आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली

हिंदी साहित्य के इतिहास में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का नाम एक ऐसे युगप्रवर्तक साहित्यकार के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने न केवल हिंदी भाषा को अनुशासित और व्यवस्थित किया, बल्कि उसे आधुनिक चेतना, बौद्धिक गंभीरता और राष्ट्रीय भावबोध से भी संपन्न किया। उनके साहित्यिक योगदान के कारण ही हिंदी साहित्य के इतिहास में एक पूरे युग को उनके नाम पर द्विवेदी युग कहा गया। यह युग मुख्यतः 1900 ई. से 1920 ई. के मध्य माना जाता है, जब हिंदी गद्य और कविता दोनों ही क्षेत्रों में निर्णायक परिवर्तन देखने को मिले।

द्विवेदी जी ने उस समय हिंदी साहित्य को दिशा प्रदान की, जब भाषा अव्यवस्थित थी, गद्य अराजक था, काव्य में विषयगत सीमाएँ थीं और साहित्य का सामाजिक उद्देश्य अस्पष्ट था। उन्होंने साहित्य को संस्कार, शुद्धता, तर्क, नीति और समाज-सुधार से जोड़ा। उनका सम्पूर्ण साहित्यिक जीवन हिंदी भाषा को एक सशक्त, सक्षम और प्रतिष्ठित राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के लिए समर्पित रहा।

Table of Contents

द्विवेदी युग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन तीव्र हो रहे थे। अंग्रेज़ी शासन के प्रभाव, पश्चिमी शिक्षा, नवजागरण और राष्ट्रीय चेतना के उदय ने भारतीय समाज को झकझोर दिया था। हिंदी साहित्य भी इन परिवर्तनों से अछूता नहीं रहा।

इस समय तक हिंदी कविता में ब्रजभाषा का प्रभुत्व था और गद्य में स्पष्ट मानक रूप का अभाव था। भाषा में अशुद्धता, विषयों में हल्कापन और शैली में अनियमितता व्यापक थी। ऐसे समय में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का उदय हुआ, जिन्होंने हिंदी को न केवल भाषाई अनुशासन दिया, बल्कि उसे आधुनिक विचारधारा का माध्यम भी बनाया।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी : संक्षिप्त परिचयात्मक तथ्य (तालिका)

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी आधुनिक हिन्दी गद्य के शिल्पकार तथा द्विवेदी युग के प्रवर्तक माने जाते हैं। उनके संपादन और लेखन ने हिन्दी भाषा को अनुशासन, शुद्धता और वैचारिक स्पष्टता प्रदान की।

क्रमशीर्षक (Heading)विवरण
1.पूरा नामआचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
2.जन्म15 मई 1864
3.जन्मस्थानदौलतपुर गाँव, रायबरेली, उत्तर प्रदेश, भारत
4.मृत्यु21 दिसम्बर 1938
5.मृत्यु स्थानरायबरेली, भारत
6.पिता का नामपं. रामसहाय द्विवेदी
7.राष्ट्रीयताभारतीय
8.काल / युगआधुनिक काल — द्विवेदी युग
9.पेशालेखक, कवि, संपादक
10.साहित्यिक विधाएँकहानी, उपन्यास
11.मुख्य विषयनिबंध, आलोचना, कविता
12.भाषा-शैलीशुद्ध, परिनिष्ठित, संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली युक्त हिन्दी
13.प्रमुख शैलियाँभावात्मक शैली एवं विचारात्मक शैली की प्रधानता
14.प्रेरणा / विचारधारादेशप्रेम एवं राष्ट्रीय चेतना
15.साहित्यिक आन्दोलनभारतीय स्वाधीनता आंदोलन
16.संपादन कार्यसरस्वती पत्रिका
17.उल्लेखनीय कृतिबिखरे मोती (कहानी संग्रह)
18.अन्य प्रमुख रचनाएँरघुवंश, हिन्दी महाभारत, ऋतु तरंगिणी, कुमारसम्भव सार, किरातार्जुनीयम्, अद्भुत आलाप, सुकवि संकीर्तन, साहित्य संदर्भ, विचार-विमर्श, रसज्ञ रंजन आदि

