अध्यापक सरदार पूर्णसिंह : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली

हिन्दी निबन्ध साहित्य के इतिहास में जिन लेखकों ने अपने सीमित रचना-कार्य के बावजूद अमिट छाप छोड़ी है, उनमें अध्यापक सरदार पूर्णसिंह का नाम अत्यन्त सम्मान और आदर के साथ लिया जाता है। वे युगीन निबन्धकारों में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। भावात्मक निबन्धों के क्षेत्र में उनकी पहचान इतनी सशक्त है कि उन्हें हिन्दी में अद्वितीय कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

उनके निबन्धों में भावनाओं की गहनता, विचारों की प्रखरता, भाषा की लाक्षणिकता तथा जीवन के प्रति वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। हिन्दी साहित्य में उन्होंने केवल छः निबन्ध लिखे, किन्तु इन छः निबन्धों ने उन्हें अमर बना दिया। उनकी रचनाएँ आज भी पाठकों को संवेदना, नैतिकता और मानवता का पाठ पढ़ाती हैं।

अध्यापक पूर्णसिंह केवल हिन्दी तक सीमित लेखक नहीं थे। उन्होंने पंजाबी और अंग्रेजी भाषाओं में भी महत्वपूर्ण लेखन किया। बहुभाषी प्रतिभा, गहन बौद्धिकता और आध्यात्मिक चेतना के कारण उनका व्यक्तित्व जितना विराट था, उतना ही संघर्षपूर्ण भी।

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अध्यापक सरदार पूर्णसिंह : संक्षिप्त परिचयात्मक तथ्य (तालिका)

शीर्षकविवरण
पूरा नामसरदार पूर्ण सिंह
जन्म17 फरवरी 1881 ई.
जन्मस्थानएबटाबाद, सलहद गाँव, सीमाप्रांत (वर्तमान पाकिस्तान)
पिता का नामसरदार करतार सिंह भागर
पिता का परिचयसरकारी कर्मचारी
साहित्यिक युगद्विवेदी युग
साहित्यिक पहचानश्रेष्ठ निबन्धकार
मृत्यु1931 ई.
प्रमुख रचनाएँसच्ची वीरता, आचरण की सभ्यता, मजदूरी और प्रेम, अमेरिका का मस्त जोगी वाल्ट हिटमैन, कन्यादान, पवित्रता (सभी निबन्ध)
भाषा-शैलीहिन्दी भाषा में उर्दू के प्रचलित शब्दों तथा संस्कृत की तत्सम शब्दावली का संतुलित प्रयोग
शैली की विशेषताभावात्मक शैली की प्रधानता
हिन्दी साहित्य में स्थानहिन्दी के प्रमुख एवं विशिष्ट निबन्धकार

सरदार पूर्णसिंह का जीवन-परिचय

अध्यापक सरदार पूर्णसिंह हिन्दी निबन्ध साहित्य के ऐसे विशिष्ट लेखक हैं, जिन्होंने सीमित रचनाओं के माध्यम से भी अमर प्रतिष्ठा प्राप्त की। वे भावात्मक निबन्धों के अद्वितीय रचनाकार माने जाते हैं। उनके निबन्धों में जीवन, प्रेम, नैतिकता और मानव मूल्यों की गहरी अनुभूति मिलती है। भाषा की लाक्षणिकता और विचारों की प्रखरता उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है। हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेजी—तीनों भाषाओं में लेखन कर उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया।

जन्म और प्रारम्भिक जीवन

सरदार पूर्णसिंह का जन्म 17 फरवरी सन् 1881 ई. में हुआ था। उनका जन्मस्थान एबटाबाद जिला था, जो वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित है। उस समय यह क्षेत्र ब्रिटिश भारत का हिस्सा था। उनका परिवार साधारण था, किन्तु बौद्धिक वातावरण से युक्त था, जिसने उनके व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

