दक्षिण एशिया का उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र प्राचीन काल से ही सभ्यताओं, संस्कृतियों और व्यापारिक मार्गों का संगम रहा है। इसी क्षेत्र में स्थित तक्षशिला (Taxila) न केवल शिक्षा का विश्व-प्रसिद्ध केंद्र रही, बल्कि यह गांधार सभ्यता का हृदयस्थल भी थी। हाल ही में पाकिस्तान के रावलपिंडी जनपद में तक्षशिला के निकट स्थित भीर माउंड (Bhir Mound) से कुषाणकालीन दुर्लभ कांस्य सिक्कों और लापिस लाजुली (नीलमणि) के टुकड़ों की खोज ने प्राचीन इतिहास के अध्ययन में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। यह खोज केवल पुरातात्विक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और अंतर-क्षेत्रीय व्यापारिक संबंधों की समझ के लिए भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
यह लेख प्रस्तुत खोज को केंद्र में रखकर तक्षशिला, गांधार सभ्यता, कुषाण साम्राज्य, मुद्रा व्यवस्था, व्यापारिक नेटवर्क और धार्मिक बहुलता का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
तक्षशिला: एक प्राचीन महानगर का परिचय
तक्षशिला वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित एक प्राचीन नगर था, जो ऐतिहासिक गांधार क्षेत्र का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यह नगर उत्तरापथ नामक प्रमुख व्यापार मार्ग पर स्थित था, जो उत्तर-पश्चिम भारत को मध्य एशिया से जोड़ता था। इसी मार्ग के माध्यम से वस्तुएँ, विचार, धर्म और संस्कृतियाँ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुँचीं।
तक्षशिला की ख्याति केवल व्यापारिक केंद्र के रूप में ही नहीं, बल्कि एक वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में भी थी। प्राचीन ग्रंथों और यात्रियों के विवरणों में ‘तक्षशिला विश्वविद्यालय’ का उल्लेख मिलता है, जहाँ व्याकरण, आयुर्वेद, राजनीति, सैन्य विज्ञान, दर्शन और धर्मशास्त्र जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का संबंध भी तक्षशिला से जोड़ा जाता है।
यूनेस्को ने तक्षशिला को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है, जो इसके वैश्विक ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करता है।
भीर माउंड: तक्षशिला की सबसे प्राचीन नगरीय बस्ती
तक्षशिला परिसर में कई पुरातात्विक स्थल हैं, जिनमें भीर माउंड सबसे प्राचीन माना जाता है। यह स्थल लगभग 800 ईसा पूर्व से 525 ईसा पूर्व के बीच विकसित हुआ और मौर्य काल से पहले की नगरीय संरचना को दर्शाता है।
भीर माउंड की विशेषता इसकी योजनाबद्ध बस्ती, आवासीय क्षेत्रों, गलियों और भवन अवशेषों में निहित है। हालिया खुदाई में इस क्षेत्र के उत्तरी भाग में स्थित B-2 ट्रेंच को एक आवासीय क्षेत्र के रूप में पहचाना गया है। यहीं से कुषाणकालीन सिक्के और उससे भी प्राचीन लापिस लाजुली के टुकड़े प्राप्त हुए हैं।
यह तथ्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि एक ही स्थल पर विभिन्न कालखंडों की सामग्री प्राप्त हो रही है, जो तक्षशिला के दीर्घकालिक नगरीय जीवन और सतत ऐतिहासिक विकास को दर्शाती है।