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का जीवन-परिचय

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के इतिहास में एक युगप्रवर्तक साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनके साहित्यिक योगदान के कारण हिंदी के एक संपूर्ण कालखंड को ‘द्विवेदी युग’ की संज्ञा दी गई है। ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से उन्होंने हिंदी भाषा को सुव्यवस्थित, व्याकरण-सम्मत और विचारप्रधान स्वरूप प्रदान किया। हिंदी गद्य को अनुशासन और गंभीरता देने के साथ-साथ खड़ी बोली हिंदी को काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय भी उन्हें प्राप्त है। उनका सम्पूर्ण जीवन हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा को समर्पित रहा।

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म 15 मई 1864 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के दौलतपुर ग्राम में हुआ था। वे एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार से संबंधित थे। उनके पिता का नाम पंडित रामसहाय द्विवेदी था, जो धार्मिक प्रवृत्ति के, संस्कारवान और परंपरागत मूल्यों में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे। पारिवारिक वातावरण सादा, अनुशासित और नैतिक मूल्यों से युक्त था, जिसने द्विवेदी जी के व्यक्तित्व निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहीं थी, जिसके कारण उन्हें औपचारिक शिक्षा में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बाल्यावस्था से ही उन्होंने अभाव, संघर्ष और आत्मनिर्भरता का अनुभव किया। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर उनके जीवन में परिश्रमशीलता, अनुशासन और आत्मसंयम जैसे गुणों का विकास करने में सहायक बनीं।

पारिवारिक संस्कारों ने उनमें धार्मिक भावना, नैतिक दृष्टि और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की चेतना जाग्रत की। आर्थिक सीमाओं के बावजूद परिवार में विद्या, अध्ययन और संस्कारों को महत्त्व दिया जाता था। इसी कारण द्विवेदी जी में प्रारंभ से ही अध्ययनशीलता और आत्मविकास की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी, जो आगे चलकर उनके साहित्यिक और भाषिक योगदान का आधार बनी।

इस प्रकार, जन्मस्थल और पारिवारिक पृष्ठभूमि ने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व को संघर्षशील, संस्कारयुक्त और कर्तव्यनिष्ठ स्वरूप प्रदान किया, जिसने उन्हें आगे चलकर हिंदी साहित्य का युगप्रवर्तक आचार्य बनने की दिशा में प्रेरित किया।

स्वाध्याय और बहुभाषी विद्वत्ता

द्विवेदी जी ने औपचारिक शिक्षा के अभाव में भी स्वाध्याय को अपना जीवन-साधन बनाया। उन्होंने अपने प्रयासों से संस्कृत, अंग्रेज़ी, बंगला, मराठी, गुजराती और फारसी जैसी भाषाओं का गहन अध्ययन किया। यही बहुभाषिक ज्ञान आगे चलकर उनके अनुवाद कार्य, आलोचना दृष्टि और भाषाई सुधार का आधार बना।

रेल विभाग से ‘सरस्वती’ तक : जीवन का निर्णायक मोड़

महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने अपने जीवन का प्रारंभिक काल रेल विभाग में नौकरी करते हुए बिताया। यह नौकरी सम्मानजनक और अच्छी वेतन वाली थी, किंतु साहित्य और भाषा के प्रति उनका समर्पण इससे कहीं अधिक था। किसी मतभेद के कारण उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और 1903 ई. में ‘सरस्वती’ पत्रिका के सम्पादक बने।

यही निर्णय उनके जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। ‘सरस्वती’ उस समय एक साधारण पत्रिका थी, किंतु द्विवेदी जी के सम्पादन में यह हिंदी की सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रभावशाली साहित्यिक पत्रिका बन गई।

‘सरस्वती’ पत्रिका और हिंदी साहित्य का नवजागरण

सम्पादन शैली और साहित्यिक अनुशासन

द्विवेदी जी का सम्पादन अत्यंत कठोर, अनुशासनप्रिय और गुणवत्ता-केन्द्रित था। वे भाषा की अशुद्धि, विचार की अस्पष्टता और शैली की लापरवाही को बिल्कुल सहन नहीं करते थे। उन्होंने लेखकों और कवियों को शुद्ध हिंदी, व्याकरण-सम्मत भाषा और विचारपूर्ण लेखन के लिए प्रेरित किया।

नए साहित्यकारों का निर्माण

‘सरस्वती’ के माध्यम से द्विवेदी जी ने हिंदी को अनेक नए कवि, निबंधकार और आलोचक दिए। उन्होंने लेखकों को केवल प्रकाशित ही नहीं किया, बल्कि उनकी रचनाओं में सुधार कर उन्हें साहित्यिक दृष्टि से परिपक्व बनाया। इस कारण उन्हें हिंदी साहित्य का शिक्षक और मार्गदर्शक भी कहा जाता है।