शिक्षा

पूर्णसिंह जी की प्रारम्भिक शिक्षा रावलपिण्डी में हुई। उन्होंने वहीं से मैट्रिक तक की शिक्षा प्राप्त की। आगे की पढ़ाई के लिए वे लाहौर गए, जहाँ से उन्होंने इण्टरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण की।

विज्ञान के प्रति उनकी गहरी रुचि थी। इसी रुचि के कारण वे रसायन शास्त्र की उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। उनकी प्रतिभा और योग्यता को देखकर उन्हें सन् 1900 ई. में एक विशेष छात्रवृत्ति प्राप्त हुई और वे उच्च शिक्षा के लिए जापान चले गए।

जापान प्रवास और शिक्षा

जापान उस समय एशिया का एक उन्नत राष्ट्र माना जाता था। वहाँ उन्होंने इम्पीरियल यूनिवर्सिटी में तीन वर्षों तक रसायन शास्त्र का अध्ययन किया। जापान में रहते हुए उन्होंने न केवल वैज्ञानिक शिक्षा प्राप्त की, बल्कि वहाँ की संस्कृति, अनुशासन और जीवन-दृष्टि से भी प्रभावित हुए।

यही वह समय था जब उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।

स्वामी रामतीर्थ से भेंट और संन्यास जीवन

जापान में ही सरदार पूर्णसिंह की भेंट महान भारतीय सन्त स्वामी रामतीर्थ से हुई। स्वामी रामतीर्थ का व्यक्तित्व अत्यन्त तेजस्वी, आध्यात्मिक और प्रेरणादायक था। उनके विचारों और जीवन-दर्शन ने पूर्णसिंह जी को गहराई से प्रभावित किया।

स्वामी रामतीर्थ के प्रभाव में आकर पूर्णसिंह जी ने संन्यास ग्रहण कर लिया। उन्होंने सांसारिक मोह-माया को त्याग दिया और स्वामी जी के साथ भारत लौट आए। इस काल में उनका जीवन पूर्णतः आध्यात्मिक साधना और आत्मान्वेषण में व्यतीत हुआ।

किन्तु जीवन की यात्रा यहीं नहीं रुकी।

पुनः गृहस्थ जीवन की ओर

स्वामी रामतीर्थ की अकाल मृत्यु के बाद पूर्णसिंह जी के विचारों में पुनः परिवर्तन आया। उन्होंने अनुभव किया कि जीवन केवल त्याग में ही नहीं, बल्कि कर्म और दायित्व में भी सार्थक हो सकता है। परिणामस्वरूप उन्होंने संन्यास त्याग दिया और विवाह कर गृहस्थ जीवन को स्वीकार किया।

यह परिवर्तन उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण चरण था, जिसने उनके विचारों को और अधिक व्यापक एवं संतुलित बना दिया। आध्यात्म और व्यवहार, विज्ञान और भावना—इन सभी का समन्वय उनके व्यक्तित्व में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।

अध्यापन जीवन और संघर्ष

फॉरेस्ट कॉलेज, देहरादून

गृहस्थ जीवन अपनाने के बाद सरदार पूर्णसिंह को देहरादून के फॉरेस्ट कॉलेज में अध्यापक की नौकरी मिली। यहाँ उन्होंने पूरी निष्ठा और लगन से अध्यापन कार्य किया। इसी संस्था से उनके नाम के साथ ‘अध्यापक’ शब्द स्थायी रूप से जुड़ गया और वे आगे चलकर अध्यापक पूर्णसिंह के नाम से प्रसिद्ध हुए।

ग्वालियर राज्य सेवा

कुछ समय बाद उन्होंने फॉरेस्ट कॉलेज से त्याग-पत्र दे दिया और ग्वालियर महाराज की सेवा में चले गए। प्रारम्भ में सब कुछ ठीक रहा, किन्तु दरबारियों के षड्यंत्रों के कारण महाराज से उनका मनमुटाव हो गया। परिणामस्वरूप उन्हें यह नौकरी भी छोड़नी पड़ी।

