हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल में जिन गद्यकारों ने न केवल समय की नब्ज़ को पहचाना, बल्कि साहित्य को नई संवेदना, नई भाषा और नए शिल्प से समृद्ध किया, उनमें मोहन राकेश का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। वे ऐसे रचनाकार थे जिन्होंने साहित्य को जीवन की यथार्थ भूमि से जोड़ा और मानव मन की जटिलताओं, संबंधों के द्वंद्व तथा आधुनिक समाज की विडम्बनाओं को गहन कलात्मकता के साथ अभिव्यक्त किया। विशेष रूप से हिन्दी नाटक को उन्होंने जो नई दिशा दी, उसने न केवल रंगमंच को समृद्ध किया बल्कि पाठक और दर्शक—दोनों के लिए नाटक को एक सशक्त विधा के रूप में स्थापित किया।
मोहन राकेश आधुनिक परिवेश से जुड़े हुए साहित्यकार थे। उन्होंने कथा-साहित्य, नाटक, यात्रा-वृत्तांत, संस्मरण और निबंध—लगभग सभी गद्य विधाओं में सृजन किया। उनकी रचनाओं में व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा, असंतोष, अधूरापन और आत्मसंघर्ष अत्यंत सजीव रूप में उभरता है। वे किसी आदर्शवादी दुनिया का निर्माण नहीं करते, बल्कि जीवन को जैसा है वैसा ही, उसकी पूरी जटिलता और कटुता के साथ प्रस्तुत करते हैं।
मोहन राकेश : संक्षिप्त जीवन एवं साहित्यिक परिचय (तालिका)
| शीर्षक | विवरण |
|---|---|
| पूरा नाम | मदन मोहन गुगलानी (Madan Mohan Guglani) |
| साहित्यिक नाम | मोहन राकेश |
| जन्म तिथि | 8 जनवरी, 1925 |
| जन्म स्थान | अमृतसर, पंजाब (भारत) |
| मृत्यु तिथि | 3 दिसंबर, 1972 |
| मृत्यु स्थान | नई दिल्ली |
| आयु | 47 वर्ष |
| साहित्य काल | आधुनिक काल |
| पेशा | लेखक, अध्यापक |
| प्रमुख पहचान | नाटककार, उपन्यासकार, कथाकार |
| साहित्यिक आंदोलन | नई कहानी आंदोलन के प्रमुख प्रवर्तकों में से एक |
| प्रमुख विधाएँ | नाटक, उपन्यास, कहानी, निबंध, यात्रा-वृत्तांत, डायरी लेखन, एकांकी |
| प्रमुख नाट्य कृतियाँ | आषाढ़ का एक दिन, आधे-अधूरे, लहरों के राजहंस |
| अन्य प्रमुख रचनाएँ | अंधेरे बंद कमरे, आखिरी चट्टान तक, क्वार्टर, पहचान |
| भाषा | खड़ी बोली हिन्दी, अंग्रेज़ी |
| शिक्षा | पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में एम.ए. |
| अध्यापन कार्य | बम्बई, शिमला, जालंधर तथा दिल्ली विश्वविद्यालय |
| सम्पादन कार्य | ‘सारिका’ (हिन्दी साहित्यिक पत्रिका) |
| प्रमुख पुरस्कार | संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1968) |
| अन्य सम्मान | नेहरू फेलोशिप |
| विशेष उपलब्धि | हिन्दी का प्रथम आधुनिक नाटक “आषाढ़ का एक दिन“ |
| ऐतिहासिक महत्व | आषाढ़ का एक दिन को संगीत नाटक अकादमी द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ |
मोहन राकेश जी का जीवन-परिचय
मोहन राकेश का जन्म 8 जनवरी, 1925 ईस्वी को पंजाब के ऐतिहासिक नगर अमृतसर में हुआ। उनके पिता श्री करमचन्द गुगलानी पेशे से वकील थे, किंतु साहित्य और संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। पिता के इसी साहित्यिक और सांस्कृतिक परिवेश का प्रभाव मोहन राकेश के व्यक्तित्व और रचनात्मक चेतना पर पड़ा। दुर्भाग्यवश, मोहन राकेश को बहुत कम उम्र में ही पिता का साया खोना पड़ा। मात्र 16 वर्ष की आयु में उनके पिता का निधन हो गया, जिसने उनके जीवन पर गहरा मानसिक प्रभाव डाला।