हिंदी भाषा का संस्कार और व्याकरणिक परिमार्जन

द्विवेदी जी का सबसे बड़ा योगदान हिंदी भाषा को अराजकता से निकालकर सुव्यवस्थित रूप प्रदान करना था। उन्होंने—

  • अशुद्ध शब्दों और वाक्य रचनाओं का विरोध किया
  • संस्कृतनिष्ठ, परंतु बोधगम्य हिंदी का समर्थन किया
  • हिंदी गद्य को स्पष्ट, तर्कपूर्ण और प्रभावशाली बनाया

उनके प्रयासों से हिंदी गद्य में स्पष्टता, गंभीरता और अनुशासन आया।

ब्रजभाषा से खड़ी बोली तक : काव्य भाषा का परिवर्तन

द्विवेदी युग से पहले हिंदी कविता मुख्यतः ब्रजभाषा में लिखी जाती थी। द्विवेदी जी ने खड़ी बोली हिंदी को काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि खड़ी बोली न केवल गद्य, बल्कि कविता के लिए भी सक्षम और प्रभावशाली है।

यह परिवर्तन आगे चलकर छायावाद और आधुनिक हिंदी कविता का आधार बना।

द्विवेदी जी का साहित्यिक दृष्टिकोण

द्विवेदी जी साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं मानते थे। उनके अनुसार साहित्य का उद्देश्य था—

  • समाज-सुधार
  • नैतिक चेतना
  • बौद्धिक विकास
  • राष्ट्रीय जागरण

उनकी रचनाओं और संपादकीय दृष्टि में नीति, विवेक और तर्क का विशेष महत्व है।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की कृतियाँ

द्विवेदी जी ने पचास से अधिक ग्रंथों की रचना की, जो काव्य, आलोचना, अनुवाद, निबंध और विविध विषयों से संबंधित हैं।

1. काव्य-संग्रह

  • काव्य मंजूषा
  • कविता कलाप
  • सुमन

2. आलोचनात्मक ग्रंथ

  • रसज्ञ रंजन
  • हिंदी नवरत्न
  • साहित्य सीकर
  • नाट्यशास्त्र
  • विचार-विमर्श
  • साहित्य संदर्भ
  • कालिदास की निरंकुशता
  • कालिदास एवं उनकी कविता
  • साहित्यालाप
  • विज्ञान वार्ता
  • कोविद कीर्तन
  • दुश्य दर्शन
  • समालोचना समुच्चय
  • नैषधचरित चर्चा
  • कौटिल्य कुठार
  • वनिता विलास

3. अनूदित रचनाएँ

  • वेकन विचारमाला
  • मेघदूत
  • विचार रत्नावली
  • कुमारसम्भव
  • गंगालहरी
  • किरातार्जुनीय
  • हिंदी महाभारत
  • रघुवंश
  • शिक्षा
  • स्वाधीनता
  • विनय विनोद

4. निबंध

  • सरस्वती पत्रिका एवं अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित अनेक निबंध

5. विविध विषयक ग्रंथ

  • जल चिकित्सा
  • संपत्तिशास्त्र
  • वक्तृत्वकला

6. सम्पादन कार्य

  • ‘सरस्वती’ मासिक पत्रिका का सम्पादन (1903 से कई वर्षों तक)

सम्मान और उपाधियाँ

द्विवेदी जी के अमूल्य योगदान को स्वीकार करते हुए—

  • 1931 ई. में काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उन्हें ‘आचार्य’ की उपाधि प्रदान की
  • हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने उन्हें ‘वाचस्पति’ की उपाधि से सम्मानित किया

निधन और साहित्यिक विरासत

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का निधन 21 दिसंबर 1938 ई. में हुआ। यद्यपि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, किंतु उनकी साहित्यिक विरासत आज भी हिंदी भाषा, साहित्य और शिक्षा में जीवंत है। उनके द्वारा स्थापित मानक आज भी हिंदी लेखन की कसौटी बने हुए हैं।