हालिया पुरातात्विक खोज: एक संक्षिप्त विवरण
पाकिस्तान में कार्यरत पुरातत्वविदों के एक दल ने भीर माउंड क्षेत्र में उत्खनन के दौरान निम्नलिखित प्रमुख पुरावशेष खोजे:
- दूसरी शताब्दी ईस्वी के दुर्लभ कांस्य सिक्के
- छठी शताब्दी ईसा पूर्व के लापिस लाजुली (नीलमणि) के सजावटी टुकड़े
वैज्ञानिक तिथि निर्धारण (Scientific Dating) और मुद्रा-विज्ञान (Numismatics) के आधार पर यह पुष्टि हुई है कि सिक्के कुषाण सम्राट वासुदेव प्रथम के शासनकाल से संबंधित हैं, जबकि लापिस लाजुली के टुकड़े इससे कई शताब्दियाँ पुराने हैं।
कुषाणकालीन सिक्के: राजनीतिक और धार्मिक संकेत
सिक्कों की कालावधि और धातु
खुदाई में प्राप्त सिक्के दूसरी शताब्दी ईस्वी के हैं और मुख्यतः कांसे से निर्मित हैं। कुषाण शासकों की मुद्रा व्यवस्था उच्च गुणवत्ता और कलात्मकता के लिए जानी जाती है। ये सिक्के न केवल आर्थिक लेन-देन का माध्यम थे, बल्कि शासकीय विचारधारा और धार्मिक नीति के भी संवाहक थे।
सिक्कों की आकृति और प्रतीक
- अग्र भाग (Obverse): सिक्कों के अग्र भाग पर सम्राट वासुदेव प्रथम का चित्र अंकित है। वे मध्य एशियाई पोशाक में दर्शाए गए हैं, जो कुषाणों की मध्य एशियाई उत्पत्ति की ओर संकेत करता है।
- पृष्ठ भाग (Reverse): पृष्ठ भाग पर एक स्त्री धार्मिक देवी का अंकन है। यह देवी किस परंपरा से संबंधित है, इस पर विद्वानों में मतभेद हो सकते हैं, किंतु यह स्पष्ट है कि यह धार्मिक बहुलता का प्रतीक है।
धार्मिक बहुलता का प्रमाण
कुषाण सिक्कों पर भारतीय, ईरानी, यूनानी और बौद्ध प्रतीकों का मिश्रण देखने को मिलता है। यह इस तथ्य को दर्शाता है कि कुषाण शासक धार्मिक सहिष्णुता में विश्वास रखते थे और विभिन्न परंपराओं को संरक्षण देते थे। वासुदेव प्रथम के काल में सिक्कों पर शिव और नंदी जैसे भारतीय देवताओं का अंकन भी मिलता है, जो साम्राज्य के ‘भारतीयकरण’ की प्रक्रिया को दर्शाता है।
वासुदेव प्रथम: कुषाण वंश के अंतिम महान शासक
वासुदेव प्रथम का शासनकाल लगभग 190 ईस्वी से 230 ईस्वी के बीच माना जाता है। उन्हें कुषाण वंश के अंतिम महान सम्राट के रूप में जाना जाता है।
उनके शासन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- भारतीय धार्मिक प्रतीकों को शाही संरक्षण
- शिव-नंदी की उपासना का प्रोत्साहन
- प्रशासनिक और सांस्कृतिक स्तर पर भारतीय प्रभावों की वृद्धि
हालाँकि उनके शासनकाल के बाद कुषाण साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया आरंभ हो गई, फिर भी उनका काल सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध माना जाता है।
लापिस लाजुली: प्राचीन व्यापारिक नेटवर्क का प्रमाण
लापिस लाजुली का परिचय
लापिस लाजुली एक गहरे नीले रंग का अर्ध-कीमती पत्थर है, जिसे प्राचीन काल में अत्यंत मूल्यवान माना जाता था। इसका उपयोग आभूषणों, सजावटी वस्तुओं और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता था।
काल निर्धारण और स्रोत
भीर माउंड से प्राप्त लापिस लाजुली के टुकड़े छठी शताब्दी ईसा पूर्व के माने जाते हैं। इसका प्रमुख प्राकृतिक स्रोत वर्तमान अफगानिस्तान का बदख्शां (Badakhshan) क्षेत्र रहा है।