मोहन राकेश के पूर्वज मूलतः सिंध प्रांत के निवासी थे। विभाजन पूर्व का यह सांस्कृतिक मिश्रण और विस्थापन की स्मृतियाँ भी कहीं-न-कहीं उनकी संवेदनशीलता को गढ़ने में सहायक बनीं। बचपन से ही वे अध्ययनशील थे और साहित्य के प्रति उनका झुकाव स्पष्ट दिखाई देने लगा था।
शिक्षा और बौद्धिक निर्माण
मोहन राकेश की प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में ही संपन्न हुई। आगे चलकर उन्होंने लाहौर स्थित ‘ओरियन्ट कॉलेज’ से ‘शास्त्री’ की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से अंग्रेजी तथा हिन्दी—दोनों विषयों में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। इस प्रकार उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि द्विभाषी और बहुसांस्कृतिक रही, जिसका प्रभाव उनकी भाषा-शैली और साहित्यिक दृष्टि पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
अंग्रेजी साहित्य के अध्ययन ने उन्हें आधुनिक पश्चिमी साहित्यिक प्रवृत्तियों से परिचित कराया, जबकि हिन्दी और संस्कृत की शिक्षा ने उन्हें भारतीय परंपरा से जोड़े रखा। इसी संतुलन के कारण वे न तो पूरी तरह परंपरावादी बने और न ही अंधाधुंध आधुनिकता के अनुयायी।
अध्यापन और संपादन कार्य
शिक्षा पूर्ण करने के बाद मोहन राकेश ने अध्यापन का कार्य प्रारंभ किया। उन्होंने बम्बई, शिमला, जालंधर तथा दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अध्यापन किया। यद्यपि वे विद्वान और कुशल शिक्षक थे, किंतु अध्यापन कार्य में उन्हें विशेष संतोष नहीं मिला। उनका मन सृजनात्मक लेखन की ओर अधिक आकृष्ट रहता था।
इसी कारण उन्होंने अध्यापन से त्यागपत्र देकर साहित्य को ही अपना पूर्णकालिक कर्मक्षेत्र बनाने का निश्चय किया। सन् 1962-63 के दौरान उन्होंने हिन्दी की प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका ‘सारिका’ का संपादन किया। संपादक के रूप में भी उन्होंने समकालीन साहित्य को नई दृष्टि देने का प्रयास किया, किंतु कुछ समय बाद उन्होंने यह कार्य भी छोड़ दिया।
सन् 1963 से 1972 तक, लगभग नौ वर्षों तक, मोहन राकेश ने स्वतंत्र लेखन किया। यह काल उनके रचनात्मक जीवन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और सघन समय माना जाता है। इसी अवधि में उनकी अधिकांश चर्चित कृतियाँ सामने आईं।
मोहन राकेश जी का वैवाहिक जीवन
मोहन राकेश का वैवाहिक जीवन अत्यंत जटिल और संघर्षपूर्ण रहा। उनका पहला विवाह सन् 1950 में शुशीला से हुआ। यह संबंध अधिक समय तक नहीं चल सका और शुशीला अपने पुत्र के साथ देहरादून में रहने लगीं।
दूसरा विवाह सन् 1960 में पुष्पा नामक महिला से हुआ, जो मूलतः जालंधर की रहने वाली थीं। यह विवाह भी शीघ्र ही टूट गया। इन असफल वैवाहिक संबंधों का प्रभाव उनकी मानसिक स्थिति और रचनाओं पर भी पड़ा। उनकी कृतियों में जो टूटन, अकेलापन और संबंधों की विफलता दिखाई देती है, वह उनके निजी जीवन से गहराई से जुड़ी हुई प्रतीत होती है।
सन् 1963 में उनका तीसरा विवाह अनीता औलख से हुआ। विवाह के समय अनीता की आयु मात्र 21 वर्ष थी। इस विवाह से मोहन राकेश को कुछ हद तक मानसिक संतुलन और भावनात्मक सहारा मिला। हालांकि, उनका यह वैवाहिक जीवन भी पूर्णतः सुखी नहीं कहा जा सकता।