द्विवेदी जी के निबंधों की भाषागत विशेषताएँ

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी निबंध साहित्य के ऐसे सशक्त स्तंभ हैं, जिनकी भाषा ने आधुनिक हिंदी गद्य को अनुशासन, स्पष्टता और गरिमा प्रदान की। उनके निबंध केवल विचारप्रधान ही नहीं, बल्कि भाषा की दृष्टि से भी अत्यंत सशक्त और संतुलित हैं। द्विवेदी जी की भाषा न तो अनावश्यक रूप से अलंकृत है और न ही साधारणता की सीमा लांघती है। उन्होंने विषय, उद्देश्य और पाठक—तीनों को ध्यान में रखकर भाषा का चयन किया। इसी कारण उनकी भाषा आज भी आदर्श मानी जाती है।

1. विषयानुकूल भाषा का प्रयोग

द्विवेदी जी की भाषा की सबसे प्रमुख विशेषता उसका विषयानुकूल स्वरूप है। वे जिस विषय पर निबंध लिखते थे, उसी के अनुरूप भाषा का चयन करते थे। उनके आलोचनात्मक निबंधों में जहाँ गंभीरता, तर्क और बौद्धिकता अपेक्षित होती है, वहाँ उनकी भाषा भी उसी स्तर की सुसंस्कृत और परिपक्व दिखाई देती है। इसके विपरीत, भावात्मक या विचारात्मक निबंधों में उनकी भाषा अधिक प्रवाहपूर्ण, सरस और कहीं-कहीं काव्यात्मक भी हो जाती है।
इस प्रकार भाषा उनके लिए केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि विचार को प्रभावी बनाने का साधन थी।

2. संस्कृतनिष्ठता और तत्सम शब्दावली

द्विवेदी जी की भाषा में संस्कृत तत्सम शब्दों की पर्याप्त बहुलता दिखाई देती है। विशेष रूप से उनके आलोचनात्मक और वैचारिक निबंधों में संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग हुआ है, जिससे भाषा में गंभीरता, प्रामाणिकता और वैचारिक दृढ़ता उत्पन्न होती है।
हालाँकि उनकी संस्कृतनिष्ठता कहीं भी बोझिल नहीं लगती, क्योंकि वे शब्दों का चयन अत्यंत सावधानी से करते थे। उन्होंने यह सिद्ध किया कि संस्कृतनिष्ठ हिंदी भी सरल, बोधगम्य और प्रभावशाली हो सकती है।

3. संस्कृत सूक्तियों का प्रभावशाली प्रयोग

द्विवेदी जी संस्कृत साहित्य के गहन अध्येता थे और इसका प्रभाव उनकी भाषा में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। वे अपने निबंधों में संस्कृत की सूक्तियों, श्लोकों और उद्धरणों का यथास्थान प्रयोग करते थे। इन सूक्तियों के प्रयोग से निबंधों की भाषा न केवल प्रभावशाली बनती थी, बल्कि विचारों को भी बल मिलता था।
संस्कृत उद्धरण उनके लेखन में विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि तर्क की पुष्टि और विचार की स्पष्टता का साधन बनते थे।

4. भावात्मक निबंधों में काव्यात्मकता

जहाँ विषय भावनाओं से जुड़ा होता था, वहाँ द्विवेदी जी की भाषा में काव्यात्मकता और सरसता स्वतः आ जाती थी। ऐसे निबंधों में भाषा अधिक लचीली, प्रवाहमयी और संवेदनशील दिखाई देती है।
यह विशेषता उनके संतुलित व्यक्तित्व को दर्शाती है—वे केवल कठोर आलोचक ही नहीं, बल्कि भावनाओं को समझने वाले संवेदनशील लेखक भी थे।

5. मुहावरेदार और जीवंत भाषा-शैली

द्विवेदी जी मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रयोग में दक्ष थे। उनके निबंधों में प्रयुक्त मुहावरे भाषा को स्वाभाविक, जीवंत और प्रभावशाली बनाते हैं। ये मुहावरे कहीं भी कृत्रिम नहीं लगते, बल्कि सहज रूप से वाक्य-प्रवाह में घुले-मिले रहते हैं।
इससे उनकी भाषा केवल विद्वानों तक सीमित न रहकर सामान्य पाठकों तक भी सहज रूप से पहुँच पाती है।

6. उर्दू और अंग्रेज़ी शब्दों का संतुलित प्रयोग

यद्यपि द्विवेदी जी संस्कृतनिष्ठ हिंदी के समर्थक थे, फिर भी वे भाषा को संकीर्ण नहीं बनने देते थे। उनकी भाषा में उर्दू और अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों का भी यथोचित प्रयोग मिलता है।
यह प्रयोग न तो भाषा की शुद्धता को बाधित करता है और न ही उसकी गरिमा को कम करता है। इसके विपरीत, इससे भाषा अधिक व्यवहारिक और समकालीन बन जाती है।

