भारत–खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) मुक्त व्यापार समझौता (FTA)

21वीं सदी का वैश्विक परिदृश्य तीव्र आर्थिक प्रतिस्पर्धा, भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और आपूर्ति श्रृंखला के पुनर्गठन से गुजर रहा है। ऐसे समय में देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreements – FTAs) केवल व्यापारिक दस्तावेज नहीं रह गए हैं, बल्कि वे रणनीतिक साझेदारी, ऊर्जा सुरक्षा, निवेश प्रवाह और कूटनीतिक प्रभाव के सशक्त माध्यम बन चुके हैं।

इसी व्यापक वैश्विक संदर्भ में भारत और खाड़ी सहयोग परिषद (Gulf Cooperation Council – GCC) के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 5 फरवरी 2026 को भारत और GCC ने इस FTA की औपचारिक वार्ता प्रारंभ करने के लिए टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस (Terms of Reference – ToR) पर हस्ताक्षर किए। यह घटना भारत की ‘वेस्ट एशिया नीति’, आर्थिक कूटनीति और ऊर्जा-व्यापार रणनीति के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।

यह समझौता न केवल भारत और GCC के बीच व्यापार को नई दिशा देगा, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में भारत की भूमिका को भी सुदृढ़ करेगा।

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टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस (ToR): अर्थ और महत्व

ToR क्या हैं?

टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस (ToR) एक औपचारिक दस्तावेज होता है, जो किसी भी द्विपक्षीय या बहुपक्षीय वार्ता की आधारशिला के रूप में कार्य करता है। यह दस्तावेज भविष्य में होने वाली बातचीत के:

  • दायरे (Scope)
  • तौर-तरीकों (Modalities)
  • संरचना (Structure)
  • समय-सीमा (Timeline)

को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है।

ToR यह सुनिश्चित करता है कि दोनों पक्ष किन-किन क्षेत्रों—जैसे वस्तुओं का व्यापार, सेवाएँ, निवेश, डिजिटल व्यापार, विवाद निपटान तंत्र आदि—पर बातचीत करेंगे। इस प्रकार, ToR वार्ता में स्पष्टता, पारदर्शिता और पूर्वानुमेयता लाता है।

भारत–GCC FTA के लिए ToR का महत्व

भारत–GCC मुक्त व्यापार समझौते के संदर्भ में ToR एक रोडमैप की तरह कार्य करता है। इसके माध्यम से:

  • वार्ताओं में भ्रम की स्थिति से बचाव होता है
  • बातचीत की गति तेज़ होती है
  • व्यापारियों और निवेशकों का विश्वास बढ़ता है
  • समझौते को संतुलित और पारस्परिक रूप से लाभकारी बनाने में सहायता मिलती है

वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनावों के दौर में ToR का यह महत्व और भी बढ़ जाता है।

खाड़ी सहयोग परिषद (GCC): एक परिचय

स्थापना और उद्देश्य

खाड़ी सहयोग परिषद (Gulf Cooperation Council – GCC) छह अरब देशों का एक क्षेत्रीय अंतर-सरकारी, राजनीतिक और आर्थिक संगठन है। इसकी स्थापना 25 मई 1981 को हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच:

  • आर्थिक सहयोग
  • राजनीतिक समन्वय
  • सामूहिक सुरक्षा
  • सामाजिक-सांस्कृतिक सहयोग

को बढ़ावा देना है।

मुख्यालय और सदस्य देश

  • मुख्यालय: रियाद, सऊदी अरब
  • सदस्य देश:
    1. सऊदी अरब (क्षेत्रफल और अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा)
    2. संयुक्त अरब अमीरात (UAE)
    3. कतर
    4. कुवैत
    5. ओमान
    6. बहरीन

GCC की संगठनात्मक संरचना

GCC मुख्यतः तीन स्तरों पर कार्य करता है:

1. सर्वोच्च परिषद (Supreme Council)

यह GCC की सर्वोच्च निर्णय-निर्माण संस्था है। इसमें सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल होते हैं। इसकी अध्यक्षता वर्णमाला क्रम के अनुसार प्रतिवर्ष बदलती रहती है।

2. मंत्रिपरिषद (Ministerial Council)

इस परिषद में सदस्य देशों के विदेश मंत्री शामिल होते हैं। यह नीतियों के निर्माण और सर्वोच्च परिषद के निर्णयों को लागू करने का कार्य करती है।

3. सचिवालय (Secretariat General)

यह GCC की प्रशासनिक इकाई है, जो समन्वय, अनुसंधान और नीतिगत सहायता प्रदान करती है।

GCC की प्रमुख विशेषताएँ

साझा बाजार (Common Market)

GCC देशों के बीच एक कॉमन मार्केट की व्यवस्था है, जिसमें वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और नागरिकों की मुक्त आवाजाही का प्रावधान है।

एक समान सीमा शुल्क

वर्ष 2003 में GCC देशों ने आपसी व्यापार पर सीमा शुल्क समाप्त कर दिया और बाहरी देशों के लिए एक समान बाहरी टैरिफ लागू किया।

सामूहिक रक्षा

GCC का एक संयुक्त सैन्य बल है, जिसे ‘पेनिनसुला शील्ड फोर्स’ (Peninsula Shield Force) कहा जाता है।

भारत–GCC FTA: खबरों में क्यों?