मोहन राकेश की मृत्यु के बाद अनीता राकेश दिल्ली के कैलाश के पूर्व क्षेत्र में रहने लगीं। उन्होंने मोहन राकेश की साहित्यिक विरासत को सहेजने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका आत्मकथात्मक लेखन ‘अतिरिक्त संतरें’ पहले हिन्दी पत्रिका ‘सारिका’ में क्रमबद्ध रूप से प्रकाशित हुआ और बाद में सन् 2002 में पुस्तकाकार प्रकाशित किया गया।
नेहरू फेलोशिप और असमय निधन
सन् 1971 में मोहन राकेश को ‘नाटक की भाषा’ विषय पर कार्य करने के लिए प्रतिष्ठित नेहरू फेलोशिप प्रदान की गई। यह उनके साहित्यिक योगदान की औपचारिक स्वीकृति थी। दुर्भाग्यवश, वे इस परियोजना को पूरा नहीं कर सके। स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ, मानसिक तनाव और पारिवारिक उलझनों ने उनके जीवन को धीरे-धीरे जकड़ लिया।
अंततः 3 दिसम्बर, 1972 ईस्वी को दिल्ली में मात्र 47 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। हिन्दी साहित्य के लिए यह एक अपूरणीय क्षति थी। इतनी अल्पायु में ही उन्होंने जो साहित्यिक विरासत छोड़ी, वह उन्हें अमर बनाने के लिए पर्याप्त है।
सम्मान एवं दायित्व
मोहन राकेश के साहित्यिक और नाट्य योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक मान्यता प्राप्त हुई। उन्हें न केवल प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, बल्कि साहित्य और रंगमंच से जुड़ी महत्वपूर्ण संस्थाओं में दायित्व भी सौंपे गए। उनके प्रमुख सम्मान और दायित्व इस प्रकार हैं—
1. प्रमुख सम्मान
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1968) — हिन्दी नाटक आषाढ़ का एक दिन के लिए प्रदान किया गया।
- नेहरू फेलोशिप — ‘नाटक की भाषा’ विषय पर शोध कार्य के लिए प्रदान की गई।
2. महत्वपूर्ण दायित्व एवं सदस्यताएँ
- फिल्म सेंसर बोर्ड के सदस्य — भारतीय सिनेमा से संबंधित नीतिगत एवं मूल्यांकन कार्यों में सहभागिता।
- राष्ट्रीय नाटक विद्यालय (NSD) समिति के सदस्य — हिन्दी रंगमंच और नाट्य-शिक्षा के विकास से जुड़े निर्णयों में सक्रिय भूमिका।
मोहन राकेश जी का साहित्यिक परिचय और दृष्टि
मोहन राकेश आधुनिक हिन्दी साहित्य के उन गद्यकारों में से हैं जिन्होंने यथार्थ को केंद्र में रखकर साहित्य सृजन किया। उन्होंने जीवन के बाहरी आवरण के बजाय उसकी आंतरिक सच्चाइयों को उजागर किया। उनके पात्र आदर्श नहीं, बल्कि साधारण मनुष्य हैं—संघर्षरत, असंतुष्ट और अक्सर अधूरे।
हिन्दी नाट्य साहित्य में भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद के बाद यदि किसी नाटककार ने नाटक को आधुनिक संवेदना प्रदान की, तो वह मोहन राकेश ही हैं। उन्होंने हिन्दी नाटक को केवल पढ़ने की विधा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे रंगमंच से जोड़ा और मंचीय संभावनाओं को विस्तृत किया।
यात्रा-वृत्तांतों में उन्होंने सर्वथा मौलिक और नवीन शैली का प्रयोग किया। उनके यात्रा-विवरण केवल स्थानों का वर्णन नहीं करते, बल्कि यात्रियों के मनोभाव, सांस्कृतिक अनुभव और आत्मचिंतन को भी अभिव्यक्त करते हैं।
संस्मरण लेखन में भी मोहन राकेश की विशिष्टता स्पष्ट दिखाई देती है। वे किसी व्यक्ति या घटना का केवल विवरण नहीं देते, बल्कि उसका सजीव चित्र प्रस्तुत करते हैं। इसी कारण उनके संस्मरण अत्यंत प्रभावशाली बन पड़े हैं। समकालीन साहित्यकार उन्हें स्नेहपूर्वक ‘महानायक’ कहकर संबोधित करते थे।