7. बोलचाल की भाषा और व्यावहारिक दृष्टिकोण

द्विवेदी जी की भाषा की एक महत्वपूर्ण विशेषता उसका व्यावहारिक स्वरूप है। उन्होंने बोलचाल में प्रचलित शब्दों और वाक्य-रचनाओं का भी भरपूर प्रयोग किया। वे ऐसी भाषा के पक्षधर थे जो—

  • सामान्य जनजीवन में प्रयुक्त होती हो
  • पाठकों के लिए सहज और बोधगम्य हो
  • अनावश्यक जटिलता से मुक्त हो

उनका मानना था कि साहित्य की भाषा वही श्रेष्ठ है, जो समाज के अधिकतम लोगों तक अपनी बात स्पष्ट रूप से पहुँचा सके।

8. स्पष्टता, तर्क और अनुशासन

द्विवेदी जी की भाषा में स्पष्टता और तर्कशीलता सर्वत्र दिखाई देती है। उनके वाक्य सुसंगठित, विचार क्रमबद्ध और अभिव्यक्ति अनुशासित होती है। उन्होंने हिंदी गद्य को भावुकता और अराजकता से निकालकर एक ठोस, विवेकपूर्ण और तार्किक आधार प्रदान किया।
इसी कारण उन्हें आधुनिक हिंदी गद्य का शिल्पकार भी कहा जाता है।

इस प्रकार, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंधों की भाषा विषयानुकूल, संस्कृतनिष्ठ, व्यावहारिक, मुहावरेदार और प्रभावशाली है। उन्होंने भाषा को न तो केवल विद्वत्ता का साधन बनाया और न ही उसे सामान्यता तक सीमित रखा। उनकी भाषा विचार, तर्क और व्यवहार—तीनों के बीच संतुलन स्थापित करती है।
यही संतुलित भाषाशैली उन्हें हिंदी निबंध साहित्य में एक विशिष्ट और आदर्श स्थान प्रदान करती है।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की निबंधात्मक शैलीगत विशेषताएँ

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी निबंध साहित्य के ऐसे युगप्रवर्तक लेखक हैं, जिन्होंने न केवल भाषा को सुव्यवस्थित किया, बल्कि निबंध शैली को भी बहुआयामी स्वरूप प्रदान किया। उनकी शैली विषय, उद्देश्य और पाठक के अनुसार रूप बदलती है। द्विवेदी जी किसी एक शैली में बँधे नहीं रहे, बल्कि उन्होंने भाव, विचार, अनुसंधान, वर्णन और व्यंग्य—सभी को अपनी लेखनी में संतुलित स्थान दिया। यही कारण है कि उनके निबंध शैलीगत विविधता के उत्कृष्ट उदाहरण माने जाते हैं।

1. भावात्मक शैली

द्विवेदी जी के कुछ निबंधों में भावात्मक शैली का अत्यंत प्रभावशाली प्रयोग मिलता है। विशेष रूप से ऐसे निबंधों में, जहाँ किसी व्यक्ति, प्रकृति या भावलोक से संबंधित विषयों का वर्णन किया गया है, वहाँ उनकी भाषा कोमल, सरस और माधुर्यपूर्ण हो जाती है।
इन स्थलों पर कोमलकांत मधुर पदावली, लयात्मकता तथा अनुप्रास जैसे ध्वन्यात्मक अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग दिखाई देता है। भावात्मक शैली में लिखते समय वे भाषा को सजावटी बनाने के लिए नहीं, बल्कि भावों को सजीव करने के लिए अलंकारों का सहारा लेते हैं। इससे उनकी भाषा चित्रात्मक और प्रभावोत्पादक बन जाती है।

2. गवेषणात्मक (अनुसंधानात्मक) शैली

द्विवेदी जी की गवेषणात्मक शैली उनके साहित्यिक और आलोचनात्मक निबंधों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इस शैली का प्रयोग उन्होंने उन निबंधों में किया है, जिनमें साहित्य, काव्यशास्त्र और कवि-कर्म से जुड़े विषयों का गहन विवेचन किया गया है।
इस प्रकार की शैली में उनके वाक्य सधे हुए, सारगर्भित और तर्क-सम्मत होते हैं। भाषा में संस्कृतनिष्ठ पदावली का प्रयोग अधिक होता है, जिससे लेखन में गंभीरता और विद्वत्ता का पुट आ जाता है। विषय का प्रतिपादन विश्लेषणात्मक ढंग से किया जाता है और निष्कर्ष तर्क के आधार पर प्रस्तुत होते हैं।