कृषक जीवन और आर्थिक संघर्ष

नौकरी छोड़ने के बाद वे पंजाब के जडांवाला गाँव में आकर बस गए और कृषि कार्य करने लगे। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्हें भयंकर आर्थिक अभाव का सामना करना पड़ा। एक महान विचारक और लेखक का यह संघर्षपूर्ण जीवन हिन्दी साहित्य के इतिहास में करुण उदाहरण प्रस्तुत करता है।

निधन

अध्यापक पूर्णसिंह का निधन सन् 1931 ई. में हुआ। यद्यपि उनका जीवन अपेक्षाकृत छोटा रहा, किन्तु उनका साहित्यिक योगदान अत्यन्त विशाल और स्थायी है।

सरदार पूर्णसिंह की साहित्यिक कृतियाँ

अध्यापक पूर्णसिंह की हिन्दी में कुल छः निबन्ध उपलब्ध हैं। संख्या की दृष्टि से ये भले ही कम हों, पर गुणवत्ता, विचार-गहनता और भावात्मक प्रभाव की दृष्टि से ये अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।

हिन्दी में उपलब्ध निबन्ध

  1. सच्ची वीरता
  2. आचरण की सभ्यता
  3. मजदूरी और प्रेम
  4. अमेरिका का मस्त जोगी वाल्ट हिटमैन
  5. कन्यादान
  6. पवित्रता

इन छः निबन्धों के बल पर ही उन्होंने हिन्दी गद्य साहित्य में अपना अमिट स्थान बना लिया।

निबन्धों की विषयवस्तु और दृष्टि

अध्यापक पूर्णसिंह ने निबन्ध लेखन के लिए मुख्यतः नैतिक और मानवीय विषयों का चयन किया। उनके निबन्धों में—

  • मानव मूल्य
  • नैतिकता
  • प्रेम
  • पवित्रता
  • श्रम की गरिमा
  • सच्ची वीरता
  • स्त्री-सम्मान

जैसे विषयों पर गहन विचार प्रस्तुत किए गए हैं।

उनकी जीवन-दृष्टि की प्रमुख विशेषता अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय है। वे न तो केवल भावुक थे और न ही केवल तर्कशील। उनके विचार संतुलित, व्यावहारिक और जीवन से जुड़े हुए हैं।

भावात्मक निबन्धकार के रूप में पूर्णसिंह

अध्यापक पूर्णसिंह को हिन्दी का श्रेष्ठ भावात्मक निबन्धकार माना जाता है। उनके निबन्धों में भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति मिलती है। वे पाठक के हृदय को सीधे स्पर्श करते हैं।

भावात्मक निबन्धों में जहाँ सामान्यतः विचारों की कमी हो जाती है, वहीं पूर्णसिंह जी के निबन्धों में भाव और विचार दोनों का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।

भाषा-शैली और लाक्षणिकता

अध्यापक पूर्णसिंह की भाषा उनकी सबसे बड़ी विशेषता है। उनकी भाषा—

  • सरल
  • प्रवाहमयी
  • लाक्षणिक
  • काव्यात्मक

है। वे प्रतीकों, उपमानों और रूपकों का अत्यन्त सुंदर प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा में भावों की गहराई और सौन्दर्य दोनों विद्यमान हैं। हिन्दी निबन्धकारों में उनकी लाक्षणिक शैली अत्यन्त दुर्लभ मानी जाती है।

अध्यापक पूर्णसिंह की भाषा की प्रमुख विशेषताएँ

हिन्दी निबन्ध साहित्य में अध्यापक सरदार पूर्णसिंह की पहचान केवल उनके भावात्मक निबन्धों के कारण ही नहीं, बल्कि उनकी विशिष्ट और प्रभावशाली भाषा-शैली के कारण भी है। उनकी भाषा में विचारों की गहराई, भावों की तीव्रता और शब्दों का सजीव प्रयोग देखने को मिलता है। वे भाषा को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं मानते, बल्कि उसे विचार और संवेदना का वाहक बनाते हैं। उनकी भाषा में उर्दू, फारसी और संस्कृत—तीनों का संतुलित और स्वाभाविक प्रयोग दिखाई देता है।