मोहन राकेश जी की प्रमुख कृतियाँ
उपन्यास
मोहन राकेश के उपन्यास आधुनिक व्यक्ति के अकेलेपन, दांपत्य जीवन की विफलता और मानसिक द्वंद्व को अभिव्यक्त करते हैं। उनके प्रमुख उपन्यास हैं—
- अंधेरे बंद कमरे
- न आने वाला कल
- अंतराल
- नीली रोशनी की बाँहें
इन उपन्यासों में व्यक्ति और समाज के बीच की दूरी तथा संबंधों की टूटन को अत्यंत सूक्ष्मता से चित्रित किया गया है।
कहानी-संग्रह
मोहन राकेश के तीन प्रमुख कहानी-संग्रह हैं—
- क्वार्टर
- पहचान
- वारिस
इन तीनों संग्रहों में कुल 54 कहानियाँ संकलित हैं। इन कहानियों में शहरी मध्यवर्गीय जीवन, पारिवारिक तनाव और आत्मसंघर्ष की सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है।
निबंध-संग्रह
उनके निबंध-संग्रह ‘परिवेश’ और ‘वकलम खुद’ में साहित्य, समाज और जीवन से जुड़े विचार प्रस्तुत किए गए हैं।
यात्रा-विवरण
‘आखिरी चट्टान तक’ उनका प्रमुख यात्रा-वृत्तांत है, जिसमें उनकी विशिष्ट शैली और संवेदनशील दृष्टि दिखाई देती है।
जीवनी और डायरी
‘समय सारथी’ उनका जीवनी-संकलन है। इसके अतिरिक्त ‘मोहन राकेश की डायरी’ (अनीता राकेश के संपादन में) उनके निजी जीवन और रचनात्मक संघर्षों को समझने में सहायक है।
नाट्य कृतियाँ
मोहन राकेश की नाट्य कृतियाँ हिन्दी नाटक के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती हैं—
- आषाढ़ का एक दिन (संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1968)
- लहरों के राजहंस
- आधे-अधूरे
एकांकी और अनूदित नाटक
उनके एकांकी संकलनों में ‘अंडे के छिलके’, ‘अन्य एकांकी तथा बीजनाटक’ और ‘दूध और दांत’ (अप्रकाशित) उल्लेखनीय हैं।
इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘मृच्छकटिकम्’ और ‘शाकुंतलम्’ जैसे संस्कृत नाटकों का सफल हिन्दी रूपांतरण भी किया।
मोहन राकेश की प्रमुख कृतियाँ (विधावार तालिका)
| विधा | कृति / रचना | वर्ष / टिप्पणी |
|---|---|---|
| उपन्यास | अंधेरे बंद कमरे | 1971 |
| न आने वाला कल | 1968 | |
| अन्तराल | 1972 | |
| काँपता हुआ दरिया | अपूर्ण | |
| नीली रोशनी की बाँहें | — | |
| नाटक | आषाढ़ का एक दिन | — |
| लहरों के राजहंस | — | |
| आधे-अधूरे | — | |
| पैरों तले की जमीन | अधूरा, कमलेश्वर द्वारा पूर्ण | |
| सिपाही की माँ | — | |
| प्यालियाँ टूटती हैं | — | |
| रात बीतने तक | — | |
| छतरियाँ | — | |
| शायद | — | |
| हँः | — | |
| एकांकी | अण्डे के छिल्के | — |
| बहुत बड़ा सवाल | — | |
| कहानी-संग्रह | इंसान के खंडहर | 1950 |
| नये बादल | 1957 | |
| जानवर और जानवर | 1958 | |
| पाँच लंबी कहानियाँ | 1960 | |
| एक और जिंदगी | 1961 | |
| फौलाद का आकाश | 1966 | |
| क्वार्टर | 1973 | |
| पहचान | 1973 | |
| वारिस | 1973 | |
| एक घटना | 1974 | |
| संपूर्ण कहानी संग्रह | 1984 | |
| निबंध-संग्रह | परिवेश | — |
| अनुवाद | मृच्छकटिकम् | संस्कृत नाटक का हिन्दी अनुवाद |
| शाकुंतलम् | संस्कृत नाटक का हिन्दी अनुवाद | |
| यात्रा-वृत्तांत | आखिरी चट्टान तक | — |
मोहन राकेश जी : भाषागत विशेषताएँ