3. विचारात्मक शैली

द्विवेदी जी के अनेक निबंध विचारात्मक शैली में लिखे गए हैं। इन निबंधों में भावनाओं की अपेक्षा विचारों की प्रधानता होती है। भाषा शुद्ध, परिनिष्ठित और तत्सम शब्दों से युक्त होती है।
इस शैली की विशेषता यह है कि वाक्य प्रायः लंबे होते हैं, किंतु उनमें विचारों की स्पष्ट श्रृंखला विद्यमान रहती है। प्रत्येक वाक्य किसी न किसी विचार-सूत्र से जुड़ा होता है और पाठक को चिंतन के लिए प्रेरित करता है। यह शैली द्विवेदी जी की बौद्धिक गहराई और वैचारिक दृढ़ता को अभिव्यक्त करती है।

4. वर्णनात्मक शैली

जब द्विवेदी जी का उद्देश्य किसी घटना, स्थान, स्थिति या अनुभव का विवरण प्रस्तुत करना होता है, तब वे वर्णनात्मक शैली का प्रयोग करते हैं। इस शैली में वस्तुस्थिति को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करने पर बल दिया जाता है।
उनके आत्मकथात्मक और संस्मरणात्मक निबंधों में भी यही शैली प्रमुख रूप से दिखाई देती है। भाषा सरल, स्पष्ट और तथ्यात्मक होती है। वर्णन में न तो अनावश्यक भावुकता होती है और न ही अलंकारों की अधिकता। उद्देश्य केवल विषय को स्पष्ट और सजीव रूप में पाठक के सामने रखना होता है।

5. हास्य–व्यंग्य शैली

यद्यपि द्विवेदी जी मूलतः गंभीर लेखक माने जाते हैं, तथापि उनके निबंधों में हास्य–व्यंग्य शैली का भी सफल प्रयोग मिलता है। विशेषकर सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों, प्रशासनिक अव्यवस्थाओं और नैतिक पतन पर वे व्यंग्यपूर्ण ढंग से प्रहार करते हैं।
इस शैली में उनकी भाषा अपेक्षाकृत सरल हो जाती है और वाक्य छोटे, चुटीले तथा प्रभावशाली होते हैं। हास्य का प्रयोग वे मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि सुधार की भावना से करते हैं। व्यंग्य उनके लिए सामाजिक चेतना जगाने का माध्यम बन जाता है।

शैलीगत विविधता का महत्व

द्विवेदी जी की शैलीगत विविधता यह सिद्ध करती है कि वे केवल एक विचारधारा या एक शैली तक सीमित लेखक नहीं थे। उन्होंने निबंध को एक लचीली और बहुपयोगी विधा के रूप में विकसित किया। विषय के अनुसार शैली का चयन उनकी साहित्यिक परिपक्वता और व्यावहारिक दृष्टिकोण का प्रमाण है।

इस प्रकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की निबंधात्मक शैली भावात्मक, गवेषणात्मक, विचारात्मक, वर्णनात्मक तथा हास्य–व्यंग्यात्मक—सभी रूपों में समान रूप से सशक्त दिखाई देती है। उनकी शैली में भाषा की शुद्धता, विचारों की स्पष्टता और उद्देश्य की दृढ़ता सदैव बनी रहती है।
हिंदी भाषा का संस्कार और परिष्कार करने वाले द्विवेदी जी वास्तव में हिंदी साहित्य के महान साधक थे, जिन्होंने निबंध को गरिमा, अनुशासन और वैचारिक ऊँचाई प्रदान की।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की रचनाएँ : एक समग्र परिचय

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के उन विरल साहित्यकारों में हैं, जिनकी रचनात्मक प्रतिभा एकांगी न होकर बहुआयामी थी। उन्होंने मौलिक लेखन, अनुवाद, निबंध, आलोचना, समालोचना और जीवनी—सभी विधाओं में समान अधिकार के साथ लेखन किया। उनकी रचनाओं का मूल उद्देश्य हिंदी भाषा को संस्कारित करना, साहित्य को बौद्धिक आधार प्रदान करना और पाठकों में विवेकपूर्ण दृष्टि का विकास करना था। उनके ग्रंथ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, बल्कि भाषा, संस्कृति और विचारधारा के क्षेत्र में भी मार्गदर्शक सिद्ध होते हैं।