उर्दू शब्दावली का सहज प्रयोग

अध्यापक पूर्णसिंह की भाषा की एक प्रमुख विशेषता उर्दू के प्रचलित शब्दों का स्वाभाविक प्रयोग है। उनके निबन्धों में प्रयुक्त उर्दू शब्द किसी बाहरी तत्व की तरह नहीं लगते, बल्कि भाषा के सहज अंग बनकर आते हैं। इससे उनके गद्य में एक विशेष प्रकार की सरलता, प्रवाह और भावात्मक गहराई उत्पन्न हो जाती है।

उनके समय में उर्दू और फारसी शब्दों का सामाजिक तथा साहित्यिक जीवन में व्यापक प्रचलन था। अतः उन्होंने युगीन परिवेश के अनुरूप अपनी भाषा में इन शब्दों का प्रयोग किया। यह प्रयोग न तो कृत्रिम है और न ही दिखावटी, बल्कि पूर्णतः स्वाभाविक है। उनकी भाषा में हिन्दी और उर्दू का ऐसा सुंदर मेल देखने को मिलता है, जो उनके विचारों को अधिक प्रभावी बना देता है।

इस मिली-जुली भाषा के माध्यम से वे जटिल भावों को भी सरल और सहज रूप में प्रस्तुत कर पाते हैं। उदाहरणस्वरूप, उनके गद्य में धार्मिक, नैतिक और मानवीय संदर्भों की व्याख्या करते समय उर्दू शब्द भाषा को अधिक जीवंत और संवेदनशील बना देते हैं। इससे पाठक के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है और विचार सीधे हृदय तक पहुँचते हैं।

संस्कृत-बहुल तत्सम शब्दावली का प्रभावी प्रयोग

उर्दू शब्दों के साथ-साथ अध्यापक पूर्णसिंह की भाषा में संस्कृत की तत्सम शब्दावली का भी सशक्त और सार्थक प्रयोग देखने को मिलता है। विशेष रूप से जब वे जीवन, पवित्रता, आचरण, नैतिकता और आध्यात्मिक विषयों पर विचार प्रकट करते हैं, तब संस्कृत-प्रधान भाषा उनके विचारों को गम्भीरता और गरिमा प्रदान करती है।

संस्कृतनिष्ठ शब्दों के प्रयोग से उनकी भाषा न केवल अर्थपूर्ण बनती है, बल्कि उसमें एक प्रकार की दार्शनिक ऊँचाई भी आ जाती है। इसके बावजूद उनकी भाषा कहीं भी बोझिल नहीं होती। उन्होंने संस्कृत शब्दों का चयन अत्यन्त सावधानी से किया है, जिससे भाषा में न तो क्लिष्टता आती है और न ही प्रवाह में बाधा उत्पन्न होती है।

उनकी भाषा में संस्कृत शब्दों के प्रयोग से गद्य में गंभीरता और सरसता का दुर्लभ समन्वय दिखाई देता है। जीवन के गूढ़ प्रश्नों पर विचार करते हुए भी उनकी भाषा पाठक को बाँधकर रखती है। उनके निबन्धों में यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि संस्कृत-बहुल शब्दावली विचारों को दृढ़ता और स्थायित्व प्रदान करती है।

मिश्रित भाषा-शैली का सौंदर्य

अध्यापक पूर्णसिंह की भाषा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे उर्दू और संस्कृत—दोनों भाषाओं के शब्दों को संतुलित रूप में प्रयोग करते हैं। इस मिश्रित भाषा-शैली के कारण उनका गद्य न तो अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ बनता है और न ही केवल उर्दू-प्रधान। यही संतुलन उनकी भाषा को प्रभावशाली, प्रवाहपूर्ण और सर्वग्राह्य बनाता है।