मोहन राकेश की भाषा उनके रचनात्मक व्यक्तित्व की सबसे सशक्त पहचान है। उनकी भाषा विषय और प्रसंग के अनुरूप अपना स्वरूप ग्रहण करती है—कहीं वह अत्यंत सरल और सहज दिखाई देती है, तो कहीं गम्भीर, विचारप्रधान और संवेदनशील रूप धारण कर लेती है। उन्होंने हिन्दी साहित्य में खड़ी बोली का प्रयोग किया है, जो तत्सम शब्दावली से समृद्ध, शुद्ध, परिमार्जित तथा संस्कृतनिष्ठ होने के साथ-साथ पूर्णतः व्यावहारिक भी है।
राकेश जी की भाषा की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि वे आवश्यकतानुसार उर्दू और अंग्रेजी शब्दों का भी स्वाभाविक प्रयोग करते हैं। यह प्रयोग कहीं भी कृत्रिम नहीं लगता, बल्कि आधुनिक जीवन की वास्तविकता को और अधिक प्रामाणिक बना देता है। इस कारण उनकी भाषा न तो बोझिल बनती है और न ही कृत्रिम शुद्धता का आडंबर ओढ़ती है।
उनकी भाषा में लाक्षणिकता और व्यंजना की प्रधानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वे सीधे कथन के स्थान पर संकेतों और बिम्बों के माध्यम से भावों को व्यक्त करना अधिक पसंद करते हैं। प्रकृति के बाह्य सौन्दर्य को व्यक्त करते समय उनकी शब्द-योजना अत्यंत सटीक, संवेदनशील और प्रभावकारी होती है। दृश्य, ध्वनि और अनुभूति—तीनों स्तरों पर भाषा जीवंत हो उठती है।
मोहन राकेश भाषा के माध्यम से संवेदनाओं को उभारने में अत्यंत दक्ष हैं। मानव मन की सूक्ष्म अंतर्वृत्तियों, मानसिक द्वंद्व और भावनात्मक उलझनों को उन्होंने जिस कुशलता से अभिव्यक्त किया है, वह उन्हें भाषा का सच्चा शिल्पी सिद्ध करता है। विशेष रूप से उनके नाटकों में संवादों की भाषा पात्रों के मनोभावों को गहराई से उद्घाटित करती है।
मोहन राकेश जी : शैलीगत विविधता
मोहन राकेश की रचनाओं की एक महत्वपूर्ण विशेषता उनकी शैलीगत बहुलता है। वे किसी एक निश्चित शैली तक सीमित नहीं रहते, बल्कि विषय, विधा और भावभूमि के अनुरूप अपनी शैली का स्वरूप परिवर्तित करते हैं। उनकी रचनाओं में वर्णनात्मक, भावात्मक, चित्रात्मक और विवरणात्मक—अनेक शैलियों का सफल प्रयोग देखने को मिलता है।
1. वर्णनात्मक शैली
मोहन राकेश की कहानियों, उपन्यासों, नाटकों और यात्रा-वृत्तांतों में वर्णनात्मक शैली का व्यापक प्रयोग हुआ है। उनके वर्णन सजीव, सप्राण और अत्यंत प्रभावशाली होते हैं। वे किसी दृश्य या स्थिति का ऐसा चित्र प्रस्तुत करते हैं कि पाठक के मन में वह दृश्य साकार हो उठता है।
इस शैली में उन्होंने भाषा और शब्द-योजना का अत्यंत संतुलित प्रयोग किया है। अनावश्यक विस्तार से बचते हुए भी वे पूर्ण दृश्य उपस्थित कर देते हैं। पात्रों की गतिविधियाँ, परिवेश और मानसिक स्थिति—सब कुछ इस शैली के माध्यम से स्पष्ट हो जाता है।
उदाहरणस्वरूप, यात्रा-वृत्तांतों में यात्रियों, मार्गों और वातावरण का उनका चित्रण पाठक को स्वयं यात्रा का अनुभव करा देता है।
उद्धरण (आखिरी चट्टान तक से):
“यात्रियों की कई टोलियाँ उस रास्ते पर बढ़ी चली जा रही थीं। कोई तेज़ था, कोई धीमा, पर सबके भीतर एक अजीब-सी बेचैनी थी, जैसे मंज़िल उन्हें अपनी ओर खींच रही हो।”
विश्लेषण
इस उद्धरण में लेखक ने साधारण-सी यात्रा को भी अर्थपूर्ण बना दिया है। ‘बेचैनी’ और ‘खींच रही हो’ जैसे शब्दों के माध्यम से यात्रा केवल भौतिक न रहकर मानसिक अनुभव बन जाती है। यह राकेश जी की वर्णनात्मक शैली की प्रमुख विशेषता है—जहाँ दृश्य के साथ भाव भी जुड़ जाता है।