1. मौलिक ग्रंथ

महावीर प्रसाद द्विवेदी के मौलिक ग्रंथ उनके स्वतंत्र चिंतन, साहित्यिक विवेक और भाषिक अनुशासन के सशक्त प्रमाण हैं। इन ग्रंथों में उन्होंने साहित्य, भाषा, काव्यशास्त्र और सांस्कृतिक विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।
‘अद्भुत आलाप’, ‘सुकवि संकीर्तन’ और ‘वाग्विलास’ जैसे ग्रंथों में उनकी काव्य-दृष्टि और सौंदर्यबोध स्पष्ट होता है। वहीं ‘साहित्य संदर्भ’, ‘विचार-विमर्श’, ‘साहित्य सीकर’ और ‘रसज्ञ रंजन’ जैसे ग्रंथ उनके आलोचनात्मक और विवेचनात्मक पक्ष को सामने लाते हैं।
‘कालिदास की निरंकुशता’ तथा ‘कालिदास और उनकी कविता’ में उन्होंने संस्कृत के महाकवि कालिदास का गहन और निर्भीक मूल्यांकन किया है, जो उनकी आलोचनात्मक साहसिकता को दर्शाता है।
भाषा-चिंतन से संबंधित ‘हिंदी भाषा की उत्पत्ति’ जैसे ग्रंथों में द्विवेदी जी का भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण परिलक्षित होता है। इसके अतिरिक्त ‘अतीत स्मृति’ जैसे ग्रंथ उनके आत्मपरक और स्मृतिमूलक लेखन का प्रतिनिधित्व करते हैं।

2. अनूदित ग्रंथ

द्विवेदी जी का अनुवाद कार्य भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने संस्कृत और पाश्चात्य साहित्य के अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों को हिंदी में प्रस्तुत कर हिंदी को समृद्ध किया।
संस्कृत महाकाव्यों में ‘रघुवंश’, ‘किरातार्जुनीयम्’, ‘कुमारसम्भव सार’ और ‘ऋतु तरंगिणी’ के उनके अनुवाद उल्लेखनीय हैं। इन अनुवादों में उन्होंने मूल ग्रंथ की गरिमा बनाए रखते हुए सरल और संस्कृतनिष्ठ हिंदी का प्रयोग किया है।
‘हिंदी महाभारत’ के माध्यम से उन्होंने भारतीय महाकाव्य परंपरा को सामान्य हिंदी पाठकों तक पहुँचाया।
पाश्चात्य चिंतन के क्षेत्र में ‘बेकन विचारमाला’, ‘शिक्षा’ और ‘स्वाधीनता’ जैसे अनूदित ग्रंथ उनकी व्यापक बौद्धिक दृष्टि के परिचायक हैं। इसके अतिरिक्त ‘गंगा लहरी’ जैसे काव्यात्मक अनुवाद उनकी काव्य-संवेदना को भी उजागर करते हैं।

3. निबंध साहित्य

महावीर प्रसाद द्विवेदी को आधुनिक हिंदी निबंध का शिल्पकार कहा जाता है। उनके निबंध विषयवस्तु, भाषा और शैली—तीनों दृष्टियों से अत्यंत समृद्ध हैं।
‘नाट्यशास्त्र’, ‘कवि और कविता’ तथा ‘कवि बनने के लिए अपेक्षित साधन’ जैसे निबंध साहित्यिक सिद्धांतों और काव्य-दृष्टि से जुड़े हैं।
‘भाषा और व्याकरण’ तथा ‘संपत्तिशास्त्र’ जैसे निबंध उनके तर्कशील और वैचारिक लेखन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
यात्रा और वर्णनात्मक निबंधों में ‘नेपाल’ और ‘आगरे की शाही इमारतें’ उल्लेखनीय हैं।
आत्मपरक और सामाजिक व्यंग्य से जुड़े निबंधों में ‘आत्म निवेदन’, ‘प्रभात’ तथा ‘म्यूनिसिपैलिटी के कारनामे’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जिनमें उनकी वर्णनात्मक और हास्य-व्यंग्य शैली का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