व्यापारिक महत्व
तक्षशिला में लापिस लाजुली की उपस्थिति इस बात का ठोस प्रमाण है कि यह नगर उत्तरापथ और सिल्क रूट के मिलन बिंदु पर स्थित एक प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र था। मध्य एशिया से आने वाले व्यापारी बदख्शां से लापिस लाजुली लाकर तक्षशिला के माध्यम से भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों तक पहुँचाते थे।
गांधार सभ्यता: सांस्कृतिक समन्वय का अद्वितीय उदाहरण
गांधार सभ्यता वर्तमान उत्तरी पाकिस्तान और पूर्वी अफगानिस्तान के क्षेत्रों में विकसित हुई। यह सभ्यता अपनी विशिष्ट कला शैली के लिए प्रसिद्ध है, जिसे गांधार कला या ग्रीको-बौद्ध कला कहा जाता है।
गांधार कला की विशेषताएँ
- बुद्ध की मूर्तियों में ग्रीक और रोमन यथार्थवाद
- वस्त्रों की सिलवटें और चेहरे की भाव-भंगिमाएँ
- यूनानी स्थापत्य तत्वों का प्रयोग
कुषाण शासकों के संरक्षण में गांधार कला का अभूतपूर्व विकास हुआ, और तक्षशिला इसका एक प्रमुख केंद्र बनी।
कुषाण साम्राज्य: एक संक्षिप्त लेकिन व्यापक अध्ययन
उत्पत्ति
कुषाण यूह-ची (युएझी) जनजाति की पाँच शाखाओं में से एक थे। ये मूलतः मध्य एशिया की घासभूमियों में रहने वाले घुमंतू लोग थे।
कालावधि
कुषाण साम्राज्य का उत्कर्ष पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी के बीच रहा।
साम्राज्य का विस्तार
- ऑक्सस नदी से गंगा तक
- खोरासान से पाटलिपुत्र तक
प्रशासन और उपाधियाँ
कुषाण शासक स्वयं को देवपुत्र (ईश्वर का पुत्र) कहते थे। यह अवधारणा चीन की ‘Son of Heaven’ परंपरा से प्रभावित मानी जाती है।
धर्म और संस्कृति
- बौद्ध धर्म के प्रमुख संरक्षक
- हिंदू, यूनानी और ईरानी धर्मों के प्रति सहिष्णुता
- गांधार कला का संरक्षण
प्रमुख शासक
- कुजुल कडफिसेस – संस्थापक
- विमा कडफिसेस – स्वर्ण मुद्राएँ, शैव उपासक
- कनिष्क महान – चौथी बौद्ध संगीति, बौद्ध धर्म का प्रसार
- हुविष्क – धार्मिक संरक्षण
- वासुदेव प्रथम – अंतिम महान शासक
मुद्रा व्यवस्था और वैश्विक संपर्क
कुषाणों की मुद्रा व्यवस्था अत्यंत विकसित थी। उन्होंने स्वर्ण, रजत और ताम्र मुद्राओं का प्रचलन किया और रोमन भार मानकों का अनुसरण किया। सिक्कों पर ‘King of Kings’, ‘Caesar’ और ‘Lord of All Lands’ जैसी उपाधियाँ अंकित मिलती हैं।
यह मुद्रा व्यवस्था रोम, मध्य एशिया, चीन और भारत के बीच व्यापारिक संपर्कों को सुदृढ़ करने में सहायक रही।
कुषाण साम्राज्य : संक्षिप्त (सारणी के रूप में) अध्ययन
| क्रम | विषय / Heading | विवरण |
|---|---|---|
| 1. | उत्पत्ति (Origin) | कुषाण, यूह-ची (युएझी) की पाँच जनजातियों में से एक थे। ये मध्य एशिया की घासभूमियों (चीन के निकट) में निवास करने वाले घुमंतू लोग थे। |
| 2. | कालावधि (Time Period) | पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी (1st–3rd Century CE) |
| 3. | साम्राज्य का भौगोलिक विस्तार (Territorial Extent) | ऑक्सस नदी से गंगा नदी तक; खोरासान (मध्य एशिया) से पाटलिपुत्र (बिहार) तक विस्तृत |
