भारत ने हाल ही में प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत देशव्यापी डॉल्फ़िन गणना के दूसरे चरण की आधिकारिक शुरुआत की है। यह अभियान उत्तर प्रदेश के बिजनौर से शुरू हुआ और इसका उद्देश्य भारत की नदियों और तटीय क्षेत्रों में रहने वाली डॉल्फ़िन प्रजातियों का अद्यतन आंकलन करना है। यह राष्ट्रीय स्तर का प्रयास न केवल डॉल्फ़िन की आबादी की गणना करने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह नदी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत आयोजित यह सर्वेक्षण दो चरणों में किया जाएगा। पहले चरण में गंगा नदी की मुख्य धारा को बिजनौर से गंगा सागर तक कवर किया जाएगा, साथ ही सिंधु नदी को भी शामिल किया गया है। दूसरे चरण में ब्रह्मपुत्र नदी, गंगा की सहायक नदियाँ, सुंदरबन क्षेत्र और ओडिशा के तटीय क्षेत्रों को शामिल किया जाएगा। इस व्यापक कवरेज से भारत में डॉल्फिन आवासों का समग्र और विस्तृत आकलन सुनिश्चित किया जा सकेगा।
प्रोजेक्ट डॉल्फिन: एक राष्ट्रीय संरक्षण पहल
प्रोजेक्ट डॉल्फिन भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय संरक्षण पहल है, जिसे 15 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित किया गया था। यह परियोजना ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की तर्ज पर विकसित की गई है और इसका उद्देश्य भारत की नदीय और समुद्री डॉल्फ़िन प्रजातियों के संरक्षण को सशक्त बनाना है। प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत विशेष रूप से गंगा नदी डॉल्फ़िन, जो भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव है, के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
प्रोजेक्ट के उद्देश्य
- डॉल्फ़िन प्रजातियों का संरक्षण: परियोजना का मुख्य लक्ष्य भारत में पाई जाने वाली नदीय और मुहाना (एस्टुअरी) डॉल्फ़िन प्रजातियों की सुरक्षा करना है।
- आवास संरक्षण: डॉल्फ़िन के आवासों की सुरक्षा और उनकी गुणवत्ता को बनाए रखना।
- वैज्ञानिक निगरानी: डॉल्फ़िन की जनसंख्या, आवास की स्थिति और पारिस्थितिक खतरों की नियमित निगरानी।
- समुदाय की भागीदारी: स्थानीय समुदायों को संरक्षण में शामिल करना और उनके सहयोग से डॉल्फ़िन आवास की रक्षा करना।
- प्रदूषण और आकस्मिक मौतों को कम करना: मछली पकड़ने के दौरान डॉल्फ़िन की फँसने जैसी घटनाओं को रोकना और जल प्रदूषण को कम करना।
डॉल्फ़िन को एक संकेतक प्रजाति माना जाता है, यानी उनकी संख्या और स्वास्थ्य नदियों और तटीय पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य का सूचक हैं। डॉल्फ़िन की आबादी में गिरावट अक्सर जल प्रदूषण, जल प्रवाह में कमी या आवास क्षरण का संकेत देती है। इसलिए, प्रोजेक्ट डॉल्फिन केवल डॉल्फ़िन के संरक्षण के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण है।
डॉल्फ़िन सर्वेक्षण: भारत में दूसरी रेंज-वाइड गणना
दूसरी रेंज-वाइड डॉल्फ़िन सर्वेक्षण की शुरुआत 17 जनवरी 2026 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर से की गई। यह सर्वेक्षण पिछले (2021-2023) सर्वेक्षण का अगला चरण है, जिसमें भारत में डॉल्फ़िन की अद्यतन जनसंख्या और उनके आवास की स्थिति का मूल्यांकन किया जाएगा।
सर्वेक्षण का समन्वय
इस वैज्ञानिक अभ्यास का समन्वय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा किया जा रहा है। इसमें वन्यजीव विशेषज्ञ, फील्ड टीमें, और वैज्ञानिक निगरानी दल शामिल हैं। मंत्रालय के अनुसार, इस सर्वेक्षण में केवल डॉल्फ़िन की संख्या ही नहीं, बल्कि उनके आवास की गुणवत्ता, मानव दबाव, प्रदूषण और पारिस्थितिक खतरों से जुड़े आंकड़े भी एकत्र किए जाएंगे।