यह उदाहरण दर्शाता है कि लेखक साधारण दृश्य को भी प्रभावपूर्ण वर्णन के माध्यम से अर्थपूर्ण बना देता है।
2. भावात्मक शैली
भावात्मक शैली का प्रयोग मोहन राकेश ने विशेष रूप से अपने नाटकों में किया है। जहाँ पात्र अपनी आंतरिक पीड़ा, असंतोष, प्रेम, अकेलेपन या संघर्ष को व्यक्त करते हैं, वहाँ यह शैली प्रभावी रूप में सामने आती है।
इस शैली में भाषा अपेक्षाकृत गम्भीर, शुद्ध और संस्कृतनिष्ठ हो जाती है। भावों की गहनता के कारण वाक्य संरचना प्रायः लंबी होती है और उनमें आलंकारिकता का भी समावेश दिखाई देता है। पात्रों के संवाद केवल कथन नहीं रहते, बल्कि उनके मन की गहराइयों को उद्घाटित करते हैं।
भावात्मक शैली के माध्यम से मोहन राकेश आधुनिक मनुष्य की भावनात्मक विडम्बनाओं और संबंधों की जटिलता को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
उद्धरण (आधे-अधूरे से):
“इस घर में रहते हुए भी हम सब एक-दूसरे के लिए अजनबी हैं।”
“मैं किसी से कुछ नहीं माँगती, बस यह चाहती हूँ कि कोई मुझे समझ सके।”
विश्लेषण
यह संवाद अत्यंत सरल है, किंतु इसके भीतर गहरी भावनात्मक वेदना छिपी हुई है। यहाँ किसी घटना का वर्णन नहीं, बल्कि पात्र की मानसिक स्थिति का उद्घाटन है। यही भावात्मक शैली की पहचान है, जिसमें कम शब्दों में गहन अनुभूति व्यक्त होती है।
यह संवाद पात्र की मानसिक स्थिति, अकेलेपन और भावनात्मक रिक्तता को प्रभावी ढंग से प्रकट करता है।
3. चित्रात्मक शैली
प्रकृति-चित्रण के प्रसंगों में मोहन राकेश की चित्रात्मक शैली विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे शब्दों के माध्यम से दृश्य, ध्वनि और भाव—तीनों का ऐसा संयोजन प्रस्तुत करते हैं कि पाठक के मन में एक सजीव चित्र उभर आता है।
इस शैली में उनकी भाषा सरल, सरस और प्रवाहपूर्ण होती है। वाक्य अपेक्षाकृत छोटे होते हैं, जिससे वर्णन में गति बनी रहती है। साथ ही, बिम्ब-विधायिनी शक्ति के कारण वर्णन काव्यात्मक सौन्दर्य से भी युक्त हो जाता है। कहीं-कहीं यह शैली कविता के निकट पहुँच जाती है, किंतु गद्य की स्वाभाविकता बनी रहती है।
उद्धरण (आखिरी चट्टान तक से):
“सूरज पानी की सतह से छू गया था। चारों ओर फैला हुआ प्रकाश लगातार रंग बदल रहा था, मानो क्षण-क्षण नया रूप ले रहा हो।”
विश्लेषण
इस उद्धरण में ‘पानी की सतह’, ‘फैला हुआ प्रकाश’ और ‘रंग बदलना’—ये सभी शब्द दृश्य को आँखों के सामने उपस्थित कर देते हैं। भाषा में काव्यात्मकता और बिम्ब-विधायिनी शक्ति स्पष्ट दिखाई देती है, जो चित्रात्मक शैली की पहचान है।
यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि लेखक दृश्य को शब्दों में चित्रित करने की अद्भुत क्षमता रखता है।
4. विवरणात्मक शैली
मोहन राकेश के यात्रा-वृत्तांतों में विवरणात्मक शैली का प्रभावशाली प्रयोग देखने को मिलता है। वे घटनाओं और दृश्यों का ऐसा सूक्ष्म विवरण प्रस्तुत करते हैं कि पाठक स्वयं को उस स्थान और स्थिति में उपस्थित अनुभव करने लगता है।