उनकी भाषा में किसी प्रकार का विलय दोष नहीं दिखाई देता। प्रत्येक शब्द अपने स्थान पर सटीक और सार्थक है। यही कारण है कि उनकी भाषा विचारों की गहराई के साथ-साथ भावों की तीव्रता को भी पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करती है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि अध्यापक पूर्णसिंह की भाषा उनकी साहित्यिक प्रतिभा का सशक्त आधार है। उर्दू शब्दों की सहजता और संस्कृत शब्दों की गंभीरता—दोनों का संतुलित प्रयोग उनकी भाषा को विशिष्ट बनाता है। उनकी भाषा न केवल विचारों को स्पष्ट करती है, बल्कि पाठक के हृदय को भी स्पर्श करती है। यही कारण है कि उनके निबन्ध आज भी भाषा-सौंदर्य और भावात्मक अभिव्यक्ति के श्रेष्ठ उदाहरण माने जाते हैं।

अध्यापक पूर्णसिंह की शैलीगत विशेषताएँ

हिन्दी निबन्ध साहित्य में अध्यापक सरदार पूर्णसिंह की विशिष्ट पहचान उनकी अनोखी शैली के कारण है। उनके निबन्ध केवल विचारों का प्रस्तुतीकरण नहीं हैं, बल्कि अनुभूतियों और संवेदनाओं की सजीव अभिव्यक्ति हैं। उनकी शैली में भाव, कल्पना, प्रतीक और व्यंजना का ऐसा समन्वय मिलता है, जो हिन्दी गद्य को काव्य के निकट पहुँचा देता है। वे गद्य में भी काव्यात्मक सौंदर्य भर देते हैं और पाठक को भावनात्मक स्तर पर बाँध लेते हैं।

भावात्मक शैली की प्रधानता

अध्यापक पूर्णसिंह मूलतः भावात्मक निबन्धकार हैं, इसलिए उनके निबन्धों में भावात्मक शैली सर्वाधिक प्रभावशाली रूप में दिखाई देती है। वे अपने अनुभवों और विचारों को शुष्क तर्कों के रूप में प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि भावनाओं के आवरण में लपेटकर पाठक के सामने रखते हैं। उनकी लेखनी में हृदय की अनुभूतियाँ प्रधान रहती हैं और विचार उन्हीं भावों से उत्पन्न होकर आगे बढ़ते हैं।

उनकी भाषा में काव्यात्मकता का सहज प्रवाह दिखाई देता है। कई स्थानों पर ऐसा प्रतीत होता है मानो लेखक किसी विषय पर विचार नहीं कर रहा, बल्कि भाव-विभोर होकर आत्मसंवाद कर रहा हो। इस शैली में प्रस्तुत विचार पाठक के मन को स्पर्श करते हैं और उसे गहराई से प्रभावित करते हैं। मौन, आचरण, प्रेम और पवित्रता जैसे विषयों पर लिखते समय उनकी भावनात्मक दृष्टि अत्यन्त प्रभावशाली हो उठती है।

लाक्षणिक शैली की अद्वितीयता

अध्यापक पूर्णसिंह की शैली की सबसे विशिष्ट और मौलिक विशेषता उनकी लाक्षणिक अभिव्यक्ति है। हिन्दी निबन्ध साहित्य में इस प्रकार की लाक्षणिकता बहुत कम देखने को मिलती है। वे साधारण कथन को भी प्रतीकों और संकेतों के माध्यम से असाधारण बना देते हैं।

उनकी लाक्षणिक शैली भाषा को केवल सजावटी नहीं बनाती, बल्कि उसमें गहन अर्थ और व्यापक व्यंजना भर देती है। उनके वाक्य विचारों को मूर्त रूप प्रदान करते हैं। अमूर्त भाव—जैसे आचरण, करुणा, पवित्रता और प्रेम—उनकी लेखनी में सजीव और दृश्य रूप में सामने आते हैं।

इस शैली के कारण उनके निबन्धों में सहजता, प्रवाह, रोचकता और रमणीयता उत्पन्न होती है। पाठक प्रत्येक पंक्ति में निहित अर्थ की परतों को धीरे-धीरे खोलता चलता है। यही लाक्षणिकता उनके गद्य को अन्य निबन्धकारों से अलग और विशिष्ट बनाती है।

