उत्तर प्रदेश का राज्य पक्षी सारस क्रेन: संरक्षण प्रयासों की सफलता और बढ़ती आबादी की उत्साहजनक कहानी

भारत जैव विविधता की दृष्टि से विश्व के समृद्ध देशों में से एक है। यहाँ की विविध जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियाँ और पारंपरिक कृषि प्रणालियाँ अनेक दुर्लभ एवं संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण में सहायक रही हैं। इन्हीं प्रजातियों में से एक है सारस क्रेन (Sarus Crane), जो न केवल भारत का बल्कि उत्तर प्रदेश का भी राज्य पक्षी है। यह पक्षी भारतीय संस्कृति, लोककथाओं और पर्यावरणीय संतुलन का एक सशक्त प्रतीक माना जाता है।

फरवरी 2026 में उत्तर प्रदेश वन विभाग द्वारा जारी नवीनतम ‘शीतकालीन सारस गणना रिपोर्ट’ ने राज्य और देश दोनों के लिए एक सकारात्मक संदेश दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में सारस की आबादी में 3.1% की वृद्धि दर्ज की गई है। यह वृद्धि केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह सरकार, वन विभाग, स्थानीय समुदायों और गैर-सरकारी संगठनों के सामूहिक प्रयासों की सफलता को दर्शाती है।

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सारस क्रेन: परिचय और जैविक विशेषताएँ

वैज्ञानिक पहचान

  • वैज्ञानिक नाम: Antigone antigone
  • परिवार: Gruidae

सारस क्रेन को विश्व का सबसे ऊँचा उड़ने वाला पक्षी माना जाता है। इसकी ऊँचाई लगभग 1.8 मीटर (5.9 फीट) तक हो सकती है, जो इसे अन्य क्रेनों से अलग पहचान देती है।

प्रमुख जैविक विशेषताएँ

  1. गैर-प्रवासी पक्षी (Non-migratory):
    सारस क्रेन जीवन भर एक ही क्षेत्र में रहता है और लंबी दूरी का प्रवास नहीं करता।
  2. एकनिष्ठ जीवन साथी:
    यह पक्षी जीवन भर एक ही साथी के साथ रहता है, इसलिए इसे वफादारी, प्रेम और वैवाहिक सद्भाव का प्रतीक माना जाता है।
  3. सामाजिक व्यवहार:
    सारस आमतौर पर जोड़ों या छोटे समूहों में पाया जाता है और अपने प्रजनन क्षेत्र को लेकर अत्यंत संवेदनशील होता है।
  4. प्रजनन आदतें:
    यह उथली जलभूमियों या धान के खेतों में घोंसला बनाता है, जहाँ पानी की उपलब्धता बनी रहती है।

सारस का प्राकृतिक आवास (Habitat)

सारस क्रेन का जीवन आर्द्रभूमियों से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसके प्रमुख आवास हैं:

  • उथली नम भूमि (Wetlands)
  • दलदली क्षेत्र
  • बाढ़ प्रभावित घास के मैदान
  • पारंपरिक धान के खेत

उत्तर प्रदेश की गंगा-यमुना की दोआब भूमि, पूर्वी उत्तर प्रदेश के दलदली क्षेत्र और तराई क्षेत्र सारस के लिए आदर्श आवास प्रदान करते हैं।

सारस गणना 2025–26: एक विस्तृत विश्लेषण

गणना का संचालन

उत्तर प्रदेश वन विभाग द्वारा संचालित इस शीतकालीन गणना में:

  • राज्य के 68 वन प्रभाग (Forest Divisions) शामिल किए गए
  • 10,000 से अधिक नागरिकों, स्वयंसेवकों, छात्रों, किसानों और वन कर्मियों ने भाग लिया

यह सहभागिता Citizen Science का उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ आम जनता संरक्षण प्रक्रिया का सक्रिय हिस्सा बनती है।

कुल आबादी

  • 2026: 20,628 सारस
  • 2025: 19,994 सारस
  • 2023: 19,196 सारस

इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि पिछले तीन वर्षों में सारस की आबादी में निरंतर वृद्धि हुई है।