| 4. | प्रारंभिक इतिहास (Early History) | दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में यूह-ची जनजाति ने बैक्ट्रिया पर विजय प्राप्त की। |
| 5. | साम्राज्य की स्थापना | कुजुल कडफिसेस ने कुषाणों को एकीकृत किया तथा शक शासकों को हटाकर साम्राज्य की नींव रखी। |
| 6. | क्षेत्रीय विस्तार | गांधार, काबुल घाटी, सिंधु बेसिन तथा गंगा घाटी तक साम्राज्य का विस्तार |
| 7. | प्रशासनिक विचारधारा | कुषाण शासक स्वयं को देवपुत्र (ईश्वर का पुत्र) कहते थे। |
| 8. | प्रशासनिक उपाधियों की प्रेरणा | ‘देवपुत्र’ की अवधारणा चीन की Son of Heaven परंपरा से प्रभावित |
| 9. | धर्म नीति (Religious Policy) | बौद्ध धर्म के प्रमुख संरक्षक; हिंदू, यूनानी और ईरानी धार्मिक परंपराओं के प्रति सहिष्णुता |
| 10. | सांस्कृतिक उपलब्धियाँ | गांधार कला शैली (ग्रीको-बौद्ध कला) का विकास |
| 11. | प्रमुख शासक – I | कुजुल कडफिसेस – कुषाण साम्राज्य के संस्थापक |
| 12. | प्रमुख शासक – II | विमा कडफिसेस – साम्राज्य विस्तार, स्वर्ण मुद्राओं का प्रचलन, शैव उपासक |
| 13. | प्रमुख शासक – III | कनिष्क महान – कुषाणों का सबसे महान शासक; चौथी बौद्ध संगीति, बौद्ध धर्म का मध्य एशिया व चीन तक प्रसार |
| 14. | प्रमुख शासक – IV | हुविष्क – बौद्ध एवं जरथुस्त्र धर्म का संरक्षण |
| 15. | प्रमुख शासक – V | वासुदेव प्रथम – अंतिम महान शासक; इनके बाद पतन की प्रक्रिया आरंभ |
| 16. | मुद्रा व्यवस्था (Coinage System) | उच्च गुणवत्ता की स्वर्ण, रजत एवं ताम्र मुद्राएँ |
| 17. | मुद्रा मानक | रोमन भार मानकों का अनुसरण |
| 18. | शाही उपाधियाँ | King of Kings, Caesar, Lord of All Lands |
| 19. | व्यापारिक नीति | रेशम मार्ग (Silk Route) के व्यापार को सुदृढ़ किया |
| 20. | ऐतिहासिक महत्त्व (Historical Significance) | एशिया में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रसार; भारत, मध्य एशिया, चीन और रोम के बीच सांस्कृतिक सेतु की भूमिका |
खोज का समग्र महत्व
भीर माउंड से प्राप्त यह खोज कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है:
- तक्षशिला के दीर्घकालिक नगरीय और व्यापारिक महत्व की पुष्टि
- कुषाण शासनकाल की धार्मिक बहुलता का सशक्त प्रमाण
- मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के बीच प्राचीन व्यापारिक नेटवर्क की पुष्टि
- गांधार सभ्यता के आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन की गहरी समझ
तक्षशिला (भीर माउंड) कुषाणकालीन खोज : महत्वपूर्ण तथ्य तालिका
| क्रम | विषय / पहलू | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|
| 1. | खोज का स्थान | भीर माउंड (Bhir Mound), तक्षशिला के निकट, रावलपिंडी ज़िला, पंजाब (पाकिस्तान) |
| 2. | विशिष्ट उत्खनन क्षेत्र | उत्तरी भाग का B-2 ट्रेंच, जिसे आवासीय क्षेत्र माना गया |
| 3. | खोज करने वाला काल | हालिया पुरातात्विक उत्खनन (21वीं सदी) |
| 4. | प्रमुख खोजें | (i) कुषाणकालीन कांस्य सिक्के (ii) लापिस लाजुली (नीलमणि) के टुकड़े |
| 5. | सिक्कों की कालावधि | दूसरी शताब्दी ईस्वी (2nd Century CE) |