चित्रात्मक शैली का सौंदर्य

अध्यापक पूर्णसिंह की शैली में चित्रात्मकता भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। वे शब्दों के माध्यम से ऐसे दृश्य उपस्थित कर देते हैं, मानो पाठक अपनी आँखों से उन्हें देख रहा हो। उनके निबन्धों में वर्णित दृश्य केवल कल्पना नहीं लगते, बल्कि सजीव चित्रों के रूप में उभर आते हैं।

इस शैली में निबन्धकार का अभिप्रेत अर्थ स्पष्ट और मूर्त हो उठता है। विशेष रूप से जब वे सामाजिक या नैतिक पतन की ओर संकेत करते हैं, तब उनकी चित्रात्मक भाषा पाठक को झकझोर देती है। उनके अनेक निबन्धों में ऐसी चित्रोपम अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं, जो विचार को गहराई और प्रभाव दोनों प्रदान करती हैं।

हास्य-व्यंग्य शैली का प्रयोग

यद्यपि अध्यापक पूर्णसिंह मुख्यतः भावात्मक निबन्धकार हैं, फिर भी उनकी शैली में हास्य और व्यंग्य का भी यथास्थान प्रयोग देखने को मिलता है। वे विशेष रूप से धार्मिक आडम्बरों, खोखली परम्पराओं और बौद्धिक दिखावे पर तीखा व्यंग्य करते हैं।

उनका हास्य हल्का-फुल्का न होकर अर्थपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण होता है। वे हास्य के माध्यम से गम्भीर विषयों को सरल और बोधगम्य बना देते हैं। कभी-कभी उनकी व्यंग्यात्मक टिप्पणी पाठक को मुस्कराने पर विवश कर देती है, तो कभी उसे सोचने के लिए बाध्य कर देती है। यही संतुलन उनकी शैली को और अधिक प्रभावी बनाता है।

अध्यापक सरदार पूर्णसिंह की शैली बहुआयामी और अत्यन्त प्रभावशाली है। भावात्मकता, लाक्षणिकता, चित्रात्मकता और हास्य-व्यंग्य—इन सभी शैलियों का संतुलित प्रयोग उनके निबन्धों को विशिष्ट बनाता है। उनकी शैली न केवल विचारों को अभिव्यक्त करती है, बल्कि पाठक के मन और हृदय दोनों को प्रभावित करती है। यही कारण है कि हिन्दी निबन्ध साहित्य में उनकी शैली आज भी अनुपम और अनुकरणीय मानी जाती है।

अध्यापक पूर्णसिंह का हिन्दी साहित्य में स्थान

हिन्दी साहित्य के इतिहास में कुछ लेखक ऐसे हुए हैं जिनकी रचनात्मक मात्रा सीमित रही, किन्तु उनके विचारों की गहराई और प्रभाव इतना व्यापक रहा कि वे स्थायी प्रतिष्ठा प्राप्त कर सके। अध्यापक सरदार पूर्णसिंह ऐसे ही रचनाकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने हिन्दी में बहुत अधिक निबन्ध नहीं लिखे, परन्तु उनकी रचनाएँ भाव, विचार और दृष्टि—तीनों स्तरों पर अत्यन्त प्रभावशाली हैं। इसी कारण हिन्दी निबन्ध साहित्य में उनका स्थान विशिष्ट और सम्मानपूर्ण माना जाता है।

सीमित रचना, व्यापक प्रभाव

अध्यापक पूर्णसिंह ने हिन्दी में मात्र छः निबन्धों की रचना की, परन्तु इन निबन्धों की वैचारिक सुदृढ़ता और भावात्मक गहराई ने उन्हें सामान्य निबन्धकारों की पंक्ति से अलग खड़ा कर दिया। उनकी रचनाएँ संख्या में कम होने के बावजूद अर्थ और प्रभाव की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध हैं। हिन्दी निबन्ध के क्षेत्र में उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि साहित्यिक महानता रचनाओं की संख्या पर नहीं, बल्कि उनके गुण और प्रभाव पर निर्भर करती है।

