुल कचरे के लगभग बराबर है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि—
- कोई भी कचरा बिना उपचार के न रहे
- खुले डंपिंग ग्राउंड की आवश्यकता समाप्त हो
- पर्यावरण-सुरक्षित निपटान हो
लखनऊ में प्रतिदिन कचरा प्रबंधन की कार्यप्रणाली
लखनऊ में प्रतिदिन औसतन 2,000 मीट्रिक टन ठोस अपशिष्ट उत्पन्न होता है। इसके प्रभावी प्रबंधन के लिए लखनऊ नगर निगम ने भूमि ग्रीन एनर्जी के साथ सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP मॉडल) के तहत सहयोग किया है।
कचरे का वर्गीकरण
प्रसंस्करण से पहले कचरे को दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जाता है—
- जैविक कचरा (लगभग 55%)
- अजैविक कचरा (लगभग 45%)
यह वर्गीकरण अपशिष्ट प्रबंधन की रीढ़ है, क्योंकि इसी के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय होती है।
जैविक कचरे का उपयोग
जैविक कचरे से—
- खाद (Compost)
- बायोगैस
का उत्पादन किया जाता है। यह न केवल अपशिष्ट को कम करता है, बल्कि कृषि और ऊर्जा क्षेत्र के लिए उपयोगी संसाधन भी उपलब्ध कराता है।
अजैविक कचरे का पुनर्चक्रण
अजैविक कचरे को—
- पुनर्चक्रण योग्य सामग्री
- RDF (Refuse Derived Fuel)
में बदला जाता है। RDF का उपयोग विशेष रूप से सीमेंट और कागज उद्योगों में ईंधन के रूप में किया जाता है।
घर-घर कचरा संग्रहण और स्रोत पर पृथक्करण
लखनऊ की अपशिष्ट प्रबंधन सफलता का एक बड़ा आधार है घर-घर कचरा संग्रहण प्रणाली।
- शहर में 96.53% तक घर-घर कचरा संग्रहण सुनिश्चित किया जा चुका है।
- 70% से अधिक कचरे का पृथक्करण स्रोत पर ही (घरों और दुकानों में) किया जा रहा है।
इससे—
- प्रसंस्करण की गुणवत्ता बेहतर होती है
- लागत कम होती है
- पुनर्चक्रण की दक्षता बढ़ती है
पुराने (लीगेसी) कचरे का वैज्ञानिक निपटान
लखनऊ के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी पुराना जमा हुआ कचरा, जिसे लीगेसी वेस्ट कहा जाता है।
एक समय शहर में लगभग 18.5 लाख मीट्रिक टन पुराना कचरा जमा था।
सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप अब तक—
- 12.86 लाख मीट्रिक टन लीगेसी कचरे का
- वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण और निपटान
किया जा चुका है।
इस प्रक्रिया में कचरे को छानकर उपयोगी सामग्री अलग की गई और शेष का पर्यावरण-सुरक्षित निस्तारण किया गया।
कचरे से बने उपयोगी उत्पाद
अपशिष्ट को संसाधन में बदलने की इस प्रक्रिया से कई उपयोगी उत्पाद सामने आए हैं—
- 2.27 लाख मीट्रिक टन RDF, जिसे देशभर के उद्योगों में सह-प्रसंस्करण के लिए भेजा गया
- 4.38 लाख मीट्रिक टन मोटा कचरा
- 0.59 लाख मीट्रिक टन बायो-सॉयल
- 2.35 लाख मीट्रिक टन निर्माण एवं विध्वंस कचरा
इन सामग्रियों का उपयोग—
- निचले क्षेत्रों को भरने
- सड़क और अवसंरचना विकास
- भूमि सुधार
जैसे कार्यों में किया जा रहा है।
कचरा प्रबंधन से भूमि की पुनर्प्राप्ति
लीगेसी कचरे के निरंतर प्रसंस्करण से लखनऊ में 25 एकड़ से अधिक भूमि पुनः प्राप्त की गई है।
इस भूमि पर अब एक आधुनिक अपशिष्ट उपचार परिसर विकसित किया गया है, जिसमें—
- विंडरो पैड
- आंतरिक सड़कें
- शेड
- वेट ब्रिज
- अन्य आवश्यक तकनीकी सुविधाएँ
उपलब्ध हैं।
यह भूमि पुनर्प्राप्ति शहरी नियोजन के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
शिवरी में प्रस्तावित वेस्ट-टू-एनर्जी संयंत्र
अपशिष्ट प्रबंधन को ऊर्जा उत्पादन से जोड़ने की दिशा में लखनऊ नगर निगम एक और महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है।
शिवरी में 15 मेगावाट क्षमता का वेस्ट-टू-एनर्जी (WtE) संयंत्र स्थापित करने की योजना है।
- यह संयंत्र प्रतिदिन 1,000–1,200 मीट्रिक टन RDF का उपयोग करेगा
- इससे बिजली का उत्पादन होगा
- सीमेंट संयंत्रों तक RDF ले जाने की 500 किमी लंबी दूरी और परिवहन लागत दोनों कम होंगी
यह परियोजना अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पादन को स्थानीय स्तर पर सशक्त बनाएगी।
परिपत्र अर्थव्यवस्था और सतत शहरी विकास
लखनऊ का यह अपशिष्ट प्रबंधन मॉडल परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के सिद्धांतों पर आधारित है।
इस मॉडल में—
- कचरे को अंतिम बोझ नहीं, बल्कि संसाधन माना जाता है
- डंपिंग में कमी
- पुनर्चक्रण में वृद्धि
- ऊर्जा उत्पादन और भूमि संरक्षण
जैसे पहलुओं पर समान रूप से ध्यान दिया जाता है।
निष्कर्ष
लखनऊ नगर निगम द्वारा अपनाया गया आधुनिक एवं वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन मॉडल यह सिद्ध करता है कि सही नीति, तकनीक और क्रियान्वयन से शहरी कचरा समस्या को अवसर में बदला जा सकता है।
‘ज़ीरो फ्रेश वेस्ट डंप’ की उपलब्धि, लीगेसी कचरे का निपटान, भूमि की पुनर्प्राप्ति और वेस्ट-टू-एनर्जी जैसी योजनाएँ लखनऊ को न केवल स्वच्छ, बल्कि सतत और पर्यावरण-संवेदनशील शहर की दिशा में ले जा रही हैं।
यह मॉडल भारत ही नहीं, बल्कि विकासशील देशों के अन्य शहरों के लिए भी एक प्रेरणास्रोत बनकर उभर रहा है।
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