भारत–GCC मुक्त व्यापार समझौता उस समय चर्चा में आया जब 5 फरवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित वाणिज्य भवन में इसके टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस पर हस्ताक्षर किए गए।

इस अवसर पर:

  • भारत की ओर से अजय भादू
  • GCC की ओर से राजा अल मरज़ूकी

ने दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए।

इस महत्वपूर्ण अवसर पर केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल, राज्य मंत्री जितिन प्रसादा और राजेश अग्रवाल भी उपस्थित रहे।

भारत–GCC द्विपक्षीय व्यापार: वर्तमान परिदृश्य (2025–26)

कुल व्यापार

वित्त वर्ष 2024–25 में भारत और GCC देशों के बीच कुल व्यापार 178.56 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। यह भारत के कुल वैश्विक व्यापार का लगभग 15.42% है।

भारत का निर्यात

भारत ने GCC देशों को लगभग 56.87 अरब डॉलर का निर्यात किया, जिसमें प्रमुख वस्तुएँ थीं:

  • इंजीनियरिंग उत्पाद
  • चावल
  • वस्त्र
  • मशीनरी
  • रत्न एवं आभूषण

भारत का आयात

भारत ने GCC देशों से लगभग 121.68 अरब डॉलर का आयात किया, जिसमें मुख्यतः शामिल हैं:

  • कच्चा तेल
  • एलएनजी (Liquefied Natural Gas)
  • पेट्रोकेमिकल्स
  • सोना

व्यापार वृद्धि दर

पिछले पाँच वर्षों में भारत–GCC व्यापार औसतन 15.3% वार्षिक दर से बढ़ा है। FTA के लागू होने से इस वृद्धि में और तेजी आने की संभावना है।

निवेश संबंध: बढ़ती साझेदारी

सितंबर 2025 तक GCC देशों का भारत में संचयी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) 31.14 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो चुका है।

GCC के Sovereign Wealth Funds भारत के:

  • बुनियादी ढाँचे
  • ऊर्जा
  • रियल एस्टेट
  • डिजिटल परियोजनाओं

में निवेश बढ़ाने में रुचि दिखा रहे हैं।

भारत–GCC FTA के अंतर्गत प्रमुख क्षेत्र

1. ऊर्जा क्षेत्र

भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 60% और प्राकृतिक गैस की 70% आवश्यकता GCC देशों से आयात करता है। FTA से ऊर्जा आपूर्ति में स्थिरता और पूर्वानुमेयता आएगी।

2. पेट्रोकेमिकल्स

कच्चे माल की आसान उपलब्धता से भारत के पेट्रोकेमिकल उद्योग को बड़ा लाभ मिलेगा।

3. आईटी और आईसीटी सेवाएँ

खाड़ी देशों के डिजिटल परिवर्तन कार्यक्रमों में भारतीय आईटी कंपनियों के लिए नए अवसर खुलेंगे।

4. बुनियादी ढाँचा

GCC निवेश फंड भारत के गति शक्ति मिशन और अन्य अवसंरचना परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

रणनीतिक और भू-आर्थिक महत्व

ऊर्जा सुरक्षा

FTA भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा और वैश्विक बाजार की अस्थिरता से सुरक्षा प्रदान करेगा।

खाद्य सुरक्षा

भारत के कृषि और खाद्य प्रसंस्करण उत्पाद GCC देशों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे।

प्रवासी भारतीय और प्रेषण

GCC देशों में लगभग 1 करोड़ भारतीय प्रवासी रहते हैं। यह क्षेत्र भारत के लिए 50 अरब डॉलर से अधिक वार्षिक प्रेषण का सबसे बड़ा स्रोत है।

IMEC (India–Middle East–Europe Economic Corridor)

G20 में घोषित यह गलियारा भारत, खाड़ी और यूरोप को जोड़ने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास है, जिसमें UAE और सऊदी अरब की केंद्रीय भूमिका है।

सुरक्षा सहयोग

आतंकवाद-रोधी प्रयासों, समुद्री सुरक्षा और संयुक्त सैन्य अभ्यासों (जैसे ‘अल-मोहद अल-हिन्दी’) में सहयोग लगातार बढ़ रहा है।

निष्कर्ष

भारत–GCC मुक्त व्यापार समझौता केवल व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा, निवेश विस्तार और वैश्विक प्रभाव का एक बहुआयामी मंच है।

टर्म्स ऑफ़ रेफ़रेंस पर हस्ताक्षर इस दिशा में पहला और निर्णायक कदम है, जिसने औपचारिक वार्ताओं का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। यदि यह समझौता संतुलित और दूरदर्शी ढंग से लागू होता है, तो यह भारत को न केवल खाड़ी क्षेत्र बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी एक मजबूत और विश्वसनीय साझेदार के रूप में स्थापित करेगा।


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