पर्यावरण संरक्षण, संवैधानिक दायित्व और विकास बनाम प्रकृति की बहस
भारत की प्राचीनतम पर्वतमालाओं में से एक अरावली पर्वत श्रृंखला न केवल भौगोलिक दृष्टि से बल्कि पारिस्थितिक, जलवायु और सभ्यतागत दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्वतमाला गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है तथा उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ मानी जाती है।
हाल ही में अरावली की परिभाषा को लेकर एक गंभीर संवैधानिक और पर्यावरणीय विवाद सामने आया, जब नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई ‘100 मीटर ऊँचाई’ आधारित परिभाषा ने इस पर्वत श्रृंखला के बड़े हिस्से को संरक्षण के दायरे से बाहर करने की आशंका पैदा कर दी। जन आक्रोश, पर्यावरणविदों के विरोध और वैज्ञानिक आशंकाओं के बाद जनवरी 2026 से पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही आदेश पर रोक लगा दी, जिससे यह मुद्दा राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन गया।
यह लेख अरावली की नई परिभाषा, उससे उत्पन्न विवाद, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप, पर्यावरणीय चिंताओं और इसके व्यापक निहितार्थों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
अरावली पर्वतमाला : एक संक्षिप्त परिचय
अरावली पर्वत श्रृंखला को विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत प्रणालियों में गिना जाता है, जिसकी आयु लगभग 1500–2500 मिलियन वर्ष मानी जाती है। यह पर्वतमाला—
- थार मरुस्थल और गंगा के मैदानों के बीच प्राकृतिक सीमा बनाती है
- राजस्थान की पारिस्थितिकी का आधार है
- दिल्ली-एनसीआर के लिए ‘ग्रीन लंग्स’ की भूमिका निभाती है
इतिहास में अरावली ने मानव बस्तियों, जलस्रोतों, वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के विकास को दिशा दी है। किंतु औद्योगीकरण, खनन, शहरीकरण और कानूनी अस्पष्टताओं के कारण यह पर्वतमाला लंबे समय से संकट में है।
हालिया विवाद की पृष्ठभूमि
नवंबर 2025 का सुप्रीम कोर्ट निर्णय
नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की एक समिति द्वारा प्रस्तावित परिभाषा को स्वीकार किया था। इस परिभाषा के अनुसार—
- केवल वे भू-आकृतियाँ ‘अरावली पहाड़ी’ मानी जाएँगी
- जिनकी ऊँचाई 100 मीटर या उससे अधिक हो
- अरावली रेंज तभी मानी जाएगी
- जब दो ऐसी पहाड़ियाँ एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हों
इस तकनीकी परिभाषा को पहली दृष्टि में स्पष्ट और मापनीय बताया गया, किंतु इसके परिणाम अत्यंत दूरगामी और चिंताजनक थे।
पर्यावरणविदों की प्रमुख आपत्तियाँ
1. संरक्षण क्षेत्र में भारी कटौती
विशेषज्ञों के अनुसार—
- अरावली में कुल 12,081 पहाड़ियाँ चिन्हित की गई हैं
- नई परिभाषा के अनुसार
- केवल 1,048 पहाड़ियाँ ही संरक्षण योग्य मानी जातीं
- अर्थात लगभग 90% अरावली क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाता
यह स्थिति अरावली के अस्तित्व पर सीधा प्रहार मानी गई।
2. छोटी और निम्न ऊँचाई वाली पहाड़ियों की अनदेखी
अरावली की पारिस्थितिकी केवल ऊँचाई पर आधारित नहीं है।
कम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ—
- भूजल पुनर्भरण में सहायक होती हैं
- वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की निरंतरता बनाए रखती हैं
- मिट्टी के कटाव और मरुस्थलीकरण को रोकती हैं
इन पहाड़ियों को बाहर करने से पारिस्थितिक निरंतरता (Ecological Continuity) टूटने का खतरा उत्पन्न हुआ।
3. खनन और रियल एस्टेट को अप्रत्यक्ष बढ़ावा
नई परिभाषा के तहत—
- वे क्षेत्र जो पहले ‘अरावली’ या ‘वन भूमि’ माने जाते थे
- अब
- खनन
- रियल एस्टेट
- औद्योगिक परियोजनाओं
के लिए खोल दिए जाते
इसे पर्यावरण संरक्षण के नाम पर विनियामक छल (Regulatory Loophole) माना गया।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान
जन आक्रोश और न्यायिक हस्तक्षेप
नवंबर 2025 के निर्णय के बाद—
- पर्यावरण संगठनों
- वैज्ञानिक समुदाय
- नागरिक समाज
- मीडिया
ने व्यापक विरोध दर्ज कराया। इसके परिणामस्वरूप मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले का स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लिया।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ
1. संरचनात्मक विरोधाभास (Structural Paradox)
न्यायालय ने कहा कि—
“यदि हम केवल ऊँचाई को ही अरावली की पहचान का आधार बनाएँगे, तो पर्वतमाला की संरचना और उसकी पारिस्थितिक आत्मा दोनों नष्ट हो जाएँगी।”
न्यायालय के अनुसार—
- पर्वत केवल ऊँचाई नहीं होते
- वे भू-आकृतिक, जैविक और जलवैज्ञानिक इकाइयाँ होते हैं
2. वैज्ञानिक अस्पष्टता
सुप्रीम कोर्ट ने प्रश्न उठाया—
- क्या 12,081 में से केवल 1,048 पहाड़ियों को संरक्षित मानना
- वैज्ञानिक रूप से तर्कसंगत है?