इस शैली में उनका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं होता, बल्कि अनुभव को जीवंत बनाना होता है। मानव जीवन, प्रकृति के सौन्दर्य और यात्रा के मानसिक प्रभाव—इन सभी का विवरण अत्यंत वास्तविक और प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है। उनके विवरणों में न तो अनावश्यक विस्तार होता है और न ही सतहीपन; बल्कि प्रत्येक शब्द अनुभव की प्रामाणिकता को बढ़ाता है।
उद्धरण (आखिरी चट्टान तक से):
“एक के बाद एक कई टीले पार करने पड़े। पैरों में थकान थी, पर हर अगले टीले पर पहुँचकर मन में उम्मीद फिर जाग उठती थी।”
विश्लेषण
यहाँ लेखक शारीरिक थकान और मानसिक उत्साह—दोनों को एक साथ व्यक्त करता है। विवरण केवल बाहरी नहीं है, बल्कि आंतरिक अनुभव से भी जुड़ा हुआ है। यही राकेश जी की विवरणात्मक शैली की विशेषता है।
इस उदाहरण से स्पष्ट है कि लेखक विवरण के साथ मनःस्थिति को भी अभिव्यक्त करता है।
5. संवादात्मक शैली
मोहन राकेश की संवादात्मक शैली विशेष रूप से उनके नाटकों में अत्यंत प्रभावी रूप में सामने आती है। उनके संवाद कृत्रिम नहीं होते, बल्कि जीवन के अत्यंत निकट होते हैं। संवादों के माध्यम से पात्रों का स्वभाव, मानसिक स्थिति और पारिवारिक-सामाजिक तनाव उजागर हो जाता है।
उद्धरण (आषाढ़ का एक दिन से):
“कलिदास, क्या जीवन में कभी ऐसा नहीं होता कि हम सब कुछ पाकर भी खाली रह जाते हैं?”
विश्लेषण
यह संवाद केवल एक प्रश्न नहीं है, बल्कि पूरे नाटक की दार्शनिक संवेदना को अभिव्यक्त करता है। संवाद के माध्यम से जीवन की रिक्तता और आत्मसंघर्ष उजागर होता है। यह संवादात्मक शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
यह छोटा-सा संवाद पूरे नाटक की केंद्रीय समस्या को उजागर कर देता है।
मोहन राकेश किसी एक शैली के लेखक नहीं हैं। वे विषय और विधा के अनुसार अपनी शैली को ढालने में पूर्णतः सक्षम हैं। वर्णनात्मक, भावात्मक, चित्रात्मक, विवरणात्मक और संवादात्मक—इन सभी शैलियों के सफल प्रयोग ने उनकी रचनाओं को गहराई, प्रभाव और स्थायित्व प्रदान किया है। यही शैलीगत विविधता उन्हें हिन्दी साहित्य में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि मोहन राकेश भाषा और शैली—दोनों के ही सशक्त साधक हैं। उनकी भाषा संवेदनशील, सजीव और अर्थगर्भित है, जबकि उनकी शैली विषयानुकूल रूप बदलने में सक्षम है। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ आज भी पाठकों और रंगमंच—दोनों के लिए उतनी ही प्रभावशाली और प्रासंगिक बनी हुई हैं।
हिन्दी साहित्य में स्थान
मोहन राकेश आधुनिक हिन्दी साहित्य के ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने अपने सृजनात्मक योगदान के बल पर एक विशिष्ट और स्थायी स्थान प्राप्त किया है। वे उस पीढ़ी के साहित्यकार थे, जिसने स्वतंत्रता के बाद के भारतीय समाज की बदलती हुई चेतना, मूल्यों के विघटन और व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा को साहित्य का केंद्रीय विषय बनाया। उनकी रचनाएँ केवल साहित्यिक प्रयोग नहीं हैं, बल्कि आधुनिक मानव की मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक स्थितियों का प्रामाणिक दस्तावेज भी हैं।