सर्वेक्षण के निष्कर्षों के आधार पर भविष्य में डॉल्फ़िन संरक्षण के लिए नीतियाँ और रणनीतियाँ बनाई जाएंगी, जिससे नदियों और तटीय क्षेत्रों में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना संभव हो सके।
सर्वेक्षण का क्षेत्र और चरण
सर्वेक्षण को दो चरणों में लागू किया जा रहा है:
- प्रथम चरण:
- गंगा नदी की मुख्य धारा (बिजनौर से गंगा सागर तक)
- सिंधु नदी (Indus River)
- द्वितीय चरण:
- ब्रह्मपुत्र नदी
- गंगा की सहायक नदियाँ
- सुंदरबन क्षेत्र
- ओडिशा के तटीय क्षेत्र
इस बार सर्वेक्षण में पहली बार सुंदरबन और ओडिशा में पाई जाने वाली इरावदी डॉल्फ़िन (Irrawaddy Dolphin) को भी शामिल किया गया है।
सर्वेक्षण में उपयोग की जाने वाली तकनीक
इस सर्वेक्षण में नवीनतम तकनीकी उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है, जिनमें प्रमुख हैं:
- हाइड्रोफोन (Hydrophones): पानी के नीचे डॉल्फ़िन की ‘इकोलोकेशन’ आवाजों को रिकॉर्ड करने के लिए।
- सैटेलाइट टैगिंग: गंगा डॉल्फ़िन के प्रवास और व्यवहार का अध्ययन करने के लिए।
- GIS और GPS आधारित मानचित्रण: डॉल्फ़िन आवासों और खतरों का सटीक मानचित्रण।
यह तकनीक सर्वेक्षण को अधिक वैज्ञानिक, सटीक और व्यापक बनाती है।
भारत में डॉल्फ़िन प्रजातियाँ और उनका महत्व
भारत में मुख्य रूप से तीन डॉल्फ़िन प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनकी संरक्षण स्थिति गंभीर है।
| प्रजाति | आवास | IUCN संरक्षण स्थिति | WPA 1972 | प्रमुख विशेषताएँ एवं खतरे |
|---|---|---|---|---|
| गंगा नदी डॉल्फ़िन (Platanista gangetica) | गंगा–ब्रह्मपुत्र–मेघना एवं कर्णफुली नदी प्रणालियाँ (भारत, बांग्लादेश, नेपाल) | संकटग्रस्त (Endangered) | अनुसूची-I | जन्मजात अंधी होती है और शिकार के लिए इकोलोकेशन का उपयोग करती है। 2009 में राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित। खतरे: प्रदूषण, आवास का विखंडन, मछली पकड़ने में फँसना (Bycatch) |
| सिंधु नदी डॉल्फ़िन (Platanista minor) | सिंधु नदी (पाकिस्तान), ब्यास नदी (भारत) | संकटग्रस्त (Endangered) | अनुसूची-I | केवल मीठे पानी में रहती है। दुनिया की सबसे दुर्लभ डॉल्फ़िन। खतरे: जल प्रवाह में कमी, बाँध, आवास क्षरण |
| इरावदी डॉल्फ़िन (Orcaella brevirostris) | चिलिका झील और दक्षिण/दक्षिण–पूर्व एशिया की नदियाँ | संकटग्रस्त (Endangered) | अनुसूची-I | खारे और मीठे पानी दोनों में रह सकती है। “स्पाय–हॉपिंग” व्यवहार के लिए प्रसिद्ध। खतरे: मछली पकड़ने के जाल, आवास विनाश |
महत्वपूर्ण संरक्षण क्षेत्र
भारत में डॉल्फ़िन संरक्षण के प्रमुख क्षेत्र हैं:
- विक्रमशिला गंगा डॉल्फ़िन अभयारण्य, बिहार – भारत का एकमात्र डॉल्फ़िन अभयारण्य, गंगा डॉल्फ़िन संरक्षण।
- ब्यास संरक्षण रिज़र्व, पंजाब – सिंधु नदी डॉल्फ़िन संरक्षण।
- सुंदरबन और चिलिका झील – इरावदी डॉल्फ़िन और गंगा डॉल्फ़िन के आवास।
पहली डॉल्फ़िन सर्वेक्षण (2021-2023) के निष्कर्ष
प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत पहले व्यापक सर्वेक्षण (2021-2023) के परिणाम मार्च 2025 में जारी किए गए थे। इसके प्रमुख आंकड़े इस प्रकार हैं:
- कुल डॉल्फ़िन: 6,327
- गंगा डॉल्फ़िन: 6,324
- उत्तर प्रदेश: 2,397
- बिहार: 2,220
- ब्रह्मपुत्र बेसिन: 635 (जनसंख्या स्थिर)
- सिंधु नदी डॉल्फ़िन:
- ब्यास नदी (पंजाब): केवल 3 डॉल्फ़िन
- प्रमुख हॉटस्पॉट्स:
- भिंड–पचनादा खंड — चंबल नदी
- चौसा–मणिहारी खंड — गंगा नदी
इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि गंगा डॉल्फ़िन उत्तर भारत में अधिक संख्या में हैं, जबकि सिंधु नदी डॉल्फ़िन और इरावदी डॉल्फ़िन अधिक संकटग्रस्त हैं।
डॉल्फ़िन संरक्षण का महत्व
डॉल्फ़िन को सांकेतिक प्रजाति (Indicator Species) माना जाता है। उनकी संख्या और स्वास्थ्य नदियों और तटीय पारिस्थितिक तंत्र की स्थिति को दर्शाते हैं। डॉल्फ़िन की आबादी में गिरावट पर्यावरणीय खतरे, जैसे जल प्रदूषण, बांधों और जल प्रवाह में कमी, और आवास क्षरण का संकेत देती है।
सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़े संरक्षण नीतियों के लिए मार्गदर्शक का काम करते हैं। इसके माध्यम से गंभीर समस्या वाले क्षेत्र चिन्हित किए जाते हैं और विज्ञान-आधारित योजना के माध्यम से लक्षित कार्रवाई सुनिश्चित की जाती है।
प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत विशेष पहलें
- राष्ट्रीय डॉल्फ़िन दिवस: हर साल 5 अक्टूबर को डॉल्फ़िन संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है।
- सैटेलाइट टैगिंग: गंगा डॉल्फ़िन की पहली बार असम में सैटेलाइट टैगिंग की गई, जिससे उनकी प्रवास सीमा और व्यवहार का अध्ययन किया जा सके।
- आवास संरक्षण कार्य: नदी किनारे के पारिस्थितिक तंत्र और तटीय क्षेत्रों में प्रदूषण नियंत्रण।
- समुदाय आधारित संरक्षण: स्थानीय मछुआरों और ग्रामीण समुदायों को संरक्षण प्रयासों में शामिल करना।
भविष्य की दिशा और चुनौतियाँ
भारत में डॉल्फ़िन संरक्षण के लिए कई चुनौतियाँ हैं:
- जल प्रदूषण: औद्योगिक अपशिष्ट और कृषि रसायन नदियों में डॉल्फ़िन की जीवन रक्षा को खतरे में डालते हैं।
- आवास विखंडन: बाँध और जलविद्युत परियोजनाओं के कारण डॉल्फ़िन के प्राकृतिक आवास छोटे खंडों में बंट गए हैं।
- अवैध मछली पकड़ना: जाल और अन्य उपकरणों में फंसने से डॉल्फ़िन की मृत्यु होती है।
- जल प्रवाह में कमी: नदी की धाराओं में कमी से भोजन और प्रजनन के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ प्रभावित होती हैं।
इन चुनौतियों का समाधान वैज्ञानिक, प्रशासनिक और स्थानीय समुदायों के सहयोग से ही संभव है। प्रोजेक्ट डॉल्फिन इन्हीं चुनौतियों के समाधान के लिए रणनीतिक कदम उठा रहा है।
निष्कर्ष
प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत दूसरी रेंज-वाइड सर्वेक्षण की शुरुआत भारत में डॉल्फ़िन संरक्षण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह न केवल डॉल्फ़िन की आबादी का अद्यतन आंकलन प्रदान करेगा, बल्कि यह नदियों और तटीय पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य का भी संकेतक बनेगा।
सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़े नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और स्थानीय समुदायों को संरक्षण उपायों को प्रभावी बनाने में मदद करेंगे। गंगा डॉल्फ़िन, सिंधु नदी डॉल्फ़िन और इरावदी डॉल्फ़िन जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण केवल जैव विविधता के लिए ही नहीं, बल्कि मीठे पानी और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है।
इस अभियान के माध्यम से भारत एक बार फिर यह साबित कर रहा है कि नदियाँ और उनके जीव केवल पर्यावरण का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारी प्राकृतिक विरासत और पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनरेखा हैं। डॉल्फ़िन संरक्षण के लिए यह कदम भविष्य की पीढ़ियों के लिए नदियों के स्वास्थ्य और जैव विविधता की सुरक्षा सुनिश्चित करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
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