न्यायालय ने संकेत दिया कि यह वर्गीकरण—
- अधूरा
- एकांगी
- और पारिस्थितिकी के विरुद्ध हो सकता है
3. पूर्व संरक्षण क्षेत्रों का भविष्य
न्यायालय ने चिंता व्यक्त की कि—
- जिन क्षेत्रों को पहले
- ‘वन’
- ‘अरावली’
- या ‘ईको-सेंसिटिव ज़ोन’
माना गया था
वे नई परिभाषा के कारण कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम निर्देश
1. नवंबर 2025 के आदेश पर रोक
न्यायालय ने अपने पूर्व आदेश को—
- Abeyance (स्थगन) में डाल दिया
अर्थात जब तक नई समीक्षा पूरी नहीं होती, पुरानी परिभाषा लागू नहीं होगी।
2. उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि—
- एक नई बहु-विषयक विशेषज्ञ समिति गठित की जाए
- जिसमें शामिल हों
- भूवैज्ञानिक
- पर्यावरण वैज्ञानिक
- वन अधिकारी
- जल विशेषज्ञ
- स्वतंत्र अकादमिक विशेषज्ञ
समिति का कार्य—
- अरावली की वैज्ञानिक परिभाषा तय करना
- पारिस्थितिक निरंतरता का मूल्यांकन
- खनन और विकास गतिविधियों के प्रभावों की समीक्षा
3. खनन पर पूर्ण रोक
अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 तक—
- अरावली क्षेत्र में
- नए खनन पट्टों
- नए लीज आवंटन
पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
4. राज्य सरकारों को नोटिस
न्यायालय ने—
- दिल्ली
- हरियाणा
- राजस्थान
- गुजरात
सरकारों को नोटिस जारी कर उनके पक्ष और नीतिगत स्पष्टीकरण माँगे हैं।
अरावली पहाड़ियों का पारिस्थितिक महत्व
1. मरुस्थलीकरण रोकने में भूमिका
अरावली पर्वतमाला—
- थार मरुस्थल को पूर्व की ओर फैलने से रोकती है
- इसे भारत की प्राकृतिक ‘ग्रीन वॉल’ कहा जाता है
इसके कमजोर होने से—
- राजस्थान
- हरियाणा
- पश्चिमी उत्तर प्रदेश
में मरुस्थलीकरण की गति तेज हो सकती है।
2. जलभृत पुनर्भरण (Groundwater Recharge)
अरावली—
- उत्तर भारत के लिए एक विशाल वाटरशेड है
- वर्षा जल को रोककर
- भूजल
- झीलों
- जोहड़ों
को पुनर्जीवित करती है
दिल्ली-एनसीआर और राजस्थान के जल संकट में अरावली की भूमिका निर्णायक है।
3. जैव विविधता का संरक्षण
अरावली क्षेत्र—
- तेंदुआ
- चिंकारा
- सियार
- लोमड़ी
- कई प्रवासी और स्थानीय पक्षियों
का प्राकृतिक आवास है।
पर्वतमाला का विखंडन जैव विविधता को सीधा खतरा है।
4. जलवायु नियामक (Climate Regulator)
अरावली—
- धूल भरी आंधियों को रोकती है
- तापमान संतुलन में सहायक है
- शहरी हीट-आइलैंड प्रभाव को कम करती है
विशेषकर दिल्ली-एनसीआर के लिए यह भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
विकास बनाम पर्यावरण : एक संवैधानिक बहस
यह विवाद केवल अरावली तक सीमित नहीं है। यह प्रश्न उठाता है—
- क्या विकास केवल आर्थिक लाभ तक सीमित है?
- क्या पर्यावरणीय क्षति को ‘तकनीकी परिभाषा’ से वैध ठहराया जा सकता है?
भारतीय संविधान का—
- अनुच्छेद 48A
- अनुच्छेद 51A(g)
राज्य और नागरिक दोनों को पर्यावरण संरक्षण का दायित्व सौंपता है। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इसी संवैधानिक भावना को सुदृढ़ करता है।
निष्कर्ष
अरावली की नई परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि भारत की पर्यावरणीय चेतना का पुनर्पुष्टिकरण है। यह स्पष्ट करता है कि—
- प्रकृति को केवल आँकड़ों और ऊँचाइयों में नहीं बाँधा जा सकता
- पारिस्थितिकी की आत्मा निरंतरता में निहित होती है
- विकास तभी टिकाऊ है जब वह पर्यावरण के साथ संतुलित हो
आगामी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट न केवल अरावली का भविष्य तय करेगी, बल्कि यह भी निर्धारित करेगी कि भारत आने वाले दशकों में विकास और पर्यावरण के बीच किस प्रकार का संतुलन अपनाता है।
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