विशेष रूप से हिन्दी नाटक के क्षेत्र में मोहन राकेश का योगदान ऐतिहासिक माना जाता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद के बाद हिन्दी नाटक को जिस आधुनिक, यथार्थवादी और मनोवैज्ञानिक धरातल पर उन्होंने स्थापित किया, उसने नाट्य साहित्य की दिशा ही बदल दी। उनकी नाट्यकृतियाँ—आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे—अपने कथ्य, संवाद और मंचीय संरचना की दृष्टि से सर्वथा नवीन हैं। ये नाटक केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि मंच पर प्रस्तुत किए जाने की दृष्टि से रचे गए हैं। इसी कारण उन्हें हिन्दी रंगमंच का सशक्त स्तंभ माना जाता है।
मोहन राकेश ‘नई कहानी आंदोलन’ के भी प्रमुख प्रवर्तकों में गिने जाते हैं। उनकी कहानियों में पारंपरिक कथानक के स्थान पर व्यक्ति की आंतरिक अनुभूतियाँ, संबंधों की जटिलता, अकेलापन और अस्तित्वगत प्रश्न प्रमुखता से उभरते हैं। उन्होंने कहानी को मनोरंजन का साधन न बनाकर आत्मसंघर्ष और यथार्थ-बोध का माध्यम बनाया। इस दृष्टि से वे प्रेमचंदोत्तर कथा-साहित्य को एक नई दिशा देने वाले रचनाकार हैं।
भाषा के स्तर पर मोहन राकेश हिन्दी के अत्यंत कुशल शिल्पी सिद्ध होते हैं। उनकी भाषा न तो अलंकारिक आडंबर से बोझिल है और न ही सामान्य बोलचाल तक सीमित। वे भाषा के माध्यम से भावों, संवेदनाओं और मनःस्थितियों को गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। इसी कारण उन्हें केवल रचनाकार ही नहीं, बल्कि एक प्रबुद्ध चिंतक और मनस्वी साहित्यकार के रूप में भी स्वीकार किया जाता है।
उनकी बहुमुखी प्रतिभा—नाटककार, कथाकार, उपन्यासकार, निबंधकार, यात्रा-वृत्तांत लेखक और संपादक—के रूप में हिन्दी साहित्य को अत्यंत समृद्ध करती है। उन्होंने जिस ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ साहित्य-साधना की, वह उन्हें अपने समय से आगे का रचनाकार सिद्ध करती है। समकालीन साहित्यकारों और आलोचकों ने उन्हें सम्मानपूर्वक ‘महानायक’ की संज्ञा दी, जो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व—दोनों की व्यापक स्वीकृति का प्रमाण है।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मोहन राकेश का स्थान हिन्दी साहित्य में एक ऐसे साहित्यकार का है, जिसने आधुनिक मनुष्य की पीड़ा, असंतोष और अधूरेपन को स्वर दिया। हिन्दी साहित्य उनके योगदान के लिए सदैव ऋणी रहेगा और उनकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और विमर्श का स्रोत बनी रहेंगी।
उपसंहार
मोहन राकेश हिन्दी साहित्य के ऐसे सशक्त हस्ताक्षर हैं जिन्होंने साहित्य को आधुनिक जीवन की सच्चाइयों से जोड़ा। उन्होंने नाटक, कहानी और उपन्यास—तीनों विधाओं में अपनी अमिट छाप छोड़ी। यद्यपि उनका जीवन संघर्षों और विडम्बनाओं से भरा रहा, फिर भी उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रभावशाली हैं। हिन्दी साहित्य में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
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- डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल : जीवन, कृतित्व और हिंदी निबंध साहित्य में योगदान
- कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली
- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली
- प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली
- हरिशंकर परसाई : जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ एवं भाषा-शैली
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