4. जीवनी और चरित्र-साहित्य

द्विवेदी जी ने जीवनी और चरित्र-लेखन के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
‘प्राचीन पंडित और कवि’ तथा ‘चरित्र चर्चा’ जैसे ग्रंथों में उन्होंने विद्वानों और साहित्यकारों के व्यक्तित्व तथा कृतित्व का मूल्यांकन किया है। इन रचनाओं में उनका उद्देश्य केवल जीवन-घटनाओं का विवरण देना नहीं, बल्कि उन व्यक्तियों के बौद्धिक और नैतिक योगदान को रेखांकित करना रहा है।

5. आलोचना और समालोचना

आलोचना के क्षेत्र में द्विवेदी जी की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
‘आलोचनांजलि’ जैसे ग्रंथों में उन्होंने साहित्यिक कृतियों का विवेकपूर्ण और निर्भीक मूल्यांकन किया।
इसके अतिरिक्त ‘समालोचना समुच्चय’ और ‘नैषधचरित चर्चा’ जैसे ग्रंथ उनके शास्त्रीय और आलोचनात्मक विवेचन के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन रचनाओं में उनकी आलोचना दृष्टि तर्क, प्रमाण और भाषिक अनुशासन पर आधारित है।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की रचनाएँ (तालिकात्मक प्रस्तुति)

महावीर प्रसाद द्विवेदी की रचनाएँ विषय और विधा की दृष्टि से अत्यंत विविध हैं। उन्होंने मौलिक लेखन, अनुवाद, निबंध, आलोचना और जीवनी—सभी क्षेत्रों में हिंदी साहित्य को समृद्ध किया।

क्रमरचना का वर्गप्रमुख रचनाएँ
1.मौलिक ग्रंथअद्भुत आलाप, सुकवि संकीर्तन, साहित्य संदर्भ, विचार-विमर्श, रसज्ञ रंजन, संकलन, साहित्य सीकर, कालिदास की निरंकुशता, कालिदास और उनकी कविता, हिंदी भाषा की उत्पत्ति, अतीत स्मृति, वाग्विलास
2.अनूदित ग्रंथरघुवंश, हिंदी महाभारत, ऋतु तरंगिणी, कुमारसम्भव सार, किरातार्जुनीयम्, बेकन विचारमाला, शिक्षा, स्वाधीनता, गंगा लहरी
3.निबंध साहित्यनाट्यशास्त्र, कवि और कविता, कवि बनने के लिए अपेक्षित साधन, संपत्तिशास्त्र, उपन्यास रहस्य, भाषा और व्याकरण, नेपाल, आगरे की शाही इमारतें, आत्म निवेदन, प्रभात, म्यूनिसिपैलिटी के कारनामे
4.जीवनी / चरित्र साहित्यप्राचीन पंडित और कवि, चरित्र चर्चा
5.आलोचना ग्रंथआलोचनांजलि
6.समालोचनासमालोचना समुच्चय, नैषधचरित चर्चा

इस प्रकार महावीर प्रसाद द्विवेदी की रचनाएँ विषय, विधा और दृष्टि—तीनों स्तरों पर अत्यंत व्यापक हैं। उन्होंने मौलिक लेखन से लेकर अनुवाद, निबंध, आलोचना और जीवनी तक हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उनकी रचनाओं में भाषा की शुद्धता, विचारों की गंभीरता और साहित्यिक उत्तरदायित्व का भाव सर्वत्र दिखाई देता है।
निस्संदेह, उनकी रचनात्मक विरासत हिंदी साहित्य को न केवल दिशा देती है, बल्कि उसे बौद्धिक और सांस्कृतिक दृढ़ता भी प्रदान करती है।

निष्कर्ष

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के ऐसे स्तंभ हैं, जिनके बिना आधुनिक हिंदी साहित्य की कल्पना अधूरी है। उन्होंने हिंदी को केवल भाषा नहीं, बल्कि संस्कृति, चेतना और राष्ट्रबोध का माध्यम बनाया। ‘द्विवेदी युग’ वस्तुतः हिंदी साहित्य का संस्कार युग है, जिसने आगे आने वाले छायावाद और आधुनिक साहित्य के लिए मजबूत आधार तैयार किया।

इस प्रकार महावीर प्रसाद द्विवेदी न केवल एक महान साहित्यकार थे, बल्कि हिंदी भाषा के शिल्पकार, अनुशासक और युगनिर्माता भी थे।


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