शीर्ष जिलों और वन प्रभागों में सारस की स्थिति

सर्वाधिक सारस वाले क्षेत्र

  1. इटावा (Etawah): 3,304
  2. मैनपुरी (Mainpuri): 2,899

अन्य प्रमुख क्षेत्र

  • औरैया: 1,283
  • शाहजहाँपुर: 1,078
  • गोरखपुर: 950

ये क्षेत्र आर्द्रभूमियों, पारंपरिक कृषि और मानव-पक्षी सहअस्तित्व के सफल उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

संरक्षण की अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्थिति

1. IUCN रेड लिस्ट

  • स्थिति: Vulnerable (सुभेद्य)
  • कारण: आवास का क्षरण, कृषि रसायनों का उपयोग और मानव हस्तक्षेप

2. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972

  • अनुसूची-IV
  • 2022 के संशोधन के बाद अनुसूची-II के समतुल्य सुरक्षा

3. CITES

  • Appendix II
  • अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर निगरानी

सारस संरक्षण के प्रमुख कारक

1. आर्द्रभूमि संरक्षण और रामसर स्थल

उत्तर प्रदेश में वर्तमान में 10 रामसर स्थल हैं।
विशेष रूप से:

  • सरसई नावर झील
  • समन पक्षी अभयारण्य

ये क्षेत्र सारस के प्रजनन, भोजन और सुरक्षित आवास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

2. ‘सारस मित्र’ पहल

वन विभाग द्वारा स्थानीय किसानों को ‘सारस मित्र’ के रूप में प्रशिक्षित किया गया है।

इस पहल के लाभ:

  • खेतों में बने घोंसलों की निगरानी
  • अंडों को कीटनाशकों, कुत्तों और शिकारी जीवों से सुरक्षा
  • किसानों और वन विभाग के बीच विश्वास का निर्माण

यह पहल Community-based Conservation का एक सफल मॉडल है।

3. ‘सारस आवास सुरक्षा परियोजना’

  • वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI)
  • टाटा ट्रस्ट

इन संस्थाओं के सहयोग से पूर्वी उत्तर प्रदेश के 10 जिलों में विशेष अभियान चलाए गए।
परिणामस्वरूप:

  • आर्द्रभूमियों का पुनर्जीवन
  • जन-जागरूकता में वृद्धि
  • स्थानीय स्तर पर संरक्षण ढाँचे का विकास

संरक्षण में चुनौतियाँ

1. आवास का विनाश

  • कृषि विस्तार
  • शहरीकरण
  • आर्द्रभूमियों का सूखना

2. कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग

  • धान की खेती में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग
  • अंडों और चूजों पर प्रतिकूल प्रभाव

3. आवारा कुत्ते और शिकारी

  • अंडों और नवजात चूजों के लिए बड़ा खतरा

4. हाई-वोल्टेज विद्युत तार

  • उड़ते समय टकराने से मृत्यु
  • यह समस्या विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में गंभीर है

भविष्य की रणनीतियाँ और सुझाव

  1. आर्द्रभूमि पुनर्स्थापन परियोजनाओं को बढ़ावा
  2. जैविक खेती और कीटनाशक-मुक्त कृषि को प्रोत्साहन
  3. विद्युत लाइनों पर बर्ड डायवर्टर लगाना
  4. स्कूलों और कॉलेजों में पर्यावरण शिक्षा
  5. स्थानीय समुदायों की भागीदारी को और सुदृढ़ करना

निष्कर्ष

उत्तर प्रदेश में सारस क्रेन की बढ़ती आबादी यह दर्शाती है कि यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान, गैर-सरकारी संगठन और स्थानीय समुदाय मिलकर कार्य करें, तो संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण संभव है। सारस केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पारिस्थितिकी और सतत विकास का प्रतीक है।

फरवरी 2026 की शीतकालीन गणना रिपोर्ट न केवल एक सकारात्मक संकेत है, बल्कि यह भविष्य के लिए एक प्रेरणादायक मार्गदर्शक भी है। यदि वर्तमान संरक्षण प्रयासों को निरंतरता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाया जाए, तो वह दिन दूर नहीं जब सारस क्रेन “सुभेद्य” से “सुरक्षित” श्रेणी की ओर अग्रसर होगा।


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