| 6. | सिक्कों का संबंध | कुषाण सम्राट वासुदेव प्रथम के शासनकाल से |
| 7. | सिक्कों की धातु | कांस्य (Bronze) |
| 8. | सिक्कों का अग्रभाग (Obverse) | मध्य एशियाई पोशाक में सम्राट वासुदेव प्रथम का चित्र |
| 9. | सिक्कों का पृष्ठ भाग (Reverse) | एक स्त्री धार्मिक देवी का अंकन |
| 10. | सिक्कों का ऐतिहासिक महत्व | कुषाण काल की धार्मिक बहुलता, राजनीतिक सत्ता और सांस्कृतिक समन्वय का प्रमाण |
| 11. | वासुदेव प्रथम का काल | लगभग 190 ईस्वी – 230 ईस्वी |
| 12. | वासुदेव प्रथम की विशेषता | कुषाण वंश के अंतिम महान शासक; भारतीयकरण (Indianization) की प्रक्रिया |
| 13. | लापिस लाजुली की कालावधि | छठी शताब्दी ईसा पूर्व (6th Century BC) |
| 14. | लापिस लाजुली का प्रकार | अर्ध-कीमती पत्थर (Semi-precious stone), गहरे नीले रंग का |
| 15. | लापिस लाजुली का स्रोत | बदख्शां क्षेत्र, वर्तमान अफगानिस्तान |
| 16. | लापिस लाजुली का महत्व | लंबी दूरी के अंतर-क्षेत्रीय व्यापार का प्रमाण |
| 17. | तक्षशिला का ऐतिहासिक महत्व | शिक्षा, व्यापार और प्रशासन का प्रमुख केंद्र |
| 18. | तक्षशिला की स्थिति | उत्तरापथ (Uttarapatha) व्यापार मार्ग पर |
| 19. | यूनेस्को स्थिति | यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल |
| 20. | भीर माउंड की विशेषता | तक्षशिला की सबसे पुरानी नगरीय बस्ती |
| 21. | भीर माउंड की कालावधि | लगभग 800–525 ईसा पूर्व (मौर्य-पूर्व काल) |
| 22. | गांधार सभ्यता का क्षेत्र | उत्तरी पाकिस्तान और पूर्वी अफगानिस्तान |
| 23. | गांधार कला | ग्रीको-बौद्ध कला (Greek-Buddhist Art) |
| 24. | कुषाण साम्राज्य की कालावधि | पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी |
| 25. | कुषाण साम्राज्य का विस्तार | ऑक्सस नदी से गंगा तक |
| 26. | कुषाणों का प्रमुख व्यापार मार्ग | रेशम मार्ग (Silk Route) |
| 27. | कुषाणों की मुद्रा व्यवस्था | स्वर्ण, रजत, ताम्र सिक्के; रोमन भार मानक |
| 28. | कुषाण शासकों की उपाधि | देवपुत्र (Son of God) |
| 29. | प्रमुख कुषाण शासक | कुजुल कडफिसेस, विमा कडफिसेस, कनिष्क महान, हुविष्क, वासुदेव प्रथम |
| 30. | खोज का समग्र महत्व | प्राचीन व्यापार, धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक संपर्कों की पुष्टि |
निष्कर्ष
तक्षशिला के भीर माउंड से प्राप्त कुषाणकालीन सिक्के और लापिस लाजुली के टुकड़े केवल पुरावशेष नहीं हैं, बल्कि वे प्राचीन विश्व की जीवंत कहानियाँ कहते हैं। ये खोजें हमें यह समझने में सहायता करती हैं कि कैसे तक्षशिला जैसे नगर शिक्षा, व्यापार, धर्म और संस्कृति के वैश्विक केंद्र बने।
कुषाण साम्राज्य की धार्मिक सहिष्णुता, आर्थिक समृद्धि और सांस्कृतिक समन्वय की परंपरा आज भी इतिहास के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। यह खोज निश्चय ही गांधार सभ्यता और प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन को नई दिशा प्रदान करेगी।
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