अध्यात्म और विज्ञान का संतुलित समन्वय

अध्यापक पूर्णसिंह का जीवन-दर्शन अध्यात्म और विज्ञान—दोनों के संतुलित समन्वय पर आधारित था। वे न तो केवल आध्यात्मिक भावुकता में विश्वास रखते थे और न ही शुष्क वैज्ञानिक तर्कशीलता में। उनके निबन्धों में आध्यात्मिक चेतना के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही संतुलन उनकी रचनाओं को गहराई और स्थायित्व प्रदान करता है।

उनकी यह दृष्टि उन्हें समकालीन निबन्धकारों से अलग पहचान देती है। वे जीवन को समग्र रूप में देखते हैं और मनुष्य के बाह्य एवं आन्तरिक दोनों पक्षों को समान महत्व देते हैं।

वैचारिक दृष्टि: गांधीवाद और साम्यवाद का समन्वय

अध्यापक पूर्णसिंह की विचारधारा में गांधीवादी मूल्यों और साम्यवादी चेतना का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। उनके निबन्धों में अहिंसा, सत्य, नैतिकता और आत्मसंयम जैसे गांधीवादी आदर्शों की स्पष्ट झलक मिलती है। साथ ही वे श्रम की गरिमा, सामाजिक समानता और मानवीय करुणा जैसे साम्यवादी विचारों को भी महत्व देते हैं।

यह वैचारिक संतुलन उनकी रचनाओं को न तो कट्टर बनाता है और न ही एकांगी। वे समाज को सुधारने की आकांक्षा रखते हैं, परन्तु उसका मार्ग प्रेम, संवेदना और नैतिकता से होकर जाता है।

भारतीय सभ्यता और संस्कृति के संवाहक

अध्यापक पूर्णसिंह के निबन्ध भारतीय सभ्यता और संस्कृति के मूल तत्वों को सशक्त रूप से प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से भारतीय जीवन-मूल्यों, नैतिक परम्पराओं और सांस्कृतिक चेतना को सुरक्षित रखने का प्रयास किया। उनके निबन्धों में भारतीय दृष्टि स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है, चाहे विषय सामाजिक हो या आध्यात्मिक।

वे आधुनिकता के विरोधी नहीं थे, परन्तु अंधानुकरण के पक्षधर भी नहीं। उनके विचारों में परम्परा और आधुनिकता का संतुलन दिखाई देता है, जो भारतीय संस्कृति की मूल विशेषता है।

इस प्रकार हिन्दी साहित्य में अध्यापक सरदार पूर्णसिंह का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण और विशिष्ट है। सीमित रचनाओं के बावजूद उन्होंने हिन्दी निबन्ध को नई दिशा और नई ऊँचाई प्रदान की। अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय, गांधीवाद और साम्यवाद का संतुलित दृष्टिकोण तथा भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी आस्था—ये सभी तत्व उन्हें हिन्दी साहित्य में एक अद्वितीय स्थान प्रदान करते हैं। उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक है और भविष्य में भी पाठकों को प्रेरित करता रहेगा।

निष्कर्ष

अध्यापक सरदार पूर्णसिंह हिन्दी साहित्य के ऐसे निबन्धकार हैं, जिन्होंने कम लिखकर भी बहुत कुछ कह दिया। उनका जीवन संघर्षों से भरा था, किन्तु उनका साहित्य मानवता, प्रेम और नैतिकता का उज्ज्वल प्रकाशस्तंभ है।

भावात्मक निबन्धों के क्षेत्र में उनका स्थान अद्वितीय है। उनके निबन्ध आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने अपने समय में थे। अध्यापक पूर्णसिंह का नाम हिन्दी गद्य साहित्य में सदैव अमर रहेगा।


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